मेरे हमसफर
मेरे हमसफर
रात के 9 बजे थे। खिड़की के सामने लगे स्टडी टेबल पर अपने विचारों को पन्नों पर उकेरती हुई लता कभी सपनों में डूब जाती, तो कभी हकीकत की दुनिया में उसी खिड़की के बाहर अपने बगीचे में झांकती जहाँ कभी किसी जुगनू का चमकना दिखता था, तो कभी झींगुरों की झनझनाहट सुनाई पड़ती थी, वर्षा की बूंदों की आवाज भी मध्यम हवा के साथ आ रही थी। बेशक बाहर घुप्प अंधेरा था, इतना अंधेरा मानो उस अंधकार में खड़ा व्यक्ति अपने हाथ भी न देख सके, खैर लता के लिए कुछ भी नया नहीं था क्योंकि उसी अंधेरे का अंश कहीं ना कहीं उसके जीवन में भी था। लता उस अंधकार का आत्मसात करते हुए टेबल पर रखे पेपर के साथ अपने ही जीवन के अंधकार से लड़ रही थी, वह जो लिख रही थी उसका शीर्षक था "मेरे हमसफर"।
कभी सिसकती तो कभी अपने दुपट्टे के सहारे अपने आँसुओं को रोकने की भरपूर कोशिश करती, वो तो सही था की टेबल लैम्प के प्रकाश टेबल पर तो थे पर सारा कमरा अँधेरे के साये में डूबा था यही वजह थी कि उसके आँसू माँ देख नहीं पाई। एक ऐसी लड़की जो बहुत ही छोटी उम्र से परिवार के कई दायित्वों का निर्वहन करती एवं कमियों में भी जीती रही, पर निरंतर आगे बढ़ती रही। एक मध्यमवर्गीय परिवार से जुड़ी अपने मां पिता के साथ कदम बढ़ा कर चलती रही। मध्यम वर्गीय परिवार शब्द हमें यह बताने को काफी है की कमियों का साथ तो रहा ही होगा, मध्यम वर्ग का मतलब ही होता है 'कुछ होना पर बहुत कुछ नहीं होना'।
लता स्नातकोत्तर करने के बाद किसी प्राइवेट कंपनी में क्लर्क के पद पर कार्यरत थी, अपनी मेहनत से इतना कमा लेती थी कि अपनी जरूरतों के लिए मां-बाप से कुछ मांगना नहीं पड़ता था। यदा-कदा अपने पिता के जर्जर हालातों में उनका साथ भी देती थी फिर आखिर उसकी आँख क्यों भीग जाते थे? वह जो लिख रही थी उसका शीर्षक "मेरे हमसफ़र" क्यों था?
एक लड़की जब बड़ी होती है तो वह पूरे समाज की बेटी कहलाती है ऐसी आशा की जाती है कि पूरा समाज एक साथ आकर उस लड़की के पिता के भार को अपना कंधा देकर बांट लेता है, पर शायद इसी समाज के दायरे में रहकर उसे वह कंधा नहीं मिल पाया था। वह अपने जीवन के तीसरे दशक को पार करने वाली थी पर कोई उसका हाथ थाम न सका था। अड़चन कई थे, कभी उसका कम सुंदर होना, तो कभी उसकी लंबाई और कभी-कभी तो समाज की बहुत बड़ी कुरीति 'दहेज'। लता उन पन्नों पर अपनी कलम को दौड़ाती है, और लिखती है।
कहाँ हो मेरे हमसफ़र,
अब आओ देर न करो, बहुत किया अब न करो
तेरे लिए कई उपवास किये मैंने
लगभग सारे व्रत किये,
विश्वास टूटा ईश्वर से मेरा
पर तुम अब तक आ न सके।
लता इन शब्दों को लिखते हुए कई और झंझावातों में फंसती चली गई, मन ही मन यह सोचती रही कि ऐसा क्यों है? क्योंकि मेरे चेहरे पर आज के रासायनिक चमक नहीं या मेरे पिता के वस्त्रों में उतने बड़े जेब नहीं? माना कि सब कुछ नहीं मेरे पास तो क्या कोई हमसफ़र भी नहीं मेरा, क्या गलती है मेरी? मेरे पिता के पास दहेज के लिए पैसों का नहीं होना या मेरी कर्मठता में कोई कमी है? लता की आंखें भर गई सिसकियों की वजह से एक लंबी सी सांस आई और थम गई। फिर से अपने विचारों में डूब गई, आंखों को पोंछा और खिड़की की तरफ देखी, बाहर अभी भी घनघोर अंधकार था, पास के कमरे में हंसती खिलखिलाती उसकी छोटी बहनों की आवाज आती, तो फिर से वह डूब जाती सोचती कि मैं भी ऐसे ही हँसा करती थी, पर दहेज रूपी दानव ने समाज में पैर फैला कर ऐसी कितनी ही खिलखिलाहटों को अपने आगोश में ले चुका है। लता देखती थी कभी अपने पिता या मां के चेहरे पर फैली झूठी मुस्कान को, फिर सोचती, आएगा कोई जो थामेगा मेरे हाथ को, मेरे पिता को अपने पिता के समान मानेगा, मेरी माँ को माँ कह कर बुलाएगा, मार्गदर्शक बनेगा मेरे भाई के लिए, तोड़ेगा समाज की बेड़ियां जिसे दहेज कहते हैं। और आएगा बनकर "मेरा हमसफ़र"।
प्रिय पाठकों क्या हम ऐसी लाखों लताओं की खुशी नहीं बन सकते? क्या दहेज लता के सारे गुणों को निगलता ही रहेगा? क्या यह लताएं ऐसी दहेज रूपी अग्नि में झुलसती रहेंगी?
सवाल कई हैं, पर जवाब नहीं।
समाप्त
