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Sippy Khardia

Romance Others

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Sippy Khardia

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कुसूर

कुसूर

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कौन सा ग़म था जो ताज़ा न था

इतना ग़म मिलेगा अंदाज़ा न था

आपकी झील सी आंखों का क्या क़ुसूर

डूबने वाले को ही गहराई का अंदाजा न था

 कभी रज़ामंदी तो कभी बग़ावत है इश्क

मोहब्बत राधा की है तो मीरा की इबादत है इश्क

 कुछ नहीं है आज मेरे शब्दों के गुलदस्ते में 

कभी-कभी मेरी ख़ामोशियां भी पढ़ लिया करो

 बर्बाद कर गए वो जिंदगी प्यार के नाम से

बेवफाई ही मिली सिर्फ वफ़ा के नाम से

 मत खोल मेरी क़िस्मत की किताब को

हर उस शख़्स ने दिल दुखाया जिस पर नाज़ था

 जिंदगी तेरी भी, अजब परिभाषा है

संवर गई तो जन्नत, नहीं तो सिर्फ तमाशा है

 ज़रा सी रंजिश पर न छोड़ किसी अपने का दामन

ज़िंदगी बीत जाती है अपनों को अपना बनाने में

 जाने उस शख़्स को कैसे ये हुनर आता है

रात होती है तो आंखों में उतर आता है

 दिन में न जाने कितनी बार होता है ऐसा

तेरी याद आना और मेरा उदास हो जाना

 उसकी बेरुख़ी ने छीन ली मेरी शरारतें

लोग समझते हैं सुधर गया हूं मैं



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