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Niraj Kumar

Drama Crime

3  

Niraj Kumar

Drama Crime

वो वैश्या नही थी|

वो वैश्या नही थी|

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बात उस समय की है जब मैं जिला जामताड़ा में इंटरमिडियत में था । मैं जब डेली शाम को अपने कोचिंगबजाता तो रोज आते–जाते मुझे एक बूढ़ी भिखारन महिला मिलती जो रेलवे स्टेशन पर भीख मांगती,जिसे में डेली देखता था। .........


हालांकि महिला बुजुर्ग थी और कपड़े फटे पुराने होते थे मगर देखने में ऐसा लगता था जैसे जब ये जबान रही होगी तो बेहद खूबसूरत रही होगी।


में जब प्रतिदिन रेलवे फाटक पर करके कोचिंग से लौटता तोबरोज देखता की शाम को दो व्यक्ति आकार उस महिला से पैसे ले लेते थे। वह बुड्ढी औरत उन दोनो व्यक्तियो को देखते ही डरने लगती थी।


मैंने सोचा हो सकता है इनका भीख मांगना ही इनका पेशा हो और ये दोनों जो इससे पैसा लेते है इनके कोई रिश्तेदार हो।

और हाँ, मुझे कभी–कभी उस भिखारन महिला को देखकर ऐसा महसूस भी होता था की शायद वह महिला मुझसे कुछ कहना चाह रही है।


एक दिन मुझे रहा नही गया। मेरे मन में उस महिला की दुर्दशा देखकर दया उठी और उसके तथा उन दोनों व्यक्तियों, जो रोज उससे पैसा लेकर चले जाते थे, उन सब के बारे में विस्तार से जानने की जिज्ञासा हुई और एक दिन में चुपके से उस भिखारन महिला के पीछे– पीछे चला पड़ा, लेकिन यह क्या........?


मैं चौक गया।

महिला एक रेड लाइट एरिया वाले इलाके में प्रवेश करने लगी और वहाँ एक कोठे पर चढ़ गई। मारे मन में आया और में सोचने लगा की क्या ये महिला वैश्या है......?

और अगर नही है तो आखिर वह यह क्यों आई है.....? मुझे अब उस महिला से घृणा होने लगी लेकिन में यह ठहरने वाला काहा था।


दूसरे दिन में एक फर्जी कस्टमर बनकर उस बुजुर्ग महिला। जिस कमरे में गई थी उसके पास पहुंचने में सफल हो गया और मैंने जो दृश्य वहाँ का देखा, उससे मुझे खुद से नफरत होने लागी, की क्यू आया ऐसी गंदी जगह पर........!!

मुझे क्या पड़ी थी.....इन सब में बदबूदार कमरे में, कही डोल की थाप और घुंघरुओं की मधुर तल पर अश्लील नर्तन करती वैश्याए.........

मुंह में पानी की हिलौरी दबाए और मसमद पर लेते ललचाई नजरों से उन वैशयाओ के अंग–अंग को निहारते ग्राहक।

पर मैंने देखा वहाँ वह बुड्ढी महिला नहीं थी। मैंने दूसरे तरफ नजर घुमाई, तो उस महिला को एक कल कोठरी में बंद पाया।


उसकी तरह वहाँ और भी कई महिलाएं थी।

लगभग 50 से ज्यादा महिला होगी....... घुप अंधेरा, नीचे दरी पर बैठी घुटनों को उठाए और उस पर सिर झुकाए कुछ महिलाएं बैठी थी

यहां की स्थिति में सुधार मेरे वश की बात नही थी, लेकिन आज मुझे उस बुड्ढी महिला की सच्चाई का पता चल गया था। अगले दिन मैंने छुट्टी ले ली और आज में फिर स्टेशन चला गया। स्टेशन पर वह जमीन पर आपने एलमुनियम का कटोरा पीट– पीटकर लोगो का ध्यान आकृष्ट कर रही थी।


मैं पहले तो उसके करीब। जाकर बैठा और उसे प्यार से "मां" के संबोधन से पुकारा।

मां शब्दों को सुनकर वह अचंभित हो गई और बेचारी फूट फूट कर रोने लगी।


मैंने उसका परिचय पूछा, मां आप कौन हो? कहाँ से आई हो? बच्चे और पति कहाँ है?

वह रोटी रही और रो–रोकर उसने जो दस्ताना सुनाई, मेरे रोंगटे खड़े हो गए और इस समाज से मुझे घृणा होने लगी। 


उस बूढ़ी भिखारन ने कहा की—

बेटा हम प्यार मोहब्बत के झांसे में पड़कर अपने मां–बाप के विरुद्ध जाकर दूसरे से शादी कर के घर से भाग गए थे...... जब तक मन नहीं भरा तक तक इस्तेमाल करता रहा...... और जिस दिन मन भर गया न बाबू, तब हमे धोखे से कोठे पर लाकर बेच दिया...!!


यह प्राय: जितने भी लड़कियों को तुम देख रहे हो न सब अपने प्यार–मोहब्बत के नेम पर विस्वास करके घर से मां–बाप के विरुद्ध जाकर भागी लकड़ियां है.... और बा डीएमई जब हमे बेच दिया जाता है तो फिर हमे मजबूर किया जाता है वैश्या बनने के लिए।


ना चाहते हुए भी ग्राहकों को खुश करना पड़ता है। सब नोचते है हमे भेड़िया की तरह मानो कितनो दिनों से उनकाई प्यास बुझी न हो। जब–तक जवानी रहती है बेटा, तब तक हम कोठे की शान रहते है और जब शरीर के अंग साथ देना छोड़ने लगते गई और ग्राहक मिलने बंद हो जाते है, तब मालिक हमे पागल घोषित कर देता है,और सड़को पर, रेलवेस्टेशन पर भीख मांगने के लिए बैठा देते हैऔर डेली उनके भेजे दलाल हमसे पैसे वसूली करते है। पैसे नही देने पर या विरोध करने पर मार–पीट भी करते है। अब बूढ़ी हो चुके हम महिलाओं के पास शक्ति तो नही होती की हम उनका विरोध कर पाये....... हम बस जिंदा लाश बन उसके इशारे पर सारा काम करते रहते है। जब हम भीख मांगने के लायक भी नहीं बचते, तो हमे ये लावारिश सड़क पर ले जाकर फेंक देते है।


यही है हम वैश्याओ की कहनी—

हम भी सोहते है की काश हमने अपने माता– पिता के विरुद्ध न जाकर गलत कडमवना उठाए होते तो हमारा भी एक हंसता–खेलता घर परिवार होते।


हर मोड़ पर हमारी आंखे तलाशती है की कही किसी मोड़ पर कोई अपना मिल जाए, उसे इस जिल्लत भरी जिंदगी से छुटकारा दिलाए।

अफसोस ! हमारे बारे में समाज मुद्दा नहीं उठाती है..... हम बस जी रहे है, हर रो कतरा–कतरा मरते हुए कल फिर जीने की आस में।



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