मेंहदी
मेंहदी
असमय ही पति के गुजर जाने से मुनिया की मानसिक और आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी थी। पति की आयु लम्बी हो इसलिए कोई भी ऐसा व्रत न था, जो मुनिया न करती थी। फिर भी ईश्वर ने असमय ही मुनिया के पति को अपने पास बुला लिया। मुनिया की पीड़ा अकथनीय थी। खुद को संभाल पाना बहुत मुश्किल था उसके लिए। यादों की पोटली में ऐसी कई यादें थीं, जो मुनिया के दिमाग में बार-बार उसे उस पल को याद करने के लिए मजबूर कर रही थी।नववर्ष के स्वागत में एक दिन शेष था। सभी औरतें सज धजकर हाथों में मेंहदी लगाकर नववर्ष के स्वागत की तैयारी कर रही थी। तभी मुनिया की नजर उनमें से एक औरत के हाथों में लगी मेंहदी पर पड़ी। मुनिया भी अपने पति के नाम की मेंहदी अपने हाथों में लगाना चाहती थी। पर उसकी चाहत सामाजिक जंजीरों से कैद थी। एक विधवा औरत को मेंहदी लगाना सामाजिक नियमों के खिलाफ था। मुनिया की माँ मुनिया के दर्द को भलीभांति समझती थी। आखिर एक माँ ही तो अपनी संतान की पीड़ा समझ सकती है। सामाजिक बंधनों की परवाह किए बिना बेटी की मायूसी दूर करने के लिए मुनिया की माँ ने मुनिया को अपने पास बुलाकर उसके हाथों में मेंहदी लगा दी। एक पल के लिए मानो मुनिया के चेहरे पर खुशी की मुस्कान सहसा वापस आ गई।अब, मुनिया की माँ के नयन सजल हो गए।
