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Babita Consul

Drama

3  

Babita Consul

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मन की बात

मन की बात

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जब से आभा विदा हो ससुराल गयी। घर काहर कोना खाली खाली सा जान पड़ता, मन किसी काम मे नही लग रहा था। आज पूरा सप्ताह होगया था। वह घर के कामों में व्यस्त रह उस से ध्यान हटाना चाहती थी पर रह-रह कर उस को बेटी की याद सता रही थी। जब राकेश ने मीठे पुए बनाने को कहाँ जो उन के साथ साथ बेटी को भी बहुत पसन्द थे। जो उसनें अपनी माँ से सीखे थे। हटाते ही उस को ध्यान आया माँ का जो उसे कितना बुलाती रहती थी।

तब मुझे इस बात का एहसास नहीं था। कि माँ मुझे याद करके मुझे बुलाती रहती है।  

पर घर गृहस्थी मे वह कम ही मयके जा पाती थी। वह माँ को अकसर पत्र अवशय लिखती रहती थी।माँ के भी पत्र आते रहतें थे। आज भी माँ को लिखा वह पत्र उस के पास रखा है जिसे उस ने लिखा तो था पर उस को भेज न सकी थी। अब एहसास होता है कि माँ के इतना बुलानें पर भी वह क्यो नही गयी।

माँ के दर्शन करने उस को जाना पड़ा था कितना रोयी थी वो।

आज भी जब माँ की याद आती है वह उस पत्र को निकाल पढ़ लेती है और जी भर कर रो लेती है।

मीठे पूओं को बनाने के बाद वह माँ को याद कर वही पत्र पढ़ने लगी। जो उस ने तब लिखा था।

मेरी प्यारी माँ !

मेरा प्यार भरा नमस्कार !

कैसी हो ! आशा है अब स्वस्थ हो गयी होगी।

बहुत समय से पत्र लिखने की सोच रही थी। पर समय नहीं मिल पा रहा था ,तुम से बाते करने का मन करता है ,कहा मै कॉलिज से आते ही बातो का पिटारा साथ लाती और तुम्हारे सामने खोल देती।

और तुम प्यार से झिड़कती,कितना बोलती हो,अब बन्द भी करो। मैं बोलती रहती थी। 

माँ यहाँ बोल भी लू तो सुनने वाला कोई नही। समय.सारा दिन कार्यो मे निकल जाता है। सारे घर की जिम्मेदारी जो है मुझ पर ...समय का पता ही नही चलता।

सुबह सवेरे उठना पड़ता है जो मुझे कभी नही अच्छा लगा। उठ कर अखबार पढ़ना अब नहीं हो पाता, अब सुबह की चाय भी बच्चो को तैयार करते ठंडी हो जाती है ।वही पीने की आदत हो गयी है, अपनी पसन्द का खाना खाये बहुत समय हो गया। बनाती तो मै हूँ लेकिन सब की पसन्द का ,अपनी पसन्द तो कही खो गयी है ,कितना मन करता है वो तुम्हारे हाथ से बने सब्जी वाले दाल भात खाने का ! कभी- कभी करता है अपनी पसन्द का खाना बनाऊ और धूप मे बैठ कर अदरक वाली चाय के घूट भरू !

पर तुम्हारी ही तरह सब की पसन्द अब मेरी भी पसन्द बन गयी है ,माँ!

अक्सर जब छत पर सुखे कपड़े उतार कर लाती हूँ। चहचहाते पंछी बहुत अच्छे लगते है मन करता है एक दिन इन ही की तरह मै भी उन्मुक्त हो अपने मन की करूँ ! जब मन आये उठूँ जब मन आये घुमने जाऊ ,मन करे तो काम करूँ, मन करे तो अपनी पसन्द के कार्य करूँ, शाम ढलते सुरज को देखती रहूँ। उस की हर किरण को महसुस करूँ, मन मे उठे हो दिन भर की जिम्मेदारी से जुड़े विचारों को शान्त कर, कुछ अपने से बाते करूँ।

कुछ ख्वाब जो पलते थे, मन मे वो सब अब मैं अपने बच्चों में देखती हूँ जो मुझे मेरी जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं। उन के चेहरे की मुस्कान ही मेरे जीने का मकसद है, वहीं मुझे सुकून देती है। पहले मैं इस सब से मुक्त होना चाहती थी।

एक अवकाश चाहती थी, पर अब अपने बूढ़े बीमार सास, ससुर जो मेरे बिना सहारे के एक पल भी नहीं रह सकते। जब उनके खुश  हो अपने लिए आशीर्वाद से उठते हाथों को देखती हूँ। सारी थकान, सारी मन की व्यथा भूल जाती हूँ। परिवार की खुशी ही मेरी खुशी है। ये सब तुम्हारे ही दिये संस्कार है माँ ! सब की खुशी में, अपनी खुशी ढूढ़ने का सबक आज भी याद है। मेरा लगाया अमरूद का पौधा अब बड़ा हो फल देता होगा। और वो नीम जिस मैं सखियों के संग झूल शीतल हवा के झोके खाती थी। अब भी शीतल हवा देता होगा। काली जामुन का वो पेड़ जिस पर चढ़ पेट भर जामुन खाते थे और गिरने के डर से दादा जी की डाँट पडती थी। सब याद आता है माँ ! और क्या लिखूँ जानती हूँ। तुम बिना लिखे ही सब जान जाती हो मेरे मन की बात !

मेरा बापू जी को प्रणाम !

पत्र पढ़ वह सिसकनें लगी।

तुम्हारी चिरैया 


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