मिड डे मील
मिड डे मील
मिड डे मील
1
हरिहर स्कूल की दीवार पर लिखा पढ़ रहा है ----'शिक्षा पर सबका अधिकार हैं' उसने यह बार-बार पढ़ा और अपने दोनों बेटे केशव और मनोहर का हाथ कसकर पकड़ लिया। वह स्कूल के बाहर पहुँचा और चपरासी मनीराम को देखकर मुस्कुराया और पूछने लगा, बड़े सरजी अंदर है तो जाने दो मनीभाई। सुनकर मनीराम थोड़ा गुस्सा हो गया। सुन !हरिहर मैं तेरा भाई नहीं हूँ, वो मैं ज़्यादा पढ़ नहीं सका इसलिए यहाँ चपरासी लग गया। वरना जात-पात में हमारी कोई बराबरी नहीं। कहकर मनीराम पान चबाने लगा। एक बार फ़िर हरिहर ने उसे गुज़ारिश की कि हमें अंदर जाने दें। उसके दोनों बेटे के भविष्य का सवाल है। पहले मनीराम ने अकड़ दिखाई। फिर यह सोचकर कि इसका काम तो बनने नहीं वाला, उल्टा बड़े सरजी की बात सुनने को मिलेगी उसने मुँह बिचकाते हुए कहा, ठीक है, जा।
बड़े सरजी के ऑफिस के बाहर लगी कुर्सी पर कोई मैडम बैठी है। उसने तीनों को देखा और बोली, क्या काम हैं? जी, वो बड़े सरजी से मिलना था ? उसने ज़वाब दिया। क्यों ? बच्चों का दाखिला करवाना हैं। हरिहर ने प्रार्थना की। मिल लो, एडमिशन होगा या नहीं देखते हैं। उसने हरिहर को ऊपर से नीचे देखते हुए कहा। बच्चों को वहीं छोड़, वह अंदर चला गया। मनोहर डरा सहमा वही बैठ गया। मगर केशव घूमकर पूरा स्कूल देखने निकल गया। वह मैदान में खेल रहे बच्चों को देखता रहा। उसका मन किया कि कहे कोई उसे भी गेंद दे दें। तभी गेंद उसके पास आई और उसने लपककर उठा ली। गेंद लेने आए बच्चे ने उसे गौर से देखते हुए पूछा, नए आये हों? अभी बाबा दाखिला करवाने अंदर गए हैं। उसने मुस्कुराकर ज़वाब दिया। फ़िर वह हर क्लॉस के बाहर से गुज़र रहा था। उसे कक्षा में पढ़ा रहे मास्टरजी की आवाज़ सुनाई दे रही थीं, बच्चों बताओ-- चाँद पर पहला भारतीय कौन गया था ? 'राकेश शर्मा' सबने मिलकर ज़वाब दिया। दो मिनट उसी क्लॉस के बाहर खड़ा रहकर वह आगे बढ़ गया। एक कमरे में लगे कुछ कंप्यूटर उसे छोटे-छोटे टी.वी. लगे। उसे इतने गौर से देखते हुए मास्टर ने अंदर बुलाकर पूछा, तुम्हारा नाम क्या है ? 'केशव' उसने झट से ज़वाब दिया। तुम्हें पता है, भगवान कृष्ण का एक नाम केशव भी हैं। पता है, अम्मा कहती थीं। वाह! तुम्हारी माँ ने तुम्हें बहुत सिखाया हैं। और तुम्हारे बाबा? मास्टर ने सवाल किया। वह अंदर स्कूल में दाखिला करवा रहे हैं। केशव के बोलते समय चेहरे पर ख़ुशी साफ़ झलक रही थीं। तभी घंटी बज गई और सब बच्चे क्लॉस से बाहर आ गये।
केशव ने देखा, सभी बच्चे दरी पर बैठ रहे हैं और उनके पास खाली डिब्बा है, जिसमें एक माई भोजन डाल रही हैं। उसने थोड़ा पास आकर देखा तो कढ़ी-चावल थे । तभी उसका हाथ पेट पर चला गया, उसे याद गया कि उसे बहुत भूख लगी हैं। उसने कढ़ी को ललचाई नज़रों से देखा, फ़िर हिम्मत कर बोला, माई मुझे भी थोड़े से दे दो। माई ने पूछा, इस स्कूल के नहीं लगते, बाहर से आए हो क्या ? हाँ, बाहर से आया हूँ। बाबा गए है अभी सर के पास। केशव अब भी कढ़ी-चावल ही देख रहा था। पहले इस स्कूल में आ जाओगे, फ़िर रोज़ यहीं खाना मिलेगा। अभी जाओ यहाँ से। कहकर माई आगे बढ़ गई। बहुत भूख लग रही है माई, अभी थोड़े से चावल दे दों। माई का मन किया कि केशव को खाना दे दें। मगर स्कूल के सुपरवाइज़र को देख उसकी हिम्मत नहीं हुई। तभी उसका भाई उसे खींचकर ले गया। और वह जाते-जाते खाते हुए बच्चों को देख रहा था। 'जान छूटी' कहकर माई फ़िर अपने काम में जुट गई।
केशव बापू आ गये हैं। चल घर चलना हैं। मनोहर उसे खींचते हुए बोले जा रहा था। हरिहर अपने दोनों बच्चों को लेकर स्कूल से बाहर निकल गया। जाते हुए मनीराम की व्यंग्य मुस्कान उसे चुभ गई। और वह चुपचाप अपने बच्चों का हाथ पकड़ अपने घर की तरफ़ जा रहा था। रास्ते में दोनों बच्चों ने पूछा, बाबा कल से स्कूल जायेंगे ?" हरिहर ने कोई ज़वाब नहीं दिया। मगर केशव ज़िद करने लगा। तब उसने कह दिया, थोड़े दिन बाद स्कूल जाना हैं। बच्चों के चेहरे पर ख़ुशी छा गई। केशव ख़ुशी से कूदता हुआ अपने मोहल्ले की चने की दुकान पर चला गया बच्चों के चेहरे की ख़ुशी देख उसकी आँखें गीली हो गई। अब वह इन्हें क्या बताए कि स्कूल में क्या बातें हुई हैं। बच्चों को रमिया काकी के घर छोड़ वह खुद अपना समोसे के ठेले पर आ गया। आज उसके आधे ग्राहक जा चुके थे। उसने ठेला लगाया और किसी ख़रीदार की राह देखने लगा।
2
थोड़ी देर बाद लोग आने लगे और वह समोसे बेचने लगा। पूरे गॉंव में वह ही बढ़िया समोसे बनाता था। दो-चार और लोगों ने भी समोसे की रेहड़ी लगाई, मगर किसी के समोसे ख़ास नहीं चले। लोग हरिहर के समोसे बड़े चाव से खाते थे । आज देर से ठेला क्यों लगाया तने ? समोसे बने नहीं थे, क्या? लोहिया चाचा ने सवाल किया। नहीं, वो मैंने सुबह ही बना लिए थे , बस तले अब हैं। हरिहर ने उसे समोसा देते हुए कहा। का बात है, कउनो परेसानी है क्या ? लोहिया चाचा वही पास ही रखे लकड़ी के स्टूल पर बैठ गए ? ग़रीबी ही सबसे बड़ी परेशानी है चाचा। आज तने ग़रीबी कैसे याद आ गई। तू इतना होसियार है, आठवीं पास है। गॉंव के लोगन को इति अच्छी-अच्छी बात बतलाता हैं। फ़िर आज क्या हो गयत। हम कह रहे है कि दूजा व्याह करवा ले, खुश रहेगा। काका ने समोसे को मज़े से खाते हुए कहा। आप हमार पीछे क्यों पड़ जात हों। भागों को गुज़रे छह महीने हुए है। और वो बहुते याद आती हैं। हरिहर उदास होकर बोला। तभी थोड़े और लोग समोसे लेने आ गए और लोहिया चाचा "तेरी तू ही जाने हरि" बोलकर चले गए।
सूरज ढलने लगा। उसे पता है, अब वो बस आधे घण्टे और रुकेगा, फ़िर रमिया काकी के घर से बच्चों को ले लेंगा। बच्चे अगर फ़िर स्कूल के बारे में पूछेंगे तो क्या ज़वाब देंगा। उसने समय से समोसे का ठेला बंद किया। मगर घर की तरफ जाने की बजाए, वह पीपल के पेड़ के पास से जाती नहर के पास बैठ गया। तभी भीमा ने उसे वहाँ बैठे देखा और उसके पास चला आया। भीमा उसके बचपन का दोस्त है। दोनों इकट्ठे आठवीं तक पढ़े। फिर हरिहर ने पढ़ाई छोड़ दी तो भीमा का मन भी पढ़ने से उचाट हो गया। क्यों नहर में कूदने का मन है क्या? भीमा ने पास बैठते हुए पूछा। दो-दो बच्चों को किसके सहारे छोड़ भागो के पास जाऊँगा, वो बात न करेंगी। हरिहर ने जवाब दिया। क्या हुआ फिर? आज स्कूल गया था, बच्चों के दाखिले के लिए मगर बात नहीं बनी। हरिहर ने ज़वाब दिया। मुझे पहले ही पता था नहीं बनेगी, मैंने सुबह तुझे स्कूल की तरफ़ जाते हुए देखा था, पर तुझे रोककर तेरे बच्चों के सामने कुछ कहना ठीक नहीं समझा। देख ! अपनी तरफ़ के गॉंव के स्कूल में उन दोनों का दाखिला क्यों नहीं करवा देता। क्या ज़रूरत है, उस स्कूल में बच्चों को भेजने की? भीमा ने समझाते हुए कहा।
हमारी तरफ़ के स्कूल की हालत देखी है न तूने। भागो का सपना था, बच्चे पढ़-लिख डॉक्टर बने। मरते वक़्त भी उसने मुझे यही याद दिलाया था। तू और मैं ऊँची जात के बच्चों के साथ इसलिए पढ़ पाए, क्योंकि हमारे बापू जमींदार के गुलाम बनकर रहे। उनके मरते ही हमारा स्कूल खत्म। फ़िर मेरा बापू मर गया तो मेरी पढ़ाई भी ख़त्म। तेरे बापू ने बड़ा ज़ोर लगाया था कि तेरा स्कूल न छूटे। मगर तू भी बावरा, मेरे निकलते ही स्कूल से भाग गया था। हरिहर ने नहर में पत्थर फ़ेंकते हुए कहा।अकेला क्या करता वहाँ? तू हिम्मत वाला था। मुझे वो नासपीटे ज़मीदार के छोकरे मारकर इसी नहर में फैंक देते और किसी को पता भी नहीं चलता। भीमा की आवाज़ में गुस्सा था। आज कौन सा हम सुखी है ? यह गॉंव भी बँटा हुआ है। हमारी बस्ती अलग उनकी बस्ती अलग। इस नहर का पानी भी हमें पूछकर लेना पड़ता हैं। एक वही ज़िले का अच्छा स्कूल है। और अपनी जात के बच्चे भी पढ़ते हैं। मगर मेरे बच्चों के लिए जगह नहीं हैं। वाह ! री किस्मत हाथ में आता है, मगर मुँह नहीं लगता हैं। हरिहर की आवाज़ में आक्रोश था।
ठीक से बता कि क्या हुआ था ? भीमा ने उसके कंधे पर हाथ रखकर पूछा। तभी हरिहर की आँखों के सामने सारा मंज़र तैर गया, जो उस स्कूल के कमरे में हुआ था।
प्रधानाचार्य मोतीलाल आँखों पर चश्मा चढ़ाए बड़े ध्यान से फ़ाइल देख रहे थे। हरिहर हाथ जोड़े कुछ मिनटों तक खड़ा रहा। फिर जैसे ही मोतीलाल ने निगाह ऊपर कर हरिहर को देखा तो उसने मुसकुराकर 'नमस्ते' कहा। मोतीलाल ने उसे बैठने के लिए कहा। वह घबराता हुआ कुर्सी पर बैठ गया और उसने कहना शुरू किया। सरजी, बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाना हैं, आपकी कृपा हो जाती, बड़ा एहसान हो जाता। हरिहर ने हाथ जोड़कर कहा।
कहाँ से आये हों? क्या नाम है ? सर जी ने पूछा।
जी हरिहर, शकूरबस्ती से आया हूँ।
सरजी ने चश्मा साफ़ किया और कहा, शकूरबस्ती? कौन सी तरफ से आये हों?
हरिहर थोड़ा झिझककर बोला, जी नहर के दाहिने तरफ़ से आया हूँ।
सरजी के हाव-भाव थोड़े बदल गए और उन्होंने पूछा, क्या काम करते हों ?
जी, समोसे का ठेला है, मेरा। हरिहर ने ज़वाब दिया।
देखो भाई, दाखिले ख़त्म हों गए हैं, तुम लेट हों गए। अब अगले साल कोशिश करना। सर जी ने बात ख़त्म करते हुए कहा।
सर जी, राम बिस्वास का लड़का आपके स्कूल में पढ़ रहा हैं। उसने बताया था कि रोज़ नए दाखिले हों रहे हैं। हरिहर की आवाज़ में हिचक थीं।
तुम्हें क्या लगा, मैं तुमसे झूठ बोल रहा हूँ, जो सच था, वह बता दिया। अब जाओ यहाँ से, सरजी की आवाज़ ऊँची थीं। सरजी गरीब आदमी हूँ, मैं खुद ठीक से पढ़ नहीं पाया था, मेरा बापू ज़मीदार की चाकरी करता था। उसने तरस खाकर मुझे इस स्कूल में दाखिला दिलवाया था। उनके मरते ही पढ़ाई छूट गई, फ़िर बापू भी मर गया। पत्नी भी छःमहीने पहले चल बसी। जाते -जाते कह गई कि बच्चों को पढ़ाना। थोड़ा रहम करो हज़ूर। कोई सीट खाली हों तो देख लो। राम बिस्वास के लड़के का भी दाखिला हो गया हैं। हमारे ऊपर भी मेहरबानी करो। बोलते-बोलते हरिहर की आँख भर आई।
देख हरिहर, अपने बच्चों की दूसरे के बच्चों से तुलना मत कर। हमारे पास जो कोटा था। वो पूरा हो गया हैं। और तूने अभी खुद ही कहा कि तू गरीब हैं। फ़िर मैं तेरी मदद कैसे करो ? सरजी कुर्सी को पीछे खींच गर्दन टिकाकर बोले।
मैं कुछ समझा नहीं सरजी, ग़रीब की मदद पुण्य का काम है। हरिहर अब भी विनय कर रहा था। पुण्य मैं किसी और से भी कमा लूँगा। मेरा परिवार भी है, उसे चलाने के लिए सिर्फ़ स्कूल की तनख़्वाह काफ़ी नहीं है। राम बिस्वास ने बीस हज़ार रुपए दिए हैं। तेरे पास है तो देखते हैं , शायद कोई सीट खाली हों जाए। वरना अपने बच्चों को अपनी तरफ़ के स्कूल में दाख़िला करवा दें। यह रामसपुर ज़िले का सबसे बढ़िया स्कूल हैं। यहाँ ऐसे नहीं जगह मिलती।
सरजी की बातें सुनकर हरिहर का होंसला उस कुरसी पर बैठने का नहीं रहा। वह धीरे कदमों से बाहर की तरफ़ जाने लगा। पीछे से सरजी ने कहा, तुम ग़रीब हरिजन सपने भी वहीं देखो जो पूरे कर सको।
हरिहर ने कुछ नहीं कहा और वो आवाज़ अभी उसके कानों में गूँज रही थीं। और जब उसने आँसुओं से भरी अपनी आँखें साफ़ की तो सामने भीमा खड़ा था।
3
भीमा ने हरिहर के कँधे पर हाथ रखा और कहा, भाभी से माफ़ी माँग लियो। बच्चे तुझे देख रहे होंगे। जा घर जा। हरिहर ने एक नज़र नहर पर डाली। और अपने घर की तरफ़ चल दिया। रास्ते से रमिया काकी के यहाँ से बच्चों को लेकर अपने घर पहुँचा। घर के नाम पर ईटों से बना एक कमरा, रसोई और स्नानघर हैं। केशव की माँ भागो हमेशा कहती थीं, बच्चे पढ़-लिखकर हमारी गरीबी मिटा देंगे। उसने सोच लिया है, कल ही बच्चों का दाख़िला अपनी तरफ़ के स्कूल में करवा देता हूँ। मेरे बच्चे लायक है, वे ज़रूर कुछ न कुछ कर लेंगे। सुबह होते ही उसने बच्चों को तैयार किया और स्कूल जाकर दाखिला करवा दिया। मनोहर बड़ा था, वह समझ चुका था कि बड़े स्कूल में बात नहीं बनी है। मगर केशव को कौन समझाए वह ज़िद कर रहा था कि उसी स्कूल में जाएगा वरना नहीं जाएगा।
जब मनोहर अगले दिन स्कूल जाने के लिए तैयार खड़ा था। तब केशव ने मना कर दिया और गुस्से में हरिहर ने उसके मुँह पर दो चाटे जड़ दिए। कहने लगा, केशव वही जाना पड़ेगा, वरना अनपढ़ रह जायेगा। तेरे बाप के पास पैसा नहीं है कि तुझे कोई दुकान खोले दे। फ़िर मेरी तरह ठेला लगाता रहियो। कहकर वह केशव को खींचते हुए ले गया। केशव रोते-रोते कहने लगा, नहीं बापू , उस स्कूल जाना हैं। मगर हरिहर बहरा हों चुका था। उसने बच्चों को स्कूल के गेट के अंदर छोड़ पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह वहाँ से भाग जाना चाहता था।
मनोहर ने केशव के आँसू साफ़ किये और उसे उसकी क्लॉस में छोड़ अपनी क्लॉस में चला गया। केशव अपनी क्लॉस में बैठा सोच रहा था, यहाँ ठीक से बैठने के लिए बेंच नहीं हैं। छोटा टीवी भी नहीं हैं। खेलने के लिए अच्छी गेंद नहीं हैं और तो और यहाँ खाना भी नहीं बँट रहा हैं। मुझे नहीं रहना यहाँ। वह आधी छुट्टी में चुपचाप स्कूल से बाहर निकल गया और मनोहर जब उसके पास पहुँचा, तब केशव उसे नहीं मिला। उसने पूरा स्कूल ख़ोज लिया, पूरी बस्ती देखने क बाद दौड़ता हुआ हरिहर के पास पहुँचा और उसे सारी बात बताई। हरिहर पागलों की तरह हर आते-जाते से केशव के बारे में पूछ रहा था। जब किसी ने बताया कि उसने केशव को बस्ती से बाहर जाते हुए देखा है। तब वह भागता हुआ बस्ती से बाहर जाती सड़क पर आ गया और लगातार 'केशव केशव' चिल्लाया जा रहा था सड़क खत्म होते ही 'ज़िला उच्च विद्यालय' के बाहर केशव खड़ा बच्चों को खाना खाते देख रहा था। हरिहर ने उसे उठाते हुए गले लगा लिया। अरे ! तू यहाँ क्या कर रहा हैं? तेरे बापू की हालत देख क्या हों गयी थीं।"बापू देखो! आज आलू -पूरी बँट रही हैं। उसने स्कूल में बँटते खाने की तरफ़ इशारा किया।
चल, मैं तुझे समोसे खिलाता हूँ , मेरे लाल तूने कुछ नहीं खाया होंगा। हरिहर केशव को गोद में घर ले जाने लगा। मुझे नहीं खाने समोसे। मुझे इसी स्कूल जाना हैं और तुम्हारे समोसे बहुत खा लिए बापू। जबसे माँ गई है, समोसे अब ज्यादा खाते हैं। केशव हरिहर की गोदी से उतर भागता हुआ बोला। हरिहर भी उसके पीछे भाग रहा हैं। मगर केशव उसकी पहुँच से दूर पीपल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। ठीक है, अब तेरा बापू पकवान नहीं खिला सकता। रमिया काकी कुछ खिला देंगी, नीचे आजा। जब मेरा मन करेंगा, तब आ जाऊँगा। केशव ने मुँह फेरते हुए कहा। हरिहर केशव को मनोहर के हवाले छोड़ अपने समोसे के ठेले पर आ गया। वह बहुत थक चुका हैं। उसने सोचा, एक बार राम बिस्वास से बात करके देखता हूँ, क्या पता कोई रास्ता निकल जाए।
राम बिस्वास की पत्नी बताती है, वह कुएँ की खुदाई करने गया हैं। वह वहाँ पहुँचकर राम बिस्वास को सारी बात बताता हैं और उसे पूछता है, : राम मुझे भी बता तूने इतने पैसे कैसे दिए। अगर किसी से उधार लिया है तो बता, मैं भी उधार ले धीरे-धीरे चुका दूँगा।" सुनते ही राम बिस्वास फूट-फूट कर रोने लग गया। और जब उसे बताता है कि उसने कैसे दाखिले के पैसे दिए है, हरिहर धक्का खा गिरने लगता है और पत्थर से उसका पैर टकरा जाता हैं। आख़िर राम बिस्वास ने ऐसा क्या कह दिया था।
4
राम बिस्वास यह तू सच कह रहा है क्या ? उसने चुप कराते हुए पूछा। हाँ, भाई, बिलकुल सच। माँ भवानी की शपथ। उस साहूकार के बड़े लड़के बिरजू ने मेरी मुनिया की इज़्ज़त को दाग लगाया और फ़िर मुँह बंद रखने को उसने मुझे बीस हज़ार रुपए दिए। उन्ही पैसों से अपने बिटुवा का दाखिला करवाया। बिस्वास ने हाथ से मुँह छुपाते हुए कहा। तू थाने क्यों नहीं गया ? ऐसे कैसे मुँह बंद कर लिया अपना ? हरिहर ने गुस्से में कहा। थाने जाकर क्या हों जाता ? वो थानेदार भी इन पैसे वालों का मुँह लगा हैं। देखा नहीं, रामकिसन के बटुवा को कैसे पीटा था, जब उसने बिना पूछे नहर का पानी अपनी गाय को पिलवा दिया था। शिकायत करने पर उत्ती उसकी खाल ही उखड़वा दीं थीं। फ़िर मेरी मुनिया को जान से मरवाकर किसी के खेत में फैंक देते तो मैं कहाँ जाता। मैं तो कहता हूँ, तू शहर चला जा। वहाँ बहुत स्कूल हैं। बिस्वास ने आँसू पौछते हुए कहा।
इतना आसान नहीं है, बिस्वास यहाँ से जाना। वहाँ बसने के लिए भी पैसे चाहिए, क्या सड़क पर दो बच्चों को लेकर बैठ जाओ। शहर में खर्चा-पानी चलाना मुश्किल हो जाएगा। अगर हमार बच्चे अच्छे से पास हो गए। तब यह स्कूल आगे की पढ़ाई का खर्च भी उठाता है। कई सरकारी योजना है, जिसके बारे में हमें पता नहीं। हरिहर ने बिस्वास के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। तू थोड़ा पढ़ा-लिखा है। तुझे ज़्यादा पता होगा। मने बस इत्तो मालूम है कि ऐ- सरकार ने कानून सब बनाए। मगर हम ग़रीब की सुनने वाला कोनो नहीं। यहाँ रहना है तो मुँह बंद रखो। और तेरे पास कोई ज़मीन भी नहीं है। किसी के खेत में मज़दूरी करेगा तो तेरे बच्चान को भी मज़दूर बना देंगे। और उधार लेगा तो ब्याज़ तने गंजा कर देगा। तुझे भागो भाभी की कसम है, तूने जे बात किसी को बताई। बिस्वास ने हरिहर के आगे हाथ जोड़े। मुनिया मेरी भी बेटी है। मुझे बुरा लग रहा है कि मैं अपनी मुनिया के लिए कुछ नहीं कर सका। पर भगवान की लाठी में आवाज़ नहीं होती। देखियो! उस नासपीटे बिरजू का कैसा हाल करता हैं। हम तो बस भगवन से इतना कहत है कि हम गरीब मज़दूर के घर कोई बिटिया न दीजू कहकर बिस्वास चला गया।
हरिहर भारी मन से अपने रास्ते चला जा रहा था। सामने से रजनीश मास्टर को आते देख रुक गया। केशव मिल गया ? स्कूल से भागा क्यों था ? हम सभी परेशां हों गये थे। हरिहर ने उसे सारी बात बताई। रजनीश ने सुना, थोड़ा सोचकर बोला, यह तरक्की करता भारत है हरिहर। यहाँ देश की आधी से ज़्यादा आबादी को पता ही नहीं हमारे अधिकार क्या हैं? स्कूलों में कोटा के नाम पर अपनी जान-पहचान वाले कर्मचारी बच्चों को दाखिला कर यह दिखा दिया जाता है कि बिना किसी भेदभाव के शिक्षा सब तक पहुँच रही हैं। अब मनीराम को ही देखो, वह भी तेरी जात का है, मगर यह बात अलग है कि वो इस बात को मानता नहीं, उसके तो चारों बच्चे उसी स्कूल में पढ़ रहे हैं। और कोई दूसरा उसी जात का आ जाए तो उसे पैसे माँगते है, ताकि कुछ ऊपर से कमा सके। इस बार का यह नया प्रिंसिपल वैसे ही बड़ा लालची हैं। क्या! करे, सब ऐसे ही चलता जा रहा हैं। रजनीश ने ठंडी सांस लेते हुए कहा। मैंने पहले दिन ही देख लिया था कि तुम्हारे बच्चे लायक है। उन्हें उचित अवसर मिलने चाहिए। पर यह कैसे होगा मास्टरजी? घरवाली के एक-दो गहने थे , उसकी बीमारी में लगा दिए। अब जमा पूँजी के नाम पर कुक नहीं है।
रजनीश कुछ रुककर बोला, पिछले साल एक बहनजी हमारे गॉंव आई थीं। किसी कार्यकारी संस्था में काम करती थीं। उनके प्रयास से ही हमारे स्कूल की हालत में बहुत सुधार हुआ था। जाते-जाते मैंने उनका फ़ोन नंबर ले लिया था, क्या नाम था उनका? हाँ, शालिनी, हाँ शालिनी जी। याद आया। मैं उनसे बात करके देखता हूँ। क्या पता, ईश्वर तेरी सुन ले। रजनीश ने हरिहर को धीरज देते हुए कहा। अगर ऐसा हुआ न मास्टरजी तो आपकी बड़ी मेहरबानी होंगी, मैं आपको रोज़ बिना पैसे के समोसे खिलाऊँगा। हरिहर ने हाथ जोड़ते हुए कहा। वह हँसते हुए बोले, मुझे घी-तेल मना है। पर तेरा एक समोसा ज़रूर खाऊँगा। अच्छा चलता हूँ।
5
चार दिन बाद शालिनी और हरिहर स्कूल के बाहर खड़े थे। मनीराम पान से भरा मुँह बिचकाकर उन्हें देख रहा था। जब उसने स्कूल का दरवाज़ा खोला तो हरिहर को लगा आज उसके बच्चों की बंद किस्मत के दरवाज़े भी खुल जायेंगे। मोतीलाल इस तरह अपने कमरे में दोनों को देखकर हैरान और सकते में आ गया। उसने बड़े ही कड़वे लहज़े में बोलना शुरू किया, यह कोई तरीका नहीं है, मैं तुम लोगों को अभी थाने पहुँचा सकता हूँ। और बहनजी आप यहाँ इनके साथ क्या कर रही हैं? अब पुरुषों की रीढ़ की हड्डी नहीं रही, जो उन्हें औरतों का सहारा लेना पड़ रहा है। यह सुनकर शालिनी ने उसे घूरकर देखा और बोली, रीढ़ की हड्डी आपकी भी नहीं है, तभी अपना घर ग़रीब का हक़ मारकर चला रहे हैं। कौन गरीब ? यह हरिहर, आप जानती नहीं, इन लोगों को सरकार से आज बहुत सुख-सुविधाएँ मिल रही है। अब ये कैसे गरीब हों गए। इन्हें आदत है, अपनी जात को गरीबी का जामा पहना लोगों से हमदर्दी हासिल करने की। उसके गुस्से में व्यंग्य छिपा था। इसका निर्णय आप नहीं करेंगे, मोतीलाल जी। सविंधान की क़िताब शहरों में पढ़ी जाती हैं। और आप जैसे लोग दीमक बनकर उस पुस्तक को खा जाते हैं। जिसका भुगतान इन दूर दराज़ ग्रामीण परिवेश से जुड़े लोगों को करना पड़ता हैं। तभी तो आप हरिहर के बच्चों के एडमिशन के लिए रिश्वत माँग रहे हैं। शालिनी ने भी व्यंग्य का ज़वाब व्यंग्य से दिया। अगर हम दो पैसे माँग रहे हैं, तो इसमें गलत क्या हैं, बहनजी। सब जगह यही होता हैं। आख़िर हमारा स्कूल ज़िले का उत्तम स्कूल हैं। सभी तरह की सुख -सुविधाएँ मिलती हैं और पैसा बच्चों पर ही लगाया जा रहा हैं। मोतीलाल ने सफाई दीं। आप दो पैसे नहीं मांग रहे हैं। आप बीस हजार माँग रहे हैं। और सरकारी वेतन आपको पचता नहीं है, जोकि आपको ऊपर की कमाई भी चाहिए। और सुख-सुविधा भी सरकार के सहयोग से ही आपके स्कूल को दी जा रही है। इसलिए यह लालच छोड़िये और दोनों बच्चों का एडमिशन होने दीजिये। शालिनी ने अपनी बात ख़त्म की।
ठीक है, बीस हज़ार भी इन जैसे लोग दे रहे हैं। फिर क्या दिक्कत हैं? मोतीलाल ने आखिरी तर्क पेश किया। अगर वहाँ की गिरह भी खोली जाएंगी तो मुझे यकीन है, आप जैसे लोग कटघरे में खड़े नज़र आएंगे। अब मोतीलाल निरुत्तर हो गया। उसे पता चल चुका था कि अब उसे हरिहर के बच्चों को दाखिला देना होगा। बहनजी कानून जानती है। हो सकता है, कोई जाँच ही न हो जाए। इस हरिहर को बाद में देख लिया जाएगा। फिलहाल तो जो हो रहा है, उसे होने दो। मोतीलाल ने मन ही मन सोचा। हरिहर के चेहरे पर मुस्कान आ गई, केशव का पहली और मनोहर का तीसरी में दाखिला हों गया। बच्चे पढ़ने में होशियार हैं, यह बात स्कूल की प्रवेश परीक्षा में सभी को नज़र आ गई। और हरिहर बच्चों की किताबें-कॉपी वर्दी लेकर जब अपने बच्चों के पास पहुँचा। तब उन्हें लगा कि इस दुनिया में इससे ज्यादा कीमती चीज़ क्या होंगी। वे दोनों बाकि बस्ती के बच्चों को अपना स्कूल का सामान दिखाने घर से निकल गए और हरिहर शालिनी का धन्यवाद बोलने के लिए चल पड़ा।
रास्ते में उसे राम बिस्वास मिला। उसने उसे यह खुशखबरी सुनाई। उसने बड़ी ख़ुशी से हरिहर को गले लगा लिया। तू शुरू से ही बड़ा किस्मतवाला रहा है हरि। जिस चीज़ के पीछे लग जात है, उसे करके ही छोड़त हैं। और भगवान की भी तेरे ऊपर विशेस कृपा बनी हुई हैं। काश! तेरी पढ़ाई न छूटी होती, फ़िर क्या पता, कहीं अफ़सर ही लग जात बिस्वास ने हँसते हुए कहा। क्यों मज़ाक उड़ा रहा है बिस्वास, मैं पढ़ाई में इतना अच्छा नहीं था कि कहीं अफ़सर लग जाता। बस मेरे बाबा का सपना था, जो पूरा न हों सका। अब भागों का सपना पूरा कर रहा हूँ। मुझे लगता है कि भागो ने ही भगवान को कह अपने बच्चों का दाखिला करवा दिया हैं। हरिहर ने आसमान की तरफ़ मुँह करते हुए कहा। मेरा श्रीधर भी उसी स्कूल में हैं। तेरे बच्चो का साथ हों जायेंगा। कहकर बिस्वास आगे बढ़ गया और हरिहर शालिनी को अपनी तरफ़ आते देख वही हाथ जोड़कर उसका धन्यवाद करने लगा।
सचमुच बहनजी, आपने बहुत उपकार किया, हम गरीबों पर। अगर आज आप न होती तो मेरे बच्चे कभी भी यह दिन न देख पाते। हरिहर की बातों में कृतज्ञता थीं। मुझे धन्यवाद तब कहना, जब तुम्हारे बच्चे पढ़-लिखकर इस पूरे गॉंव का नाम रोशन करे और लोगों को पता चले कि शिक्षा किसी में भेदभाव नहीं करती। अगर कोई मन लगाकर उसका अध्ययन करें, तब वह सबको बराबर फल देती हैं। बहनजी, आपकी यह बातें सुनकर मन को बड़ा संतोष मिलता हैं। ईश्वर आपको लम्बी ज़िंदगी दें। हरिहर ने आशीष वचन कहें। तुम समझदार हो, इसलिए कभी यह मत सोचना कि तुम अपने ऊपर हों रहे अनाचार को चुपचाप सह जाओ। कभी हिम्मत मत हारना। और अपने बच्चो को भी निडर बनाना। मैं तुमसे ही मिलने आ रही थीं, आज शाम की ट्रैन से झारखण्ड जा रही हूँ। कुछ आदिवासी बच्चों का स्वास्थ्य कैंप लगने वाला हैं। बस यही कहना है कि हो सकता हैं, अभी मुश्किलें टली न हों। इसलिए हताश न होना। शालिनी ने समझाते हुए कहा। अब क्या मुसीबत आएँगी ?बहनजी, हमने अपने बच्चों का दाखिला करवाना था, वो हो गया। बस अब राम की कृपा से सब अच्छा होगा। हरिहर ने आत्मविश्वास के साथ कहा। "ऐसा ही हों ! अपना और अपने बच्चों का ध्यान रखना, चलती हूँ। कहकर शालिनी उसी रास्ते से वापिस चली गई।
उन्हें जाते देख हरिहर सोच रहा था कि अब सब अच्छा होने वाला हैं। पता नहीं, बहनजी क्यों परेशां हों रही थीं। वह अपनी कल्पना में देख रहा है कि केशव और मनोहर बड़े हों चुके हैं। केशव डॉक्टर और मनोहर वकील बन, अपने पिता का आशीर्वाद ले रहे हैं। तभी उसे पीछे से किसी ने धक्का मारा और वह ज़मीन पर औंधे मुँह गिर गया।
क्यों रे ! बीच में क्यों खड़ा है ? तेरी शक्ल क्या देख ली, मेरा तो दिन ही ख़राब हो गया। चल हट, यहाँ से। हरिहर ने खुद को सम्भाला और खड़ा होकर पीछे देखा तो सामने बिरजू अपने दोस्तों के साथ खड़ा था। हरिहर ने उसे घूरकर देखा उसकी आँखों के सामने मासूम मुनिया का चेहरा घूमने लगा। मन किया, वहीं बिरजू को पीट दें, मगर वो अपना गुस्सा पी रास्ते से हट गया। अगर कभी बीच में खड़ा हुआ तो खाल निकलवा दूँगा। कहकर बिरजू और उसके दोस्त हरिहर को हीन दृष्टि से देख आगे निकल गए और हरिहर चुपचाप वापिस अपने समोसे के ठेले पर आ गया।
उसने अपनी ख़ुशी से सबको एक समोसा फालतू दे दिया और बड़े प्यार से अपने बच्चों के लिए भी समोसे बनाने लगा। उसे पता है कि केशव को समोसे अच्छे नहीं लगते। मगर फिर भी वह दोनों बच्चों को अपनी गोद में बिठकार खिलायेगा। सोचते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए। का हुआ हरिहर काहे ! लुगाई की तरह गंगा-जमुना बहाने लग जात है। किती बार कहा है, दूजा व्याह क्यों नहीं करवा लेता। घर में औरत आएँगी तो मर्द बना रहेगा। हरिहर ने आँखें साफ़ की। और सामने रखे स्टूल पर लोहिया चाचा को बैठे देखा। क्यों मर्द रो नहीं सकते का ? उनके सीने में भी दिल होत हैं। खाली औरत जात क्या ऊपर से लिखवाकर लाई है कि बस हम ही टंकी चालू रखेंगे। हरिहर ने उन्हें समोसे देते हुए कहा। मर्द की दाढ़ी होती है और औरत की नलकी। अब हमें ही देख लो, तेरी चाची मरी हमने एक आँसू नहीं बहाया। हाँ, थोड़ा दुःख था, फ़िर दूजा व्याह कर लिया। अब तेरे बच्चों का दाखिला भी हो गया है। अब तू अपने बारे में सोच। तू कहे तो मैं बात करो? किससे बात करोंगे ? अरे ! वही अपने मनसुख की बिटिया, का नाम है उसका ??? लोहिया चाचा कुछ बोलते, तभी बोल पड़ा "कौन रमा ???? नहीं रे ! वो विधवा है। वो दूसरी कैं नाम था उसका ? चंदा। हाँ चंदा, उसे व्याह रचा लें।"
6
दिमाग ठीक है। वो मुझसे बारह साल छोटी हैं। उससे काहे ! व्याह करो? हरिहर ने समोसे तलते हुए कहा। का हो गया, तेरी नई चाची भी पंद्रह साल छोटी हैं। मर्द कभी बड़ा और बूढ़ा नहीं होत। तभी यह बूढ़ा मर्द यहाँ बैठ समोसे खा रहा हैं और नयी चाची किसी और को घर में समोसे परोस रही हैं। यह बात हरिहर ने ऐसे चटखारे लेकर कही कि आसपास के लोग हँसने लगे और लोहिया चाचा समोसा वही छोड़ बड़बड़ाते हुए वहाँ से चले गए। ऐ ! तने ठीक नहीं किया हरिहर। मैं तने देख लूँगा। तभी मनोहर भागता हुआ आया और कहने लगा कि बापू आओ देखो ! केशव पूरी बस्ती में क्या करता फ़िर रहा है। उसने ठेला बंद किया और जाकर देखा, केशव अपनी वर्दी पहने पूरी बस्ती में घूम रहा हैं। हरिहर ने उसे गोद में उठाया उसे कहने लगा कि इस तरह यह वर्दी ख़राब हों जाएँगी। चल ! उतार मैं धोबी से ठीक से धुलवा कर लाता हूँ वह इस्त्री भी कर देंगा।
जब केशव की यूनिफार्म लेकर वह धोबी घाट पर पहुँचा, उसने देखा सफ़ेद साड़ी में लिपटी रमा कपड़े धो रही हैं। उसका साड़ी का पल्लू उसके सिर से हट गया हैं और उसे इस बात का होश भी नहीं रहा और वह बड़े ही तल्लीन होकर कपडे धोए जा रही हैं। कम उम्र में इतना उदास चेहरा देखकर कलेजा मुँह को आ जाता हैं। तभी उसकी नज़रे हरिहर पर गई। वह सकपका पर अपना सफ़ेद घूँघट निकाल वहीं खड़ी हों गई।
केशव ने अपनी स्कूल की वर्दी ख़राब कर दी, तनिक धोकर इस्त्री करके दे दो। उसका दाखिला ज़िले के बड़े स्कूल में हो गया हैं। आज वर्दी मिली और उसने गन्दी कर दी, दोनों बच्चे खुश बहुत हैं। " हरिहर लगातार बोले जा रहा था, मगर रमा ने कोई ज़वाब नहीं दिया। और चुपचाप उसकी वर्दी धोती रही। हरिहर ने देखा, कपड़ें धोने का झाग थोड़ा सा उसके मुँह पर लग गया उसे साफ़ करने के लिए जैसे ही उसने हाथ लगाया, झाग उसके चेहरे पर भी फैल गया। उसने साड़ी के पल्लू से पूरा चेहरा पोंछा और वह उसके साँवले सलोने चेहरे को देखने लगा। यह कोई उम्र होती है ,ऐसे मासूम चेहरे पर दुःख की बदली छाने की। खैर! दुःख भी कहाँ उम्र देखकर आता हैं। यही सोचते हुए उसके सामने भागो का चेहरा घूमने लगा। आप साम को बापू से आकर ले लेना। अभी इस्री गर्म होंगी, वखत लगेगा।" रमा ने बड़े ही धीरे से कहा। "जी ! ठीक है, ले लूँगा अब चलता हूँ। रमा अपने घूँघट की ओट से उसे देख रही थीं। आज कितने समय बाद उससे किसी ने अपनी बात बताई है। वरना घर में अब वह केवल एक सामान की तरह है, जो ज्यादा चल न सकने पर वापिस आ गया हैं। और घर के लोग उसे कोने में रखकर भूल गए हैं।
शाम को उसकी बहन चंदा खुद ही हरिहर के बेटे मनोहर को वर्दी पकड़ा गई। मनोहर उसे बापू को देते हुए बोला, लो बापू, आ गई केशव की वर्दी चमक के। अब सुबह ही इसे स्कूल जाने के लिए वर्दी दीजियेगा। चलो, अब सो जाओ! कल सवेरे जल्दी उठना हैं। उसने दोनों बच्चों को सुला दिया और अपनी भागो को याद करते हुए खुद भी गहरी नींद में सो गया। सुबह की पहली किरण के साथ सभी एक नई उम्मीद के साथ जगे। और हरिहर ने दोनों बच्चों को तैयार किया। जैसे ही डिब्बा उनके बस्ते में डाला, केशव ने मना कर दिया। बापू वहाँ खाना मिलता हैं, मैंने देखा था। मैं वही खाना खाऊँगा। केशव ने डिब्बा वही छोड़ दिया और मनोहर ने भी लेने से मना कर दिया।
अच्छा केशू, मनु खूब मन लगाकर कर पढ़ना और मास्टर की बात ध्यान से सुनना और खाना खा लेना। और मनु स्कूल ख़त्म होते ही भाई का हाथ पकड़कर दरवाज़े के पास खड़े रहना वो दयाल भैया आएंगे उन्हीं के साथ आ जाना। हरिहर ने समझाते हुए कहा। बापू तुम नहीं आओंगे? मनोहर ने पूछा। दयाल भैया सड़क का कूड़ा उठाने आते हैं न, तो वो तुम्हें लेते आएंगे। यह सुनते ही मनोहर और केशव हाथ हिला स्कूल के अंदर चले गए और हरिहर दो मिनट तक वही खड़ा रहा। तूने अपने बच्चो का दाखिला करवा ही लिया। मनीराम पान खाते हुए बोला। हाँ भाई, सब ऊपरवाले की कृपा हैं। देखते है, कब तक ऊपरवाला मेहरबान रहता हैं मनीराम मन ही मन बुदबुदाया।
7
क्लॉस में बच्चों को देख केशव खुश हों रहा था। उसने पूरी क्लॉस को देखा और चुपचाप एक कोने में बैठ गया। तभी मास्टरजी आये और केशव को देख बोले, "तुम नए आये हों। " उसने हाँ में सिर हिला दिया। अच्छा बच्चों, आज हम अंग्रेजी के कुछ अक्षर सीखेंगे। और तभी मास्टर ने एक बटन दबाया और सफ़ेद बोर्ड पर रंगीन अक्षर आने लगे। सभी बच्चे देखकर खुश हों रहे थे । जब मास्टर ने पढ़ाना खत्म किया तो सबसे पूछा कि कोई सुनाये। तीन-चार बच्चों खड़े हुए और उसमे एक केशव भी था। मास्टरजी के पूछने पर उसने उसी तरह सुनाया जैसा उसने देखा था। मास्टर ने उसकी तारीफ़ की। मास्टरजी बच्चों को गृहकार्य देकर कक्षा से निकल गए। उनके जाते ही दो बच्चे मनीष और शम्भू उसके पास आये, वे भी केशव की तरह पिछड़ी जाति के बालक थे । तीनों में अच्छी दोस्ती हों गई। बाकी चार कक्षाओं में भी केशव ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सब उसकी तारीफ़ कर रहे थे। जब खाने की घंटी बजी, सब बच्चे बाहर की तरफ़ भागे। केशव भी शम्भू और मनीष के साथ बाहर आ गए। उन दोनों के हाथों में खाने का डिब्बा था। तू खाना नहीं लाया केशव? नहीं लाया खाना, स्कूल में मिलता तो हैं। केशव ने खाते हुए बच्चों को देखते हुए कहा।
मिलता हैं. मगर हमें नहीं मिलता हैं। हम अपना डिब्बा ही खाते हैं। सोनू ने ज़वाब दिया। नहीं, मैं यहीं खाऊँगा। तभी उसका बड़ा भाई मनोहर भी वहीं आ पहुँचा। दोनों भाई कतार में बैठ गए। आज राजमा-चावल बँट रहे थे और दोनों बच्चों के मुँह में पानी आ रहा था। वे इंतज़ार करने लगे। कब उनके पास यह खाना आयेंगा। बापू समोसे ही खिलाते या सादी रोटी के साथ प्याज़ और धनिये की चटनी या बहुत हुआ तो सब्ज़ी वो भी सिर्फ आलू या भिंडी की। माँ साल में दो तीन बार कुछ स्वादिष्ट बनाकर खिलाती थीं। मगर उनके मरने के बाद वह भी ख़त्म हों गया। रमिया काकी के हाथों में स्वाद नहीं हैं, वह भी रोटी के साथ पुदीने और टमाटर की चटनी देती हैं। या केले के पत्तों की सब्जी बना देती हैं। या कभी उबाल के चावल दे देती हैं। अब स्कूल में खाना मिलता है, अब दिल से पेटभर खायेगा। जैसे माँ के हाथों की बनी पूरी भाजी खाता था। वह यह सब सोच ही रहा था, तभी खाना बाँटने वाली माई उसके पास आई और उसे कहने लगी कि तुम बच्चों हटो यहाँ से। जब खाना बचेगा, तब मिल जाएगा।"दोनों बच्चे मन-मसोस कर खड़े हों गए। उसके दोस्तों का डिब्बा भी ख़त्म हों गया और बाकी बच्चे भी खाना खाकर चले गए। दोनों बच्चों को खाना नहीं मिला।
जब स्कूल से लौटते समय दयाल भैया की बैलगाड़ी में दोनों भाई बैठकर जा रहे थे , तभी पेड़ पर लगे अमरूद के फल देखते हुए बोले, यही रोक दो। मुझे बड़ी भूंख लगी हैं। क्यों मनु, आज डिब्बा नहीं ले गया था ? नहीं, आप जाओ हमें यही छोड़ दो, हम दोनों यहाँ से घर चले जायेंगे। मने देर हों रही हैं। तू केशव का हाथ पकड़कर सीधे पहुँच जाना। मैं चलता हूँ। दोनों भाई, वहीं अमरूद के पेड़ से अमरूद तोड़कर खाने लगे। मनोहर का तो पेट भर गया। मगर केशब आधा-अधूरा पेट लेकर घर पहुँचा। तभी रमिया काकी उनके लिए रोटी और टमाटर की चटनी दे गई। जो केशव ने मुँह बनाकर खाई और बाकी बची बापू के लिए रख दी।
शाम को जब हरिहर वापिस आया। तब देखा केशव अपनी माँ की तस्वीर सीने से लगाए सो रहा था। और मनोहर स्कूल का काम कर रहा था। उसने स्कूल के बारे में पूछा, तब मनोहर ने बताया, स्कूल बहुत अच्छा हैं, मगर आज वे दोनों भूंखे रह गए। क्यों खाना नहीं मिला? हरिहर ने मनोहर का गाल सहलाते हुए पूछा। नहीं बापू , सब खा रहे थे , मास्टर, बड़े सर, बच्चे, मगर कुछ बच्चों को नहीं दिया। वे अपना डिब्बा लाये थे । और हम डिब्बा नहीं लाए इसलिए भूखे रह गए। बाद में कहा कि मिड डे मील ख़त्म हों गया।" "क्या !! क्या!!! कहते है इसे, " मिड डे मिला "
नहीं बापू , 'मिड डे मील' मनोहर थोड़ा ज़ोर से बोला।
8
ऐसे ही लगातार तीन-दिन बीत गए। केशव और मनोहर को खाना नहीं मिलना था, नहीं मिला। मनोहर फ़िर भी चुपचाप बापू के कहने पर रोटी-अचार ले जाता था। मगर केशव नहीं माना, वैसे केशव एक अनोखे ढंग का बच्चा है। एक बार उसका मन शहतूत खाने का हुआ था और शहतूत का पेड़ गॉंव के उस तरफ़ के मंदिर में था। उसके-माँ बापू ने बहुत समझाया और उसे अपनी मंडी से शहतूत भी लाकर दिए। मगर केशव को तो उसी पेड़ के शहतूत खाने थे । वह पेड़ पर पहुँचकर वहाँ मज़े से बैठ शहतूत खाने लगा। तभी किसी ने देखकर गॉंव में शोर मचा दिया। केशव की पिटाई होते-होते बची। पंचो ने बच्चा कह हरिहर को माफ़ी माँगने के लिए कहा। सबके सामने कान पकड़कर उसने क्षमा याचना की। उसकी इस हरकत के कारण बापू ने तीन दिन तक बात नहीं की थीं। एक बार केशव की दोस्ती उसकी उम्र के रघु से हों गयी थीं, जो सुनार का बेटा था। ऊँच-जाति के रघु के साथ घूमते केशव को पूरे गॉंव ने क्या देख लिया, हरिहर पर सुनार ने अपने बेटे को बहकाने का इल्ज़ाम लगा दिया। रघु की पिटाई हुई और केशव भी इस बार बच न सका। कुछ दिनों बाद रघु दिखना बंद हो गया और केशव ने पता किया तो उसके बापू ने उसे घर से दूर भेज दिया था। अब किसे कौन समझाए कि बच्चों को बचपन की बातें समझ में आती हैं। यह काला-गोरा, छोटा -बड़ा, ऊँच-नीच यह फितूर बच्चों के दिमाग की उपज नहीं हैं।
केशव अपनी उम्र से ज़्यादा समझदारी की बातें करता हैं। उसका कहना है, पानी हमारी प्यास बुझाने के लिए मना नहीं करता, सूरज हम पर रोशनी डालने से पीछे नहीं हटता, पेड़ ने कभी नहीं कहा कि मेरे फल मत खाओ। कोयल भी हमारी छत पर आकर कूकती हैं तो फिर मुझे रघु से बात करने से क्यों रोकते हों, क्यों कहते हों कि उनमें और हममें बड़ा फर्क हैं। उनके इस सवालों का ज़वाब कौन दें। अम्मा ने भी पल्ला झाड़ लिया और उसके बापू के पास इतना समय नहीं कि उसे कुछ समझा सकें। मगर अब केशव मिड डे मील खाना चाहता हैं और उसे यह बात समझ नहीं आ रही कि वह यह खाना क्यों नहीं खा सकता। बापू ने ज़बरदस्ती डिब्बा उसके बस्ते में डाला। मगर उससे वो प्याज़ की सब्जी और रोटी नहीं खाई गई। तब हरिहर ने सोच लिया कि वह खाने की केशव की ज़िद को पूरा करने की कोशिश करेगा। आख़िर वो माँग ही क्या रहा है? खाना, जो उसके पेट के साथ उसका दिल भी भर दें।
हरिहर समोसे अच्छे बना लेता ही है, फ़िर खाना भी अच्छा बना सकता हैं। मगर जब भागो थीं, तब उसने ज़रूरत नहीं समझी और दूसरा पैसो की तंगी। पैसे की कटौती कर वह अपनी भागो का इलाज करा रहा था। एक गाँठ उसके स्तन पर थीं। बड़ी मुश्किल से सरकारी अस्पताल के धक्के खाता और डॉक्टर को दिखाता। उसकी कई दवाई उसे प्राइवेट खरीदनी पड़ती और भागो का खाना भी थोड़ा अलग बनता। पैसे की बचत करना ज़रूरी था, इसलिए पेट भरने का गुज़ारा भर हों सका। बच्चे भी माँ की हालत देख सहम से गए। जब डॉक्टर ने स्तन कैंसर की आख़िरी स्टेज कह उसे अस्पताल से छुट्टी दे दीं। तब अपनी मरती माँ को देखकर केशव चुप सा हो गया था, उसकी अनोखी ज़िदो को भी विराम लग गया। और उसके मरने के बाद कितने दिनों तक उसने कुछ नहीं खाया था। अब अगर मेरा बच्चा कुछ माँग रहा है तो क्यों न मैं उसकी फरमाइश पूरी कर दो। स्कूल जाते वख्त हरिहर ने डिब्बा दोनों बच्चे के बस्ते में डाला। तब उसके चेहरे पर एक चमक थीं। उसने केशव का गाल चूमते हुए कहा, "मेरे बच्चे आज पूरा खाना खा लियो। केशव ने कहा कुछ नहीं, मगर हाँ में सिर हिला दिया।
आज स्कूल में मास्टरजी परीक्षा के बारे में बता रहे थे। तभी मनीराम ने अंदर आकर कुछ कहा और मास्टरजी तुरंत कक्षा छोड़कर बाहर चले गए। तभी घंटी बज गई और सभी बच्चे अपना डिब्बा उठाये बाहर आ गए। केशव ने अनमने ढंग से अपना डिब्बा खोला और डिब्बे में कचौरी-भाजी देख वह खुश हों गया। दोनों भाई अपना खाना खा रहे थे । तभी मास्टर जी के पास बैठे एक आदमी ने मनोहर को कुर्सी देने का इशारा किया। वह जैसे ही खड़ा हुआ, तभी केशव ने कहा, भैया आप बैठकर खाओ, मैं जाता हूँ। उसने खाली डिब्बा बंद किया और उसी दिशा की तरफ़ चल पड़ा। किसी कर्मचारी को बोल देते बच्चा हैं, कहाँ उठा पाएंगा। मास्टरजी ने कहा। अरे ! सर काहे ! चिंता करते हों। इनकी जात यहीं काम करती हैं, यह भी बड़ा होकर यही काम करेगा। कहकर वो हँसने लगा। और मास्टरजी उसके लाये कागज़ देखने लगे।
केशव कुर्सी खींचकर ला रहा था। प्लास्टिक की कुर्सी होने के कारण वह ज़्यादा भारी नहीं थीं। केशव को ऐसे कुर्सी लाते देख वह आदमी बोला क्यों उठाकर नहीं ला सकता था? उठाकर लानी थीं तो आप खुद ले आते, मैं तो खींचकर ही ला सकता था। केशव ने ज़वाब दिया। देखो ! कैसे ज़बान लड़ा रहा हैं, चल भाग यहाँ से ! देखिये! सर, यह कागज़ हैं और पैसे भी हम देने को तैयार हैं, मगर मिड डे मील का टेंडर हमारा ही पास होना चाहिए। जाते हुए केशव ने सुना तो वही रुक गया। तभी मास्टरजी ने उसे सख्ती से जाने के लिए कहा। तब वह धीरे-धीरे वहाँ से सरकने लगा। हम खाने का सैंपल भी लाए हैं। आप एक बार दाल -पालक चखकर बताओ कि कैसा हैं ? बस यही आवाज़ उसके कानों तक पहुँची। ये खाना भी खिलाएँगे और पैसे भी देंगे वाह! यह तो बड़े अच्छे हैं। केशव सोचने लगा।
9
अब हरिहर रोज़ कुछ न कुछ नया बनाकर अपने बच्चों के डिब्बे में देने लगा। केशव और मनोहर खुद भी खाते और अपने दोस्तों को भी खिलाते थे । हरिहर के हाथों में स्वाद हैं। बच्चे खुश होकर खाते थे । जब एक दिन केशव अपने डिब्बे का कौर अपने दोस्त शम्भू को खिला रहा था। तभी उसकी पालक की रोटी का टुकड़ा किसी ने उसके हाथ से लेकर अपने मुँह में डाल लिया। उसने सिर उठाकर देखा सामने रघु खड़ा था। वह ख़ुशी से हैरान हों गया। रघु तू भी यही पढ़ता हैं, पर कभी दिखा क्यों नहीं? केशव ने उसे गले लगाते हुए पूछा। बस अभी दाखिला हुआ है मेरा। माँ गुज़र गयी थीं। बापू ने नानी के पास भेज दिया था। वो खुद बीमार रहती थीं और मामी उन्हें ठीक से नहीं रखती थीं तो वह मुझे कैसे रख पाती। बस वापिस आ गया और बापू ने इस स्कूल में डलवा दिया।
हाय ! तेरी माँ भी गुज़र गई, मेरी माँ भी गुज़र गई भाई। अब हम दोनों एक जैसे हों गए। केशव ने रघु का हाथ पकड़कर कहा। नहीं, हम दोनों एक जैसे नहीं हों सकते। तू कहना क्या चाहता हैं? यही कि मैं तुझसे एक कक्षा आगे हूँ। रघु ने हँसते हुए कहा। केशव भी हँसते हुए बोला, पर हमारी उम्र तो बराबर है, हाँ अगर तू फेल हों जाएगा फिर हम बराबर हों जाएंगे। केशव ने भी फ़टाक से ज़वाब दिया। तू नहीं सुधरेंगा याद है न, कितनी मस्ती करते थे , हम दोनों। तू स्कूल से खाना क्यों नहीं खाता? रघु ने सवाल किया। ये लोग हमें देते नहीं हैं। उसने अपने दोस्तों की तरफ़ देखकर कहा। चल छोड़ ! मेरे साथ खाना खा ! कहकर केशव ने रघु को बिठा लिया। भाई ! तेरा खाना स्कूल के खाने से भी अच्छा हैं। मेरे घर में भी इतना अच्छा खाना नहीं बनता। रघु ने केशव का खाना स्वाद लेकर खाते हुए कहा।
अब रोज़ यही होता। रघु मिड डे मील छोड़कर उसके पास आ जाता। जब तक घंटी नहीं बजती, दोनों दोस्त साथ में बैठकर खाना खाते। गेंद से खेलते, कंचो से खेलते और खूब हँसते। मनोहर ने कई बार केशव को टोका कि रघु से दोस्ती ठीक नहीं हैं। कही वो फ़िर किसी मुसीबत में न पड़ जाए। मगर उल्टा केशव ने उसको कसम देकर रोक दिया कि वो बापू को कुछ न बताए। स्कूल की घण्टी लगते ही जब रघु स्कूल से बाहर जाता, तब दोनों दोस्त एक दूसरे को देखते भी नहीं थे । मनोहर को भी लगा कि चलो! बात स्कूल की स्कूल में रह जाएँगी। एक दिन जब दोनों आधी छुट्टी में साथ बैठकर कंचे खेल रहे थे, तब प्रधानाचार्य के कमरे के बाहर भीड़ लगी देखकर केशव ने पूछा, तुझे पता हैं, क्यों बड़े सर के ऑफिस के बाहर इतनी भीड़ रहती हैं। रघु ने कंचा फेंकते पूछा। ज़्यादा नहीं पता, पर जो मूँछों वाला आदमी वहाँ खड़ा है, उसका नाम मूलचंद है, वह कल बापू के पास आया था। कह रहा था, मदद करो तो टेंडर हमें मिल जाए। बापू ने उसे कुछ समझाया। रघु ने कंचे का ज़वाब कंचे से दिया। 'टेंडर'? वो क्या होता है ? मैंने भी यह 'टेंडर' जैसा कुछ सुना है, केशव दिमाग पर ज़ोर देते हुए बोला। मुझे लगता है, जो खाना यहाँ बाँटा जाता है न, उसके लिए कुछ होगा यह टेंडर। रघु ने कहा। हाँ! तू सही कह रहा है। अच्छा केशव, तू अपने बापू से क्यों नहीं कहता कि वो भी टेंडर भर स्कूल में खाना बाँट दें।
क्या ! तेरा मतलब मिड डे मील? केशव का कंचा अब हाथ से छूट बड़े सर के कमरे के बाहर पहुँच गया। देख, केशव तूने लाइन पार कर दी। रघु ने कंचे की तरफ देखते हुए कहा। हाँ ! भाई कर तो दीं !!!!!!!''
10
रात को केशव, मनोहर और हरिहर अपना स्कूल का गृहकार्य कर रहे थे और हरिहर अपनी रोज़ की कमाई का हिसाब कर रहा था। देखो ! बच्चों अब मैं सोच रहा हूँ कि समोसे के अलावा कुछ और भी खाने की चीजें जैसे मटर पुलाओ, पूरी भाजी, जो सुबह तुम्हारे लिए भी बनता हूँ, थोड़ी ज्यादा बना लूँगा। थोड़ी आमदनी बढ़ जाएँगी और आगे जाकर तुम्हारी पढ़ाई के ख़र्चे भी बढ़ेंगे। मेरे पास कुछ ज्यादा पैसा होगा तो तुम्हारा बापू तुम पर ज़्यादा खर्च कर सकेंगे। क्यों क्या कहते हों? सच में बापू बहुत अच्छा सोचा आपने, हमारे दोस्तों को वैसे भी तेरे हाथ का बना भोजन बहुत पसंद आता हैं। अपने यहाँ के लोग उँगलियाँ ही चाट जायेंगे। क्यों केशव? कहता तू सही है भाई। मगर मैं कुछ और सोच रहा था, अगर बापू गुस्सा न करे तो बताओ ? केशव ने थोड़ा बचते हुए पूछा। हाँ, बता कि क्या बात हैं? तेरे खुराफ़ती दिमाग में क्या चल रहा हैं? हरिहर ने रुपए समेटते हुए कहा। मनोहर भी केशव का मुँह देखने लगा। बापू, रोज़ हमारे स्कूल में लोग मिड डे मील के लिए फॉर्म भरने आ रहे हैं। मतलब कोई टेंडर भरा जा रहा हैं। जिसका टेंडर पास हों गया। वो मिड डे मील स्कूल में देंगा। केशव बिना किसी डर के अपनी किताबें एक तरफ रखकर बोल गया। तू कहने क्या चाहता है? ज़रा खुल के बता।
इसे पहले केशव कुछ कहता मनोहर ने ही कहा, बापू यह कहना चाह रहा है कि आप मिडडे मील का टेंडर भर दों। जैसे हमारे दाखिले के समय स्कूल में फॉर्म भरा था न ऐसे ही स्कूल में खाने के लिए भी कुछ फॉर्म भरना पड़ता हैं। एक बार आपका नाम आ जाएगा तो आप हमारे स्कूल में खाना बाँटेंगे। मनोहर ने भी बड़ी मासूमियत से कहा। तुम दोनों का न दिमाग ख़राब हों गया हैं। पता नहीं, क्या सोचते रहते हों ? सबसे ज़्यादा यह केशव पगला गया हैं, इसे आदत हों गयी हैं। खुद को और हमको मुसीबत में डालने की। अब सो जाओ ! कहकर हरिहर ने दिये सी जलती बत्ती बंद कर दीं। और चादर तानकर लेट गया। मगर केशव की आँखों में नींद नहीं थीं। उससे रहा नहीं गया। उसने धीरे से कहा,बापू इसमें बुराई क्या हैं। आप भी खाना बनाते हों, वो लोग भी यही काम करते हैं, अगर आप हमारे स्कूल में खाना बाँटेंगे तो क्या फर्क पड़ जायेंगा।" फर्क कुछ नहीं पड़ेगा केशू, अब हरिहर उठकर बैठ गया और केशव को समझाता हुआ बोला, हम गरीब लोग है, उस पर हमारी जात भी छोटी हैं, एक हमारे पास पैसा नहीं कि हम इन सबमें पड़े और दूसरा हमारा खाना खाएगा कौन? तुम लोगों को ही स्कूल वाले खाने नहीं देते। ये दुनिया ऐसी ही हैं, तुझे अभी यह सब नहीं समझ आयेंगा। इसलिए तू सिर्फ पढ़ाई कर। और अपने बापू और अपनी मरी माँ का नाम रोशन कर।"बापू , माँ कहती थीं, कान्हाजी के सखा सब अलग-अलग जाति के थे । तब भी उन्हें वे अपने साथ ले जाकर माखन खिलाते थे । ताकि सब समझ सके कि जो यह दूध दोहने का काम करता हैं, उसे खाने और खिलाने का पूरा हक़ हैं। केशव की बात की सच्चाई को सुनकर हरिहर कुछ बोल न सका। बस यहीं कहा, केशव सपने में शायद माँ आकर समझा दें, जो मैं नहीं समझा पा रहा।
अगले दिन केशव और मनोहर एक दूसरे का हाथ पकड़ स्कूल जा रहे थे । क्योंकि रमिया काकी बहुत बीमार है। और बापू उनको लेकर अस्पताल गए हैं। "बेचारी! रमिया काकी दो साल पहले काका चले गए और अब काकी चली जाएँगी। केशव ने मुँह बनाते हुए कहा। क्यों बेकार सोच रहा है, काकी को थोड़ा बुखार हैं। ठीक हो जाएँगी। अभी दोनों बातचीत कर ही रहे थे । तभी किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई, दोनों उसी तरफ़ दौड़े , जहाँ से आवाज़ आ रही थीं। एक बड़ा टीले जैसा पत्थर। वहाँ उसके पीछे बिरजू रमा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था, और वो लगातार खुद को छुड़ाने का प्रयास कर रही थीं। वह बोल रहा था, आज आई तू हाथ में, सारी जवानी क्या कपड़े धोकर बर्बाद कर देंगी या फ़िर कुछ हमारे काम भी आयेंगी। छोड़, कमीने ! छोड़,मुझे, कोई बचाओ ! तभी मनोहर बोल पड़ा। छोड़! दीदी को, वरना शोर मचाएँगे। दोनों बच्चों को देख बिरजू हैरान हो गया और रमा को राहत महसूस हुई। पहले बिरजू डर गया। फिर अपनी ज़ेब से चाक़ू निकालकर डराते हुए बोला, भागो यहाँ से, सूअर के बच्चों। वरना तुम्हारे साथ तुम्हारी दीदी को भी मार डालूँगा। मनोहर केशव का हाथ पकड़ पीछे हटा। रमा को लगा, आज यह वहशी उसे नोच-नोचकर यहीं गाड़ देगा। अब कुछ नहीं हो सकता। ये बच्चे तो खुद डर गए हैं, वह फिर ज़ोर से चिल्लाई। तभी बिरजू ने उसका मुँह बंद करने की कोशिश की। केशव ने मौका देख बैग से अपना टिफ़िन, गत्ता और फुट्टा निकाला और बिरजू के सिर पर मारने लगा। मार से बिरजू बौखला गया और उसकी पकड़ ढीली हों गई। मनोहर ने उसे धक्का मारा और चिल्लाया भागो! दीदी। रमा जैसे-तैसे अपना पल्लू समेट गिरती पड़ती भागने लगी तभी केशव ने गिरे बिरजू के सिर पर वार किया। इस बार वो बेहोशी की हालत में पहुँच गया। फिर मनोहर और केशव भी वहाँ से ऐसे सरपट भागे कि सीधा स्कूल के पास रुके। कुत्तों के बच्चों तुम्हें छोड़ूँगा नहीं। कहकर बिरजू वहीं बेहोश हों गया।
11.
रमा भागते हुए अपने अपने घर पहुँच कमरे में खुद को बंद कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। आज अगर वो बच्चे न होते तो मेरा क्या होता। यह सोच वह दहाड़े मार रो रही थीं, पर उसे सुनने वाला कोई नहीं था। सब मौसी के बेटे की शादी में गए हुए थे । कहीं उसका परछावा नई दुल्हन पर न पड़ जाए इसलिए उसे साथ लेकर नहीं गए। इनकी बेटी आज हलाल कर काट दी जाती तो भी इन्हें कोई फ़र्क न पड़ता। ऐसे जीवन से मरना भला कहकर उसने चारपाई पर रखी चादर उठाई और छत पर टंगे पंखे से बाँध दीं। और फंदा अपने गले में डाल लिया। जैसे ही, रस्सी थोड़ी कसी तभी किसी ने दरवाजे पर आवाज़ लगाई। और न चाहकर भी वह चादर को गले से निकाल मेज़ से उतर गई। खुद को ठीक कर दरवाजा खोला सामने देखा हरिहर खड़ा था। उसे देख हैरान हो गई और अपना पल्लू सँभालते हुए बोली, जी आप ? उसे लगा केशव और मनोहर ने सबकुछ बता दिया होगा, तभी हरिहर यहाँ आया हैं। मगर हरिहर ने जब कहा, आपको रमिया काकी बुला रही हैं, उनकी तबीयत ठीक नहीं है। ज़रा उन्हें देख आओ। जी जाती हूँ। आप ठीक हैं न? उसका पसीने से लथपथ चेहरा, सूजी हुई ऑंखें। हरिहर को ऐसा पूछने पर विवश कर रही थीं। उसका मन किया कि वो हरिहर के पैर पकड़ खूब ज़ोर से रोए और उसे बताये कैसे उसके नन्हें बच्चों ने उसकी लाज रखी हैं और आज वो ज़िंदा भी सिर्फ उसके बच्चों के कारण हैं। मगर वह खुद को समटते हुए बोली। जी ठीक हूँ, आपके बच्चे तो ठीक है न? उसके स्वर में चिंता थीं। हाँ, वो ठीक हैं। स्कूल में हैं। मुझे देर हों रही हैं। कहकर हरिहर चला गया। और वह संतोष की सांस ले, रमिया काकी के यहाँ चल दीं। हे ! भगवन, उन बच्चों की भी रक्षा करना। मन ही मन उसने कहा। उसकी चाल देख लग रहा था कि उसने मरने का इरादा त्याग दिया हैं।
आज तू स्कूल इतनी लेट क्यों आया? बड़े सरजी ने कितनी डाँट लगाई। रघु ने केशव से आधी छुट्टी में पूछा। तेरा खाना कैसे गिर गया? केशव ने उसे सारी बता दीं कि रास्ते में उनके साथ क्या हुआ और उन दोनों भाइयों ने क्या किया। वाह ! तूने सचमुच बहादुरी का काम किया केशव। वो बिरजू भाई, है ही अज़ीब। सारा दिन गॉंव के लड़कों के साथ ताश खेलता रहता हैं। मेरी माँ कभी उससे बोलने नहीं देती थीं। अपना ध्यान रखियो, कहीं तेरे पीछे न पड़ जाए। रघु ने सावधान किया। कुछ नहीं होगा, तू चिंता मत कर। केशव ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा। तूने अपने बापू से बात की? रघु ने फिर पूछा। हाँ, मगर बापू बोले, हमारे हाथ का खाना कोई नहीं खायेगा। रघु कुछ देर चुप बैठा रहा और फ़िर सोचकर बोला कि एक तरकीब हैं, उसने केशव के काम में कहा। तुझे लगता है, यह तरक़ीब काम करेंगी ? हाँ बिल्कुल, कोशिश करने में क्या बुराई हैं। ठीक हैं। कहकर दोनों ने ताली मारी और अपनी-अपनी क्लॉस में चले गए।
घर लौटते वक़्त मनोहर केशव से बोला, आज जो कुछ हुआ उसे बापू को बताने की ज़रूरत नहीं हैं। बेकार में वो परेशां हों जायेंगे और हों सकता है कि हमारे बताने से रमा दीदी भी किसी मुसीबत में न पड़ जाए। मुझे लगता है बापू को बता देना चाहिए, कम से कम उन्हें पता चलेगा कि वो बिरजू कैसा हैं। केशव ने ज़वाब दिया। नहीं, कुछ दिन रुककर बताएँगे। ठीक है, जैसा तुम कहो। केशव भाई की बात मान गया। रात को उन्होंने रमिया काकी का हाल पूछा। और सोते हुए बोला, कल खाना थोड़ा ज्यादा देना, मेरे दोस्त माँग रहे थे । कहकर केशव चादर तानकर सो गया।
कल सुबह स्कूल में आधी छुट्टी के समय रघु अपनी कक्षा के दोस्तों को लाया। एक दोस्त ने केशव के साथ बैठने से मना कर दिया। बाकी दोस्त साथ में खाने लगे। उन्होंने केशव का डिब्बा खाया। खीर-पूरी इतनी स्वाद थीं कि एक बार लेने के बाद सबने बार -बार ली और तो और एक दोस्त ने कहा, मिड डे मील से अच्छा तो केशव का खाना हैं। इनके खाने में कोई स्वाद नहीं हैं। मगर मुझे यह माँ के खाने से भी ज्यादा स्वादिष्ट लगा। यह सिलसिला रोज़ चलता रहा। बच्चों को केशव का डिब्बा पसंद आने लगा। रघु की तरकीब काम कर रही थीं। उन लोगों की दोस्ती देख, कुछ मास्टरों को जलन हुई। ये बच्चे कैसे, उस छोटी जात के केशव का खाना मज़े से खा रहे हैं। कुछ भी कहो, यह केशव है, बड़ा चालाक। अंग्रेज़ी के मास्टर सुधीर ने सामाजिक के मास्टर से कहा तो वह बोले, वो बच्चे हैं, कुछ भी खा सकते हैं। बचपन को ऐसे ही थोड़ी न बेपरवाह कहा जाता हैं। जो भी हों, बड़े सरजी से बात करता हूँ , यह ठीक नहीं हैं। सामाजिक के मास्टर ने ज़वाब दिया, यह भी करके देख लो। तभी सुधीर, दो चार मास्टरों और बहनजी को साथ ले जाकर बड़े सरजी के कमरे में गया। सारी बात सुनकर हरिहर को स्कूल बुलवा लिया गया।
12
क्यों हरिहर, तुम अपने बेटे को क्या सिखा रहे हों ? जिस दिन तुम उस बहनजी को लेकर आये थे, मुझे समझ जाना चाहिए था कि तुम्हारे इरादे कितने नेक हैं। तुम्हारा इस स्कूल में आना ही एक सोची-समझी चाल हैं। मोतीलाल हरिहर को सुनाया जा रहा था। क्या बात! कर रहे है, सरजी, मैं गरीब जिसका सारा दिन रोज़ी -रोटी कमाने में निकल जाता हैं, उसके पास इतना समय नहीं कि वो कोई जालसाजी कर सके। हरिहर ने सफ़ाई देते हुए धीमी आवाज़ में कहा। तो फिर तुम्हारा सपूत क्या नए कारनामे कर रहा हैं ? अब यह मत कहना कि तुम्हें कुछ नहीं पता। मोतीलाल ने सवाल किया। सरजी, वो बच्चा हैं। मैं मानता हूँ, थोड़ा शरारती हैं। अभी वो बच्चा इतना चतुर -चालाक है तो बड़ा होकर क्या करेंगा। मोतीलाल की आवाज़ में व्यंग्य था। सरजी, मेरे बच्चे अपने बापू का ही सपना पूरा कर रहे हैं। ऐसा कौन सा कारनामा कर दिया उन्होंने। हरिहर को अब भी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मोतीलाल क्या बात कर रहा हैं। वो ही तो मैं कह रहा हूँ कि तुमने ही उन्हें कुछ सिखा के भेजा हैं। इरादे तुम्हारे ठीक नहीं हैं। तभी तुम्हारा केशव घर से डिब्बे ला-लाकर यहाँ के बच्चों को खिलाता हैं।
अगर कल दूसरी जात के लोगों ने कोई शिकायत कर दी कि उनके बच्चे एक नीची जात के घर का पका भोजन खाते हैं। तब तुम्हारे बच्चों का इस स्कूल से नाम काटने में मैं एक सेकंड भी नहीं लगाऊँगा। तुम जानते हों , समरसता दिवस अखबारों और टीवी के लिए एक ख़बर हैं। मगर होता वहीं है, जो हम मानते हैं। और हमारा मानना यहीं है , तुम अपने दायरे में रहो। और गॉंव के उस तरफ़ रहो। लकीर लांघने की कोशिश न करने में तुम्हारी भलाई हैं। अपने बच्चों को समझाओ कि पढ़ने आते हैं तो सिर्फ़ पढ़े। यहीं उनके लिए अच्छा हैं। कोए को हंसो के बीच बैठने का मौका मिला हैं, मगर किसी ने हंस नहीं बना दिया। अब जाओ, अगली बार दोबारा नहीं बुलाऊँगा। अपनी वाणी को विराम दे, मोतीलाल ने घण्टी बजा दीं और बाहर बैठी मैडम हाज़िर हों गई। और हरिहर बेहद गंभीर और परेशान मुद्रा में कमरे से निकल गया।
हरिहर दोनों बच्चों को लेकर जा रहा था। इतना शांत और गंभीर उसके बच्चों ने उसे कभी नहीं देखा था। केशव अपने स्कूल के किस्से अपने बापू को सुना रहा था। मगर मनोहर बापू के हाव -भाव समझ रहा था। उसे पता था कि बापू को आज बड़े सरजी ने बुलाया था। और ज़रूर कोई बात हुई है, जिसकी वजह से आज उनके साथ खूब बतियाने वाला बापू शांत हैं। मनोहर ने ही बात बदलने के लिए पूछा, बापू आज आप हमें लेने क्यों आ गए। क्या ठेले पर किसी को बैठा कर आये हों ? हरिहर ने कोई ज़वाब नहीं दिया। आप मुझे वो लाल -कमीज दिला दो। मैं स्कूल के सालाना जलसे में पहनने की सोच रहा हूँ। दिलाओगे न बापू ? केशव ने उसका हाथ हिलाते हुए पूछा। मगर वह चुप रहा। बल्कि केशव को घूरकर देखा। तभी उन्होंने देखा कि वो घर न जाकर घर के पीछे वाली गली में जा रहे हैं। यह देख मनोहर को चिंता हुई कि इस रास्ते पर हम क्यों आ गए। कुछ मिनटों में वह स्कूल के सामने खड़े थे । हमारा पुराना स्कूल। मगर यहाँ क्यों? दोनों भाई यही सोच रहे थे । इससे पहले दोनों कुछ कहते उसने बोलना शुरू किया, मैं सोच रहा हूँ कि वार्षिक परीक्षा के ख़त्म होते ही तुम दोनों का दाखिला फ़िर से इसी स्कूल में करवा दूँ। इसलिए आज चलकर बात कर लेते हैं। उस स्कूल का किस्सा ही खत्म करते हैं क्यों रे ! केशव मैं ठीक रहा हूँ न ?" बच्चों को काँटो तू खून नहीं, उन्हें लगा जैसे किसी ने उन्हें सपने से जगा दिया हों। नहीं बापू, ऐसा क्यों कह रहे हों? आखिर! हमारी गलती क्या हैं ? केशव ने पूछा।
"बटुवा हमार गलती क्या है? हमका ये बताओ? हम इत्ते जतन से तुम्हारे लिए सब कर रहे हैं, तुम हो कि सब ख़राब करन पर तुले हूँ। समझाया था न, तुमको कि मिडडे मील का वो फॉर्म, टेंडरवा के चक्कर में न पड़ो। मगर तुम नहीं माने और तुम लगे हमसे खाना अलग थैली में ले जाकर स्कूल के बचवा को भी खिलाने लगे ताकि बाकी को भी हमारे खाने की आदत हों जाए और तुम हमें मनाकर टेंडरवा भरवा लोंगे। अब दोनों बच्चे समझ चुके थे, कि बात क्या हैं। क्योंकि जब भी बापू गुस्से में होता हैं, तब वो गाँव की बोली बोलने लगता हैं। वरना उसे हमेशा यह याद रहता है कि वह आठवीं पास हैं और खड़ी बोली में बात करता हैं। बापू को गुस्से में देख मनोहर से रहा न गया और वह हिम्मत करके बोल पड़ा, सारी गलती इस केशव की हैं, आप मेरा स्कूल क्यों छुड़वा रहे हों? यह उस रघु के साथ मिलकर टेंडर का फॉर्म भी खुद भर देता। दोनों ने फॉर्म चुराने का भी सोच लिया था। केशव अपने भाई को भीगी आँखों से देखने लगा। चल केशव ! आज तेरा स्कूल ख़त्म करवाता हूँ, वह उसे घसीटते हुए अंदर ले गया। और केशव ज़ोर-ज़ोर से रोकर कहने लगा, बापू गलती हों गई, माफ़ कर दो। मुझे लगा तुझे अच्छा लगेगा। तू ही माँ को कहता था कि भगवान ने चाहा तो तेरे हरिहर का खाना पूरा गॉंव खायेगा। केशव अभी खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रहा था। मगर हरिहर की बातों का उस पर कोई असर नहीं हुआ। और वह केशव को खींचे जा रहा था। तभी मनोहर ने हरिहर के पैर पकड़ लिए और बोला, आख़िरी बार माफ़ कर दो। मैं वादा करता हूँ कि अब यह कुछ नहीं करेंगा। उसे रोते हुए केशव पर दया आ रही थीं। उसकी नाक निकल रही थीं और वो लगातार रोये जा रहा था। तभी हरिहर ने एक बार उसे देखा और उसे कंधे से पकड़कर बोला, सुन ! केशव सारे बच्चे रघु जैसे बच्चे नहीं होते और न कभी हों सकते हैं। अगर आज के बाद तूने कभी कोई ऐसी हरकत की तो बेटा स्कूल तुझे निकाले न निकाले, मैं तुझे यहीं इस स्कूल में भेज दूँगा। पगले ! तू नहीं जानता कि दुनिया तेरे हिसाब से नहीं सोचती, हम कौए हैं और वहीं रहेंगे। तुझे तेरी मरी माँ की कसम यह मिड डे मालवा का सब नाटक दोबारा न करियो। ठीक हैं, नहीं करूँगा। मुझे वही स्कूल जाना है।" केशव अभी रो रहा था।
अगले दिन स्कूल के बाहर खड़ा हरिहर बोला, जो कहा उसका ध्यान रखियो और हाँ रघु से भी दूर रहा कर। आधी छुट्टटी में केशव ने रघु को कल की सारी बात बताई। कोई नहीं भाई, तेरा इस स्कूल में रहना ज्यादा ज़रूरी हैं। आज तेरे डिब्बे में रोटी-अचार को देख बात समझ आ गई कि तेरा बापू कितना नाराज़ हैं। जब बाकी के बच्चे भी खाने के लिए केशव के पास आये, तब रघु बोल पड़ा, आज से भाइयों मिड डे मील खाओ। 'केशव मिड डे मील' की सेवा अब ख़त्म। ये सुन बच्चे वापिस चले गए। रघु और केशव वही रोटी-अचार खाने लगे। तभी माई ने आकर कहा, चलो, तुम दोनों खाना खाओ, यहाँ क्यों बैठे हों। रघु ने मना किया। तब माई ने कहा, केशव भी उनके साथ खाना खा सकता हैं। यह सुन दोनों सोचने लगे कि आज स्कूल को क्या हों गया। अरे ! जल्दी चलो, बच्चों ने खाना शुरू कर दिया हैं। दोनों ने देखा, आज कोई जातीय भेदभाव मिड डे मील में नहीं नज़र आ रहा। लगता है, स्कूल सुधर गया हैं। रघु धीरे से बोला। और दोनों खाना खाने के लिए चल पड़े।
13
केशव रघु के साथ चल तो पड़ा मगर उसका मन नहीं था कि वह आज कुछ खाए। जिस खाने को वो हमेशा दूर से देखता रहता था। उसी खाने को आज देखने का मन भी नहीं था। जब दोनों खाना खाने बैठे, तब मास्टरजी ने रघु को पंक्ति के दूसरी तरफ़ बैठने को कहा। वह समझ चुका था कि मास्टरजी क्या कहना चाह रहे हैं। मगर उसने साफ़ मना कर दिया। मास्टरजी ने भी मुँह बिचका लिया। क्या कह सकते थे, आख़िर वह भी उस ज़िले के गाँव के रुतबेदार व्यक्ति का बेटा है। उसके पिता ने भी कुछ क्लॉस में पंखे लगवा कर दिए हैं। इसलिए मुँह बंद कर एक तरफ हों गए। सभी बच्चों को खाना दिया जा रहा था। कढ़ी, चावल, आलू-गोभी की सब्ज़ी और ख़ीर देख बच्चे खुश हों रहे थे । मूलचंद को टेंडर मिल गया था। उसे वहीं खाने के पास खड़ा देख दोनों दोस्त समझ गए। रघु ने देखा कि खीर और कढ़ी उसे नहीं मिली और केशव की थाली लबाबब भरी हुई हैं। उसने केशव को देखा, वह कुछ नहीं खा रहा था। क्या हुआ? खाता क्यों नहीं? रघु ने उससे पूछा। मेरा मन नहीं हैं, तू खा ले। केशव ने अनमने मन से ज़वाब दिया। देख ले ! अगर मैंने खा लिया तो तू कुछ नहीं खा पायेगा। रघु ने उसको छेड़ते हुए कहा। केशव ने उसकी तरफ़ थाली सरकाते हुए कहा, तेरी मर्ज़ी, तू खा लें। और खुद उठकर चल दिया। रघु ने बिना संकोच किए उसकी थाली से खीर और कढ़ी खाने शुरू कर दिए। वही मनोहर भी पेट-भरकर खा रहा था।
स्कूल से लौटते वक़्त दोनों भाई रमिया काकी के घर गए। रमिया काकी ने प्याज़ और रोटी खिलानी चाही तो मनोहर ने पेट भरा कहकर मना कर दिया मगर केशव ने खा ली। रात को उसे चुप-चुप देख हरिहर ने बात करने के लहज़े से पूछा, क्यों केशव आज स्कूल में क्या किया रे? पढ़ाई की और क्या किया। यह कहकर वह अपना स्कूल का गृहकार्य करने में जुट गया। मनोहर ने उसे बताया कि आज उन्हें भी स्कूल में दिया जाने वाला भोजन मिला। इस बात पर हरिहर ने खुश होकर कहा, देखा सब दिन एक से नहीं रहते, कभी-कभी हमारे बिना कुछ करे ही सब कुछ बदल जाता हैं। भगवान सब देखता हैं। उसने लाल कमीज़ केशव को पकड़ाई और कहा, तेरे सालाना जलसे के लिए मैं लाल कमीज़ ले आया हूँ। अच्छी हैं न? केशव ने हाँ में सिर हिला दिया और सोने के लिए अपनी चारपाई पर चढ़ गया। हरिहर ने भी उसका मन पढ़ते हुए उसे ज्यादा नहीं पूछा। और बत्ती बुझा दीं। जब रात के ढाई बजे थे और चारों तरफ़ सन्नाटा था। तभी अचानक मनोहर इतनी ज़ोर से चिल्लाया कि दोनों उठ गए। बापू , बापू बाआआअ पू दर्द हों रहा हैं। मनोहर को इस तरह कराहते देख उसे पानी दिया तभी उसे उल्टी हुई और वो बेहोश हों गया।
हरिहर के जैसे होश ही उड़ गए। उसने मनोहर को गोद में उठाया और केशव को रमिया काकी के पास छोड़ अपने ठेले में मनोहर को लादकर ज़िले के अस्पताल की तरफ़ भागा और उसे इस तरफ़ जाते देख रास्ते के कुत्ते भी उठ खड़े हुए। कई बतियाँ जल गई। गाँव के कई जानकार भी हरिहर के पीछे हों लिए। वह दौड़ता-भागता हुआ, जब अस्पताल पहुँचा तो उसने देखा कि वहाँ पहले ही भीड़ हैं। गॉंव का चुनमुन कूड़ेवाला और मुनिया का पिता राम बिस्वास भी अपने बेटे श्रीधर को लेकर वहाँ पहुँचा हुआ हैं। और भी कई जाने-पहचाने चेहरे वहाँ पहुँचे हुए थे । सबके बच्चे बिलख रहे थे और एक दो बेहोश थे । अस्पताल में डॉक्टर भी कम थे । जैसे -तैसे सब बच्चों को देख दवा देने का काम चल रहा था। मनोहर को भी देखा गया। हरिहर का बुरा हाल था। वह बस रो नहीं रहा था। मगर अपने बेसुध बेटे को देख उसकी हालत भी बहुत ख़राब थीं। डॉक्टर हैरान थे कि ये बच्चे बीमार कैसे हों गए ? टेस्ट किये जा रहे थे । अस्पताल में एक दो डॉक्टर बाहर से भी आए। टेस्ट के अनुसार इनके खानपान की वजह से इनकी हालत ऐसी हों गई हैं। बड़े डॉक्टर ने हरिहर से पूछा, उसने बताया रात को सिर्फ पानी पीकर सो गया था। कह रहा था, आज पेट भरा हुआ हैं। बस जो कुछ खाया था, स्कूल से ही खाकर आया था। डॉक्टर ने कहा, 'एक्सट्रीम फ़ूड पोइज़िन्ग' का केस हैं, मगर हरिहर को समझ नहीं आया। तो डॉक्टर ने बताया कि अत्यधिक विषैले भोजन के कारण ऐसी हालत हों गई हैं।
मनोहर को दवा दी गई। उसकी हालत अभी नाजुक बानी हुई थी। तभी अस्पताल से चीखे आनी शुरू हों गयी थीं। दो बच्चे सदा के लिए दुनिया छोड़कर जा चुके थे । हरिहर ने मनोहर का बाजू कसकर पकड़ लिया। मगर कुछ घंटे बाद उसने महसूस किया कि उसका हाथ उसे ठंडा क्यों लग रहा हैं। उसने नाक के पास भी अपनी ऊँगली रखी, मगर उसे कुछ महसूस नहीं हुआ। तभी वहाँ नर्स आई, उसने भागकर डॉक्टर को बुलाया। उसने हरिहर को एक तरफ किया। वह बस यही बोल रहा था, मेरा बच्चा .च च च च ........ डॉक्टर ने मनोहर को अच्छे से देखा और हरिहर के कंधे पर हाथ रखकर बोला, इसे घर ले जाओ, अब कोई उम्मीद नहीं हैं। हरिहर भरे गले से बोला, डॉक्टर उम्मीद नहीं है का मतबल हैं? मेरा बच्चा बिलकुल ठीक हैं। आप दोबारा जाँचिए। हरिहर अब गुस्से में था। मगर डॉक्टर उसकी हालत देख नरमी से बोले, देखो भाई, तुम्हारा बच्चा अब ज़िंदा नहीं हैं। इसलिए इसे घर ले जाओ। कहकर वहाँ से चले गए और हरिहर धम्म से नीचे गिर गया।
14
केशव, और रमिया काकी दोनों की नज़रें बाहर लगी हुई थीं। उन्होंने केशव को सुलाने की बहुत कोशिश की। मगर उसकी आँखों में नींद कहाँ थीं। वह यही सोच रहा था, सुबह हो चुकी हैं, अब बापू कभी भी मनोहर को दवाई दिलवा उसे घर ले आएँगे। रमिया काकी को भी नई सुबह के साथ सबकुछ ठीक होने की ही आशा थीं। तभी देखा दो लोग हरिहर को सँभालते हुए चले आ रहें हैं। और दो लोग ठेले को खींचकर ला रहे थे । सबने गौर से देखा, मनोहर बेसुध सा ठेले पर सो रहा था। केशव ने जैसे ही दूर से देखा बापू आ रहे हैं। वह भागता हुआ गया। उसे देखकर हरिहर वही ज़मीन पर बैठ गया। केशव मनोहर की और लपका, क्यों बापू? भाई, ठीक नहीं हुआ क्या? उसने मनोहर को आवाज़ लगाई, मनोहर उठ, उसे हिलाता रहा। तभी रमिया काकी और भी लोग नज़दीक पहुँच चुके थे । साथ आये आदमी ने जैसे ही कहा, मनोहर अब नहीं रहा। रमिया काकी की चीख निकल गई। वह ज़ोर से रोने लगी। केशव भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लग गया। वह कभी बापू को हिलाता, कभी मनोहर को। पूरा गॉंव इस दुखद अंत पर अचंभित और शोकाकुल था। हरिहर के दोस्त भीमा ने आकर जैसे-कैसे सारे कारज पूरे किए। रमा दूर से मनोहर की अंतिम विदाई देख रो रही थीं। सबको यही लग रहा था, अभी मनोहर उठ खड़ा होगा और दौड़ने लग जायेंगा। बार-बार रमिया काकी यही कहीं जा रही थीं, अरे ! मुझ बुढ़िया को उठा लेता भगवन, इन बच्चो को काहे बुला लेता हैं। पहले माँ चली गई अब बेटा भी। हाय ! हाय ! कुछ ही देर में राम का नाम सत्य बोल मनोहर को भावभीनी विदाई दे दी गई। सब श्मशान घाट से घर आ गए। मगर हरिहर वहीं बैठा रहा। भीमा उसका साथ देने के लिए वहीं रुका रहा। तभी हरिहर की जैसे छाती फट गई हों, वह इतनी ज़ोर से दहाड़े मारकर रोया कि मानो उसकी चीखें आसमान से टकराकर सब जगह गूँज रही हों।
भीमा भी रोने लग गया और उसे गले लगा लिया। जब थोड़ा ऑंसू का यह सैलाब धीरे हुआ। तब वहीं किसी पत्थर का सहारा लेकर बैठ गया। देख ! तू टूट जायेंगा तो केशव को कौन सम्भालेगा। तू उसका अब भाई भी हैं। तेरे पास जीने की वजह हैं। तू इस तरह हिम्मत नहीं हार सकता, भीमा भरे गले से हरिहर से बोला। हाय ! यह क्या हों गया, रात को अच्छा ख़ासा सोया और सुबह होते ही सब ख़त्म। मेरा भगवान से भरोसा ही उठ गया हैं। पहले भागो, और अब मनु।आधा-अधूरा वाक्य बोल वह फ़िर फूट-फूट कर रोने लगा। हमारा मनु भाभी के पास गया है। अब वो ही उसका ध्यान रखेंगी। हरि भाई, घर चल। केशव रमिया काकी से नहीं संभलेगा कहकर भीमा ने हरिहर को खड़ा किया और दोनों लौटने लगे। पूरे गॉंव में किसी ने अपने घर चूल्हा नहीं जलाया। केशव बापू को देख, उनसे लिपट गया और हरिहर ने उसे कसकर गले लगा लिया। हरिहर केशव को चिपकाए भीमा के साथ अपने घर में घुसा तो उसे चारों तरफ़ मनोहर ही नज़र आया। उसने चारपाई पर केशव को लिटाया। और वही दीवार से सिर टिका बैठ गया। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने भीमा को कहा, कोई गॉंव का हों तो हाथ जोड़कर मना कर दियो। अभी मेरा केशु सोया हैं और मेरी हालत नहीं कि मैं किसी और से बात कर सको। भीमा गया और थोड़ी देर बाद अपने साथ शालिनी को लेकर लौट आया।
शालिनी को वहीं रखी चौकी पर बिठा , भीमा कमरे के कोने में खड़ा हों गया। शालिनी ने कहना शुरू किया, "हरिहर, मैं कल रात पहुँची हूँ। तुम्हारे बारे में पता चलते ही खुद को रोक न सकी। मुझे पता है कि अभी तुम्हारी बात करने की हालत नहीं हैं। मगर मैं फ़िर भी पूछूँगी कि यह सब कैसे हुआ? " हरिहर ने अपनी भरी आँखों से शालिनी को पहले देखा और फ़िर अपनी आवाज़ को ढूँढते हुए रात से लेकर अब तक की घटना सुनाई। तभी केशव भी उठ गया और घबराते हुए पिता की गोद में चला गया। स्कूल में ऐसा क्या खा लिया जिसकी वजह से उसके पेट का पाचन ऐसा विषैला हुआ कि यह अनहोनी घट गई? शालिनी हैरान होकर बोली। मिड डे मील खाया था। केशव ने दबी आवाज़ में कहा। और शालिनी ने उसे प्यार से अपने पास बुलाते हुए कहा, केशव बेटा, ज़रा मेरे पास आओंगे। उसने बापू को देखा, फिर बापू के सिर हिलाने पर वह शालिनी के पास गया। तुम मुझे कल स्कूल में क्या हुआ था, आराम से बाताओ। केशव ने धीरे -धीरे सारी बात बता दीं। केशव की बात सुनकर शालिनी जैसे किसी निर्णय पर पहुँच गई। केशव के सिर पर हाथ फेरकर बोली, अब मैं चलती हूँ। फ़िर मिलने आऊँगी अपने बेटे का ख्याल रखना। और हाँ, जो दो बच्चों की जान गई हैं, क्या तुम उनका पता बता सकते हों ? शालिनी ने पूछा। जी, दोनों हमारे गॉंव से दूर सड़क पार करते ही दूसरे गॉंव के थे । हरिहर ने जवाब दिया।
रात का वक़्त था। रमिया काकी केशव को अपने साथ घर ले गई। इतना भूखा रहना भी इस बच्चे के लिए ठीक नहीं हैं। तू भी कुछ खा ले हरि। रमिया काकी केशव का हाथ पकड़कर बोली। नहीं काकी, तुम इसे खिला देना। मेरा मन नहीं हैं। बहुत समझाने पर भी हरिहर न माना। तब काकी केशव को ही अपने साथ ले गई। कुछ देर बाद शालिनी एक -दो लोगों के साथ वहाँ पहुँच गई। हरिहर कल पुलिस स्टेशन पहुँच जाना। हम इस घटना की शिकायत करेंगें। शालिनी ने ज़ोर देते हुए कहा। किसलिए, हम क्या कर सकते हैं बहनजी ? हमें क्या पता कि गलती किसकी हैं ?कौन हमारी बात का यकीन करेंगा। हरिहर की आवाज़ में उदासीनता थीं। यह काम पुलिस करेंगी। मगर हमें पहला कदम उठाना होगा। शालिनी ने अब भी समझाया। बहनजी, आप अभी जाए। मैं देखूँगा। हरिहर ने हाथ जोड़ शालिनी को जाने के लिए कह दिया।
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वहाँ मोतीलाल को जैसे ही यह बात पता चली कि पुलिस भी इस मामले में पड़ सकती हैं तो उसकी रातों की नींद उड़ गई। उसने पैसे लेकर टेंडर पास किया था और यह जानते हुए कि खाना विषैला और बासी है, उसने तब भी पैसे लेकर खाना परोसने के लिए कह दिया। ऐसा खाना इन छोटी जात वालो की नियति हैं, इन्हें क्या फर्क पड़ेगा? ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? थोड़ा पेट में दर्द होगा। उसे क्या पता था कि बीमारी के साथ-साथ तीन मासूम अपनी जान खो देंगे। और दूसरा वह हरिहर से बदला लेना चाहता था। वह तबसे ही खार खाये बैठा था, जबसे हरिहर के बच्चों का दाखिला हुआ था। उसकी नफरत का ही परिणाम था कि उसने बासी और विषैली खीर और कढ़ी मनोहर जैसे बच्चों को सौंपी। और उसे यह भी लगने लगा था, हरिहर ने अगर टेंडर भर दिया और उसे यह कॉन्ट्रैक्ट मिल गया तो यह हार भी उसे बर्दाश्त नहीं होंगी। अपने बदले और अहम के कारण उसने मूलचंद जैसे घटिया स्तर के व्यक्ति को ऐसी हरकत करने से नहीं रोका। मगर अब क्या? वो शालिनी एक बार फ़िर हरिहर की मदद करने के लिए आ गयी हैं। तभी मूलचंद उसके घर आया, उन्हें इस तरह परेशान देख वह बोला, आप क्यों घबराते हों सर जी? मैं हूँ न, सब इंतज़ाम कर दूँगा। कुछ नहीं होगा, मैंने पहले भी कई स्कूल में ऐसा खाना परोसा, मगर मज़ाल हैं, कोई मुझ तक पहुँच भी पाया हों।" मूलचंद ने आराम से कुर्सी पर बैठते हुए कहा।
क्या कभी किसी की जान गयी थीं ? मोतीलाल ने सवाल किया।हाँ, कह सकते हों कि एक-दो बच्चे, मगर उन्हें हमने काफी पैसा दिया था। पैसा इन गरीबों का भगवान है सरजी, आप चिंता न करें। बस कुछ ही दिनों में आपको एक खुशखबरी सुनाऊंगा कि सब मामला सुलट गया। कहकर मूलचंद चला गया। मूलचंद कह तो ठीक रहा हैं, न उन लोगों क पास कोई सबूत हैं और न ही इतनी ताकत कि हमारे साथ लड़ सकें। यह सोचकर मोतीलाल निश्चित हों गया।
मूलचंद ने अपनी तरफ़ से पूरा ज़ोर लगा दिया कि यह केस एक किस्सा बनकर यही खत्म हों जाए और लोग कुछ दिनों में सब भूल जाए। शालिनी भी इंतज़ार कर रही थीं कि कब हरिहर स्वयं उसके पास आयेंगा और वो लम्बे समय से चलते आ रहे, इस मिड डे मील में ज़हर परोसते स्वार्थी और पापी लोगों को जेल के अंदर देखेंगी। उसे याद है, आज से ठीक दो साल पहले किसी स्कूल के बच्चों के साथ ऐसा हुआ था। मगर तब भी अपराधी बचकर निकल गये थे। उन माता-पिता ने ही साथ देने से मना कर दिया। जिनके बच्चे इस अनहोनी का शिकार हुए थे। उन्होंने पुलिस, कोर्ट केस के चक्कर में पड़ने से मना कर दिया था। उनका कहना था ग़रीब को कभी कोई न्याय दे पाया हैं, उसके पास फुर्सत नहीं कि वो अपना अच्छा और बुरा सोच सके। वे तो सकूं से अपने परिवार का गुज़ारा कर ले, यही बहुत हैं। बच्चों को जाना था, इसलिए चले गए। वह पुलिस स्टेशन में बैठी, ये सब सोच ही रही थीं कि थानेदार बोला, मैडम आप कब तक इंतज़ार करेंगी। कोई नहीं आने वाला। उन दो बच्चों के परिवारों ने मना कर दिया है। अब बचा एक, वो भी नहीं आयेगा। आप अपनी मण्डली को लेकर यहाँ से जाए। इन लोगों को पैसा मिल गया होगा। जाने वाला चला गया, इनकी ज़िन्दगी सँवर गई। हम बरसो से यही देखते आ रहे हैं। आप जैसे कितने लोग आते हैं और ऐसे ही चले जाते हैं। आप भी जाइए और समाज को सुधारने का नया तरीका खोजिए। थानेदार शालिनी को डंडा दिखाते हुए बोला। उसे हरिहर से ऐसी उम्मीद नहीं थीं। कम से कम वो तो मनोहर की मौत का सौदा नहीं करता। अच्छा शालिनी, हम चलते हैं। उसके सहयोगी राजेश ने अपना थैला उठाकर कहा, हमसे अब और इंतज़ार नहीं होगा। मेरी मानो तो तुम भी हमारे साथ चलो, आगे तुम्हारी मर्ज़ी। थानेदार ने शालिनी को ऐसा देखा, मानो कह रहा हूँ बड़ी आई झाँसी की रानी। सब जोश हों गया ठंडा। शालिनी ने घड़ी की तरफ़ निगाह डाली। मगर मायूसी का घंटा उसके दिल में बज रहा था। हरिहर नहीं आने वाला हैं। वह यह बात जान चुकी थीं।
हरिहर अपने ठेले को लगातार देखे जा रहा था। इसी ठेले पर वह मृत मनोहर को लेकर आया था। क्या वह कभी इस पर अपनी दुकान लगा सकेगा। ऐसे ही प्रश्नों का जवाब देने के लिए उसने मिट्टी का तेल निकाला और ठेले पर गिराकर उसे जला दिया। नहीं, अब वह यह ठेला और नहीं देख पाएगा। तभी उसने देखा दो-चार लोग उसकी और ही आ रहे हैं। वह जलते हुए ठेले के धुएँ से साफ़-साफ़ नहीं देख पा रहा था। मगर धोती-कुर्ते पहने लोग उसकी तरफ ही बढ़ रहे थे । वह भी अपने घर के आँगन में खड़ा उन्हें आते एकटक देखता जा रहा था।
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तुम हो हरिहर? तुम्हें ही पैसे देने में देर हों गयी थीं। लो मूलचंद सेठ ने दिए हैं। उन्होंने नोटों की गड्डी पकड़ाते हुए कहा। किसलिए ? हरिहर ने रुपए नहीं पकड़े, वो तुम्हारा बेटा गुज़र गया था न, बस सेठ तुम्हारी मदद करना चाहते हैं। उन्होंने कंधे पर हाथ रखकर कहा। मगर ये रुपए मुझे नहीं चाहिए। और कौन है, यह मूलचंद सेठ? उसने ने कंधे से हाथ हटाते हुए पूछा। मेरा नाम हीरा हैं। और मैं उनका ख़ास आदमी हूँ और सेठ वही हैं, जो स्कूल वगैरह में खाना सप्लाई करते हैं। उन्हें दुःख है कि तुम्हारे साथ यह हादसा हुआ, इसलिए अफ़सोस कर रहे हैं। उसने सफाई देते हुए कहा। पैसे देकर कौन सा अफ़सोस किया जाता है। अगर मन के इतने साफ़ थे तो खुद आते अपने आदमी को नोटों की गड्डी के साथ क्यों भेजा। हरिहर ने कहा। हम बहुत देर से आराम की भाषा बोल रहे थे, मगर लगता हैं, तुम्हें वो भाषा समझ नहीं आएगी। तू सुन!, वो तेरी मैडम पुलिस स्टेशन में तेरी राह देख रही है न, उसके साथ मिलकर कोई कांड न करने की कीमत है यह। ये तो हमारी शराफत है कि अब तक मुँह मीठा कर बोल रहे हैं, वरना हाथ की भाषा से समझाना हमें भी आता हैं। हीरा ने मुठ्ठी दिखाते हुए कहा। ये नोट रख और खुश रह। हीरा ने नोट हरिहर के हाथ में पकड़ा दिए। और गमछे को गले में कसकर बाँधने लगा।
ओ ! सुन ! हरिहर ने हीरा के कंधे पर हाथ रख, कहना शुरू किया। हीरा उसकी तरफ़ देख रहा था। पहली बात, मैं गरीब ज़रूर हूँ, बेबस नहीं कि तेरे नोट देख, तेरे या तेरे सेठ के कदमों में गिर जाओ। पहले लगता था, शायद मेरे मनु की मौत कोई हादसा या मेरी ही करनी का फल हैं, मगर अब मने समझ में आ गया, मेरा मासूम मनु , तुम जैसे स्वार्थी और दीन लोगन का हक़ मारन वाले गंदे लोगों की करनी का सिकार हों गया। पता नहीं, कितने मनु खा गया हों गया, तेरा सेठ। उसको कह, इससे दो चार वकील रखे, जो उसे बचाएँगे। कोंकी मैं तेरे सेठ को जेल पहुंचाकर ही अपने मनु की तेरहवी करूँगा। और हाँ, पहले मैंने अपने बच्चान की ख़ातिर टेंडरवा नहीं भरा, मगर अब अपने मरे हुए बच्चे की कसम मिड डे मिलवा मैं ही बाटूँगा। कहकर हरिहर ने नोट हीरा की हथेली पर रख दिए। तुझे पता नहीं हैं, उनकी पहुँच कहाँ तक हैं? नेता लोगों के साथ उठना बैठना हैं, मारा जायेंगा। अगर तू अभी यहाँ से नहीं गया ता तने इसी जलते हुए ठेले में डाल दूँगा। चल भाग यहाँ से ! हीरा उस भड़कती आग को देख, थोड़ा सकपका गया और वहाँ से जाना ही उसने उचित समझा।
शालिनी ने अपना बैग उठाया और जाने को हुई और सामने हरिहर को देख उसके चेहरे की उदासी उम्मीद में बदल गई। उसने निडर होकर कहा। अब शिकायत दर्ज़ करो, स्कूल के ख़िलाफ़। थानेदार उन दोनों के होसले देख, चुपचाप लिखने बैठ गया। हरिहर ने मूलचंद की बात शालिनी को बताई। सब के सब मिले हुए हैं, वो मोतीलाल, स्कूल कमेटी और हों सकता हैं, इन्हें कोई राजनेता भी मदद कर रहा हों तो कोई बड़ी बात नहीं। हरिहर यहाँ तक आये हों तो पीछे मत हटना। यह सिर्फ शुरुआत हैं, अगर डरकर पीछे हटे तो यह अपराध और पनपेगा और कितने ही मासूम इसकी बलि चढ़ेंगे। अब कुछ भी हों जाए बहनजी, अपने मनु की मौत ऐसे नहीं बेगार करनी, वैसे भी अब खोने के लिए बचा क्या हैं? केशव हैं, जिसे जब पहले भगवान ने रख लिया तो आगे भी उसकी रक्षा वही करेंगा। शालिनी को विश्वास हों गया था कि अब इस रात का सवेरा होकर रहेंगा।
हरिहर जब गॉंव पहुँचा, उसके घर के पास भीड़ जमा थीं। उसने देखा भीमा और दो-तीन लोग पानी फ़ेंक रहे हैं। उसने पास आकर देखा तो पता चला कि उसका एक कमरे का मकान जल रहा हैं। वह भी भागता हुआ आया। पहले उसकी नज़रे केशव को ढूँढ रही, उसने देखा केशव भी अपने हाथों से पानी का डिब्बे उठाए, आग बुझा रहा हैं। उसने केशव को झट गोंद में उठा लिया। "बापू ! हमारा घर! "केशव को चूमते हुए उसने उसे एक तरफ़ खड़ा किया। और खुद भी पानी डालने लगा। मगर कोई फायदा नहीं हुआ। सब जल गया था, सिर्फ कालिख बची थीं। तभी पंच राधेश्याम बोले, हरिहर कुछ लोग आकर तेरा मकान जला गए। ये कैसे लोगन से तने मुसीबत ले ली, कल पंचायत बैठेंगी, अब वही जवाब देना। हरिहर सुनता रहा और भीड़ उसके आसपास से हटने लगी।
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पंचायत के पंच ने बोलना शुरू किया। हम सबको बहुते दुःख है कि तेरे साथ अच्छा नहीं हुआ। मगर कल जो लोग आकर खुले में धमका कर गए और फिर तेरा मकान जल गया। यह कोई अच्छा संकेत नहीं हैं, समझे। कल को वे लोग गॉंव के दूसरे लोगन को नुकसान पहुँचा सकत हैं। फिर तेरा एक बच्चा केशव हैं, उसका सोचा होता।" उसका सोचा हैं और सब बच्चों का सोचा हैं, अगर आज मैं कुछ नहीं बोला और जाने कितने मनु मरेंगे। और जो मरे उनका हिसाब नहीं। ये लोग अपनी मनमानी करते रहेंगे। रसोई तो देवी अन्नपूर्णा का वरदान हैं, मगर यह उसी देवी के वरदान को कलंकित करने पर लगे हैं, इन्होंने हमें कभी इंसान समझा हैं। नहर का पानी हम पूछकर पीते हैं। माता के मंदिर में हम नहीं जा सकते। कुछ पेड़ों पर हम नहीं चढ़ सकते। रास्ते अलग हैं, कुएँ अलग हैं, इनके घर को साफ़ करते हैं, समाज की गंदगी साफ़ करते हैं और ये हमें ही गंदगी समझते हैं, हमारा नहीं खाएंगे, मगर हमसे झूठन साफ़ करवा लेंगे। शहरों में लोग पढ़ गए अपने हक़ समझ गए। मगर गॉंव और ज़िलों में वो लहर क्यों नहीं आ सकती। हमारे बच्चे का दाखिला नहीं होता। कानून हैं, मगर सुनता कोई नहीं। सब बहरे हों गए हैं। हमारे वख्त सब अंधे बहरे हों जाते हैं। हमारी बहू -बेटियों के मान-इज़्ज़त कई बार इनकी जूती के नीच रौंद दी जाती हैं। और हम दबे कुचले लोग कुछ नहीं कर पाते। जब खाना देते थे ही नहीं थे, हमारे बच्चों को। तो उस दिन क्यों दिया ? है कोई जवाब इन बातों का ? आज अगर यह बाप चुप रह गया न, तो हमारे बच्चों का हम पर से भरोसा ही उठ जायेगा। सबने हरिहर की बातें ध्यान से सुनी।
तभी लोहिया चाचा बोले, हरि सौ बात सच कह रहा हैं। मने उसकी बातें गलत न लगे। तभी एक पंच ने कहा, तूने जो खाना खिलाने का ज़िम्मा लिया हैं, पुलिस, कोर्ट उसका पैसा कहाँ से आयेंगा? सोचा है, कभी ? सब हो जायेंगा, जो ईश्वर यहाँ तक लाया है, वह आगे भी ले जायेंगा। हरिहर ने जवाब दिया। तभी राम बिस्वास बोल पड़ा, मारे पास कुछ रुपए हैं हरिहर, मारी ओर से मदद, मैं अपनी बच्ची के लिए कुछ नहीं कर सका, मगर तू हमेशा से ही हिम्मत वाला हैं। कम से कम तू अपने मरे हुए बच्चे के साथ न्याय कर। भावना को समझ उसने रुपए रख लिए। तभी पंचो ने फैसला सुनाया, जो कोई हरिहर को सहयोग करना चाहता है करे, अपनी ख़ुशी से करे। बाद में नुकसान हो तो उसके लिए कोनो ज़िम्मेदार नहीं।
केशव रमिया काकी के घर रह रहा हैं। मगर हरिहर जले हुए लैंप की रोशनी में अपने मकान की लीपा पुताई कर रहा था। केशव की किताबें , बस्ते और वर्दी जल गए थे । कल उसे नई किताबें दिला ही देंगा। तभी उसे एक आहट सुनाई दीं। लैंप की रौशनी में उसने मुड़कर पीछे देखा, सामने चादर में ढके संकोच के साथ रमा खड़ी हुई हैं। हरिहर उसे देख हैरान रह गया। रमा? रात में ? घर में सब ठीक है न? हाँ, सब ठीक है। उसने अपने हाथ की मुठ्ठी खोली देखा कि कुछ सोने सी तार सा धागा था। यह हमार मंगलसूत्र हैं, जो कोनो काम का नहीं हैं, जे आप रख लो। मारी तरफ से मदद। मना न करना। रमा ने विनती की। इसे मैं नहीं ले सकता। तुमरा और तुमरे बच्चो का एहसान जे मने पर हैं, उसके सामने यह कछु नाही। रमा की आँखों में आँसू आ गए। क्या कुछ समझा नहीं ? रमा ने उस दिन की घटना को विस्तार से बता दिया। सुनते ही हरिहर ने गुस्से में अपनी मुट्ठी भींच ली। अगर आपने दरवाज़े पर उस दिन दस्तक न दी होती तो मैं फंदे पर झूल गयी होती। रमा कभी जे बात न सोचना। तुहार ज़िंदगी इतनी सस्ती नहीं है कि कोई कुत्ता काटने पर आये तो ख़त्म कर दो। यह मंगलसूत्र ले लो। थोड़ा बोझ कम होगा हमार। हमार बस चलता तो अपनी जान देके तुम्हारे मनु को ईस्वर से लाते। हरिहर ने मंगलसूत्र ले लिया। और रमा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
सुबह हरिहर ने केशव को स्कूल छोड़ दिया। कोई पूछे तो कह देना कि एक-दो दिन में वर्दी खरीद लेंगे। हरिहर ने प्यार से केशव का माथा चूमा और उसे स्कूल के अंदर भेजा। कुछ मास्टर उसे चिढ़कर कर देख रहे थे , मगर कुछ को उससे हमदर्दी हों रही थीं। मगर कोई क्या कर सकता था। सबको पता था कि सच देखना जितना दुष्कर हैं, उसी सच को बोलने का परिणाम और भी भयंकर हैं। आधी छुट्टी में उसने रघु को पूरे स्कूल में ढूँढा। मगर वह कहीं नहीं दिखा, उसे उस दिन की बात याद आई। उसका मन बेचैन हों उठा। अब सिर्फ रघु ही उसका भाई सबकुछ था। मगर वह नज़र क्यों नहीं आ रहा। उसने उसके दोस्तों से पूछा। मगर किसी को कुछ नहीं पता था। स्कूल ख़त्म होते ही हरिहर उसे लेने आया और उसने रघु के बारे में बताया।वह ठीक होगा। हो सकता है, छुट्टी पर हों। कल आ जायेंगा। जैसे ही स्कूल पार कर अपने गॉंव की सड़क पर आये तो सामने बिरजू खड़ा था, अपने दोस्तों के साथ। उसके हाथ में लाठी थीं। केशव अपने बापू के पीछे छिप गया। हरिहर ने उसे गोद में उठा लिया और एक तरफ़ चलने लगा। तभी बिरजू ने उसे धक्का दिया और वह गिरते-गिरते बचा। केशव को उसने अलग खड़ा कर दिया। तभी उसके साथियो ने लाठी बरसानी शुरू की। हरिहर को मार खाता देख केशव आस-पास से रेत उठा लाया और उसने एक की आँखों में रेत फैंकी तो वे लोग केशव को मारने दौड़े। अपने बच्चे को बचाने के लिए उसने एक की लाठी छीन, सबको पीटना शुरू किया। सब भाग गए। हरिहर ने बिरजू को पकड़ लिया, उसने लाठी को छोड़ उसे हाथ से पीटना शुरू किया। क्यों बे! सबको अपने बाप की जागीर समझा हुआ है का ? जब चाहे किसी पर भी हाथ आजमा लेंगा। यह मुनिया के लिए, यह रमा को हाथ लगाने के लिए, कहते हुए वह मारता रहा। अगर केशव उसे न रोकता तो वह आज उसकी जान ले लेता। अगर अब कभी हमार तरफ मुँह कर देखा तो तेरी ज़िंदगी का आख़िरी दिन होगा।
हरिहर अपने घाव पर हल्दी लगा रहा था। तभी शालिनी आ गई और हरिहर की हालत देख पूछने लगी, "छोड़ो न बहनजी, अब ओखली में सिर दे दिया है तो इन सबसे क्या डरना।" शालिनी ने बताया, "अच्छी खबर नहीं है, हरिहर। थानेदार कुछ करने से रहा। डॉक्टर, स्कूल का कर्मचारी, कोई कुछ बताने को तैयार नहीं हैं। मैंने सीधा अब राज्य के कमिश्नर को चिट्ठी लिख दी हैं। ताकि यह केस बंद न हों। एक छोटी सी उम्मीद नज़र आई हैं। मुझे किसी तरह मूलचंद के रसोइये का पता चल गया हैं। जिसे मूलचंद ने गायब कर दिया था। तुम मेरे साथ चलो, अगर तुम उसे बात की गंभीरता बताओगे तो शायद वह सच बोल पड़े। कब चलना हैं? हरिहर ने पूछा।
सुबह तड़के ही शालिनी अपने साथ ज़रूरी सामान ले घर से निकल पड़ी। उसने अपने सहयोगी राजेश को उतर प्रदेश के कमिश्नर से बात करने के लिए भेज दिया था। बाकी और सहयोगी भी कोई सुराग ढूँढने में लगे थे , मगर सबसे बड़ा ज़ोखिम का काम शालिनी कर रही थी। मूलचंद का रसोइया भीखू उसे कुछ बतायेंगा या नहीं या फिर मूलचंद के आदमी उसे उस तक पहुंचने भी देंगे या नहीं, सब खतरों का उसे पता था। तमिलनाडु में जब वह ऐसे ही मिड डे वाली घटना के पीछे का सच पता लगाने में जुटी थीं, तब इसी मूलचंद ने उस पर हमला करवाया था। मगर वो बच गई। इस बार मूलचंद उसे नहीं छोड़ेगा। पर अब उसे डर लगना बंद हों गया है। उसे याद है, जब उसकी शादी के बाद ससुराल वालों ने उसे ज़िन्दा जलाने की कोशिश की थीं। वह किस तरह आधी रात ही घर से निकल भागी थीं। कैसे, उसने हिम्मत कर कोर्ट में गवाही देकर, सबको जेल पहुँचाया था। तब भी उसे कोर्ट जाने से रोकने के लिए उसके अपने ही पति ने जमुना में फेंक दिया था। वो तो कुछ स्थानीय लोगों ने उसे बचा लिया, वरना आज वो यहाँ नहीं होती। इसलिए मरने से डर नहीं लगता। डर तो पीछे हटने से लगता है। उसकी कमज़ोरी किसी की उम्मीद न तोड़ दें। यह सब सोच वह अपने स्कूटर पर सरपट दौड़े जा रही थीं। तभी उसने देखा उसके स्कूटर के पीछे चार लोग लग चुके है, जीप उसके इतने करीब आई और उसे धक्का दे दिया। वह स्कूटर समेत रास्ते में जा गिरी। गंडासा लेकर उसकी तरफ बढ़ते उन गुंडों को देख वह सरपट दौड़ी। गिरते-पड़ते वह भागती जा रही थीं। उसकी सांस उखड़ रही थीं। जब उसे लगा गंडासा उसकी गर्दन तक पहुँच गया हैं। तो उसने साथ बहती नहर में छलांग लगा दीं। वे लोग वही रुक गए। वे लोग दो-चार मिनट वहीं खड़े रहें। मर गई साली, कहकर नेताजी को बता देते हैं, हमारा काम अब ख़त्म।
18.
हरिहर शालिनी का इंतज़ार कर रहा था, कहीं बहनजी, किसी मुसीबत में न फँस गयी हों। वहाँ नहर का पानी शांत था। तभी उसमें हलचल हुई। और शालिनी बाहर निकली। खुद को किनारे के पास लाकर सांस लेने लगी। गीले सूट से मुँह पोंछ आसमान की तरफ देखा। फिर घड़ी की तरफ देख, गिरे स्कूटर की तरफ बढ़ने लगी। यह समाज हमेशा यही सोचता है कि औरत हमेशा डूब ही जाती हैं। तैरना तो उसने तभी सीख लिया था, जब उसके पति ने उसे नदी में फेंका था। उसे पता था, हर बार उसे बचाने के लिए कोई किनारे पर खड़ा नहीं होगा। वो स्कूटर स्टार्ट कर हरिहर के पास पहुँची। हरिहर जल्दी करो। स्कूटर पर बैठ हरिहर उसे पूछा उसको देर क्यों हुई और उसके कपड़े कैसे गीले हुए ? उसने कहा, इस मामले में नामचीन नेता भी शामिल हैं, उनके ही गुंडों का काम हैं। भीखू के गॉंव रसोली पहुँच चुके थे। भीखू के घर का पता पूछ, जैसे ही उसकी झोपड़ी में घुसे। भीखू नहीं दिखा। लगता है, उन लोगो ने उसे कहीं और भेज दिया हैं। अब क्या करे ! बहनजी।" तभी उन्हें करहाने की आवाज सुनाई दी, जो झोपड़ी के पीछे से आ रही थीं। जाकर देखा, भीखू घायल पड़ा था। उसके पेट पर धारधार वार हुए थे । आखिरी साँसे गिन रहा था। भीखू हमें सच बता, यह मिड डे मील का सच क्या हैं? कौन लोग हैं ? जाते-जाते सच बोलो ताकि ऊपरवाले को मुँह दिखा सको। मरी-सी आवाज में उसने बोलना शुरू किया। मूलचंद, मास्टर, बड़े सर और विधायक गिरधारी लाल कहकर भीखू ने दम तोड़ दिया।
शालिनी और हरिहर मरे भीखू को देख रहे थे । शालिनी सोच रही थीं, अगर पुलिस को यह बता भी दूँ, तब भी कोई फ़ायदा नहीं। भीखू ज़िंदा होता, शायद उसे गवाह बना दिया जाता। मगर अब क्या हों सकता था। हम अब भी वही है हरिहर। उसने निराश होकर कहा। बहनजी, क्यों न भीखू की झोपड़ी में देखते हैं, क्या पता कुछ मिल जाए। भीखू की झोपड़ी में कुछ कागज़ मिले, जिन पर खाने की सामग्री लिखी थीं। घटिया से भी घटिया सामान मँगवाया जाता था। उसके मूल्य बहुत ज्यादा दिखाए जाते थे । सारे कागज़ बटोर दोनों वहाँ से चले गए।
केशव को रघु का ख्याल आ रही था। वह रमिया काकी से झूठ बोल, रघु के घर के पास पहुँच गया था। मगर वह अंदर कैसे जाए? तभी उसे याद आया कि वह पहले भी अंदर जा चुका हैं। यह शहतूत का पेड़ उसे घर के अंदर पहुंचा सकता हैं। बस, किसी तरह वह आसपास की नज़रों से बचकर पेड़ पर चढ़ छत पर आ गया। संभलकर वह छत से नीचे की और जा रहा था। वह रघु के कमरे में गया, मगर वहाँ कोई नहीं दिखा। वह फिर चुपचाप धीरे-धीरे रसोई की तरफ बड़ा। वहाँ दो लोग ज़मीन पर बैठे बात कर रहे थे । "बेचारा! रघु बिटुवा सगी माँ गँवा बैठा। अब सौतेली आएँगी तो उसका जीना ही हराम कर देंगी। पहले उसे ठीक होकर घर आने दो, क्यों ऐसी मनहूस बातें निकालती हो। देख लेना, बड़े साहब ब्याह नहीं करेंगे, वह भी अपने बच्चे को बहुत चाहत हैं। देखा नहीं, इलाज करवाने शहर के बड़े अस्पताल ले गए हैं। अरे! रेहन दे, ऐ मर्द जात नहीं रह सकती। औरत के बिना। सब होगा ब्याह। तभी केशव दोनों के सामने आ गया। दोनों उसको देख हैरानी से उठ खड़ी हो गई। ऐ ! छोरे तू अंदर कैसा आया रे! कोई चोरी ता नहीं की। माई, मैं रघु का दोस्त हूँ। मुझे बताओ, वह कहाँ हैं ? हाथ जोड़कर केशव नीचे बैठ गया। दोनों को उस पर दया आ गयी। हमें नहीं मालूम, बस इतना पता हैं कोई बड़ा अस्पताल हैं, अब जा यहाँ से। किसी ने देख लिया तो तुझे धर देंगे।
वह रसोई से निकला ही था कि सामने रघु के पिता खड़े हुए थे। उन्होंने केशव को घूरकर देखा। वह थोड़ा सहम गया। उसे डर लगा, अब कही यह उसके बापू को न बता दें। मगर थोड़ी देर बाद उनके चेहरे के हावभाव बदल गए और उन्होंने पूछा, क्यों रघु से मिलने आये थे। उसने हाँ में सिर हिला दिया। फिर यहाँ क्यों खड़े हों, मेरे साथ चलो। इतना कहते ही वह चल पड़े और केशव उनके पीछे हो लिया। उसके चेहरे पर ख़ुशी के भाव थे। वह अब रघु से मिलेगा, उसे बतायेगा कि उसके साथ क्या हुआ? उसका भाई दुनिया छोड़कर चला गया और किसी ने उसका घर जला दिया। अब वह ही उसका भाई, उसका सबकुछ हैं।
गाड़ी सरपट दौड़ पड़ी थी। केशव गाड़ी से बाहर देख रहा था। तभी पीछे आते दूसरे मोड़ से शालिनी और हरिहर स्कूटर पर आ रहे थे । केशव को सफेद रंग की गाड़ी में बैठा देख, उसके मुँह से निकला, बहनजी यह मेरा केशव हैं। पता नहीं, इसे कहाँ ले जा रहे हैं? शालिनी ने अपना स्कूटर उस गाड़ी के पीछे लगा दिया। गाड़ी अस्पताल के पास रुक गयी। केशव और रघु के पिता कुछ सीढ़ियाँ चढ़, उस कमरे में पहुंच गए। मशीनों से घिरा पड़ा रघु पंखे की और देख रहा था। केशव को देखते ही जैसे उसके शरीर में जान आ गयी और उसने उठने की कोशिश की, मगर उठ न सका। पास खड़ी नर्स ने उसे संभलकर लिटा दिया। केशव तू ?उसने साथ में अपने बापू को देखा तो आँखों से उन्हें धन्यवाद दिया। रघु ने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया। केशव भी उसका हाथ पकड़ वही बैठ गया। भाई, उस दिन जब तू स्कूल से निकल गया था न तब मेरी पानी की बोतल वही क्लास मैं रह गयी थीं। मैंने बड़े सर को अंग्रेजी के मास्टर और मूछों वाले आदमी से बात करते सुना था। उसे बोलने में फिर तकलीफ हुई। रघु बेटा, अभी मत बोलो। उसके पिता ने उसे टोका। मगर थोड़ा रुक वह बोलने लगा, भाई उस दिन कढ़ी और खीर दोनों ख़राब थे और वो कह रहे थे कि आज ज्यादा पैसे दिखाकर कम खर्च किये। खाना उन नीच लोगो को खिलाकर बर्बाद होने से भी बचा लिया। बड़े सर, तेरा और तेरे भाई का नाम ले रहे थे । तेरा भाई कहाँ हैं? ठीक तो हैं न ? वह तो मर गया रघु। यह कहकर केशव फूट-फूटकर रोने लगा। रघु की आँखों में आँसू आ गए। तब तक शालिनी और हरिहर अंदर आ चुके थे । शालिनी ने बिना देर करे, पुलिस को बुला लिया। रघु ने सब कुछ पुलिस को बता दिया।
रघु केशव का हाथ कसकर पकड़कर बोला, "भाई मुझे मेरी माँ की बहुत याद आ रही हैं। ऐसे लगता हैं, माँ बुला रही हैं। तभी उसकी मशीन आवाज़ करने लगी। नर्स ने डॉक्टर को बुलाया और सबको बाहर भेज दिया। मगर रघु ने केशव का हाथ नहीं छोड़ा। भाई तू ठीक हो जायेगा। मुझे तेरे साथ कंचे खेलने हैं। उसकी साँसे ऊपर चढ़ने लगी। उससे बोला नहीं जा रहा था। डॉक्टर ने जैसे ही उसकी धड़कन देखी, जो थम चुकी थीं। रघु भी हमेशा के लिए दुनिया छोड़ जा चुका था।
केशव ज़ोर से चिल्लाया रघु ! उसके पिता, हरिहर, पुलिस सब अंदर आ गए। डॉक्टर ने उसके पिता से कहा, मैंने आपको पहले ही कहा था कि आपके बेटे के पास कम समय हैं, वो तो जैसे अपने इस दोस्त का इंतज़ार कर रहा था। रघु के पिता ने ज़ोर- ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। हरिहर की आँखों में आँसू आ गए। शालिनी ने भी भीगी पलकों से कहा, यह बच्चा तो हमारा अधूरा काम पूरा कर चला गया। हरिहर ने काँपते हाथ रघु के पिता के कंधे पर रखे और उन्होंने आज जात-पात का भेद न करते हुए हरिहर को गले लगा लिया। मुझे सब पता था कि वो मूलचंद का सच क्या हैं? फिर भी मैंने उसे मिड डे मील के टेंडर भरने में मदद की। कभी यह नहीं सोचा था कि यह गाज मेरे अपने बच्चे पर गिर जाएँगी। आज मैं तुम्हारे साथ हूँ, हरिहर। तुम चिंता मत करो, हमारे बच्चों को न्याय मिलकर रहेगा।"
पुलिस ने सबको पकड़ लिया। और सामने आया एक भयानक सच: "हमेशा से ही निम्न स्तर का सामान मँगवाया जाता था, दूध में पानी डालते थे। और घटिया से घटिया चावल , दाल का प्रयोग होता था। उस दिन तो दूध फटा और ख़राब था और कढ़ी में मकड़ियाँ गिर गयी थीं, पता होने पर भी किसी ने कुछ नहीं कहा। बल्कि मोतीलाल के कहने पर वो ख़राब खाना केशव जैसे बच्चो को खिलाया गया। घूस लेकर टेंडर पास करा जाता था। मूलचंद ने पहले भी तमिलनाडु और कई अन्य राज्य में यही काण्ड किया था।रघु के बयान को कोर्ट में दर्ज़ किया गया। दो साल बाद कोर्ट का फ़ैसला आया। मूलचंद , विधायक गिरधारी लाल, मोतीलाल, सभी की गिरफ्तारी हुई। रघु के पिता ने भी पूरा साथ दिया। सबको दस साल की सजा हुई। सभी बच्चो के माता-पिता को सरकार ने मुआवजा दिया। कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार मिड डे मील देने से पहले स्कूल के प्रिंसिपल खाने को खायेंगे। सारी जाँच पड़ताल की जिम्मेदारी जिलाअधिकारी की होंगी। किसी प्रकार की लापरवाही होने पर प्रिंसिपल, खाद्य अधिकारी, उस ज़िले के विधायक सबको जवाब देना होगा। और बिना किसी भेदभाव के स्कूल में शुद्ध और पौष्टिक खाना बटेंगा। टेंडर में भी कोई जात-पात को लेकर या पैसे को लेकर कोई हेरा-फेरी नहीं होंगी। इस फैसले के आने से सबके चेहरों पर ख़ुशी थीं।
आज रघु को टेंडर मिल तो गया, मगर अब भी कुछ अभिभावकों के विरोध के कारण रघु ने खुद ही अपना नाम पीछे ले लिया। क्योंकि उसे पता था कि हर बदलाव को समाज केवल अपने हिसाब से स्वीकार करता हैं। वो अच्छा खाना बना सकता हैं, मगर अच्छी और नवीन सोच तो सबको खुद ही बनानी होगी। उसने स्कूल के पास ही अपना ढाबा खोल लिया हैं। जहाँ सब आना चाहते हैं तो सबका स्वागत हैं। खाना बनाने में रमा भी उसकी मदद करती हैं। उसने रमा का हाथ उसके बापू से माँग लिया हैं। केशव स्कूल जा रहा हैं। उसे स्कूल के मैदान में रघु कंचे खेलता दिखता हैं। जब वह मिड डे मील खाने बैठता हैं तो मनोहर खाना खाता हुआ दिखता हैं। स्कूल की आखिरी कक्षा हैं और केशव ध्यान से सुन रहा है, मास्टर जी कह रहे है कि महाभारत के युद्ध में पांडवों की तरफ से अभिमन्यु और घटोत्कच भी वीरगति को प्राप्त हुए थे।
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