मुश्किल यही है
मुश्किल यही है
कालोनी की मैडम कलावती की हर जगह चर्चाएँ होती रहती थी उनके बिना कोई भी फंक्शन सूना सूना लगा करता था। उनके व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि वे चुने हुए मोती समान शब्दों को एक खूबसूरत माला में पिरोना बखूबी जानती थीं लेकिन अपनी अहंकारी प्रवृत्ति और सामने वाले पर एक बेल की तरह छा जाने की अद्भुत कला के चलते सभी को कुछ ही दिनों में अप्रिय हो जाती थीं। लोक व्यवहार में अब ज्यादा देर तक कोई किसी की बक बक झेल नहीं पाता है इस बात का उनको कतई भान नहीं होता।समाज में ही नहीं अपने परिवार में भी कभी कभी वह इसी के चलते हँसी का पात्र बन बैठती थीं।
"लो भाई ! आ गईं मैडम कलावती।" मिसेज अग्रवाल बोल पडीं।
" अरे भाई थोड़ी देर हो गई असल में मेरे जिम्मे इतना काम पडा होता है कि निकलते निकलते देर हो जाती है।ये तो कुछ करते धरते नहीं दिन भर चाय पानी का हुकुम अलबत्ता चलाते रहते हैं। वो तो मेरे जैसा है कि" मैडम कलावती का वाक्य पूरा भी नहीं होने पाया था कि वहां जुटी महिलाएं एक और मेंबर को वेलकम करने के लिए चल दी'। यही या यूँ कहें कि प्राय: ऐसा ही होता रहता है मैडम कलावती के साथ। अरे भाई, किसके जिम्मे नहीं घर का काम पडा होता है ? किसके पति या बच्चे नहीं घर बैठे हुकुम पर हुकुम चालाते रहते हैं ?फिर कोई तुम स्पेशल तो नहीं ? और और एक वह भी तो हैं मिसेज त्रिपाठी जो नौकरी भी करती हैं, अपने बाल - बच्चों और हसबैंड का टिफिन भी लगाती हैं और हमेशा मुस्कुरा कर ठीक समय पर किटी या सोसाइटी की मीटिंग में भी आ जाया करती हैं।' कोई महिला बुदबुदा उठी।
" हाँ, तो फ्रेंडस ! अब हम लोग अपनी मीटिंग की कार्यवाही शुरू करने जा रहे हैं।"मिसेज सिंह ने ऐलान किया।
मिसेज चैटर्जी, जो सेक्रेटरी थीं, उठकर खड़ी हो गईं और परम्परा के अनुसार समवेत स्वरों में ईश वन्दना शुरू हो गई -" भज रे इष्ट नाम मन आमार।
भज रे, , भज रे
सृष्टि -स्थिति तातेईनिहित,
ताहतेई शेष परिणाम।|
भज रे इष्ट नाम भज रे इष्ट नाम "
मिसेज जैन बार बार घड़ी देख रही थीं लगता है उन्हें जल्दी ही जाना था। ईश वंदना के बाद कस्टमाइज हाउजी गेम या तम्बोला खेलना तो उनके लिए "मस्ट " रहा करता था।बल्कि उन्हों तो कई बार यह प्रस्ताव भी दे डाला था कि मेंबर जब जुटें तो सबसे पहले नाश्ता पानी हो जाया करे और फिर हाउजी खेल लिया जाया करे जिससे अगर किसी मेंबर को जानना हो तो वह चला जा सके। और हाँ उन्होंने तो यह भी सजेस्ट कर डाला था कि यह ईश वंदना चलते समय कर ली जाय। लेकिन यह बात बहुतों को जंची नहीं थी इसलिए मिसेज जैन अब निराश हो चली थी और हर मीटिंग में इस बोरिंग शुरुआत को अनमने ढंग से झेलती थीं।औरतों के उस ग्रुप में अकेली थीं मिसेज जैन जो पूजा पाठ क्रिया कर्म से अलग ही रहती थी। उनके पति आर्मी में रहे हैं इसलिए उनकी लाइफ स्टाइल शेष औरतों से अलग ही रहा करती थी। वे टोले मोहल्ले के लोगों को ज्यादा तवज्जो नहीं दिया करती थीं। उनकी पार्टियां हाई फाई हुआ करती थीं जिनमें पबजी, तम्बोला, फनी किटी गेम, ओगी गेम, बार्बी गेम, एक मिनट के गेम, बिंदी गेम जाने क्या क्या हुआ करते हैं। "ओके ब्यूटीफुल लेडीज़ " प्रेसिडेंट साहिबा फरमा रही थीं।
मीटिंग में मिसेज चौहान सबसे पुरानी मेंबर हैं जो याद करने लगीं कि टिकट, नंबर और किस्मत का यह गेम ऑफ़ चांस नाम से 488 साल पुराना खेल रहा है। वे जब अपनी जवानी के दिनों में यूरोप घूमने गई थीं तो उन्हें बताया गया था कि 1530 में इटली में "ले लोटो इटालिया "इसका नाम था।18 वीं सदी में "ले लोटो " फ्रांस, , ब्रिटेन और यूरोप के अन्य हिस्सों में पहुंच गया और अब पूरे संसार के मध्य और उच्च वर्ग के जीवन का हिस्सा बन गया है। " अब हम मैडम कलावती को बुलाना चाहेंगे जो आकर मेम्बर्स को हाउजी गेम खिलाएं।"
मैडम कलावती के लिए यह काम उनके मन का हुआ करता था।लेकिन वे मन ही मन अफ़सोस भी किया करतीं और दूसरों को सुनाया भी करती हैं कि उनके गेम खिलाने से उनके अपने खेलने पर जो पाबंदी लग जाया करती है इसे वह बहुत ही मिस करती हैं।आखिर उन्हें लकी क्वीन का टाइटिल जो मिला हुआ है ! हाऊजी शुरू हुआ। मैडम कलावती ने नंबर पुकारने शुरू किये और बीच बीच में उनका मिसेज प्रसाद से कुछ आँखों ही आँखों में इशारेबाजी भी हुआ करती थी। सभी अपना अपना नंबर मिलाने और उसे काटने में व्यस्त थे और उधर जाने क्या इशाराबाज़ी चले जा रही थी वे एक एक नम्बर बोल रही थीं और उधर मिसेज प्रसाद के साआरे नंबर कटते जा रहे थे। पता चला कि हर बार की तरह इस बार भी मिसेज प्रसाद के ही सारे नंबर कटते चले गए और उन्हें विजय मिल गई।
मिसेज जैन इस बार ताड़ गईं कि हाउजी गेम में अवश्य कोई ना कोई साज़िश रची जाती है क्योंकि अगर मिसेज प्रसाद खिलाती है तो मैडम कलावती के सरे नंबर कट जाया करते हैं और जब मैडम कलावती यह खेल खिलाती हैं तो मिसेज प्रसाद के सारे नंबर कटने लगते हैं। उन्होंने देर नहीं करते हुए अपनी शंका जाहिर कर डाली।अब तो वहां भयंकर कोहराम मच गया। एक फ्रंट पर मिसेज जैन और ढेर सारी मेंबर और दूसरे फ्रंट पर मैडम कलावती, मिसेज प्रसाद और कुछ और महिलाएं थीं। इस नोंक झोंक में दखल करती हुई प्रेसीडेंट साहिबा ने खुद जब जांच की तो पता चला कि बोले जाने वाले नम्बरों के दो सेट मौजूद थे। हालांकि मैडम कलावती रंगे हाथों पकड ली गई थीं और सारा मामला मेम्बरों की समझ में आ गया था लेकिन फिर भी अपना हाथ जोर जोर से नचाते हुए वे चीख चीख कर बोले जा रही थीं -
" अब मुझे क्या पता कि बोले जाने वाले नम्बरों के एक सेट हैं या दो। मैं तो नेकी करती हूँ और गेम आप लोगों को खिलाती हूँ और आप लोग अब मुझ पर झूठी तोहमतें लगा रहे हैं ! मैं मैं अब इस सोसाइटी की मेम्बरशिप से ही इस्तीफा देती हूँ। "
सोसाइटी के लोग एक दूसरे को देख रहे थे। मिसेज प्रसाद और मैडम कलावती एक दूसरे का हाथ थामे हाल से बहर जा रही थीं। पहली बार मैडम कलावती का ऐसा एक्सपोजर देख कर बाकी सभी महिलायें विस्मित और हतप्रभ थीं।
