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Madhu Vashishta

Inspirational

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Madhu Vashishta

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माताजी का आत्मविश्वास

माताजी का आत्मविश्वास

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  साथ वाले घर के बाबूजी और माताजी जब पार्क में घूमने के लिए दोनों समय निकलते थे तो अनायास ही लोगों के मुंह से निकल जाता था, वाह !क्या जोड़ी है। इस उम्र में भी एक्सरसाइज करके दोनों ने अपने आप को चुस्त-दुरुस्त बना रखा था। बाबूजी इनकम टैक्स ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनके दोनों पुत्र और पुत्री की शादी हो चुकी थी। पुत्री का घर भी ज्यादा दूर नहीं था। अक्सर बाबूजी और माताजी घर के बाहर अपने पोते पोतियों, नाते नातियों के साथ घर के बाहर बरामदे में कुर्सी बिछाए हंसते हुए दिखते थे। उनका घर वास्तव में सबके लिए एक उदाहरण स्वरूप ही था क्योंकि इतना बड़ा संयुक्त परिवार तो शायद उन्हीं का ही था। दोनों बहुएं बेटे और उनके बच्चे अक्सर साथ ही खेलते थे।

           उस दिन सुबह उठकर जब पता चला कि बाबूजी को रात में ही हार्ट अटैक आ गया और वह इस दुनिया में नहीं रहे, तो सच मानो एक्सरसाइज और तंदुरुस्ती के नियमों पर से तो विश्वास ही उठ गया। ना तो उन्हें कोई टेंशन थी, ना ही वह मोटे , सादा खाना खाते थे इसके बावजूद भी ----! क्रिया वाले दिन तो कोई भी माता जी को देखकर तो पहचान ही नहीं सकता था, उनकी काले बाल सफेद में परिवर्तित हो चुके थे और चेहरे पर झुर्रियां अचानक से----? प्रत्येक के बीच में बोलने वाली और हर समय हंसने वाली माता जी दूर से सबको देखकर अपने में खोई हुई हाथ जोड़ती हुई कुछ अलग ही लग रही थी।

    

       यह तो बाद में ही पता पड़ा कि उस घर में दो रसोईयां थी और माता जी छोटे बेटे के साथ रहती थी। बाबूजी की मृत्यु के उपरांत बड़े बेटे को बाबूजी का मार्केट के पास बना हुआ एक डुप्लेक्स फ्लैट दे दिया गया और क्योंकि माताजी छोटे बेटे के साथ ही रहती थी इसलिए उसके नाम पर शायद वही घर हो गया था।

            माताजी का घर आज फिर से चर्चा का विषय बन गया वही जो एक समय संयुक्त परिवार की वजह से चर्चा का विषय था आज घर से जोर-जोर से बोलने की आवाज आ रही थी, समस्या जो समझ में आई वह केवल यह थी कि माता जी के छोटे बेटे की सदा से ही अपना अलग से फ्लैट में रहने की इच्छा थी और अनचाहे ही उसे माता जी के साथ इस पुराने घर में रहना पड़ा। और कुछ ऐसा ही हाल बड़े बेटे का था, क्योंकि उसका बचपन भी उसी घर में बीता था और अब उसके पुत्र भी बड़े हो रहे थे तो वह फ्लैट में रहना बिल्कुल नहीं चाहता था। शायद बाबू जी ने अपनी छोटे बेटे के नाम यही घर कर दिया था। ऐसा उन्होंने माताजी के कारण किया होगा, वह जानते थे की माताजी छोटे बेटे के साथ ही रहती हैं। इस बंटवारे में दोनों की नापसंदगी का पूरा असर माताजी पर पड़ा। छोटी बहू अक्सर यही कह देती थी "अगर आप हमारे साथ ना रह रहे होते तो हम उस फ्लैट में आराम से रह रहे होते। अब तो बाबूजी नहीं है और वह फ्लैट भी तो आप लोगों का ही है, क्या आप कभी भी वहां जाकर के नहीं रह सकती?" अभी तक केवल संकेतों में कही गई यह बात बेटी के सामने चिल्ला चिल्ला कर भी कही जा चुकी थी। माता जी को अपने ही घर में खाना खाते हुए, रहते हुए ,बेहद पराया सा महसूस हो रहा था। जिस दिन भी बेटी और उसके बच्चे मिलने आ जाते, छोटी बहू पर तो मानो दुखों का पहाड़ ही फूट पड़ता था और साथ में इस बात का गुस्सा भी बढ़ जाता था कि माताजी क्या पूरी जिंदगी सिर्फ उसके ही साथ रहेंगे और उनके आए गए मेहमान वही निभाएगी क्या?फ्लैट में बड़ी भाभी मजे से रहेंगी।

        तंग आकर माताजी एक दिन बड़े बेटे के पास फ्लैट में भी चली गई। वहां जाने के बाद भी समस्या जस की तस ही थी। ननद के आते ही बड़ी भाभी जो छूट जाती थी कि आपके पापा ने यह नहीं सोचा कि मेरे दोनों बेटे इस फ्लैट में शादी के बाद कैसे रह पाएंगे। छोटी के तो फिर एक बेटा और एक बेटी है उसकी बेटी के जाने के बाद वह तो आराम से यहां पर रह सकती थी। उसके बाद में माताजी भी यहीं बसने की सोचेंगे तो कितनी मुश्किल हो जाएगी।

            माता जी को रह रह कर बाबूजी की पुरानी बातों में से यह बात बेहद याद आ रही थी जब एक दिन बाबूजी ने हंसते हुए माताजी को बताया था कि उनके दोस्त के घर में बंटवारे पर बेटों में झगड़ा हो रहा है। उनका हरियाणवी दोस्त उन्हें अपनी भाषा में यही समझा रहा था कि बच्चों की तो यही इच्छा होती है कि ए बुड्ढे ,जो भी तेरे पास में है धर जा ,और फिर मर जा। सुनकर के दोनों इतना हंसे थे कि बस पूछो ही मत। लेकिन-----। बाबूजी का ख्याल आते ही माताजी को याद आया बाबूजी माता जी को कभी भी कमतर और बिचारी हालत में देख ही नहीं सकते थे। आखिर तक भी माताजी ने हमेशा लेटेस्ट सूट ही बनवाए थे, मोटापा अपने पर कभी हावी नहीं होने दिया। मुस्कुराहट और आत्मविश्वास की तो उनमें कभी कमी थी ही नहीं। वह अनपढ़ भी नहीं थी। पढ़ना तो उनका शौक था। वह क्यों उलझ के रह गईं, उन्हें लगा बाबूजी आज भी उसके साथ हैं और उन्हें माता जी को इस बिचारगी की हालत में देखकर बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा। अगर वह इस उम्र में भी सिर्फ बच्चों के द्वारा रोटी दिए जाने का इंतजार करेगी तो लानत है उन पर। बाबूजी ने अपने होते हुए उसे कभी किसी के सामने झुकने नहीं दिया। अपनी कोई जिम्मेदारी उन्होंने अधूरी नहीं छोड़ी। उनकी बेटी भी बहुत अच्छा पढ़ कर सरकारी स्कूल में टीचर लगी हुई थी। उनके लिए भी बाबूजी की पेंशन आ रही थी। हॉस्पिटल में भी उनका इलाज फ्री था। बाबूजी का इतना समय का साथ क्या माताजी में कोई आत्मविश्वास ना भर सका। जाने कहां से माताजी में इतनी शक्ति आई। उन्होंने अपने बड़े बेटे से कहा "मैं जब तक चाहूंगी इस फ्लैट में रहूंगी और क्योंकि इस डुप्लेक्स में एक कमरा ऊपर भी है, तुम लोगों की प्राइवेसी और शांति भंग भी नहीं होगी मेरा अपना कमरा ऊपर रहेगा, अपना खाना भी मैं अलग ही बनाऊंगी। तुम लोगों के द्वारा बनाया हुआ खाना खा कर के ही मैं मानसिक रूप से इतनी कमजोर हो रही हूं। अगर तुम्हें प्राइवेसी चाहिए तो प्राइवेसी मुझे भी चाहिए।"

  शायद उनके कहने के ढंग में ही कुछ ऐसा होगा कि कोई भी उन्हें कुछ कह ना सका बस सिर्फ इतना हुआ कि उनका पलंग और थोड़ा सा सामान ऊपर शिफ्ट हो गया था। ऐसे ही एक दिन माताजी ने जब अपने पुराने घर में जाने की सोचा तो अपना ताला लगा कर उन्होंने उस घर में भी अपना खाना अलग ही बनाने की पेशकश करी क्योंकि उनका ख्याल था कि जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन। उन्हें किसी के भी द्वारा खिलाया गया खाना मंजूर नहीं था। वैसे भी उन्हें याद है कि बाबूजी अक्सर शादियों में भी खाना अपने घर से ही खा कर जाते थे, क्योंकि बाबूजी का यही कहना था कि थाली में रखा हुआ भोजन हमारा ही हिस्सा होता है, क्योंकि उसे खाने से ही हमारे को शक्ति और संतुष्टि मिलती है। जाने खाना किस ने किस भाव से बनाया है। वह माताजी को यही कहते थे कि तुम्हारे हाथ का दिया हुआ खाना मुझे प्रसाद के जैसे लगता है। माताजी अपनी शक्तियों को कहां भूल गई थी। अब अकेले रहते हुए माताजी सुबह शाम वैसे ही घूमने जाती थी बाकि समय अपने कमरे में पूजा-पाठ या कुछ भी करती थी। अकेले रहते हुए भी उन्हें हमेशा बाबूजी अपने साथ ही प्रतीत होते थे। शायद यही कारण था कि उन्हें कोई परेशानी आई भी नहीं। यूं भी बहु, पोते और पोतियां अब ना तो माताजी से कुछ बुरा बोलते थे और ना ही माताजी उन्हें या किसी से भी कुछ कहतीं थी। वह जहां चाहती थी वहां ही रहतीं थीं।

     उस दिन जब उनकी बेटी ने आकर कहा "बड़े भैया अपने बेटे की शादी करना चाह रहे हैं ,तो उन्होंने कहलवाया है कि मम्मी ऊपर का कमरा खाली कर दे, जब भी कभी मम्मी फ्लैट में रहा करेंगे तो नीचे चुन्नु के साथ ही रह लेंगी। वैसे भी कुछ समय बाद हो सकता है चुन्नू को हॉस्टल जाना पड़े तब तो उनका कमरा अलग वहां भी हो ही जाएगा।" बेटी ने उन्हें समझाया भी कि मम्मी अब दिनों दिन आपकी उम्र भी ढल ही रही है, क्या फायदा भाभियों से वैर बढ़ाने का , आखिर आपका भी करना तो भाभियों को ही पड़ेगा।

        माताजी थोड़ी देर को मौन हो गई फिर बोली, "आगे का मुझे नहीं पता, तुम्हारे पापा आज भी मेरे साथ हैं, और तुम्हारे पापा ने मेरी और अपने बच्चों की जिम्मेदारी अच्छे से निभाई। अगर बच्चों को अपने बेटे बहुओं का ख्याल रखना है तो वह अपने बच्चों का इंतजाम खुद ही करें। मैं किसी के ऊपर निर्भर नहीं हूं, अगर तुम्हें कभी लगे कि मैं कुछ भी कर पाने में असमर्थ हो रही हूं तो तुम्हारे बाबू जी द्वारा बैंक में रखे हुए मेरे पैसों से मेरे लिए कोई अटेंडेंट रख देना और तुमसे जितना हो सके मेरा ख्याल कर लेना बाकि मैंने अपने बैंक में तुझे अपना नॉमिनी बनाया है। तुम्हारे बाबू जी ने अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाई है, अपना ख्याल मैं भी कर ही रही हूं, और भाइयों को भी जाकर तुम कह देना की अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी वह भी अच्छे से खुद ही निभाएं।" यह कहते हुए माताजी का चेहरा आत्मविश्वास से जगमगा उठा। बाबूजी की फोटो की ओर देखकर वह ऐसे ही मुस्कुरा रही थी, जैसे एक दूसरे की बात को सहमति देते हुए वे दोनों पहले मुस्कुराते थे। बिटिया भी मुस्कुरा रही थी और मां उसके खाने के लिए कुछ सामान फ्रिज में से निकाल रही थी।

          

             


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