पछतावे का शोर
पछतावे का शोर
अजीत की आँखें पूरी तरह लाल हो चुकी थीं।
उसकी बाईं आँख से निकला एक आँसू,
गालों को छूता हुआ ज़मीन की तरफ गिर रहा था।
उसका चेहरा कई दिनों से टूटे पड़े कनेर के फूल जैसा लग रहा था—
बेजान, मुरझाया हुआ।
दूर से अगर अजीत की माँ भी उसे देखें,
तो शायद अपने ही बेटे को पहचान पाना
उसके लिए भी आसान नहीं होता।
चंद रोज़ पहले अजीत, इस अजीत से बिल्कुल अलग था।
उसके होंठों पर मुस्कान रहती थी।
वह हँसता था, बहुत बातें करता था।
खुद को इस दुनिया का
एक मुकम्मल शख़्स मानता था।
और इस सबकी वजह थी उसकी मुहब्बत—
ख़याती।
मगर शायद नियति से उसकी ख़ुशी देखी नहीं गई।
या यूँ कहें—
जब मुहब्बत में अना शामिल हो जाए,
तो अंजाम अक्सर यही होता है।
अजीत और ख़याती अकसर फोन पर घंटों बातें किया करते थे।
शुरू-शुरू में अजीत,
ख़याती की बातों को पूरी वरीयता देता था।
उसकी हर बात का जवाब देता।
अगर कभी कोई बात उसे अच्छी भी नहीं लगती,
तो वह उसे ख़याती पर ज़ाहिर नहीं होने देता—
बस उसकी गलती का अहसास करा कर छोड़ देता।
मगर धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा।
अब अकसर ख़याती पर
अजीत का हुक्म सादिर होने लगा था।
ख़याती अब महबूब नहीं,
एक कनिज बनती जा रही थी।
और ख़याती को किसी की हमराह बनना तो क़बूल था,
मगर सोने के पिंजरे में
क़ैद एक बुलबुल बनना—नहीं।
एक शाम ख़याती और अजीत ने
बाहर साथ डिनर करने का प्लान बनाया था।
मगर उसी वक्त ख़याती की माँ को
अचानक चक्कर आ गया।
घर का माहौल बिगड़ गया,
और ख़याती डिनर पर नहीं जा सकी।
अजीत का फोन आया,
लेकिन अफ़रा-तफ़री में
ख़याती उसे उठा नहीं पाई।
इस बात ने अजीत को आग-बबूला कर दिया।
वह आपा खो बैठा।
उसे लगा—
यह कैसे हो सकता है
कि न मेरी बात मानी गई
और न ही मेरा फोन उठाया गया।
गुस्से में वह सीधे
ख़याती के घर के बाहर जा खड़ा हुआ
और अपनी बाइक का हॉर्न बजाने लगा।
ख़याती के घर में
अजीत के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी—
जैसा कि अक्सर मुहब्बत में होता है।
मगर जब यह सब
ख़याती के पिता ने देखा,
तो वे समझ गए।
उन्होंने ख़याती को बाहर भेजा,
ताकि वह अजीत से बात कर सके।
ख़याती घर से बाहर निकलकर
अजीत तक पहुँचती,
उससे पहले ही अजीत ऊँची आवाज़ में बोल पड़ा—
“तुम्हें याद नहीं है क्या,
हमारे बीच आज के लिए क्या तय हुआ था?
और ऊपर से तुमने मेरा फोन भी नहीं उठाया।
अगर तुम्हें मैं पसंद नहीं,
तो साफ़-साफ़ मना कर दो।
तुमने तो मुझे अपना गुलाम बना रखा है।”
ख़याती अजीत के पास आकर,
हल्के गुस्से में बोली—
“मेरी माँ को चक्कर आ गया था।
मैं उनके पास थी।
और मेरा फोन—
मुझे याद भी नहीं कि उसे कहाँ रख दिया था।
और रही बात तुम्हारे गुलाम होने की,
तो मुझे लगता है—
जहाँ मुहब्बत को गुलामी समझा जाने लगे,
वहाँ से चले जाना ही बेहतर होता है।”
इतना कहकर ख़याती
अपने घर की तरफ़ मुड़ गई।
दरवाज़ा बंद करते हुए उसने कहा—
“आज के बाद मुझे फोन मत करना।”
दरवाज़ा बंद हुआ
और ख़याती अंदर चली गई।
अजीत कुछ समझ पाता,
उससे पहले ही
उसके पास पछतावे के सिवा
समझने को कुछ बचा ही नहीं था।
और तब से लेकर अब तक
अजीत इसी हाल में है।
हर रोज़ कोशिश करता है
कि अपने भीतर के पछतावे से जीत सके—
मगर अभी तक,
जीत उसकी नहीं हुई।
