Prem Kumar Shaw

Drama Inspirational


4.7  

Prem Kumar Shaw

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पिताजी

पिताजी

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अभिनव और परिधि स्कूल से आज थोरी देर से घर आये, उस समय दोपहर के बारह बज चुके थे, जबकि प्राय: वें दोनों ग्यारह के करीब पहुंच जाया करते थे। घर आकर देखा कि माँ उन दोनों भाई बहन के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर रखी है।

माँ ने कहा," क्या बात है आज तुम लोग देरी से घर पहुंचे?"

अभिनव ने कहा," माँ, क्या करें स्कूल से तो साढ़े दस के करीब ही निकल गये थे, पर रास्ते में साइकिल का टायर ही पंचर हो गया और मेरे पास उतने पैसे भी नहीं थे कि इसके पंचर ठीक करवाता, इसीलिए पैदल ही हम दोनों भाई बहन को चार किलोमीटर चल कर आना पड़ा"।

माँ ने कहा," अरे मेरे बच्चों, तुम लोग इतना दूर पैदल चलकर आये, और उन दोनों को आंचल में छिपा रोने लगी ।

वह कहती जा रही थी ..." कितनी बार इनको बोले है इन दोनों को आप स्कूल छोड़ आए और वापस भी लेने जाएं "

पर उसके अंदर यह भी चल रहा था कि यदि वे इन्हें रोजाना स्कूल छोड़ने और लाने जाएं तो फिर मजूरी पर कौन जायेगा।

वह यह सब सोच ही रही थी कि अभिनव ने कहा आज बहुत तेज की भूख लगी है । आप हमें जल्दी भोजन परोसिए।

माँ रसोई में गई । रसोई क्या कहें, वह उनकी छोटी सी झोपड़ी का ही एक किनारा था जिसमें वह खाना बनाया करती थी।

वह अपने दोनों बच्चों के लिए कई प्रकार के पकवान बनाए थी। जिसमें पुआ, पूरी, मटर-आलू की सब्जी, और निमकी भी था। जिससे खूबसूरत सुगंध आ रहा था।

जब खाना दोनों भाई बहनों के पास आया तो वे देख कर माँ से बोले, "माँ आज इतनी सारी चीजें हमारे लिए बनाई हो!!!!"

" जबकि हर रोज उन्हें या तो सुखी रोटी के संग सिर्फ आलू के सब्जी या भात और दाल से ही पेट भर लेना पड़ता था और वे उसी में खुश भी रहते थे।"

माँ ने कहा," हाँ, आज आपलोग दोनों दस वर्ष के हो गए न। इसीलिए आपके पिताजी ने यह सभी चीजें लाकर दी है बनाने के लिए, और आपलोग को आज भरपेट भोजन करवाने के लिए कहा है।

यह सुनते ही अभिनव ने कहा," तब तो आज हम पिताजी के साथ ही खायेंगे। आप उन्हें बुला दीजिए न ।"

माँ ने कहा, "वे तो अभी काम पर गये है, कैसे आयेंगे?"

माँ के कई बार समझाने के बाद वह मान गया और दोनों भाई बहन ने पेटभर भोजन किया।

भोजन कर अभिनव ने माँ से कहा," पिताजी कहाँ काम करने गए हैं? मैं आज उन्हें जल्दी घर लेकर आऊँगा । आज हमारा जन्मदिन है फिर भी वें अभी तक नहीं आए। "

( हर रोज भोर में जाते थे और रात सात के करीब आते थे)

माँ ने कहा," रहने दो बेटा, वें आज जल्दी ही आएंगे, सुबह बोलकर गये है"

पर अभिनव ने ज़िद पकड़ लिया तो माँ ने बता दिया कि, बड़के मालिक के यहाँ काम करते हैं।

( बड़के मालिक जिनका नाम नारायण सिंह था, वे गाँव के मुखिया थे, बहुत शानो-शौकत से रहते थे)

अभिनव यह सुनते ही दौड़ कर बड़के मालिक के यहाँ चला गया जो उसके घर से कम से कम कोई दो किलोमीटर दूर था।

वह वहाँ जाकर अपने पिताजी को कई जगह ढूँढता है।

कहीं उसके पिता जी दिखाई नहीं पड़ते हैं। फिर जब वह मुखिया जी के घर के अंदर देखता है तो अचंभित रह जाता है।

उसके पिताजी बड़के मालिक के पैरों पर गिर कर मजदूरी माँग रहे । पर मुखिया जी को तनिक भी तरस नहीं आ रहा है।

वें कह रहे हैं," अरे, तोहरा के एकर पहिला हफ्ता ही नू एक हजार रूपया देले रहनी "( तुम्हें पिछले सप्ताह ही न एक हजार रूपया दिए थे)

पिताजी कह रहे," मालिक उतना में तो कैसे भी चलावत ही बानी घर पर आज बचवन के जन्मदिन रहे त ओकनी खातिर पुआ पकवान मेहर के बोल आइल हई बनाए के"(

मालिक उतना में तो चला ही रहे हैं घर, पर आज दोनों बच्चों का जन्म दिन है तो पत्नी को बोल आया हूँ पुआ - पकवान बनाने के लिए)

बड़के मालिक गाली देते हुए कहते हैं..." भगबे कि न मादर... एहिजा से। ले दूसो रुपिया और जो एही में चला लिहे कुछ दिन और सुन काल भोरे आ जहिए बहुत काम बा ।( भाग यहां से मादर....। ले यह दो सौ रुपए और सुन कल भोर में ही आ जाना बहुत काम है।)

पिताजी कहते हैं, "जी मालिक, और रोते हुए वहां से घर के लिए चल देते हैं"

पिता के लड़खड़ाते पैर को देख,

अभिनव जो भले ही दस वर्ष का एक बच्चा है पर समझदार तो है।

वह अपने पिता के कष्ट को महसूस करता है। वह वहीं छूप कर रोने लगता है।

और सोचता है..." पिताजी जी स्वयं बहुत कष्ट सह रहे और हमें पता भी नहीं चल रहा। वें हमारे लिए मर रहे हैं और मालिकों की लानते-मलानते सुन रहे है ।

यहीं पर अभिनव ठान लेता है कि उसे अपने पिता के दर्द को दूर करना है किसी भी तरह।

इसी विचार में वह भी घर की और चल दिया जिधर उसके पिताजी चले जा रहे थे।

पंद्रह वर्ष बार अभिनव कलेक्टर बन गया था और परिधि, जिसका विवाह भी हो गया था, वह विश्वविद्यालय में अध्यापिका बन गई थी। और दोनों ही अपनी पूर्व की परछाइयों को धूमिल करते आ रहे थे जहाँ उनके माता-पिता को सिर्फ दर्द मिल रहा था।

" पिता को अब मालिक की गाली नहीं सुननी पड़ती और न ही माँ को तवे पर हाथ जलाना पड़ता।"


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