माँ के चले जाने के बाद

माँ के चले जाने के बाद

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उसका मूड बहुत उखड़ा हुआ था। आज उन्होंने फिर ऐसी बात कह दी थी जो उसे बेतरह चुभती थी। बाबू जी कब समझेंगे कि वे उसके लिए बोझ नहीं, उसकी जान हैं। पर, बाबू जी थे कि हमेशा उसे यह अहसास कराते रहते थे कि वे उस पर बोझ हैं। उसकी पूरी कोशिश रहती थी कि उन्हें कोई कष्ट न हो। वे जो कुछ भी चाहते, वह जल्दी से जल्दी उसे पूरा करने की कोशिश करता। पर, उसे कोफ्त तब होती जब उन्हें खुश रखने की उसकी इस कोशिश पर भी उसे बाबू जी से सुनने को मिलता – “बस, मेरे मुंह से कुछ भी निकला और तू उसे तुरंत पूरा करने को भागता है, क्यों शर्मिंदा करता रहता है, मुझे इस तरह तुझ से कुछ कहते भी संकोच होता है।" वह चुप होकर रह जाता। 

बाबू जी के रिटायरमेंट से तीन साल पहले ही उसे नौकरी मिल गई थी और उसे इस शहर में आना पड़ा था। नौकरी लगने के एक साल बाद ही उसकी शादी हो गई थी और फिर अगले साल ही वह जुड़वाँ बच्चों का बाप बन गया था। अम्मा-बाबूजी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। नौकरी की व्यस्तता के कारण बाबूजी तो उसके पास कम आ पाते थे, पर अम्मा का जब भी मन करता अपने पोते-पोती से मिलने चली आतीं।

अब तो बाबूजी को रिटायर हुए भी ग्यारह साल हो चुके हैं। जब वे रिटायर हुए थे तो उसने कितना आग्रह किया था कि वे सब साथ रहें, पर वे नहीं माने थे। अम्मा की इच्छा को नज़रअंदाज़ करते हुए उन्होंने गाँव के अपने पुश्तैनी मकान को ठीक-ठाक करा लिया था और वहीं रहने चले गए थे। उसने अम्मा से पूछा भी था कि इस उम्र में उन्हें अलग रहने की क्या जरूरत है तो उन्होंने संकोच के साथ कहा था – “तेरे बाबूजी को किसी पर बोझ बन कर रहना पसंद नहीं है। वे कहते हैं, विशु को अपने परिवार के साथ आज़ादी से रहने दो। गाँव में अपना मकान है, भगवान की दया से पेंशन भी है, फिर हम किसी को क्यों परेशान करें।“

वह सन्न रह गया था – “क्या कह रही हो अम्मा? क्या मैं ‘किसी’ की श्रेणी में आता हूं? बेटा हूं मैं उनका। उन्होंने ऐसा सोचा भी क्यों? सच बताना क्या कभी अनजाने में भी मैंने उन्हें ऐसा अहसास कराया है?”

अम्मा चुप हो गई थीं। फिर उन्होंने कहा था – “उनके दोस्तों - रिश्तेदारों के अनुभव हैं, जिनकी वजह से शायद उनकी यह सोच बनी हो। पर, तू इस बात को दिल से मत लगा। तुझे वे बहुत प्यार करते हैं। फिर, कितने दिन वे तुम सबसे दूर रह पाएंगे। हमेशा ही तो तुम्हारी और बच्चों की बातें किया करते हैं। समय गुजरने दे सब ठीक हो जाएगा।"


समय तो ज़रूर गुजरा, लेकिन ठीक कुछ भी नहीं हुआ। उसकी माँ बिना कोई नोटिस दिए अचानक गुजर गई। उन सबके लिए यह एक बहुत बड़ा धक्का था। बाबू जी को भी इतना हैरान-परेशान उसने कभी नहीं देखा था। गाँव में उन्हें अकेला छोड़ने का सवाल ही नहीं था। इस बार उन्होंने भी कोई विरोध नहीं किया था और वे चुपचाप उसके साथ चले आए थे।

वे आ तो गए थे, पर बिलकुल अलग-थलग से रहते। अक्सर कमरा बंद करके पड़े रहते। वह अपने काम के सिलसिले में सुबह ही घर से निकल जाता और घना अंधेरा पसर जाने के बाद थकाहारा घर लौटता। आते ही वह बाबूजी के कमरे में जाता। बाबूजी बस इतना ही कहते – “आ गया तू”, और उठ कर बैठ जाते। वह उनसे पूछता – “आपकी तबियत तो ठीक है न, बाबूजी”। उसे उत्तर मिलता – “मेरी तबियत को क्या हुआ है। बस पड़ा हुआ हूं। कट जाएगी ऐसे ही बाकी बची जिंदगी”।

वह बाबूजी के अकेलेपन को समझता था। माँ को बहुत मिस करते होंगे। माँ की याद तो उसे भी बहुत आती थी, पर उसे लगता अगर वह उनके सामने माँ का जिक्र करेगा तो वे और भी परेशान हो जाएंगे। इसलिए चुप होकर रह जाता।


छुट्टी के दिन वह उनके साथ कुछ समय गुजारना चाहता, पर बाबूजी हां हूं में ही जवाब देते और उसे उनके पास से उठ कर चले आने के सिवाय और कोई चारा नहीं रहता। उसका मन करता बाबूजी अपने-आपको सिर्फ अपने कमरे तक ही सीमित न रखें, पूरे परिवार के साथ बैठे उठे ताकि उनका अकेलापन दूर हो सके और वे माँ की यादों से भी दूर रह सकें। यह सोच कर वह पुराने ब्लैक-एंड-व्हाइट टी.वी. की जगह एक रंगीन टीवी ख़रीद लाया था। ड्राइंग रूम में रखा टीवी देखने भी वे कभी-कभार ही बाहर आते। ज्यादातर उसकी बीबी और दोनों बच्चे ही टीवी से चिपके रहते।


उस दिन बाबूजी टीवी पर न्यूज देख रहे थे। तभी बच्चे अपना कोई कार्यक्रम देखने के लिए ज़िद करने लगे। उन्होंने टीवी का रिमोट बच्चों को थमाया और अंदर जाकर लेट गए। वह जब अपने काम से लौट कर आया तब उसकी बीबी से उसे यह सब मालूम हुआ। उसने तुरंत ही उनके पास पहुंच कर इस बात के लिए माफ़ी मांगी और उन्हें बाहर आकर टीवी देखने के लिए कहा। वे उसकी बात सुन कर बोले – “कोई बात नहीं, बच्चे हैं। फिर जिनका टीवी है, उनका हक पहले बनता है”। वह उनकी बात सुनकर सन्न रह गया था – “क्या कह रहे हो बाबूजी, आप इस घर के सबसे बड़े हो। हर चीज पर पहला हक आपका है”। बाबूजी ने कुछ नहीं कहा था और वह करवट बदल कर लेट गए थे। उनके इस व्यवहार से आहत सा वह बाहर निकल आया था।


सुबह दफ्तर जाने से पहले वह नाश्ता कर रहा था। वह उठने को ही था कि बाबूजी डाइनिंग टेबल के पास आए और उससे पूछने लगे – मैं एक केला ले लूं क्या? उसने हैरानी से उन्हें देखते हुए कहा था – “इसमें पूछने की क्या बात है?” बाबूजी ने बिना कुछ कहे टेबल पर रखे केलों के गुच्छे में से एक केला तोड़ लिया और उसे छीलते हुए अंदर चले गए।


उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह या उसका परिवार ऐसा क्या कर रहा था जिससे बाबूजी उनके साथ घुलमिल नहीं पा रहे थे। उसकी पत्नी तो अभी भी उनके सामने घूंघट निकालती थी और उनसे बोलती भी नहीं थी। दोनों बच्चे भी उनकी बहुत इज़्ज़त करते थे और वह तो उनकी तमाम ज़रूरतों का अंदाजा लगा कर उनके कहने से भी पहले उन्हें पूरा करने की कोशिश करता था। क्या करे वह जिससे बाबूजी उनके साथ सहज हो जाएं।


उस दिन उसकी छुट्टी थी। वह बालकनी में बैठा अखबार पढ़ रहा था। तभी बाबूजी नहाने के बाद अपने कपड़े सुखाने के लिए बालकनी में आए। उसने कहा – “लाओ, बाबूजी मैं सुखा देता हूं”। पर, उन्होंने इनकार में सिर हिलाते हुए अपने कपड़े खुद ही अलगनी पर फैला दिये। उसने देखा सूखने के लिए फैलाई बनियान में कई जगह छेद हो रहे थे। उससे रहा नहीं गया और वह उनसे पूछ बैठा – “ये फटी हुई बनियान पहनते हो आप?” उनका संक्षिप्त उत्तर था – “मेरे पास यही है?” उनका यह उत्तर उसे क्रोधित कर गया था – “बाबूजी आप मुझे बताओगे नहीं तो मुझे कैसे पता चलेगा? अगर आप फटी बनियान पहनोगे तो मेरा इतनी मेहनत से कमाने का फायदा क्या? मुझे अपनी जरूरतें बता तो दिया करो”।


बाबूजी ने बिना उसकी ओर देखे हुए कहा था -“चल, अब तो तुझे पता चल गया है, ला देना।" वह थोड़ी ही देर में बाजार जाकर उनके लिए दो नई बनियानें ख़रीद लाया था। जब वह उन्हें देने गया तो उन्होंने कहा था – “इतनी भी क्या जल्दी थी। क्या आज ही मुझे नई बनियान पहन कर कहीं जाना था।"

पता नहीं क्यों वह अपने गुस्से को दबा नहीं पाया था – “बाबूजी आप क्यों कर रहे हो मेरे साथ ऐसा? मैं तो आपको खुश देखना चाहता हूं। आप मुझे परायेपन का अहसास क्यों कराते हो?”

वे भी शायद पहली बार ऊंची आवाज़ में बोले थे – “मैं तो बहुत एहसानमंद हूं तेरा। चाहता हूं ईश्वर तुम सबको जल्दी से जल्दी इस कर्तव्य-बंधन से मुक्त कर दे और तुम निश्चिंत रह सको।"

उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ था। अपने बेटे के बारे में वे ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं और क्यों? बात और न बढ़े, यह सोच कर वह वहां से चुपचाप निकल आया था। ऐसे समय उसे माँ की बहुत याद आई थी। काश, आज माँ होती तो वह सबकुछ संभाल लेती या फिर इस स्थिति की नौबत ही नहीं आती।

उस दिन के बाद उनके बीच एक अजीब सी दूरी आ गई थी। पहले ही उनके बीच बात बहुत कम होती थी, अब तो सिर्फ एक-दो वाक्यों तक ही सीमित होकर रह गई थी। उसे लगता था, वह हार गया है। कई बार उसका मन करता, बाबूजी उससे उसका हाल पूछे, उसके सिर पर प्यार से अपना हाथ फिराएं और वह उस वात्सल्य रस में डूब सके जिसके लिए वह माँ के जाने के बाद तरस कर रह गया था। उसे इन दिनों माँ की याद पहले से भी ज्यादा सताने लगी थी।


दफ्तर से आने के बाद वह खाना खाकर टीवी देखने बैठ जाता। यही वह समय होता जब बाबूजी भी अपने कमरे से निकल आते और सोफे से कुछ दूर हट कर रखी आराम कुर्सी पर आकर बैठ जाते। टीवी पर जो भी कुछ चल रहा होता, वे उसे लगभग खामोशी से देखते रहते। वो ही कभी-कभी उनसे बात करने की कोशिश करता। ज्यादातर वे हां या ना में जवाब देते और कुछ देर बाद उठ कर अपने कमरे में चले जाते। संवादहीनता की यह स्थिति उसे असहज बनाए रखती और वह अंदर ही अंदर कहीं दरकने लगता।

दफ्तर से आने में उसे कुछ देर हो गई थी। दोनों बच्चे सोने जा चुके थे। आशा के विपरीत बाबूजी अब तक जाग रहे थे और हमेशा की तरह आराम कुर्सी पर खामोश बैठे हुए थे। खाना खाने के बाद वह टीवी खोल कर बैठ गया। उसने खामोशी तोड़ने के इरादे से पूछा – “बाबूजी, आपके लिए न्यूज लगा दूँ?” उन्होंने वही संक्षिप्त सा उत्तर दिया था – “नहीं, मन नहीं है। तू कुछ भी लगा ले।"


वह यूं ही चैनल पलटने लगा। एक प्रोग्राम ने उसका ध्यान खींचा तो वह उस पर रुक गया। बच्चों की गायन प्रतियोगिता का प्रोग्राम था। सभी बच्चे ‘माँ’ विषय पर गाना गा रहे थे। उन सभी की मम्मियां भी वहां मौजूद थीं। हर गाना लोगों को आंदोलित कर रहा था। तभी एक ऐसा बच्चा गाने आया जिसकी माँ नहीं थी। उसने गाना भी ऐसा चुना था कि प्रतियोगिता के जजों सहित सभी की आँखें नम हो आई थीं। पता नहीं कब वह स्वयं को उस बच्चे की जगह रख कर देखने लगा था। उसे अपनी माँ बेतरह याद आने लगी थी। बेखबरी में उसकी आंखों से आँसू बहने लगे थे। बाबूजी के सामने माँ का जिक्र न करने की अपनी कसम उसे याद नहीं रही थी। गाना खत्म होते न होते उसके भीतर का सैलाब फट कर बाहर आ गया और वह “अम्मा कहां हो तुम” कह कर ज़ोर-ज़ोर से हिचकियां भर कर रोने लगा।


उसके अचानक इस तरह बिलख पड़ने से बाबूजी कुछ क्षण हतप्रभ से बैठे रहे, फिर अपनी कुर्सी से उठे और उसके सिर पर अपना हाथ फिराते हुए उसे चुप कराने लगे। बाबूजी के स्पर्श से उसकी रुलाई और भी ज़ोर से फूट पड़ी। बाबूजी उससे पूछ रहे थे – “तुझे अम्मा की याद आती है विशु? मैं तो समझता था तू उन्हें बिलकुल भूल गया है, एक बार भी तो तूने कभी उसका जिक्र नहीं किया।"

वह हिचकियों के बीच ही बोला था – “मैं अम्मा को कैसे भूल सकता हूं, बाबूजी। उनकी यादों से आप परेशान न हों, बस इसीलिए मैं आपके सामने उनका जिक्र करने से बचता रहता हूं।"


“उफ, और मैं क्या सोच रहा था। जिसे जन्म देने वाली माँ का कभी ख्याल नहीं आता, वह मेरा क्या ख्याल रखेगा। सोचता था कितना बड़ा कलाकार है तू जो मेरा ख्याल रखने का इतना अच्छा दिखावा कर रहा है। हे ईश्वर! तू मुझे कभी माफ़ मत करना” बाबूजी उसे अपनी छाती से लगा कर उसके आँसू पोंछे जा रहे थे, पर उनकी खुद की आंखों से जो पानी बह रहा था, उसका उन्हें भान नहीं था।


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