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पहला दिन

पहला दिन

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उस दिन भी वह साढ़े चार बजे उठी, आदतन उसके मुंह से निकल पड़ा सर्व मंगल मंगले शिवे सर्वाथ साधिके शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते। उसने अपनी हथेलियां खोलकर हस्त दर्शन किया जो कर्म के आधार है जो प्राणी के लिये ईश्वर के समान सहयोगी है। उसे कुछ याद आया बिना किसी सोच के आँसू की कुछ बूंदे हथेलियों पर गिर पड़ी। कल बिदा के समय सहकर्मी शिक्षिकाओं के सीने की गर्मी का ताजा एहसास हुआ, दिमाग में एक प्रश्न उठा,

’’आज कहाँ जाना है ?’’ साथ ही आईने पर नज़र गई सिर के .झिंथराये बाल, जिनमें सफेदी की मात्रा ज्यादा थी, आँखो के नीचे हल्की सयाही और सामने के दांत की खाली जगह।

’’ये क्या हो गया मुझे ?’’

जीवन ठहरता तो नही ? यह निर्वाध रुप से अपने गन्तव्य की ओर बढ़ता ही जाता है। कल सुबह की स्थिति कुछ दूसरी थी, ’’बस आज भर सबसे अच्छी साड़ी पहन ले, मेंचिंग की चूड़ियाँ डाल ले। आज के बाद तो ये ज्यादातर आलमारी की ही शोभा बढ़ाएंगी। कहां जाना होगा नियम से ? दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी, लगता था जैसे अब तक कुछ घंटो में ही वह जादू की छड़ी अपना प्रभाव खोे देगी, जिसे घुमा-घुमा कर उसने अपने लिये सर्व सुविधायुक्त अपना संसार बसाया था। उसके कदम बोझिल थे, किसी बहाने से उसकी आंखे बरसना चाहती थीं। उसने रोज की तरह नाश्ता किया, जान बूझकर कुछ देर से स्कूल पहुंची, उस दिन 31 मार्च होने के कारण छात्रों के परीक्षा परिणाम घोषित होने थे। शिक्षिका बहने कार्य पूर्ण करने में लगी थीं। वह प्रत्येक कक्षा में जाती, भर नजर बच्चों को देखती, 6 वीं कक्षा में तो जैसे उसके आने के बारे में किसी ने कुछ ध्यान ही नही दिया। सब आपस में बातचित करने अथवा तू तू मैं में करने में मग्न थे, उसके मन में हिलक उठ रही थी। अब कल से वह इनकी शिक्षिका नही रह जायेगी। उसने संकेत भी किया,

’’आज मेरा अंतिम दिन है स्कूल में तुम लोग जरा शांत हो रहो।’’

’’तैं नई आबे त पूरा स्कूल बंद हो जाही !" मुंह लगे छात्र सुजल ने लापारवाही पूर्वक कहा और पुनः बातचीत करने लगा। उसने आज किसी को न मारने का विचार बनाया था, सत्र का अंतिम दिन था, किसी का मन पढ़ाई में नही लग रहा था। उसने चाॅक लेकर श्याम पट पर प्रश्न लिखा- ’’अनुशासन क्या है ?’’ हल्ला बंद हो गया।

सभी सोचने लगे। कुछ ने खड़े होकर उत्तर दिया जिसे उसने अनुशासन की परिभाषा लिखकर पूर्ण कर दिया। थोड़ी देर बाद वह आठवी क़क्षा में गई, विद्यार्थियो को आगे की पढ़ाई के संबंध में कुछ आवश्यक जानकारी दी। उनका दुख भी उसके ही सामान था। वे स्कूल छोड़कर जा रहे थे, वह भी स्कूल से सदा के लिये जा रही थी।। वे मौन वेदना सहते रहे। कमल नाम का विद्याार्थी उसके लिये विगत 3 वर्ष से समस्या बना हुआ था, आदतन अनाज्ञाकारी, न पढ़ना न तो किसी को पढ़ने देना, उसका सिद्धांत था। बहुत बार समझाया लेकिन वह किशोर अपनी सोच के अनुसार जीने वाला है उसे स्कूल से निकालने की धमकी दी गई। वह कई हफ्ते स्कूल नही आया, हार कर उसे ही मना कर लाना पड़ा। उसने पता लगाया, शराब के कारण कर्जे के बोझ से दबे उसकेे पिता ने दो वर्ष पूर्व आत्मघात कर लिया था। माँ मजदूरी करके बच्चे पाल रही है। उसका छोटा भाई सहदेव स्कूल से जाने के बाद इधर -उधर कुछ काम करके चार पैसे कमाता है। उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि जानने के पश्चात् वह उसे और अधिक चाहने लगी थी। कल वह स्कूल नहीं आया था, उसने उसके भाई को भेज कर मिलने के लिये बुलवाया। बड़ी मुश्किल से आया।

’’मेरा आज अंतिम दिन है कमल, यदि मुझसे तुम्हारे प्रति कभी ज्यादती हो गई हो तो मुझे माफ कर देना, किसी भी प्रकार अपनी पढ़ाई जारी रखना।" उसका गला भर्रा गया था, वह होठो पर झूठी मुस्कान लिये सुनता रहा जेैसे ही वह चुप हुई वहाँ से चला गया । सातवीं के छात्रों से भी उसने इसी प्रकार विदा ली। उसका हृदय खंड खंड हो रहा था जिस स्कूल में लगातार 8 वर्ष तक आती रही, अनेक विद्यार्थी आठवीं पास कर आगे की पढ़ाई के लिये अन्यत्र चले गए। उससे हमेशा के लिये दूर होना उसके लिये दूध पीते बच्चे को मां की गोद से छीन लेने जैसे लग रहा था। उसेे विदा करने के लिये संकुल प्रभारी श्री अशोक तिवारी और संकुल समन्वयक श्री योगेश पाण्डे जी आये हुये थे। जलपान के बाद बहनो ने उसे सिंदूर तिलक से अभिशिक्त कर श्री फल का उपहार दिया। बहन शकुन्तला ने रामचरित मानस (मझला साइज) पुस्तक रहल के साथ उसेे भेंट की। प्रभा शुक्ला ने सुंदर सी पेन दी। उनका उपहार उसे अत्यंत प्रिय लगा।

’’चलो अब चलते हैं बहन जी को विदा कर दें!" मीना बहन जी ने कहा। हेड मास्टर, नायक बहन जी, आनंद बहन जी, सभी उसके साथ शाला प्रांगण में आये, जहां उसकी प्लेजर खड़ी थी, उसने कातर दृष्टि से शकुन्तला मैडम को देखा और अचानक उसकी बाँहे फैल र्गइं। उनकी आँखो से गंगा जमुना बह निकली। सभी से भेट कर उसने स्वंय को संयमित किया। निगाहे झुकाई और अपनी गाड़ी स्टार्ट कर बरसती आँखों से देखते हुए अपने स्कूल सेे सदा के लिए विदा ले लिया। घर तक वे बरसर्ती आई।

चूंंकि गर्मी इस वर्ष अन्य वर्षो की तुलना मे कुछ अधिक ही पड़ रही है। अप्रेल प्रारंभ नहीं हुआ और कई रातो से गर्मी के मारे नींद नही आ रही है। उसने केशरवानी को सारे कूलर ठीक करने हेतु दे रखे थे। वह एक सप्ताह से नदारत था अतः उसके घर जाकर अपना काम पूरा करने केे लिये कहा। घर आई तो पति महोदय ने माहौल हल्का करने के लिये हल्की फुल्की बातें प्रारंभ की। उसके ज्येष्ठ पुत्र एवं पुत्र वधू मिठाई, फूल माल, बुके आदि लेकर आ गये। विगत 6 माह से उनसे उसकाा अनबोला चल रहा था। इस अवसर पर उनके आने की उसे जरा सी भी आशा नहीं थी, सभी लोगो ने टीका लगाकर पुष्प भेंट कर स्वागत किया। वह लगातार रोती रही। एक बात जान लें उसके आँसू बहुत कम निकलते है। हर अवसर पर धैर्यपूर्वक व्यवहार करना उसके व्यक्तित्व की विशेषता है। कुछ दिन पहले उसेे शक हो गया था कि आँखो में आंसू सूख जाने की बीमारी तो नही हो गई ? चलिये इस समय वह शक तो दूर हो गया। उसका बड़ा बेटा सेवाकाल की विशेष घटनाओ का वर्णन कर रहा था। सम्मानपूर्वक सेवा समाप्ति पर मित्रों से भीे बधाई संदेश प्राप्त हो रहे थे।

कल का दिन तो ऐसा था जैसे छोटे बच्चो का होता है जागती तो रोती, थकती तो फिर सो जाती। संध्या काल में अपने आराध्य श्री आंजनेय के पूजन दर्शन हेतु मंदिर गई थी। उसे अयोग्य की अंगूलि पकडकर सारी मुश्किले पार कराने वाले पिता वे ही तो हैं, अश्रुपूरित नेत्रों से उनकी महिमा का गुणगान किया। एक ऐसी बालिका जो पाठशाला जाने के लिये तरसा करती थी उसे पढ़ने लिखने का ऐसा अवसर दिया कि वह जीवन के चैतींस वर्ष शा, शिक्षिका के रुप में कार्यपूर्ण कर आज सेवा निवृत्त हो गई। इस बीच उसे एक भी स्पष्टीकरण देने की नौबत नही आई। अत्यंत मान सम्मान से शिक्षक राज्यपाल एवं राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान से नवाजा गया उसे। सारा विभाग उस पर गर्व करता रहा।

’’हे पिता! मेरी अंगूलि थामे रहना, आज मैं अकेली हूॅ। मुझसे मेरा काम छूट गया है जिसे मैं अपने जीवन से ज्यादा महत्व देती हूॅ। वह हनुमान् जी की प्रतिमा की ओर देखती मौन अश्रु बहाती रही।

समय तो किसी के लिये रुकता नहीं है। वह बीते दिनों की याद करती कभी सोती कभी जागती रही थी। और आज का यह दिन प्रातः भ्रमण पर जाना कुछ समय से अनियमित हो गया है। नींद समय से न खुली तो बस घर भर की ही होकर रह जाती। उसने स्वयं से वादा किया था कि पहले दिन से ही प्रातः भ्रमण को नियमित कर लेगी। अब पहले की तरह भाग दौड़ नही होगी, यदि पैदल न चली तो बेतहाशा वनज बढ़ जायेगा, जो स्वंय में हजार बीमारियों की जड़ है। वह नित्य क्रिया से निवृत्त हो एक कप हर्बल टीले कर घूमने निकल पड़ी। सड़कें, पेड़ पौधे, जाने पहचाने लोग, सब अनजाने से लगे।फिर जब चेहरे पर नजरें गड़ा कर देखा तो लगा कुछ नहीं बदला। मेक्सी पहने हाथ में तार खुंसी डंडी लिए ऊँची- ऊँची डालों से फूल चुराती महिलाएं अपने प्राण प्रिय श्वानों की जंजीरें थामें चोर नजरों से देखते, या उसके जोर से खींचते,चले जाते लोग, बस कृपा तो उन्हीं पर बरसेगी जो या तो सो रहे होंगे या घूमने निल गये होंगे। वह उसकी परिचिता! जिससे उसकी पहचान मैट्रिक की परीक्षा के दौरान हुई थी। उस समय भी वह नगर निगम में लिपिक का काम करती थी। जो अब तक कुंआरी है, बाद में उसे न जाने कहाँ से ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ कि उसने मनुष्य की बजाय जानवरों पर प्यार लुटाना अधिक उपयुक्त समझा। उसके घर में कई कुत्ते हैं जिन्हें वह अपना सगा मानती है। उन्हें आदर से संबोधित करती है। पहले उन्हें खिलाकर स्वयं खाती है। स्मृति वन के रास्ते में अपने दो तीन कुत्तों की जंजीर पकड़े वह ऐसी प्रसन्न नजर आती है जैसे प्राचीन काल में राजकुमारियाँ अपने मनोरंजन के लिए अश्वो की वल्गा संभाले रथारूढ़ होकर अकेली भी यात्रा पर निकल जातीं थीं। ऐसा उसने कई टीवी सिरियल में देखा है। वह उस दिन भी सारी दुनिया से निर्लिप्त अपने सगे संबंधियों को मार्ग विभूषित करवाने ले जा रही थी। उसके चेहरे पर रात्रिकालीन आलस्य के साथ चिकनाई चमक रही थी जो चेहरे के हल्के पड़ चुके चेचक के दागो के कारण फिसल पड़ने से बच रही थी।

’’नमस्ते जी।’’ उसने जबरिया उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया।

नमस्ते करती वह खींची चली गई । उहापोह में उसे किंचित विलंब हो चुका था। सूर्य का सिंदुरी वृत्त पूर्व की ओर उदित हो रहा था। उसने कदम रोक कर श्रद्धापूर्वक विश्वदेव को प्रणाम किया। वे पेड़ो के झुरमुठ से आहिस्ता आहिस्ता बाहर निकल रहे थे। बहुत सारे लोग वापस लौट रहे थे जिनका उसने अभिवादन किया उत्तर पाया, बाकी तो अपने रास्ते आये गये।

सब कुछ तो ज्यों का त्यौ है वही बदल गई है, वह अब भूतपूर्व शिक्षिका हो चुकी है। जहां भी रहे मनोमस्तिष्क में यह सतर्कता रहती थी कि ड्यूटी पर पहुंचना है। छुट्टी के लिये आवेदन पत्र देना है, समय पर स्कूल पहुंचना है, डायरी बनाना है काॅपी जांचनी है, प्रश्न महिला है, वही कोना तो रिक्त हो गया है इसलिये इतनी दुःखी है। शुभचिन्तकों ने अपने -अपने अनुभव के आधार पर सेवा समाप्ति पर मिलने वाली धनराशि के सदुपयोग के मार्ग सुझाये। सभी का एक मत था कि अपने निर्वाह हेतु रुपये सुरक्षित रखे जाए , उसे लगा जैसे ऐसा सोच कर उन लोगों के प्रति अत्याचार करेगी जिनके बलिदान के बिना वह अपनी नौकरी नहीं निभा सकती थी। जब उसने मिनी पी.एस.सी पास कर नौकरी प्राप्त की थी, तब तीनो बच्चे छोटे थे, बड़ा 8 वर्ष मझला , 6 वर्ष और सबसे छोटा डेढ़ वर्ष , उसने दो बच्चो को स्कूल भेज कर तीसरे को गोद में उठाये स्कूल जाना प्रारंभ किया था। कितने उदास हो गये होंगे बच्चे? माॅ घर में नहीं है यह भावना ही बच्चे को हद से ज्यादा अकेला कर देती है। छोटे बेटे को कंधे पर उठाये, उसका बास्केट एक हाथ में पकड़े वह पहले मेन हास्पीटल जाकर इंजेक्शन लेती क्यों कि उस समय वह कमर दर्द से पीड़ित थी। फिर सीटी बस में चढ़कर 5 कि.मी दूर विद्यालय पहुंचती , नये परिवेश में बच्चा बड़ा असहज अनुभव करता। वह पूरे दिन उसके कंघे से चिपका रहता, उसेेेे लिए-लिए ही वह कक्षा एक के विद्याार्थियो को पढ़ाती । घर आती तो स्कूल से आकर दोनो बच्चे दरवाजे पर बैठे होते, उसका कलेजा मुंह को आ जाता। नहीं हो पायेगी नौकरी! बच्चों को बहुत कष्ट हो रहा है। फिर भी उस समय को सबने मिल कर काटा, बडी सहजता और प्रसन्नता से, शरीर में शक्ति और मन में उमंग थी उसके, उसे अपने बच्चों का भविष्य गढ़ना था। बड़े होते बच्चो ने उसे भरपूर सहयोग दिया। नौकरी के आर्थिक संबल ने उन्हें सम्मान जनक मुकाम पर पहुंचाया, तो फिर जमा राशिपर एक का ही अधिकार लूट नहीं तो और क्या है।

उसने सभी को बराबर हक देने का फैसला कर लिया था।

स्मृतिवन से आकर नहा धोकर अनजाने ही तैयार हो गई। गाड़ी स्टार्ट कर चल पडी, उसने अपने अपने आप को विद्यालय से थोड़ी दूर पर पाया। सचेत होकर पुनः वापस लौट आई। पूरे दिन इस बात को स्वीकारने में लगी रही कि वह अब सेवा निवृत्त हो गई है।

गुजरा किसी तरह सोते जागते पहला दिन, कितना अंतर है दो पहले दिनों में ? सेवा का पहला दिन, मुख्यालय से 5 कि.मी दूर पति देव के साथ सिटीबस में बैठकर प्रातः 10 बजे पहुंची थीअपने स्कूल। बस में यात्रा करने की कोई वैसी आदत नही थी, बिना कुछ पकड़े ही बच्चे को लेकर खड़ी हो गई। लगा गिरने को हुई, बस की गेट पर एक मध्यम उंचाई की सौम्य आकृति वाली उम्र दराज महिला ने बच्चे को अपनी गोद में संभाल लिया। वे स्वर्गीया सुशीला पाण्डे बहन जी थीं। वे भी प्रा, शाला,कोनी में पदस्थ थीं, वही जा रही थी।

जैसे नशो में धीरे-धीरे ग्लूकोज चढ़ता है वैसे ही हौले-हौले आत्म गौैरव की भावना जन्म लेकर पुष्ट हो रही थी। वह उसे धारण करती जा रही थी। नौकरी से मिलने वाले आर्थिक संबल पर उन सब की आशाएं टिकी हुई थी। वह दिन भी आज की तरह ठहर -ठहर कर बीत रहा प्रतीत हो रहा था, घर मे रहते हुये दोपहर में एक घंटे आराम करने की आदत थी। बच्चा भी कुछ देर सोता था। यहां कैसे सोये मां बेटे ? एक पानी की खाली टंकी थी उसने उस पर लकड़ी का श्यामपट बिछाकर उसी पर अपने बच्चे को सुलया था। शाला में नीम के पेड़ के नीचे खडे श्री अरविन्द कुमार राम ने उसे चाय पीने का आमंत्रण दिया, चाय क्या थी मानो ईश्वर का प्रसाद ही था। उसे बड़ी ताजगी का अनुभव हुआ।

गौरव की भावना अब दयनीयता में बदल रही है, तोड़ रही है अंदर -अंदर।

दोपहर को भाई का फोन आया था, उसने भी अनिंद्य सेवा समाप्ति पर बधाई दी , उसे उसके अवशाद का अंदाजा था इसीलिये उसने उसे कुछ याद दिलाने की कोशिश की। उदास क्यो होती है दीदी ? सेवा निवत्ति की तारीख तो सेवा प्रारंभ में ही लिख दी जाती है, इसे भी सहजता से ले , फिर तेेरे पास तो काम का अंबार है अपनी रचनाये पूरी कर ! घुमने फिरने जा। गरीब बच्चों को उपचारात्मक शिक्षा देने की जो तेरी येाजना थी उस पर काम कर। एक काम से निवृत्ति हुई है, बल्कि यू कहे कि कार्य ने अपना रूप बदला है। यह तो सोच, यदि बड़े अपना स्थान रिक्त नहीं करेगे तो नई पीढ़ी को काम कैसे मिलेगा?

उसकी अंतिम बात वास्तव में दमदार थी, पीड़ा का अंत तो नही हुआ , लेकिन नियति को स्वीकारने का बल अवश्य मिला। संध्या के साथ कर्तव्य के नये आयाम उपस्थित हुये । उसने गाय को दाना चारा दिया। दुध की बाल्टी साफ की। भेाजन में कुछ ठीक ठाक बनाने के बारे में सोचने लगी। कुछ याद न आया फिर वही खाली खालीपन चारो ओर से डंसने लगा। वह शाम की उदासी को अपने हृदय में उतरती अनुभव कर रही थी। पहले तो शाम के समय कार्यो की बारात उमड़ आती थी। जैसे ही स्कूल से आओ गायें आकर खड़ी हैं, पूरा घर बिखरा हैं, तब से कोई मिलने आ गया। कोई चाय के लिए चिल्ला रहा है , इधर भोजन बनाने में विलंब हुआ जा रहा है। मुँह धोना तो दूर लधु शंका के लिए जाने का वक्त भी नहीं रहता था। सब कुछ समेटते रात के ग्यारह बज जाते , नई आई पत्रिकाओं को पढ़ने के लिए जी तरस कर रह जाता। लेटते ही निद्रा के आगोश में अपनी सुध-बुध खो देती। आज भी वे सारे काम हैं किन्तु कल कहीं जाने की जल्दी नहीं है। इसलिए कुछ करने का भी मन नहीं है। वह बैठी खिड़की से डूबते सूर्य को देख रही थी। सिंदूरी गोला अग-जग को बलिदानी केसरिया रंग में रंग रहा था।

’’अभी तो सूर्यास्त में विलंब है। सब तरफ उजाला है फिर यह मन में अंधेरा क्यों हुआ जा रहा है ? झूठा है मन ! उसने स्वयं को प्यारी सी डाँट लगाई।’’

’’मैडम अब तैं हमला पढ़ा ! अब तें हमला पढ़ा ! तैं कहे रहे रिटायर हेाहूं त तुमन ला पढ़ाहूं! एदे आ गयन मैडम । हम कमजोर हन हमर डहर कोनो नई देखैं।’’ कुछ छोटे बड़े बच्चे, मैले कुचैले बच्चे, बोरी का बस्ता लिए बच्चें ! दौड़े चले आ रहे थे उसकी ओर।

अरे ! ये तो घर के सामने वाले नीम के पेड़ के नीचे बैठ रहे हैं। ’’ऐऽ...ऽ..ऽ.. ! देखो तो मेरा चश्मा किधर है ? बच्चे आ गये हैं पढ़ने, जब तक उजाला हैे तब तक पढ़ा दूँ इन्हें।’’


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