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Nihal singh Singh

Inspirational

4.5  

Nihal singh Singh

Inspirational

न्याय जो कर्म से आगे देखता है

न्याय जो कर्म से आगे देखता है

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आज यमलोक में असामान्य चहल-पहल थी।

इस हलचल का कारण यमदूतों द्वारा लाई गई दो आत्माएँ थीं—एक माँ और उसकी बेटी।


दोनों की आत्माओं से ऐसी उज्ज्वल रोशनी फूट रही थी कि यमदूत उन्हें देर तक देखने से भी हिचक रहे थे।

मानो उस दिव्यता को निहारना उनकी दृष्टि की सामर्थ्य से परे हो।


माँ—एक युवा स्त्री—अद्भुत सौंदर्य से युक्त थी।

उसे देखकर प्रतीत होता था कि प्रकृति ने उसे बड़े स्नेह और संयम से रचा हो।

उसकी बेटी, जो अब भी माँ का हाथ थामे थी, शांत मुस्कान के साथ सब कुछ निहार रही थी।


पर यमलोक की यह चहल-पहल उनके रूप के कारण नहीं थी।

यमराज को यह निश्चित करना था—

कौन स्वर्ग जाएगा और कौन नरक।


यमराज ने दोनों आत्माओं को देखा।

पहली बार उनके मुख पर दुविधा स्पष्ट दिखाई दी।


कुछ क्षण मौन रहा।

फिर यमराज बोले—

“ये जो इस बालिका की माँ हैं, इनका नाम विभा था।”


इतना कहते ही यमलोक का आकाश जैसे खुल गया।

सबके सामने विभा का जीवन चलचित्र की भाँति उभर आया।


एक सुनसान रात।

एक स्त्री अपनी नन्ही बच्ची को गोद में लिए बार-बार उसे चूम रही थी।

वह स्वयं साँवली, थकी और टूटी हुई थी—

पर उसकी गोद में पल रही बच्ची की आँखों में

मानो पूरा आकाश उतर आया हो।


वह स्त्री देर तक रोती रही।

फिर काँपते हाथों से बच्ची को एक सुनसान सड़क पर लिटाया।

चारों ओर देखा—

जब कोई दिखाई न दिया,

तो भारी मन से वहाँ से चली गई।


सुबह हुई।

लोगों ने सड़क किनारे एक मासूम बच्ची को रोते देखा।

एक सज्जन रुके,

उसे उठाया

और अनाथ आश्रम पहुँचा दिया।


आश्रम के रजिस्टर में उसका नाम दर्ज हुआ—

विभा।


वहीं विभा बड़ी हुई।


विद्यालय जाने की उम्र आई,

पर उसे पढ़ने भेजने के स्थान पर

आश्रम की सफ़ाई में लगा दिया गया।


वह अपने कोमल हाथों से काम करती।

काम के बाद वार्डन उसे अक्षर-ज्ञान सिखाती।


दो वर्ष बीत गए।

हाथ कठोर हो गए,

पर आँखों में पढ़ने का उजाला आ गया।


एक दिन एक दंपति आश्रम आए।

विभा को गोद लिया

और अपने साथ ले गए।


अब उसके पास घर था,

परिवार था।

वह विद्यालय जाने लगी।


चार वर्ष बीते।


फिर वही हुआ,

जो किसी मासूम के जीवन में नहीं होना चाहिए।


विद्यालय से उसे लेने जाते समय

उसके दत्तक माता-पिता दुर्घटना का शिकार हो गए।


विभा एक बार फिर अकेली रह गई।


जब वह घर लौटी,

तो लोगों ने उसे मनहूस कहकर निकाल दिया।


अब सड़क उसका घर थी।

भीख उसका सहारा।


जहाँ असहायता होती है,

वहाँ भेड़िए अवश्य आते हैं।


एक पुरुष आया—

सहारा देने के नाम पर।

उसका नाम था दुर्जन,

और उसका आचरण उसके नाम के अनुरूप।


विभा उसके साथ रहने लगी।

रात को वह शराब पीकर आता,

मारता,

तोड़ता।

सुबह रोता,

मिन्नत करता,

और विभा मान जाती।


एक वर्ष बीता।

विभा गर्भवती हुई।

दुर्जन प्रसन्न था—

उसे वारिस मिलने वाला था।


नौ महीने बाद

विभा ने एक बेटी को जन्म दिया।


जब दुर्जन को ज्ञात हुआ कि लड़की हुई है,

उसकी प्रसन्नता लुप्त हो गई।


वह बच्ची को लेने बढ़ा।

विभा समझ गई—

यह उसे मार देगा।


दुर्जन बोला—

“या यह बच्ची, या मैं।”


विभा ने बच्ची को चुना।


दुर्जन ने उसे घर से निकाल दिया।


कुछ देर वह चौखट पर खड़ी रही।

फिर फुटपाथ को ही अपना संसार मान

बच्ची को सीने से लगाकर सो गई।


उसने उसका नाम रखा—

दिव्या।


वह दिव्या को पीठ पर बाँध

मजदूरी करने लगी।


एक दिन दुर्जन फिर आया।

मिन्नत करने लगा।


दिव्या के भविष्य की सोचकर

विभा लौट गई।


पर अब वह केवल देह रह गई थी।

हर रात ज़बरदस्ती होती।

विभा चुप रहती—

क्योंकि दिव्या सुरक्षित थी।


पाँच वर्ष बीते।

विभा का शरीर सूख गया।


पर जब दिव्या

तुतलाती आवाज़ में “माँ” कहती,

तो जीवन फिर अर्थ पा लेता।


एक रात दुर्जन शराब पीकर आया।

विभा दिव्या के साथ खेल रही थी।


उसने विभा को बुलाया।

ज़बरदस्ती करने लगा।


माँ की चीख सुन

दिव्या वहाँ आ गई।


दुर्जन की नज़र बच्ची पर पड़ी—

और उसकी नीयत बदल गई।


विभा सब समझ गई।


उसने दुर्जन को धक्का दिया,

दिव्या को गोद में उठाया

और भाग निकली।


वह रेलवे पटरी तक पहुँची।

दिव्या को सीने से लगाए

उसे प्यार करने लगी।


ट्रेन आई—

और सब समाप्त हो गया।


यमलोक में यह दृश्य देखकर

यमदूतों की आँखें नम थीं।


दिव्या और विभा की आत्माएँ शांत थीं।


पर यमराज के सामने दुविधा थी—

दिव्या निर्दोष थी,

पर विभा पर आत्महत्या का दोष था।


तभी प्रधान दूत बोला—

“महाराज,

विभा ने मृत्यु को नहीं चुना।

वह भागते-भागते वहाँ पहुँची।

बच्ची में इतनी लीन थी

कि मृत्यु को आते देख न सकी।”


यमराज ने दंड उठाया।

उनकी वाणी गंभीर थी—


“न्याय केवल कर्म नहीं देखता,

परिस्थिति भी देखता है।”


विभा और दिव्या को

स्वर्ग भेज दिया गया।


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