STORYMIRROR

Niraj Kumar

Action Crime

3  

Niraj Kumar

Action Crime

पासा पलट गया

पासा पलट गया

7 mins
13

सुबह के 9 बजे थे, दरवाजे की घंटी बाजी और लगातार बजती रही| दरवाजा खोलने के लिए मेघा बाथरूम से दौड़ी घंटी बजाने वाले की अधीरता से वह समझ गई थी की महेश के सिवा कोई और नहीं हो सकता| अभी तो ऑफिस के लिए निकले थे फिर वापस आ गए, कुछ भूल गए होंगे| मेघा ने सफर चेहरा लिए दरवाजा खोला|


" कहा मर गई थी? इतनी देर लगा दी" 

महेश गुस्से में चिल्लाए, साइड में होते हुए मेघा ने कठोर स्वर में बोला " सुबह का वक्त है, मुझे नहाना धोनावनाही होता है क्या?


" जबान लड़ा रही है सुबह –सुबह ?"

मेघा ने फिर का बार सत की शीश करते हुए पूछा" आज क्या भूल गए?" " मोबाइल फोन तू यह भी याद नहीं दिला सकती मेरे जाते समय?"

30 सालो से याद दिला रही हूँ, एक दिन तो खुद याद रखो| तेरी ड्यूटी है मेरी हर चीज का ध्यान रखने की महेश ने बोला... अपनी कोई ड्यूटी पूरी की है तभी? " सुबह–सुबह बकवास कर रही है, तंग आ गया हूँ मैं, "मैं भी|" तो चली जा मायके " मैं क्यों जाऊँ? आप भी तंग है न तो आप क्यू नही चले जाते? जहां जाओ चले जाओ यह मेरा घर है और अब सच तो है की मुझे आप की जरूरत ही नही है, मेरे बच्चे बड़े हो गए है मैं अब उन के सहारे जी सकती हूँ | आप को अपने काम करवाने के लिए मेरी जरूरत है, मुझे आप की नही मैं अपने बच्चों के साथ बहुत खुश हूं|


मेघा की बात सुनकर महेश का मुंह खुला का खुला रह गया, कुछ बोल नही सके मेघा कठोर शब्दों का बाण चलाती हूँ ई सीधी तनकर खड़ी थी| महेश चुपचाप अपना मोबाइल उठाकर चले गए| मेघा ठंडी सांस भरते हुए चौथी मंजिल पर स्थिति अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ी नीचे जाते हुए महेश को देखती रही| महेश कार स्टार्ट करते ऑफिस चले गई वह वही रखी कुर्सी पर अनमनी सी बैठ गई और महेश को कही अपनी कठोर बातों पर गौर करने लगी| उसे अपनी बातों की कटुता पर जरा भी दुख नहीं हूँ आ|


30 साल उसने महेश जैसे पति को कैसे झेला है, यह वही जानती है, महेश हद के ज्यादा आत्मकेंद्रित, गुस्सैल, भुलक्कड़ किसी के सुख–दुख से कोई मतलब नहीं रखने वाले इंसान है| मेघा को याद नहीं आता की इन 30सालो मैं महेश ने किसी दिन एक पल भी उसका ध्यान रखा हो, बाद

अपना आराम, अपनी जरूरतें, अपना काम वह अकेली ही तो जी सही है|

इतने सालो से 2 दिन बाद वह 50 की हो जाएगी| कितना लंबा समय उसने घुटघूट कर बिताया है वो वही जानती है|


नीरस सी उसकी दिनचर्या मैं न कोई उमंग रही न उत्सुकता, न आकर्षण, न कोई आमोदप्रमोद, सुबह उठना गृहस्थी संभालना, बच्चों को पालना| यही दिनचर्या रही उसकी कई बार मन ही मन उसे अपने माता –पिता पर भी गुस्सा आता जिन्होंने उसका विवाह करते समय एक बार महेश के परिवार या महेश के स्वभाव के बारे में पूछताछ किये | महेश 6 भाई–बहन थे| सब के सब स्वार्थी और गुस्सैल, ससुर तो बहुओं को घर की नौकरानी समझते थे जाता सा गुस्सा आने पर लगी लगाई थाली उठाकर फेंक देते थे| वे उठते –बैठते गलियों की बौछार करते थे और सास बहली की लेकिन उनकी कोई सुनता नहीं था| पिता की देखा–देखी महेश ने शादी के कुछ महीनों बाद मेघा पर हाथ उठानी की जब कोशिश की थी तो मेघा ने कहा था, ‘ बस यह गलती मत करना जिस दिन हाथ उठाया,’ उसी दिन इस घर से चली जाऊंगी यह सुनकर महेश ने दोबारा हाथ उठाने का प्रयास नही किया पर महेश के शब्द मेघा को बहुत तकलीफ देती थी| 


मेघा कभी नहीं भूलती की जब आकाश और अवनी का जन्म हूँ आ, महेश उस दिन भी यह कहकर रोज की तरह ऑफिस चले गए थे मेरा यहां क्या काम मां तो है ही, मैं ऑफिस जा रहा हूँ | प्रसव पीड़ा से अधिक दर्द दिया था महेश की इस रुखाई ने|


उस दिन वह समझ गई थीं यह आदमी कभी पत्नी का दुखदर्द नही समझेगा| आकाश आना के 5 साल बड़ा था दोनो बच्चो को उसने अपने दम पर पाला–पास है, तब तो संयुक्त परिवार था| 


सास–ससुर के देहांत के बाद धीरे–धीरे समय के साथ ‘सब अपने–अपने परिवार से साथ अलग और व्यक्त होते गई और भावनात्मक रूप से भी दूर होते गए|


महेश का भी दिल्ली से मुंबई ट्रांसफर हो गया था| नए शहर, नए लोग, तब आकाश 10 साल का था| स्कूल में एडमिशन से लेकर इस घर की छोटी–बड़ी व्यवस्था मेघा ने खुद की थी|

महेश तो अगले दीन ही ऑफिस चले गए थे| वह जानती थी की महेश घर में भी रहेंगे तो उसका जीना मुश्किल ही करेंगे| वह हर बात में गलियां सुनती रहेगी महेश की बाते किसी ताने से कम नहीं रही कभी|


जैसे–जैसे आकाश और अवनी बड़े हो रहे थे, वे मां का दर्द समझ रहे थे| मेघा के लिए दोनों के दिलो में प्यार और सम्मान बढ़ता ही गया| 

आकाश तो एक बार पिता से उलझ गया था, “आप मम्मी के इस बात नही कर सकते पापा”|


बेटे से स्वर पर महेश चौक थे, ‘ तू मुझे सिखाएगा’

“सिखाना ही पड़ेगा किसी न किसी को तो, पापा” आकाश निडर होकर बोला|

मेघा ने टोका आकाश ऐसे बात नही करते|


‘करनी पड़ेगी मम्मी|’

महेश गुस्सा हो गए ‘तेरी इतनी हिम्मत? 

उन्होंने आकाश को मारने के लिए हाथ उठाया तो वहाँ बैठी अवनी डट कर खड़ी हो गई चिल्लाई `स्टॉप इट पापा, रही नही चलेगा|

अक्ष ने कहा ‘पापा’ हमें मजबूर मत करना आपने साथ कोई गलत बात करने के लिए हम मम्मी नही है की आपका हर बुरा व्यवहार चुपचाप सहन करते जाएंगे|


महेश बाग में इधर–उधर रखा समान फेंकते हुए बाहर

निकल गए थे| एकदम सन्नाटा छा गया था घर में मेघा ने कहा, तुम दोनों पापा के साथ ऐसा बात नही करनी चाहिए थी, हैं अभी है पिता है तुम्हारे|

आकाश ने कहा ‘नही मम्मी, बस घर खर्चों क लिए आप के हाथ पर पैसे रखकर उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है क्या? 


बचपन से उन को हर बात पर गुर्राते ही देखा है, याद नहीं आता कभी हमारे सिर पर उन्होंने पेयर से हाथ रखा हो| अपने दोस्तो के पिता को देखा है हम ने कसक सी उठती रही है, हमेशा आप उनकी तरफदारी न करे, आप नेबहुत दुख उठाए है अब आप सम्मान से जिएंगी| किसी से दबने की जरूरत नही गई, आपको अपने आत्मसम्मना के साथ डट कर रही वी लव यू मां कहते हुए दोनों बच्चे उससे चिपट गए थे|


झरझर आंसू बह चले थे मेघा के गालों पर, वह सोचने लगी ‘ मेरे बच्चों कब इतने बड़े हो गए, अपनी मां की दुख को इतना। समझ गए’| 

अब अक्ष इंजीनियर बनकर एक बड़ी कम्पनी में कार्यरत था| उसने अपनी सहकर्मी नीलिमा से विवाह करने की इच्छा प्रकट की तो मेघा ने सहर्ष हामी भर दी| महेश ने देखा माना करने का कोई फायदा नही है अब तक महेश काफी हद तक समझ चुके थे की गई वे दिन जब घर में उनका एक्छत्र राज था|


दोनो बच्चे हर बात में, हर काम में मां की सलाह लेते थे, महेश, बस चुपचाप देखते रहते वे अपने को उपेक्षित महसूस करते| 


आकाश कह दिया था, ‘पापा अब साल आप मम्मी से जैसे बात करनी थी कर चुके कुछ ही दिनों में नीलिमा आ जाएंगी उसके सामने ऊंची आवाज और गलियां देना आप भूल जाएंगे तो अच्छा सहेगा| वह बहुत ही संस्कारी परिवार की लड़की है| आपके जैसा बात करने वाला उसके पूरे खानदान में नहीं होगा| और अगर आप को शांति से रहना बहुत मुश्किल लगता हो तो मैं कोई और रास्ता निकलवा सकता हूँ |


आकाश के स्वर की गंभीरता महेश को जैसे आसमान से जमीन पर पटक गई थी| उन्होंने सोचा, क्याब्रस्त निकलेगा। आकाश, क्या मेघा, अवनी और अपनी पत्नी को लेकर कहीं चला जाएगा अलग घर लेगा, वे क्या अकेले रह जाएंगे? ये सब सोचकर उनके रोगंटे खड़े हो गए|


मेघा बच्चों के साथ पाकर जी उठी| उसने भी सोचा, मैं क्यों घुटघुट कर मरू अब इतने लायक बच्चे है, जी ही लूंगी इन्हीं के सहारे इस उम्र मैं भी चैन से नहीं जी पाई तो एक दिन ऐसे ही मर जाऊंगी| अब बच्चों ने उसके सोए स्वाभिमान को जगा दिया है| पति के झूठे तृष्टि के लिए वह अपना सब–कुछ बलिदान करती आई है क्यू वह ही कर्तव्य की वेदी पर अपनी आकांक्षाओं– भावनाओं की बलि देती चली आई| 


यह जीवन उसका अपना है, आखिर क्यों वह शादी के हवनकुंड में स्वाहुति देती चली गई?

इस पीड़ादायक यात्रा का कही तो अंत होना ही चाहिए| महेश के दुर्व्यवहार का जवाब तो देना ही पड़ेगा, बस|

मेघा ने खुद को बदल लिया था और महसूस भी कर चुकी थी, महेश अब थोड़ा शांत रहने लगे थे| वह जब कहती है मुझे आप की नही आपको मेरी जरूरत है| 

आप का सब काम में ही करती हूँ , मेरे बिना आप का कोई नही है तो वे चुप हो जाते है आज सुबह की घटना। बिना गली–गलौज और तोड़फोड़ के घर गई थी|

सालो पुरानी आदत महेश की इतनी जल्दी नही बदलेगी| महेश कोशिश तो कर रहे है, यह वह नही जानती थी| महेश भी अच्छी तरह समझ चुके थे की पासा पलट चुका है|



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Action