STORYMIRROR

Madan lal Rana

Romance Tragedy

4  

Madan lal Rana

Romance Tragedy

पहला-पहला प्यार

पहला-पहला प्यार

9 mins
402

तब मैं जानता भी नहीं था कि प्यार किस चिड़ियां का नाम है. मेरा मन गहन पीड़ा से विकल हो उठता है जब मुझे अपने बीते प्यार याद आती है,जिसे बेरहम दुनिया ने अपने उसूलों और स्वाभिमान के पैरों तले कुचला डाला था.


कुछ धुंधली सी यादें हैं जिसके मेरे मानस पटल पर उभरते ही मैं बेचैन हो उठता हूं.मेरी आत्मा चित्कार कर उठती है.दिल पानी-पानी हो जाता है.

काश.! मैंने प्यार नहीं किया होता.

तब मैं मुश्किल से सत्रह साल का यह होउंगा जब यह घटना घटी थी.मेेेरे पड़ोस में एक लड़की रहती थी जो देखने में ऐसी थी कि एक बार उस पर नजर पड़ जाय तो फिर उसे निहारते रहने के लिए दिल नजरों को मजबूर कर दे.मैैंने पहली बार उसे तब देखा जब वह सज-संवर कर अपने छत पर खड़ी थी.उसके हाथ में एक किताब थी जिसे वह छत के एक कोने से दूसरे कोने तक परेड सी करती हुई पढ़ रही थी,और मैं मंत्र-मुग्ध होकर उसे देख रहा था.

अचानक उसकी नज़र मुझ पर पड़ी तो वह चौंक कर ठिठक गयी और कुछ नाराजगी के भाव से मुझे देखने लगी..मै झेंप सा गया.मुझे लगा कि मेरी जहान भर की खुशियों पर अचानक बिजलियां आ गिरी हों.

मेरी टांगें कांपने लगीं और मैं वहां अधिक देर तक खड़ा ना रह सका.शीघ्र ही नजरें चुराकर मैं वहां से हट गया लेकिन जब मैंने छुपकर उसे देखा तो वो जहां की तहां खड़ी थी और टकटकी बांधे मेरी छत की तरफ ताका रही थी परन्तु मेरा अपराधी मन उसके सम्मुख जाने से डर रहा था.मुझे इस बात का गहरा अफसोस था कि मैंने बेवजह उसके दिल को ठेस पहचाई.मेरा मन आत्मग्लानि और पश्चाताप से भर उठा था.

कुछ देर बाद जाकर देखा तो वह जा चुकी थी.मुझे डर लगा कि इस बात की शिकायत कहीं वह अपने घर वालों से ना कर दे.मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

अगले दिन डरते-डरते मैं फिर अपनी छत पर पहुंचा.वह पहले की तरह हाथ में किताब लेकर परेड सी करती हुई कुछ पढ़ रही थी और कभी-कभी वह सर घूमाकर मेरी छत की तरफ भी देख लिया करती थी.मैं अपराध बोध से ग्रस्त उसे मात्र छुप कर ही देख रहा था.उसकी केवल एक झलक से ही मेरे बेचैन दिल को राहत मिल गई थी.उसकी प्यारी-प्यारी अदाओं से मेरी आंखों को जैसे अमृत सी तृप्ति मिल रही थी.उसके चेहरे से आंखें हटाने का दिल नहीं कर रहा था.न जाने कितनी देर तक मैं उसे यों ही निहारता रहा.जब वह चली गई तो मैं भी वहां से खिसक पड़ा.

मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरे दिल को यह करता हो गया है.उसकी मात्र एक झलक पाने को मेरा मन हमेशा क्यों व्यग्र रहने लगा था.जब वह अपनी छत पर आती थी तो मैं भी दौड़ कर अपनी छत पर आ जाता और दीवार की ओट में छिपकर घंटों निहारता रहता.

उसे देखने का मेरा यह तरीका काफी समय तक चलता रहा.इस दौरान मैंने नोट किया कि प्रतिदिन वह मेरी छत की तरफ खोजपूर्ण दृष्टि से देखा करती थी और मुझे ना पाकर निराश हो जाती थी.उसकी आंखों में मैंने शिकायत और अफसोस के मिले-जुले भाव देखे.मेरे प्रति उसके चेहरे पर शिकायत के भाव शायद इसलिेए थे कि मैं उसे दिखाई नहीं पड़ता था और अफ़सोस शायद इसीलिए कि उसने मुझे खो दिया था.उसकी ऐसी हालत पर मेरा दिल पसीज गया और अंततः एक दिन मैं उसकी आंखों के घेेेरे में आ खड़ा हुआ.

इस बार वह काफी देर तक मुझे निहारती रही और मैं मुर्खों की तरह बिना पलकें झपकाये उसे ताकता रहा फिर जब मेरी तंद्रा भंग हुई घबराकर पीछे मुड़ा और जैसे ही भागने को उद्धत हुआ वह खिलखिलाकर हंस पड़ी.उसकी खिलखिलाहट मेरे कानों में मधुर संगीत की तरह देर तक गूंजती रही.

उसकी इस प्रतिक्रिया पर मेरा मन नाच तो उठा था पर मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर वो हंसी क्यों.?हो सकता है कि मेरी घबराहट पर उसकी हंसी छूट गई हो.

खैर जो भी हो तत्क्षण् मैं वहां से हट गया.इस घटना के बाद मैं तय नहीं कर पा रहा था कि अब उसके सामने जाऊं या नहीं.उसकी इस प्रतिक्रिया ने मुझे अजीब सी उलझन में डाल दिया था.

दिल और दिमाग में कई दिनों के संघर्ष के बाद आखिर एक दिन मैं उसके सामने आ ही गया और धड़कते दिल से उसकी तरफ देखा.वह मंद-मंद मुस्कान बिखेर रही थी.उसे देखकर मेरी प्यासी आत्मा को तृप्ति मिली और मेरा बेचैन दिल लगभग शांत हो गया.मेेेरा अपराध बोध जो अब तक मेरा पीछा कर रहा था वह भी न जाने पल भर में कहां गायब हो गया था.  

उसके बाद हम दोनों के दिलों की सरिता में हमारे प्यार की छोटी सी कश्ति आहिस्ता-आहिस्ता अपनी मंजिल की तरफ बढ़ने लगी.धीरे-धीरे मेरे अंदर की झिझक और संकोच कम होता चला गया.मगर अफसोस तो यह था की अबतक न तो मैं उससे अपने दिल की बात कह सका था और नहीं वह कुछ बोल सकी थी.मै अगर कभी कुछ कहना भी चाहता था तो मेरी हिम्मत और जुबान दोनों जवाब दे जाते थे.इसी उधेड़बुन और परेशानी के आलम में कई सप्ताह और बीत गये.

एक दिन मैं उसके मकान के नीचे वाले रास्ते से होकर गुजर रहा था कि अचानक एक मधुर सी आवाज मेरे कानों में पड़ी.आवाज की दिशा में मैंने सर उठाकर देखा.वह अपनी छत के ऊपर मुंडेर से सटकर खड़ी थी और मुझे आकर्षित करने का प्रयास कर रही थी.

मुझे उसनेे फिर से पुकारा  "किशोर..."

मुझे लगा जैैेस उछलती-कूदती किसी कोयल ने अचानक मेरे कानों में आकर अपनी कूक डाल दी हो.

मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़ की सी स्थिति में ज़र्रों का तथ्यों खड़ा रह गया.मुझे उम्मीद थी कि वह कुछ और बोलेगी,मगर ऐसा नहीं हुआ.शायद कुछ बोलते-बोलते वह भी ठिठक सी गई थी.फिर भी उसके मुख-मंडल पर चंचलता की छाप स्पष्ट दिखाई दे रही थी.

अचानक उसने अपनी मुठ्ठी में दबी हुई कोई चीज नीचे गिरा दी.वह मुड़ा-तुड़ा कागज का एक टुकड़ा था.मैनें चारों ओर नज़रें घुमाकर देखा जब कोई भी आस-पास नजर नहीं आया तो मैंने झट से वह कागज का टुकड़ा उठा लिया.और फिर बिना एक क्षण गंवाए वहां से चल दिया.आशंका और अभूतपूर्व जिज्ञासा का तूफान लिये मैं ताबड़तोड़ अपने घर पहुंचा.धड़कते दिल से मैंने वो उस मुड़ी-तुड़ी चिट्ठी को खोला और पढ़ने लगा.

हालांकि उम्र के लिहाज से वह इस काबिल नहीं थी कि अपनी कलम के जरिए अपनी भावनाओं को पूरी तरह से कागज पर उतार सके फिर भी उसके खत लिखने के अंदाज पे कोई भी अचंभित हो सकता था.मुझे तनिक भी अंदाजा नहीं था कि उसकी भावनाएं इतनी गहरी हो सकती हैं.उसका प्यार इतना गहरा एवं सधा हुआ हो सकता है.वह कालेज में किस इयर में थी यह तो मुझे नहीं मालूम पर उसके पत्र ने यह बता था कि वह अपनी धारदार कलम से अपनी भावनाओं को समेटकर उन्हें कागज पर उतार सकती थी.

उसने लिखा था:-----

प्रिय किशोर..,

मैं यह नहीं जानती कि मैं यह पत्र तुम्हें किस भावना से वशीभूत होकर लिख रही हूं और इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी मगर इतना अवश्य ही जानती हूं कि मेरे दिल की सरिता में तुमने जो प्यार का सैलाब खड़ा कर दिया है, उसने मेरे मनो-मस्तिष्क को अस्त-व्यस्त कर डाला है.मरी नींदें उड़ गयीं हैं.मेरे दिल का करार ना जाने कहां गुम हो गया है.मेरी भूख,मेरी प्यास अब कुछ भी मेरे वश में नहीं रहा है.शायद तुम्हें नहीं मालूम कि इस सैलाब ने मुझे बेचैनी के किस पाताल में लाकर पटक दिया है, जहां से मैं चाहूं तो भी नहीं निकल सकती.

मुझे तुम्हारे प्यार का सहारा चाहिए किशोर,बस तुम्हारे प्यार का.तुम्हारी आंखों में मुझे प्यार भरे सुख की अनुभूति हुई है.अब तुम्हारे प्यार के सामिप्य से ही मेरी बेचैन आत्मा को शांति मिल सकती है

तुम्हारी सूरत हर समय मेरी आंखों के आगे घूमती रहती है.उस दिन तुम मुझे कितने अच्छे लगे थे जिस दिन मेरी खिलखिलाहट पर तुम बौखला गए थे.तुम्हारी सूरत एक डांट खाये बच्चे की तरह हो गयी थी.मैं खूब हंसी थी उस दिन.उसके बाद मेरा नन्हा सा दिल तुम्हारे भोलेपन के पाश में कैद होकर रह। गया.मुझे अब तुम्हारे सिवा और कुछ भी अच्छा नहीं लगता.दिल चाहता है सिर्फ़ तुम्हें ही देखती रहूं.हो सकता है यह सब तुम्हें मेरा बचकानापन लगे. लेकिन मैं अपने दिल के हाथों मजबूर हूं,और मेरी इस मजबूरी का ईलाज केवल तुम हो.      

      तुम मुझे बहुत ही अच्छे लगते हो किशोर.मुझे तुम्हारी जरूरत है, तुम्हारे प्यार की जरूरत है.तुम्हारे बिना अब तो जैसे मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं.तुम ही मेरी जिंदगी की आखिरी मंजिल हो.  

मैं तुम्हारे पत्र का इंतजार करुंगी.मुझे पत्र दोगे ना किशोर.? अगर तुमने मेरे प्यार को ठुकरा दिया तो कह नहीं सकती कि मैं ज़िंदा बचूंगी भी या नहीं.देखो मुझे निराश मत करना

तुम्हारे  ख़त की प्रतिक्षा में,

तुम्हारी  राधा  

बस इतना ही लिखा था उस खत में  पढ़कर मैं सकते में आ गया.मेरी ज्ञानेंद्रियां सुन्न हो ग्रीन.मै कुछ भी सोचने समझने के लायक नहीं रह गया था उस वक्त.मैं समझ नहीं पा रहा था कि अब किस प्रकार उसके खत का जवाब दूं.उसकी भावनाओं के अनुकूल अपने खत में इबारत के लिए यथोचित् शब्द जुटा पाऊंगा या नहीं यह चिन्ता मुझे बराबर संता रही थी.अंततोगत्वा येन-केन-प्रकारेण अपनी सारी ज्ञानेंद्रियों की शक्ति लगाकर मैंने उसे खत लिखा.

न जाने मेरा ख़त उसकी भावनाओं के मध्य खरा उतर सका या नहीं मगर अगले दिन उसके मुख-मंडल पर जो शांति और प्रसंन्नता देखी उससे यही अंदाजा लगाया जा सकता था कि मेरा ख़त उसे किसी इच्छित वरदान के रूप में मिल गया था.उसे उस दिन खुश देखकर मुझे भी काफी ख़ुशी मिली थी .

धीरे-धीरे हमारा प्यार परवान चढ़ता गया.अब हम एक-दूसरे के और निकट आ चुके थे.हमारा आत्मिय संबंध पूरी तरह दृ‌ढ़ हो चुका था.हमें अब ऐसा लगने लगा था कि हम एक दूसरे के बिना बिल्कुल अधूरे हैं.

बहरहाल शनै:-शनै: हमारी आरजुएं एवं आकांक्षाएं भी जवान होने लगी.हम दोनों एक-दूसरे के साथ के बगैर तड़पने लगते थे.हमदोनों की आंखों में भी प्यार के सुनहरे सपने जाने लगे थे अर्थात हम दोनों भी प्यार के आत्मिय सुखों में पूरी तरह डूब चुके थे.लेकिन हम जिस समाज में रह रहे थे उससे हमारी खुशी अधिक दिनों तक देखी नहीं आती.शायद प्यार की तड़प और विछोह की उत्पीड़न की आग में झुलसने के लिये ही हमने प्यार किया था.इसीलिये तो हमारे प्यार पर समाज के झूठे रिवाजों और उसूलों का वज्रपात हुआ था.

जालिम समाज ने ऊंच-नीच नामक घटिया रूढ़िवादी विचारों का सहारा लेकर हमारे पवित्र प्रेम को जलाकर राख कर दिया. कुछ भी तो नहीं बचा था हमारे पास सिवाय जुदाई के गमों और लोगों के तानों के.हमारे प्यार की रुसवाई हुई थी.हम एक दूसरे के बिना दो जिंदा लाशों की तरह अपने -अपने घरों की मरघट में सिसक रहे थे.रुसवाई की आग में सुलग-सुलग कर जीना हमारी नियति बन गयी थी.  

दिलों के पास-पास होते हुऐ भी हम दोनों एक दूसरे के लिए कितनी दूर-दूर थे.समाज के ठेकेदारों ने समाज-सुधार के नाम पर हमारे तमाम सुखों को हमसे निर्ममता पूर्वक छीन लिया था.  

आज जबकि हमारा देश स्वतंत्र है, तो फिर किसी से प्यार करने के लिए हमें स्वतंत्रता क्यों नहीं है.?क्या सिर्फ इसलिए कि इसके पीछे दौलत का स्वार्थ है जिसकी चकाचौंध में आज का आदमी अंधे होकर अपनी मानवता भी को चुका है.

कितना अच्छा होता हमें प्यार करने की सामाजिक स्वतन्तता  होती.अगर ऐसा होता तो फिर यह जातिवाद का कोई बन्धन ही नहीं होता, दुनियां और समाज में इतनी विकृतियां नहीं होतीं.  आज भी जब मुुुझे उसकी याद आती है मेरा मन इन खोखली मान्यताओं के विरूद्ध चित्रकार कर उठता है.  

                                      


ಈ ವಿಷಯವನ್ನು ರೇಟ್ ಮಾಡಿ
ಲಾಗ್ ಇನ್ ಮಾಡಿ

Similar hindi story from Romance