मंदिर की सबसे ऊंची सीढ़ी

मंदिर की सबसे ऊंची सीढ़ी

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तीन दिन की लगातार छुट्टियां थीं। उसने बस स्टैंड पहुंच कर इस शहर के लिए बस पकड़ ली थी। बस शहर में प्रवेश कर चुकी थी। जानी-पहचानी जगहें एक-एक कर खिड़की के पर्दे से गुजरती चली जा रही थीं। इस छोटे से शहर की शायद ही कोई ऐसी जगह हो जो मीता की यादों से न जुड़ी हो। मीता की यादें और उन बीते लम्हों को फिर से जीने की अदम्य कामना ही उसे इस शहर में खींच लायी थी।


यहां पहली बार वह एक सेमिनार में भाग लेने आया था। तीन दिन का सेमिनार था जो दूसरे दिन सुबह से शुरू होने वाला था। उसकी कंपनी ने पहले ही उसके लिए होटल बुक कराया हुआ था। होटल पहुंच कर उसने आराम करने का इरादा किया ही था कि फोन की घंटी बजने लगी। उसने बेमन से फोन उठाया। रिसेप्सनिस्ट का फोन था – “सर, आपसे कोई मिलने आया है। उसे ऊपर कमरे में भेज दूं या फिर आप लॉबी में आ रहे हैं?”


इस अजनबी शहर में कौन उससे मिलने आया होगा, यह सोचते हुए उसने कहा – “मैं नीचे ही आ रहा हूँ। बस पांच मिनट में”


उसने जल्दी-जल्दी शर्ट डाली और लिफ्ट पकड़ कर लॉबी में पहुंचा। उसे देखते ही रिसेप्सनिस्ट ने कोने में रखे सोफे की तरफ इशारा किया जहां एक सांवली सी, लेकिन आकर्षक व्यक्तित्व वाली लड़की बैठी हुई थी। वह उसकी ओर बढ़ा तो वह उठ कर खड़ी हो गई और बोली – “आप धीरज सर हैं न? हैडऑफिस से आए हैं ?”


उसने असमंजस भरी निगाह उस पर डालते हुए कहा था – “हां, पर आप?”


“सर, मैं मीता हूँ। इस शहर में कंपनी की ब्रांच में काम करती हूँ। सेमिनार के सिलसिले में आप इस शहर में तीन दिन रुकने वाले हैं ना? कंपनी ने मुझे भी सेमिनार में भाग लेने के लिए डेप्यूट किया है। मेरे बॉस राजेन्द्र सर ने मुझसे कहा है कि मैं आप से पहले ही मिल लूं और इस बात का ख्याल रखूं कि इस नए शहर में आपको कोई परेशानी न होने पाए”


वह विस्मय से भर उठा। कंपनी कितना ख्याल रखती है अपने स्टाफ का। फिर सोफे पर बैठते हुए बोला - “खुशी हुई मीता जी आपसे मिल कर। मैं यहां पहली बार ही आया हूँ। सोच रहा था कि इस अनजान शहर में अनजान लोगों के बीच ये तीन दिन कैसे गुजरेंगे। चलो, आपका साथ रहेगा” कुछ देर उन्होंने औपचारिक बातें कीं और फिर मीता को धन्यवाद देकर वह उठ खड़ा हुआ। उसे इस समय थोड़ा आराम कर लेना बहुत जरूरी लग रहा था।


अगले दिन जब वह सेमिनार में पहुंचा तो मीता गेट पर ही खड़ी मिल गई। वह उसका इंतजार ही कर रही थी। दोनों बातें करते हुए सेमिनार हॉल में पहुंचे और साथ वाली कुर्सियों पर बैठ गए। लंच टाइम में दोनों ने साथ ही खाना खाया। बातों ही बातों में यह तय हुआ कि सेमिनार के बाद वे शहर के कुछ दर्शनीय स्थल देखने जाएंगे।


पूरे तीन दिन कंपनी ने उसके लिए कार की व्यवस्था की हुई थी। वे सीधे ही घूमने निकल दिए। शहर से करीब आधा घंटे की दूरी पर एक तालाब था, जिसे टूरिस्ट स्पॉट के रूप में विकसित किया गया था। तीन तरफ हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा यह तालाब सचमुच बहुत सुंदर था। वे बहुत देर तक तालाब के किनारे बातें करते हुए घूमते रहे। थोड़ा अंधेरा होते ही बत्तियां जल उठीं। उनकी रोशनी में नहाया तालाब और भी खूबसूरत लगने लगा। वे थक कर तालाब की सीढ़ियों पर बैठ गए थे।


शाम गहराने के साथ ही वहां सैलानियों की अच्छी-खासी संख्या नजर आने लगी थी। तालाब से कुछ दूर लगी दुकानों पर लोग खा-पी रहे थे। मौज-मस्ती करते बच्चे भाग-दौड़ कर रहे थे और जोड़े हाथों में हाथ डाले तालाब की खूबसूरती को निहारते उसके चारों ओर बने ट्रेक पर चक्कर लगा रहे थे। कुछ लोग सीढ़ियों पर बैठ कर उस नजारे का आनंद ले रहे थे।


कुछ देर वे खामोश बैठे रहे। फिर उसने मीता से कहा था – “रात होती जा रही है। आपके घर वाले इंतजार कर रहे होंगे। सोचते होंगे हैडऑफिस से ऐसा कौन आया है जिसकी वजह से आप समय पर घर नहीं पहुंच पा रही हैं। गालियां दे रहे होंगे मुझे? चलो, चलते हैं”


वह उठने लगा था। पर मीता को वैसे ही बैठा देखकर रुक गया – “क्या हुआ? घर नहीं जाना है क्या?”


“घर पर कोई इंतजार नहीं कर रहा है, मेरा। मैंने शायद आपको बताया नहीं, मैं यहां अकेली ही रहती हूँ। फिर भी रात तो हो ही रही है” – उसने उठते हुए कहा था।


वह उठ कर चल दी तो वह भी उसके पीछे-पीछे कार की ओर चल दिया। कुछ प्रश्न उसके जेहन में उभर रहे थे, पर उसने उन्हें बाहर नहीं आने दिया। रास्ते भर मीता ने खामोशी ओढ़े रखी। वह सिर्फ बात करने के लिए ही उससे कुछ जानकारियां लेता रहा और वह उनके बहुत संक्षिप्त उत्तर देती रही।


होटल पहुंचने पर कार से बाहर निकलते हुए उसने कहा था – “आपको घर जाकर अकेले अपने लिए खाना बनाना पड़ेगा, क्यों न हम होटल के रेस्त्रां में साथ ही खाना खा लें। ड्राइवर आपको घर तक छोड़ देगा” वह बिना कुछ कहे बाहर निकल आई थी।


मैं डिनर से पहले थोड़ा फ्रेश होना चाहता हूँ। अगर आपको भी फ्रेश होना हो तो मेरे आने के बाद आप मेरे कमरे का उपयोग कर सकती हैं” वह उसे लॉबी में बैठा कर अपने कमरे में चला गया।


थोड़ी देर बाद जब वह लॉबी में आया तो मीता भी फ्रेश होने के लिए चाबी लेकर उसके कमरे में चली गई।


रेस्त्रां में आते ही मीता का मूड बिलकुल बदल गया था। उसने ही दोनों के लिए खाने का ऑर्डर दिया और बोली – “सर, आज तालाब तो हमने देख ही लिया है। कल सेमिनार खत्म होने के बाद मैं आपको शहर में घुमाऊंगी। बहुत ज्यादा जगह तो यहां देखने के लिए नहीं हैं, पर जो भी हैं देखने लायक हैं। कुछ जगहें तो छोटी-छोटी गलियों में काफी अंदर हैं, वहां कार से जाना मुश्किल है”


“फिर कैसे जाएंगे हम?”


वह कुछ सोचने लगी और फिर बोली – “ऐसा करते हैं, कल मैं अपना स्कूटर लेकर आती हूँ। मेरे स्कूटर से घूमेंगे। कितनी ही संकरी गली हो, ले जाओ उसे। क्यों ठीक रहेगा ना सर?”


वह उसके उत्साह को मंद नहीं करना चाहता था, उसने तुरंत ही हामी भर दी तो वह खुश हो गई।


तय प्रोग्राम के अनुसार दूसरे दिन शाम को वे स्कूटर से घूमने निकल पड़े। स्कूटर मीता ही चला रही थी। वाकई कई जगह देखने तो बहुत संकरी गलियों से गुजरना पड़ा।


उन पुरानी, लेकिन वैभवशाली हवेलियों में वे साथ-साथ घूमें जो ऐतिहासिक धरोहर तो थीं ही, वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना भी थीं। वह उसे घंटाघर दिखाने ले गई, वहां के एकमात्र लेकिन बेहद खूबसूरत छोटे से बाग में वे थोड़ी देर बैठे। उसने उसे बाजार घुमाए, खाने-पीने की मशहूर दुकानें दिखाईं और म्यूजियम भी दिखाया। मीता उसकी गाइड बनी हुई थी और बड़े उत्साह से उसे सब कुछ दिखा-बता रही थी।


काफी घूम-फिर कर वे थक गए थे। आखिर में वह उसे शहर के बीचों-बीच टेकड़ी पर बने कृष्ण मंदिर ले गई। बहुत सारी सीढ़ियां चढ़कर जब वे मंदिर में पहुंचे तो उस ऊंचाई से जगमग करते शहर का मनोरम दृश्य देख कर उनकी सारी थकान उतर गई।


मंदिर के दर्शन करने के बाद वे सबसे ऊंची सीढ़ी पर बैठ गए। मीता की बांह उसकी बांह को स्पर्श कर रही थी। वह उस छुअन को भीतर तक महसूस कर रहा था। पर, मीता इस सबसे बेखबर उसे उंगली के इशारे से वे जगहें दिखा रही थी, जहां वे थोड़ी देर पहले घूम कर आए थे।


वहां बैठे बहुत अच्छा लग रहा था। दोनों का ही उठने का मन नहीं था। पर, रात के आठ बज चुके थे। घड़ी पर नजर पड़ते ही मीता हड़बड़ा कर उठ कर खड़ी हो गई थी – “चलें सर, टाइम तो काफी हो गया है”


“कोई बात नहीं, चलो आज भी वहीं रेस्त्रां में खाना खाते हैं। वहीं से तुम घर निकल जाना” पता नहीं कब वह ‘आप’ से ‘तुम’ पर उतर आया था।


नहीं सर, यहां से मेरा घर बहुत पास है। चलो, मैं आज आपको अपने हाथ का खाना खिलाती हूँ। खाना खाने के बाद कार बुला कर आप आराम से होटल जा सकते हैं”


उसके जवाब का इंतजार किए बिना वह सीढ़ियां उतरने लगी।


नीचे आते ही उसने स्कूटर की चाबी उसे थमा दी और बोली – “मैं बहुत थक गई हूँ, स्कूटर अब आप चलाइये”


“मुझे यहां के रास्ते नहीं पता हैं, तुम्हीं चलाओ”


“आप चिंता न करें सर, पास में ही है, रास्ता मैं बताती रहूँगी” वह पीछे वाली सीट पर आराम से उसके कंधों पर अपने हाथ रख कर बैठ गई और उसे रास्ता बताती रही। वाकई पांच-सात मिनट में ही वे उसके घर पहुंच गए।


एक बेडरूम का छोटा सा फ्लैट था। बड़े करीने से सजा फ्लैट मीता की सुघड़ता को नुमाया कर रहा था। उसे हॉल में बैठा कर वह डिनर की तैयारी करने किचन में चली गई। अकेला बैठा वह बोर होने लगा तो उठ कर किचन में चला आया। मीता के मना करने पर भी वह सब्जी काटने बैठ गया। मीता गैस पर पहले ही कुछ चढ़ा चुकी थी और बर्तन निकालने में लगी थी। तभी उसने बेसाख्ता पूछ लिया था – “तुमने अब तक शादी नहीं की मीता?”


उसने एकदम उसे पलट कर देखा था। फिर वह वापस अपने काम में लग गई थी। वह अचकचाया सा उसके उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी बिना उसकी ओर मुड़े उसने कहा था – “हां, शादी की थी मैंने?”


“की थी, क्या मतलब?”


“मेरा तलाक हो चुका है”


“सॉरी, मुझे पता नहीं था”


“इसमें सॉरी की क्या बात है? तीस साल से ऊपर की मेरी उम्र देख कर किसी के भी मन में यह प्रश्न उठ सकता है”


खाना बनने तक उनके बीच खामोशी पसरी रही। खाना भी उन्होंने लगभग बिना बात किए ही खत्म किया। वह उस कमरे में पड़े एकमात्र सोफे पर जाकर बैठ गया। मीता बर्तन रखने अंदर चली गई। लौटी तो उसके हाथ में इलायची का डिब्बा था। उसे वह डिब्बा पकड़ा कर वह भी उसी सोफे पर बैठ गई। वह उससे कुछ कहना चाहता था, पर उसकी आंखों में नमी देख कर रुक गया। शादी की बात छेड़ने का उसे मन ही मन बहुत अफसोस हो रहा था।


तभी मीता ने कहना शुरू किया था – “हमारी लव मैरिज हुई थी। हम बहुत खुश थे। सुशांत मुझे लेकर बहुत पोसेसिव था। शुरू में तो मैं इसे उसके जबरदस्त प्रेम का हिस्सा मान कर खुश होती रही। पर, धीरे-धीरे उसके शक्की स्वभाव ने मेरा जीना हराम कर दिया। मैं ना तो किसी से बात कर सकती थी, ना ही किसी की प्रशंसा कर सकती थी और ना ही कहीं आ-जा सकती थी। मायके भी जाती तो वह पीछे-पीछे चला आता। मैं जितना ही समझाती उतना ही उसके शक का दायरा बढ़ता जाता। कब तक सहन करती यह सब? छह महीने पूरे होते-होते मैंने उसे तलाक का नोटिस दे दिया। वह बहुत रोया, गिड़गिड़ाया पर मैं इतनी घुटन महसूस करने लगी थी कि बस उस रिश्ते से बाहर निकलना चाहती थी” यह कहते-कहते मीता सुबकने लगी थी। उसने सांत्वना देने के लिए उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया था। दोनों कुछ देर वैसे ही बैठे रहे। ड्राइवर की मिस्ड कॉल आने पर वह घड़ी देखता उठ खड़ा हुआ। मीता उसे गेट तक छोड़ने आई। जब तक कार रवाना नहीं हुई, वह वहीं खड़ी रही।


सेमिनार का वह तीसरा और आखिरी दिन था। उसी रात उसकी वापसी की ट्रेन थी। मीता के सामान्य व्यवहार से उसे यह अंदाजा हो गया था कि रात के उस प्रसंग से वह उबर चुकी थी। उसने भी वह बात नहीं निकाली।


ट्रेन के जाने तक उनके पास चार घंटे का समय था। उसने एक बार फिर कृष्ण मंदिर जाने की इच्छा जताई तो मीता तुरंत तैयार हो गई। वे उसी सबसे ऊंची सीढ़ी पर जाकर बैठ गए। उस ऊंचाई से शहर का नजारा देखते हुए उसने कहा था – “मैं कैसे आपका शुक्रिया अदा करूं मीता जी। ये तीन दिन कहां निकल गए पता ही नहीं चला। सच कहूँ, यहां बड़े बेमन से आया था, आज जब जाने का समय आ गया है तो बड़े बेमन से जा रहा हूँ”


तेज हवा से मीता के बाल बार-बार उड़ कर उसके माथे पर आ रहे थे। उन्हें हाथों से हटाते हुए मीना ने उसकी आंखों में देखा था – “ऐसा क्या है, इस छोटे से शहर में?”


“तुम” – उसने कहा था।


उसके होठों पर एक हल्की मुस्कान खेल गई थी। वे काफी देर तक मंदिर की उसी सीढ़ी पर बैठे बातें करते रहे। ट्रेन जाने का समय तेजी से पास आता जा रहा था। अचानक घड़ी पर नजर पड़ने के साथ ही वह उठ कर खड़ा हो गया था।


होटल जाकर उसने अपना सामान उठाया और काउंटर पर चाबी पकड़ा कर तेजी से बाहर निकल आया। मीता उसे ट्रेन तक छोड़ने आई थी। जब वे स्टेशन पर पहुंचे ट्रेन चलने ही वाली थी। फर्स्ट क्लास के डिब्बे में अपना बैग रखने के बाद वह गेट पर आकर खड़ा हुआ ही था कि गाड़ी सरकने लगी। उसने ट्रेन के साथ-साथ चल रही मीता से कहा था – “थैंक्स फॉर एवरी थिंग मीता। क्या मैं कभी फोन पर तुमसे बात कर सकता हूँ?”


“हां, हां क्यों नहीं” मीता ने हाथ हिलाते हुए कहा था। तभी ट्रेन ने गति पकड़ ली थी। मीता रुक गई थी और लगातार हाथ हिला रही थी। वह भी तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक मीता आंखों से ओझल नहीं हो गई।


अपने शहर पहुंच कर वह काम में बहुत व्यस्त हो गया था। मीता को फोन करने की बात उसके दिमाग में थी, पर किसी न किसी कारण वह कर नहीं पाया था। उसे आए सात-आठ दिन गुजर गए थे। उस दिन फोन की घंटी बजी तो उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह मीता का फोन होगा। उसकी आवाज सुनते ही वह सचमुच उछल पड़ा था – “अरे मीता, तुम?”


“हां मैं। आपने तो कहा था मैं फोन करूंगा। जाते ही भूल गए कौन मीता”


“नहीं, नहीं ऐसी बात नहीं है। तुम्हें और तुम्हारे साथ बिताए पल रोज याद कर लेता हूँ”


“मैं कैसे मान लूं? इतने दिन जाकर हो गए, फोन तो किया नहीं आपने”


“मैं सच कह रहा हूँ, हर दिन याद किया है तुम्हें। हां, फोन न करने की गलती की है मैंने। इस गलती की सजा भुगतने के लिए तैयार हूँ। बोलो, क्या सजा है मेरे लिए”


“ठीक है, हफ्ते में कम से कम तीन बार फोन करना होगा आपको” यह कह कर वह जोर से हंस पड़ी थी।


उसके बाद वह नियम से उसे फोन करने लगा था। उनमें लम्बी बातें होतीं। ज्यादातर उनके बीच सामान्य बातें ही होती थीं। मीता उसे हर छोटी-बड़ी बात विस्तार से बताती और वह उसे ध्यान से सुनता। उसे फोन करने में जरा भी देर हो जाती तो मीता का फोन आ जाता। फोन के अलावा वे एसएमएस के जरिए भी एक-दूसरे का समाचार लेते रहते। उसने कई बार मीता के शहर जाने और उससे मिलने का मन बनाया पर किसी न किसी वजह से यह संभव नहीं हो पाया। फोन उनके बीच संपर्क का ऐसा साधन बन गया था जिससे वे एक-दूसरे से जुड़ा महसूस करते थे।


इधर कई दिनों से मीता उसका फोन नहीं उठा रही थी और ना ही उसका खुद का कोई फोन आया था। उसने उसे कई एसएमएस भी किए पर उनका भी कोई जवाब नहीं मिला तो वह परेशान हो उठा। उसने उस ब्रांच में फोन किया जहां मीता काम करती थी तो उसे पता चला कि वह लंबी छुट्टी लेकर अपने घर चली गई है। यह उसके लिए और भी परेशानी की बात थी। मीता ने इस बारे में उसे कुछ भी तो नहीं बताया था। उसे तो यह भी पता नहीं था कि उसका घर कहां था। फिर वह चाहे कहीं भी हो, उसे फोन तो कर सकती थी। उसके फोन का और उसके इतने सारे एसएमएस का जवाब तो दे ही सकती थी। क्या हुआ है उसे? उसकी चिंता और बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने उसे फोन करना और एसएमएस भेजना जारी रखा, पर किसी का भी जवाब नहीं मिल रहा था। एक माह बाद उसने मीता के ऑफिस में फिर से फोन लगाया तो पता चला उसने छुट्टी बढ़ा ली है। बार-बार मीता के ऑफिस में फोन करना और उसके बारे में पूछना, उसे अच्छा भी नहीं लग रहा था। हार कर उसने फोन करना और एसएमएस भेजना बंद कर दिया।


वह हर सुबह एक नयी आशा लेकर उठता कि शायद उस दिन मीता का फोन आ जाए, पर उसे निराशा ही हाथ लगती। वह सिलसिलेवार सारी बातें याद करता और सोचता उससे कहां और कैसी गलती हुई है कि मीता ने उससे संपर्क ही तोड़ दिया है। पर, उसे ऐसी कोई बात नजर नहीं आती थी। अचानक क्या हुआ था, यह वह समझ नहीं पा रहा था।


आज लगभग सात माह बाद वह फिर इस शहर में था। वह हर उस जगह गया जहां मीता के साथ घूमा था। वह उसके घर का भी चक्कर लगा आया था जहां दरवाजे पर ताला लटका हुआ था। थक-हार कर वह अपने होटल में आकर सो गया। जब उसकी आंख खुली तो शाम उतर आई थी। वह उठ कर बैठ गया। उसका मन बहुत उदास हो आया था। वह इस शहर को जल्दी से जल्दी छोड़ कर चले जाना चाहता था। उसने तय किया कि कल सुबह की पहली बस से वह वापस चला जाएगा। यह तय करने के बाद वह होटल से बाहर निकल आया।


यूँ ही इधर-उधर भटकने के बाद उसके कदम कृष्ण मंदिर की ओर उठ गए। वह एक-एक सीढ़ी चढ़ता जा रहा था और यह सोचता जा रहा था कि काश मीता भी पहले की तरह उसके साथ होती। सबसे ऊपर की सीढ़ी उसे दिखाई देने लगी थी। वहां बैठ कर वह उन पुराने दिनों में खोना चाहता था। लेकिन, कुछ सीढ़ी पहले उसने देखा कि उस सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर तो पहले से ही कोई बैठा हुआ था। उसे बहुत निराशा होने लगी। उसे लगा वह लौट जाए, पर वह इतना थक गया था कि वहां कुछ देर बैठने के लिए उसके कदम बढ़ते गए।


सांझ के झुटपुटे में उसने देखा उसे देखते ही उस सबसे ऊपर सीढ़ी पर बैठी वह लड़की उठ कर खड़ी हो गई थी और हैरत से उसे देख रही थी। पास आते ही उसकी आंखें भी जैसे धोखा खाने लगीं, क्या वह सचमुच मीता ही थी या फिर वह उसे मीता समझ रहा था। तभी उस आवाज ने उसे चौंका दिया – “सर, आप यहां?”


उत्तर में वह धम्म से सीढ़ी पर बैठ गया था। उसकी टांगें कांप रही थीं। मुश्किल से अपने-आप पर काबू करते हुए उसने पूछा था – “इतना क्यों परेशान किया मुझे मीता? मेरे फोन और एसएमएस का जवाब न देकर तुम क्या जताना चाहती थीं? यही ना कि तुम्हारी नजर में मेरी कोई कीमत नहीं है। फिर यहां इस सीढ़ी पर बैठ कर क्या कर रही हो तुम? इस सबका मतलब समझाओगी मुझे?”


मीता उसे अचानक वहां देख कर लगे धक्के से उबर चुकी थी। वह उसके पास बैठते हुए बोली – “पता नहीं, जो कुछ मैं आपसे कहूँगी उसे आप उसके सही रूप में लोगे या नहीं, पर मैं कुछ छुपाऊंगी नहीं। सुशांत को तलाक तो मैंने दे दिया था, पर मैं उसे भूल नहीं पा रही थी। शायद यही स्थिति उसकी थी। उसने अब तक दूसरी शादी नहीं की थी। मुझे लगता था, शायद वह खुद के शक्की स्वभाव को छोड़ देगा और किसी दिन आकर मुझे मना लेगा। पहल उसे ही करनी थी। मैं उस दिन का हर दिन इंतजार करती थी।


मुझे तलाकशुदा और अकेला जानकर कितने ही लोगों ने मुझसे संबंध बनाना चाहा, पर मुझ पर सुशांत हावी रहा। दो-तीन लोगों से दोस्ती अवश्य हुई, पर कभी भी उनके लिए मेरे मन में कोई कोमल भावना जागृत नहीं हुई। आपसे मिलने के बाद मुझे पता नहीं क्या हो गया। मैं सिर्फ आपके बारे में सोचने लगी। ऐसा तो कभी भी नहीं हुआ कि सुशांत की जगह मैं किसी और के बारे में सोचूं। आपका फोन नहीं आता था तो मैं बेचैन हो जाती थी। न चाहते हुए भी आपको फोन करने के लिए विवश हो जाती थी। सच कहूँ मैं खुद से ही डरने और भागने लगी थी। आपको तो मेरे बारे में काफी कुछ पता था, पर आपके बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता था। ना मैंने पूछा था और ना ही आपने बताया था। सिर्फ तीन दिन के साथ ने मुझे इतना बदल दिया था, मैं सचमुच डरने लगी थी। इसीलिए मैंने आपसे पूरी तरह दूर रहने का निर्णय लिया था। मुझे लगता था जब संपर्क टूट जाएगा तो मन भी बदल जाएगा, पर मेरी लाख कोशिशों के बाद भी ऐसा हो नहीं पाया। हां, मैं आपको याद करने के लिए यहां अक्सर आ कर बैठ जाती हूँ”


मीता, काश एक बार तो तुमने खुल कर मुझसे कुछ कहा होता। तुम्हें क्या लगता है, मैं इस मंदिर की तमाम सीढ़ियां चढ़ कर यहां क्यों आया हूँ? चलो, आज मैं तुम्हें अपने बारे में भी बता देता हूँ। मैं जब बहुत छोटा था, मेरे पिताजी गुजर गए थे। माँ ने मुझे और मेरी तीन बहनों को बड़ी मुश्किल से पाला। मैं पढ़ने में तेज था, इसलिए पढ़ता गया और मैंने एमबीए कर लिया। इस कंपनी में सीनियर मैनेजर की नौकरी करते तीन साल हो गए हैं। कई रिश्ते आए मेरे लिए, पर मैं अपनी तीनों बहनों की शादी करने के बाद ही इस बारे में सोचना चाहता था। दो बहनों की शादी हो चुकी है, तीसरी की बात पक्की हो चुकी है। दो महीने बाद उसकी भी शादी हो जाएगी। सच कहूँ, मैंने भी कभी नहीं सोचा था कि किसी से सिर्फ तीन दिन की मुलाकात में मैं उसके बारे में कुछ ऐसा फील करने लगूंगा जिससे मेरी दुनिया ही बदल जाएगी। बोलो, शादी करोगी मुझसे?


मीता ने धीरे से उसके कंधे पर अपना सिर रख दिया था। मंदिर की उस सबसे ऊंची सीढ़ी पर बैठे वे जगमगाते शहर के साथ अपना जगमगाता भविष्य भी देख रहे थे।


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