मेरा देश
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सुबह का समय, डॉ विकास मेहता और उनके पोते डॉ रवि मेहता दोनों बाहर लॉन में बैठकर चाय पी रहे थे कि तभी सर्वे करने के लिए कोई अंदर आए। डॉ विकास मेहता ने घर में अपना, रवि का और रवि की पत्नी डॉ किरण मेहता और अपनी पत्नी सावित्री का नाम लिखवाया।
सर्वे करने वाले कर्मचारियों ने जब दूसरे कॉलम व्यवसाय के बारे में पूछा तो डॉक्टर विकास मेहता ने सावित्री के अलावा तीनों के सामने डॉक्टर लिखवाया। तभी सर्वे अधिकारियों ने पूछा क्या सावित्री जी हाउसवाइफ है? उनका प्रोफेशन? इससे पहले कि रवि कुछ बोलता दादा जी बोले जी नहीं वह हाउसवाइफ नहीं है वह हाउस लाइफ है।
उनका यह जवाब सुनकर मुस्कुराता हुआ रवि बोला दादू "यू रॉक"। बेशक तुम्हारी दादी के बिना तो मैं जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकता डॉक्टर विकास मेहता बोले। वाइफ बनके तो यह 55 साल पहले आई थी, तब गांव में मैं ही एक अकेला क्वालिफाइड डॉक्टर था। क्योंकि मेरे माता पिता की सदा से यही इच्छा रही थी कि उनका बेटा गांव में ही रहकर सब की सेवा करें तो मेरी अपॉइंटमेंट टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में होने के बावजूद भी सिर्फ तुम्हारी दादी के कारण मैं गांव छोड़कर मुंबई में न जा सका । तुम्हारी दादी मेरी वाइफ से भी ज्यादा मेरे माता पिता की बहु और गांव में जो पिताजी ने अपनी जमीन पर छोटा सा अस्पताल बनाया था उसमें लगभग हर पेशेंट की लाइफ थी।
तुम्हारी दादी डॉक्टर ना होते हुए भी ह्यूमन साइकोलॉजी इतनी अच्छी तरह से समझती थी कि उसे घर में सबके बोलने से पहले ही पता चल जाता था कि किसको क्या चाहिए? किसका कैसा मूड है उसे सबका पता था। हालांकि तुम्हारे पिता ने जब मुंबई में अपना नर्सिंग होम बनाया तो उनकी बहुत इच्छा थी कि हम लोग भी मैं और तुम्हारी दादी भी मुंबई जा कर रहे। मुझे पता है कि तुम्हारे पिता जो कि हमारे इकलौते बेटे थे , उनके बिना वह बेहद उदास रहती थी। वह अपने बेटे के साथ मुंबई में ही रहना चाहती थी लेकिन क्योंकि मेरी मां( यानी कि तुम्हारी परदादी) गांव से शहर में नहीं जाना चाहती थी । सावित्री उन्हें भी अकेले नहीं छोड़ सकती थी, उसको अपने कर्तव्यों का पूरी तरह से भान था। मेरी मां का ख्याल करने के कारण जब तक मेरी मां जीवित रही सावित्री उन्हें छोड़कर कभी मुंबई भी नहीं गई।
गांव में भले ही और डॉक्टर आ गए हो लेकिन भीड़ हमारे ही अस्पताल में लगती थी। मेरी मां की मृत्यु होने के बाद सावित्री ने ही पूरा घर और मुझे वैसे ही संभाला जैसे एक मां अपने बच्चे को संभालती है।
तुम्हारी मम्मी पापा के विमान दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद मैं तो बिल्कुल ही टूट गया था। मुझे तो चारों ओर अंधेरा ही दिख रहा था। तुम भी तो अपने मम्मी पापा के बिना कितने अकेले पड़ गए थे। तब तुम 11वीं क्लास में ही तो थे। तुम्हारी दादी ने तुम्हें भी कितने प्यार से संभाला याद नहीं है क्या तुम्हें? हां दादू, कैसे भूल सकता हूं? दादी रात रात भर मेरे साथ जगतीं थी। उनकी दी हुई हिम्मत के कारण ही तो आज मैं सफल डॉक्टर बन सका वरना ग्यारहवीं के बाद मैं तो डिप्रेशन के कारण पढ़ाई छोड़ ही चुका होता। आप दोनों के मुंबई आने के कारण और पापा के नर्सिंग होम को संभालने के कारण ही आज हम अपनी नर्सिंग होम को इतने बड़े अस्पताल में परिवर्तित कर पाए हैं।
सर्वे वाले तो सर्वे कर के चले गए लेकिन डॉ विकास और उनके पोते डॉ रवि दादी की और भी बहुत सी बातें याद कर रहे थे। दोनों ही पुरानी यादों में खोए हुए थे।
भावावेश में रवि ने दादू के पैर छू लिए और कहा दादू तुम यह सब बता कर क्या यही कहना चाहते हो कि मुझे विदेश में डॉक्टर बनने के लिए नहीं जाना चाहिए? असल में दादू मैं भी अपने पापा के नर्सिंग होम को यूं ही छोड़ कर नहीं जाना चाहता लेकिन किरण की यही इच्छा है। रवि के चेहरे पर उदासी स्पष्ट थी। नहीं नहीं ,ऐसा कुछ नहीं बेटा। तुम आगे बढ़ो हमें बहुत खुशी है। तुम्हारे पिता का नर्सिंग होम चलाना मुझे व्यस्तता भी देगा और खुशी भी।
शायद दादू की आंखों में भी नमी आ गई थी। तभी किरण जो जाने कब से वहां खड़ी होकर उनकी बातें सुन रही थी, सामने आई और इतने में ही सावित्री जी भी लौन में चाय पीने के लिए उनके साथ ही बैठ गईं।
किरण ने चाय पीते हुए एक लिफाफा रवि की ओर बढ़ाते हुए कहा रवि इसे फाड़ दो। मैं भी तुम्हारी दादी की तरह हाउसवाइफ नहीं हाउस लाइफ बनना चाहूंगी। हम अपने इसी अस्पताल को और बड़ा करेंगे। हम इस घर की परंपरा को ही आगे बढ़ाएंगे। हम दोनों विदेश नहीं जाएंगे। मैं चाहती हूं तुम्हारे मन में भी मेरे लिए उतना ही प्यार और सम्मान हो जो दादू के मन में दादी के लिए है।
यह परंपराएं और इतना प्यार हम केवल अपने देश में ही पा सकते हैं। हम भी अपने ही देश में अपनों के साथ रहकर अपनों की ही सेवा करेंगे।
सावित्री जी हैरान सी कुछ भी ना समझते हुए उनकी ओर देख रही थी। रवि और मेहता जी के चेहरे पर खुशी स्पष्ट थी। तभी रवि बोला दादी तुम कह रही थी ना कि एक बार हम गांव भी जाएंगे तो हम सब वीकेंड पर गांव जाकर अपना घर और अस्पताल भी देखेंगे कि रमन और चमन भैया उस अस्पताल को कैसे चला रहे हैं। हां मम्मी, मैं तो पहली बार ही गांव जाकर देखूंगी, किरण ने कहा और सब मुस्कुराहट उठे। गांव जाने की सुनकर सावित्री जी की खुशी तो संभाले नहीं संभल रही थी।
पाठकगण आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि आज मुंबई में उनका अस्पताल काफी प्रतिष्ठित अस्पतालों में से है लेकिन अब उन्होंने अपने अस्पताल का नाम मेहता नर्सिंग होम से बदलकर जीवन अस्पताल रख दिया है।
