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Sudha Adesh

Inspirational


4.8  

Sudha Adesh

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नई दिशा

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"मेरी मृत्यु के पश्चात् मेरा शरीर दान कर दिया जाये।"

अमित शंकर की इस कथन को सुनकर जहाँ सचिन तथा चेतना अवाक् रह गये वहीं उनकी पत्नी अमला ने रोना प्रारंभ कर दिया। उस समय उनको यह भी होश नहीं रहा कि दूसरी बार हार्ट अटैक का सामना कर आज ही घर लौटे पति के सामने उनका इस तरह से रोना उचित भी है या नहीं।

अमला को इस तरह से रोते देखकर उनकी बहू चेतना उन्हें उनके पास से उठाकर अपने कमरे में ले गई। एकांत पाते ही वह बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रोते हुए बोलीं, "बहू, अब तू ही उन्हें समझा, भला यह भी कोई बात हुई, कि हम उनके शरीर का दान कर दें। उनके शरीर को कोई चीरे फाड़े, यह मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा। तुम्हारे पिताजी यह क्यों भूल रहे हैं कि जब तक मृत शरीर का दाह संस्कार पूर्ण विधि विधान से नहीं होता तब तक व्यक्ति की आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता। वह विधि विपरीत काम क्यों करना चाह रहे हैं ? "

"माँजी, आप चुप हो जाइये। मैं और सचिन उन्हें समझाने का प्रयास करेंगे।" चेतना ने माँजी को चुप कराते हुए कह तो दिया लेकिन वह जानती थी कि उसके ससुर जो कुछ भी कहते या करते हैं, वह बहुत सोच समझकर करते हैं अतः उनकी इस आकांक्षा के पीछे भी अवश्य ही मानवता के प्रति सेवा की भावना ही मुख्य होगी।

उसे याद है, उसके विवाह के समय उन्होंने न केवल बिना दहेज के विवाह का प्रस्ताव रखा था वरन् उस पर अमल भी किया था। माँ पिताजी के विशेष आग्रह पर उन्हें उसे कपड़े गहने लाने की इजाज़त देनी पड़ी थी। विवाह के निमंत्रण पत्र पर उन्होंने लिखवा दिया था, "हमें आपका उपहार नहीं, आशीर्वाद चाहिये।" निमंत्रण पत्र पर लिखी उस पंक्ति को पढ़कर उसका भाई तथा बहन यह कहकर खूब हँसे थे, भला ऐसा भी किसी ने आज तक किया है। यह तो स्वयं को महान दिखाने का नाटक है। हम भी देखेंगे कि मेहमानों के लाये उपहार वह कैसे नहीं लेते ?वे दोनो उस समय आश्चर्यचकित रह गये जब जयमाल के पश्चात् उन्होंने अपनी कथनी और करनी में भेद न करते हुए लोगों के लाये उपहारों को विनम्रता से लौटाना प्रारंभ कर दिया था। शुभकामनायें व्यक्त करने आये लोगों के द्वारा लाये बुके को अवश्य उन्होंने रख लिया था। उनके इस आचरण को देखकर उसके पास ही बैठे उसके भाई बहन खिसियानी हँसी हँस दिये थे।

अपनी सदाश्यता का एक अनोखा उदाहरण उन्होंने तब प्रस्तुत किया था जब आम प्रथा के विपरीत विवाह के पश्चात् वह सचिन और उसे मंदिर ले जाने की बजाय अनाथाश्रम ले गये थे तथा उनके हाथों से उन्होंने बच्चों को खाने के साथ-साथ उपहार भी दिलवाये थे। तब उन मासूमों के चेहरे पर आई चमक देखकर उन्होंने कहा था,

"भगवान को प्रसाद चढ़ा कर उनका आशीर्वाद तो सभी लेते हैं लेकिन हम यह क्यों भूल जाते हैं कि ये मासूम भी उन्हीं की रचना हैं, इनमें भी उस तथाकथित भगवान का ही वास है फिर उस पत्थर की मूर्ति पर चढ़ावा चढ़ाने से तो अच्छा है कि हम अपने सुख- दुख इन सजीव मूर्तियों में बाँटें "बाद में पता चला कि वह बच्चों का जन्मदिन, विवाह की वर्षगाँठ इत्यादि भी होटलों में मनाने की बजाय इन्हीं लोगों के साथ मनाना ज्यादा पसंद करते हैं। यहाँ तक कि होली दीवाली वाले दिन भी इन लोगों के साथ अपनी ख़ुशियाँ बाँटना नहीं भूलते हैं। 

अक्सर लोगों के खाने के तथा दिखाने के दाँत अलग-अलग होते हैं लेकिन पिताजी जो भी कहते हैं, करते भी हैं । इस बार भी अगर वह कुछ कह रहे हैं तो उसमें कुछ तथ्य अवश्य ही निहित होगा अतः उनका अपनी बात से पीछे हटने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। चेतना उनके कृतित्व और व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुई थी कि वह उसके ससुर ही नहीं, उसके पथप्रदर्शक गुरू बन गये हैं। उनकी प्रेरणा के कारण वह अपनी पी.एच.डी. पूरी करके कॉलेज में व्याख्याता बन गई है वरना विवाह के पश्चात् वह भी आम स्त्री की तरह अपना जीवन व्यतीत करती रहती। पिताजी ने ही उसे आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाते हुए आत्मनिर्भर बनने के लिये प्रेरित किया था। उसकी सास अमला वास्तव में सच्चे अर्थो में उनकी अर्धांगिनी ही हैं। बिना कहे ही उनके मन की बात समझकर तद्नुसार आचरण करना उनकी प्रवृति बन गई है। अपने दस वर्ष के वैवाहिक जीवन में उसने उन्हें कभी लड़ते-झगड़ते नहीं देखा है किन्तु आज उनकी इच्छा का विरोध करते हुए वह असहाय सी शून्य में देखे जा रही थीं, पिताजी को नींद आते ही सचिन भी उनके पास आ गया। उनकी बातों ने उसे भी विचलित कर दिया था, भला एक पुत्र अपने पिता के शरीर को भले ही वह मृत ही क्यों न हों, ऐसे किसी को कैसे सौंप सकता है ?

पिताजी को सीवियर अटैक पड़ा था। हालत में सुधार होने उन्हें घर ले आये थे लेकिन डाक्टर ने उन्हें किसी भी प्रकार के तनाव से दूर रखने का आग्रह किया था। शायद उन्हें अपनी आसन्न मृत्यु का आभास हो गया था अतः अवसर पाते ही उन्होंने अपनी दिली इच्छा प्रकट कर दी थी लेकिन उनकी इस इच्छा ने सब का सुख चैन छीन लिया था।तीन चार दिन इसी कशमकश में बीत गये। एक दिन सब साथ बैठे नाश्ता कर रहे थे कि उन्होंने देह दान की फारमेल्टी पूरा करने के लिये चेतना से फार्म मँगाने के लिये कहा।

"पिताजी, आप ऐसा क्यों कह रहे है, आप शीध्र ठीक हो जायेंगे।" चेतना ने कहा । 

"बेटी, मुझे इन दोनों पर तो भरोसा नहीं है लेकिन आशा है तुम मेरी इस इच्छा का अनादर नहीं करोगी। न जाने यह सांसे कब बंद हो जायें !! दिल की इच्छा दिल में ही रह जाये इसलिये देहदान का फार्म भरकर आश्वस्त होना चाहता हूँ।" आशा भरी नजर से उसे देखते हुए उन्होंने कहा।

 "पिताजी, मैं नहीं जानती कि आपके इस निर्णय के पीछे क्या कारण है लेकिन इतना अवश्य जानती हूँ कि हमारे धर्म में अग्नि को समर्पित शरीर को ही मुक्ति मिलती है।" चेतना ने विवशतायुक्त स्वर में कहा।  

"आराम से कह तो दिया कि मेरा शरीर दान कर देना लेकिन आपने यह कैसे सोच लिया कि हम आपका शरीर लावारिसों की तरह किसी को चीड़-फाड़ के लिये दे देगें।" माँ जो चुपचाप उनका वार्तालाप सुन रही थीं, अचानक उत्तेजित होकर बोली  "अमला, धर्म-अधर्म, मोक्ष, वोक्ष मैं नहीं जानता। यह भी नहीं जानता कि दूसरा जन्म भी होता है या नहीं। आत्मा-परमात्मा का संबंध भी मेरे जैसे कर्मप्रधान प्राणी की समझ से बाहर है। मैं बस इतना जानता हूँ कि इस नश्वर शरीर का उपयोग जितना अधिक से अधिक मानवता के कल्याण के लिये कर सकूँ कर लूँ। तुम्हारा यह सोचना या यह कहना कि लावारिस शरीर को ही चीड़ फाड़ के उपयोग में लिया या लाया जाता है , शायद ठीक हो। जरा सोचो हमसे तो अच्छे वह लावारिस हैं जो मर कर भी संसार को ज्ञान दे जाते हैं। आखिर इन्हीं शरीरों से छात्र मानव शरीर की संरचना को देख और समझकर जीवित शरीर पर अपने ज्ञान का उपयोग कर लोगों के दुख दर्द दूर कर पाते हैं। कुछ रूककर उन्होंने पुनः कहना प्रारंभ किया...

"अमला, जिन्हें तुम लावारिस कह रही हो वह भी किसी के पिता, माँ, भाई, बहन, पुत्र या पुत्री होते हैं। कभी-कभी परिस्थितियाँ उन्हें लावारिस अवश्य बना देती हैं लेकिन यह सोचना कि हर वह शख्स जो अपना शरीर या शरीर का कोई अंग दान करता है वह लावारिस है, गलत है। यदि ऐसा होता तो तुम्हारा यह पति आज अंधा ही रहता। अमला, तुम तो जानती ही हो कि जब मैं ग्यारह वर्ष का था, दीपावली पर अनार छुड़ाते हुए, अचानक हुए विस्फोट में मेरी दोनों आँखों की रौशनी चली गई थी। रौशनी वाले पर्व ने किसी अबोध की दुनिया में अंधेरा ही अंधेरा भर दिया था। तब डाक्टर ने कहा था कि मेरी आँखें ठीक हो सकती है यदि किसी की आँखें मिल जायें। उस समय आज की तरह "आई बैंक" नहीं थे कि जहाँ पैसे देकर आँख ली जा सकें। जहाँ भी किसी एक्सीडेंट या किसी के मरने की खबर मिलती, पिताजी वहाँ जाकर मेरे लिये आँखों की माँग करते लेकिन हर जगह उन्हें निराशा ही हाथ लगती। यहाँ तक कि कभी-कभी उन्हें अपमानित भी होना पड़ता पर पुत्र के मोह में अंधे हो चुके वह सारे अपमान हँसते-हँसते सहते गये। उनके लिये जिंदगी, जिंदगी नहीं बोझ बन चुकी थी, भला कोई भी माता-पिता संतान को दुखी देखकर सुख से कैसे रह सकते हैं ? दिव्यांगता यदि जन्मजात हो तो भी एक बार संतोष हो जाता है लेकिन यदि दिव्यांगता किसी दुर्घटना की देन हो तो उसको अपना पाना, न केवल दिव्यांग बच्चे के लिये वरन् माता- पिता के लिये भी अभिशाप बनने लगती है।

 कभी-कभी कोई हादसा किसी से कुछ छीन लेता है वहीं किसी के लिये वही हादसा रौशनी की किरण बन जाता है। अभी माँ-पिताजी असमंजस की स्थिति में ही जी रहे थे कि उनके नौकर दीनू काका के पुत्र को वाइरल फीवर हो गया। इलाज के बावजूद उसकी हालत बिगड़ती गई तथा चार दिन के बुखार में ही उसने दम तोड़ दिया। दीनू काका जो मेरे पिताजी की मनःस्थिति से परिचित थे, ने स्वयं अपने पुत्र की आँखें मुझे देने की पेशकश की।  उनकी पेशकश पर एकाएक पिताजी को विश्वास ही नहीं हुआ।  "मालिक अपना शंकर तो चला गया। मिट्टी से बना शरीर मिट्टी में ही मिल जायेगा। मिट्टी हुए इस शरीर का कोई अंग किसी के काम आ जाए तो क्या बुराई है ? छोटे मालिक के लिये आपको आँखें चाहिए यदि शंकर की आँखें ही उनके काम आ जाए तो, शंकर नहीं कम से कम उसकी आँखें तो मेरे सामने रहेंगी।" पिताजी को असमंजस में पड़ा देखकर, अपनी बात कहते हुए दीनू काका ने अपनी आँखें पोंछी थीं।  

भावविभोर होकर पिताजी ने उन्हें गले से लगा लिया। उन्हें सांत्वना देते हुए कुछ देने की पेशकश की तो वह बोले,"पैसे देकर हमारी भावनाओं को ठेस मत पहुँचाइये मालिक। हम ग़रीबों के लिये पैसा सब कुछ नहीं है। क्या छोटे मालिक हमारे कुछ नहीं लगते ? उनको भी हमने शंकर की तरह ही गोद खिलाया है, प्यार किया है...फिर यह कीमत क्यों और किसलिये ?" इस बार विवशताजन्य आक्रोश उनके शब्दों में झलक आया था।

"नहीं-नहीं दीनू काका, अमित भी तो आपका ही पुत्र है। आखिर हमसे ज्यादा तो आपने ही उसकी देखभाल की है।" इस बार माँ ने उनके टूटे दिल पर मलहम लगाते हुए कहा था।

माँ-पिताजी ने उस मासूम बच्चे को श्रद्धांजली देते हुए मेरे नाम के साथ शंकर भी जोड़ दिया था। उस समय दीनू काका ने अगर धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य और मोक्ष के बारे में सोचा होता तो आज मैं भी दिव्यांग होता तब क्या तुम्हारे उच्चपदस्थ पिता तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में देते ? उन्हीं दान की हुई आँखों से मैं दुनिया देख रहा हूँ। दीनू काका की बातें आज भी मेरे कानों में ऐसे गूँजती हैं जैसे कल की ही बात है। दीनू काका मेरे दूसरे जन्मदाता थे। आज मैं जो कुछ हूँ ,उन्हीं के कारण हूँ अतः उनके ही सिखाये मार्ग पर चलकर मैं चाहता हूँ कि मेरी देह दान कर दी जाये। वैसे भी यह शरीर तो नश्वर है, चाहे वह अग्नि को समर्पित हो, चाहे मिट्टी या जल में, सब सोचने की बातें हैं। शाख का पत्ता जब तक शाख पर रहता है जब तक जीवन देता ही है किन्तु टूटने के पश्चात् मिट्टी में मिलकर भी जीवन दे जाता है । यही मानव जीवन का मूल मंत्र होना चाहिये। मिट्टी में मिलने से पूर्व हमारी देह किसी के काम आ सके तो क्या बुराई है ?" कहते-कहते पिताजी हाँफने लगे थे लेकिन उनका चेहरा एक अनोखी आभा से दीपित हो उठा था।

"शायद आप ठीक कह रहे हैं, जीवित रहते हुए इंसान स्वभावतः अपना ही अच्छा बुरा सोचता है। छल-कपट करते हुए यह भी नहीं सोचता कि उसकी करनी से किसी को दुख तो नहीं पहुँच रहा है। कम से कम मर कर तो दूसरों का भला कर जाये। बेटा, मरने के पश्चात् मेरा शरीर भी दान कर देना।" अमला के स्वर की दृढ़ता देखकर न केवल सचिन और चेतना वरन् अमित शंकर भी चौंक गये। भला दान का इससे अच्छा स्वरूप और क्या हो सकता है ? यह एक ऐसा निर्णय है जो कहने सुनने में आसान लगता है पर इस पर अमल करना बेहद ही कठिन है। इस दान के लिये पहले तो व्यक्ति को इस कदम के लिये स्वयं को मानसिक रूप से तैयार करना पड़ेगा, साथ ही साथ रिश्तेदारों और समाज का विरोध एवं मान-अपमान भी सहने के लिये भी तैयार रहना होगा। ऐसे क्रांतिकारी कदम बिरले ही उठा पाते हैं। हर नये कदम का विरोध तो होता ही है। आदमी वही है जो अपने निश्चय पर बिना किसी डर, बिना किसी दबाव के चल पाये...तभी वह समाज को नई दिशा दे पाता है। इस अहसास के साथ ही सचिन ने चेतना की ओर देखा। वहाँ भी असमंजस की छाया देखकर आँखों ही आँखों में उन दोनों ने एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हुए आखिरकार माँ-पिताजी के निर्णय को पूर्ण करने का संकल्प करते हुये सिर्फ दो नहीं, देहदान के चार फार्म लाने का निश्चय कर लिया।   


     

 




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