Sadhna Singh

Romance


4.7  

Sadhna Singh

Romance


लड़कीबाज़

लड़कीबाज़

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..... अरे जनाब.... मैं जब 9वी में था तो मोहल्ले का जबरदस्त छोरा हुआ करता था। घर में अम्मा थी और दो बहने। बड़ी जीजी अपनी सहेलियों में व्यस्त रहती थी और छोटी बहना अपने खेल खिलौनों में। सुबह उठकर अम्मा हम तीनो भाई बहनों का नाश्ता और दोपहर का खाना बनाकर अपनी ड्यूटी पर चली जाती थी। मैं जब 8 साल का था तो बाबूजी को दिल अघात से मौत हो गई थी। उनकी जगह पर सरकार ने अम्मा को नौकरी दे दी थी। मैं उस 8 साल की उम्र में पूरे मोहल्ले में कटी पतंग की तरह यहां वहां उड़ता रहता। कभी किसी का दही ला रहा हूं, कभी कोई धनिया मंगा रहा है, तो कभी किसी के गेहूं साइकिल पर रखकर पिसवाने जा रहा हूं,कभी सड़क पर दूसरे लड़कों के साथ क्रिकेट खेल रहा हूं, कभी किसी की छत पर पतंग उड़ा रहा हूं। बस पढ़ाई लिखाई से मेरा कोई मतलब नहीं था। दोपहर होते ही मेरे साथ खेलने वाले दूसरे लड़कों को उनके माता-पिता घर में पढ़ने के लिए बुला लेते पर मैं सड़क पर अकेला ही गेंद खेलता रहता या अपने दरवाजे के बाहर बने स्लिप पर बैठा रहता। गर्मियों में तो अम्मा सुबह सुबह स्कूल भेज देती पर सर्दियों में तो अम्मा स्कूल के टाइम से पहले ही अपने ऑफिस चली जाती ,तो स्कूल जाना भी बहुत ही कम होता।

जैसे-जैसे मै बड़ा होता गया आवारागर्दी और बढ़ गई। फिर मैंने महसूस किया कि मेरे साथ खेलने वाले लड़कों की संख्या दिन-ब-दिन गिरती जा रही है। मैं जैसे ही किसी लड़के को खेलने के लिए बुलाता तो उसकी मम्मी कहती ....." पढ़ रहा है, नहीं आएगा।"... एक दिन तो हद हो गई जब एक लड़के के पापा ने मुझसे कहा ...."तुम यहां से जाओ, मेरा बेटा तुम्हारे साथ नहीं खेलेगा.... उसे पढ़ लिखकर कुछ बनना है.... तुम्हारी तरह आवारागर्दी नहीं करनी है।" मुझे बहुत गुस्सा आया पर पता नहीं क्यों मैं उनसे कुछ कह नहीं पाया। अब मेरे साथ खेलने के लिए तीन लड़के थे, जो कि दूसरे मोहल्ले के थे। मैं फिर सब कुछ भूल कर अपनी मौज मस्ती में व्यस्त हो गया और दूसरे मोहल्ले के लड़कों के साथ खेलने लगा। लेकिन फिर भी मैं किसी को आटा पिसाने, दही लाने, बिस्किट लाने, सब्जी लाने जैसे छोटे-मोटे कामों के लिए मना नहीं करता था। जबकि मुझे मालूम था यह सभी लोग मुझे आवारा समझते हैं और मेरे साथ अपने बच्चों को खेलने भी नहीं देते हैं। लेकिन मेरे पास यह सब मथने का वक्त नहीं था, मैं तो अपने क्रियाकलापों में बहुत मस्त और खुश था।


  गिरते पड़ते मैं नौवीं कक्षा में आ गया और तब तक समझ आ गया था की लड़कीबाजी भी मजेदार चीज होती है। अब मैं सोचने लगा कि मैं मोहल्ले की किस लड़की को पटाऊं। लेकिन मोहल्ले की एक भी लड़की मेरी तरफ देखती तक ना थी, मेरी इमेज ही इतनी खराब थी। फिर भी एक दो बार कोशिश की तो बड़ी झाड़ खाई। फिर लगा कि इस मोहल्ले में दाल नहीं गलेगी किसी और मोहल्ले में ट्राई करना पड़ेगा। इसलिए दूसरे मोहल्लों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। कहीं लड़की खूबसूरत ना लगी,तो कहीं लड़की का बाप या भाई दबंग लगा। मेरी तलाश जारी थी कि अचानक पता लगा कि मेरे घर से चौथा मकान बिक गया है और उसमें एक नया परिवार रहने आ गया है। छोटा सा परिवार था मां, पिता, एक लड़की और एक छोटा लड़का। पिता बहुत सीधे-साधे थे, मां बिल्कुल घरेलू और बेटी बहुत खूबसूरत थी। मेरी तो बांछे खिल गई, वह लड़की मेरी हमउम्र थी, मैंने सोचा इसे पटाने के लिए बस सारी कोशिशें करूंगा। जासूसी सूत्रों से पता लगाया कि उसका नाम अविका है और वह नवीं में पढ़ती हैं। मैंने उसके ऊपर निगाह रखनी शुरू कर दी तो मुझे पता चला कि वह सुबह और शाम अपने छोटे से पोमेरियन कुत्ते को घुमाने के लिए घर से बाहर लाती है। अब तो मैं भी सफेद कुर्ता पजामा या कोई भी डीसेंट सी पैंट शर्ट पहनकर, बालों को शरीफों की तरह संवार कर, अपने दूसरे मोहल्ले के दोस्त का देसी कुत्ता टहलाने लगा। मैंने देखा वह अपने कुत्ते से बात करते हुई चलती थी बीच-बीच पर उसे गुड बॉय, गुड बॉय भी बोलती थी। बस मैंने भी उस देसी कुत्ते को जिसकी एक आंख काली थी ,एक कान गिरा हुआ था को वेलडन हैंडसम , वेलडन हैंडसम कहना शुरू कर दिया। 2 हफ्ते बीत गए थे पर ना वह मेरी तरफ देखती थी और ना उस बदसूरत कुत्ते की तरफ।..... एक दिन मैंने थोड़ा सा प्रयास किया और उससे सभ्यता से बोला....." आपका कुत्ता बहुत प्यारा है, क्या नाम है इसका।" उम्मीद तो थी कि वह मुस्कुराकर नाम बताएगी, पर हुआ इसका उल्टा। वह तुनक कर बोली.... "तुमसे मतलब..??." .... अरे यार, सारे किए कराए पर पानी फिर गया, इतने दिन तक इस बदसूरत कुत्ते को घुमाना, शालीनता का नाटक करना सब बेकार गया। अगले दिन से मैंने कुत्ता टहलाना छोड़ दिया। उसके झिड़कने से ऐसा अपमान महसूस हुआ कि मैं 2 दिन तक घर से बाहर ही नहीं निकला। मैं दांत पीस पीस कर खुद से खुद ही बात करता....." घमंडी कहीं की... समझती क्या है खुद को....। अंदर से मन कहता वह तो बड़ी सुंदर है, लेकिन पुरुष ईगो फिर से सामने खड़ा हो जाता और कहता.... दो कौड़ी की औकात है इसकी... हिम्मत कैसे हो गई मुझे झिड़कने की।" अम्मा भी बोली.... "क्या बात है तू घर में.. वह भी पूरा पूरा दिन...!!! तबीयत तो ठीक है।".... "हां ठीक है" मैं रुखाई से जवाब देता। मैं अपने गुट का सबसे हैंडसम लड़का था और... और इसने मुझे दुत्कार दिया,.. कई बार मन किया कि जाकर दो झापड़ रसीद कर दूं। फिर लगता बात फैल गई तो खामखाह इज्जत का फालूदा हो जाएगा।

अगले महीने होली थी, मैं दोस्तों के संग रंगा पुता एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले घूम रहा था और खूब मस्त था। अचानक मैंने देखा उसकी मम्मी घर के दरवाजे पर खड़ी हैं। मैं वहां पहुंचा और हैप्पी होली आंटी जी..... बोलते हुए उनके चेहरे पर रंग डाल दिया। इत्तेफाक से रंग उनकी आंख में चला गया और दर्द के मारे पर बुरी तरह बेचैन हो गई। अविका ने जैसे ही देखा तो वह भागती हुई आई और बोली.....

" तुम्हें तमीज नहीं है... क्या समझते हो अपने आपको??... कहीं से अक्ल खरीद लो अपने लिए... रंग कहीं आंखों में डाला जाता है??".. मैंने तो मुंह पर रंग डाला था, मैंने भी तैश में कहा। अगर मम्मी की आंख में कुछ हुआ तो तुम्हारी पुलिस कंप्लेंट करूंगी..... मैं थोड़ा सा डर गया पर फिर भी चलते चलते बोला... "हां हां कर देना ,देख लूंगा तुम सबको।"

   उस दिन के बाद मेरी कोशिश रहती कि उसके घर के सामने से ना निकलू ,भले ही अपने काम के लिए रास्ता लंबा लेना पड़े। उसकी धमकी मेरे कानों में गूंजती रहती थी। एक रात मै सो रहा था कि अचानक रात के 3:00 बजे मेरी आंख खुली ,मैं उठ कर बैठ गया, मुझे लगा अविका मेरे सामने खड़ी होकर कह रही है.... तुम्हें तमीज नहीं ..... तुम्हारी पुलिस कंप्लेंट करूंगी। ऐसा पहली बार कुछ हुआ था जो मैं भूल नहीं पा रहा था। अविका मेरे दिलो-दिमाग पर छा गई थी ।मैं कुछ देर यूं ही बैठा रहा, पानी पिया ,फिर खड़ा हो गया और उस रात मैंने एक कसम खाई ....अब इस घमंडी लड़की को कुछ करके दिखाऊंगा, इसे लगता है ...कि मैं कुछ नहीं हूं तो अब यह मेरा 10वीं का रिजल्ट देखेगी और बस उस रात जो सूरज निकला उसने मेरे जीवन की दिशा बदल दी ।कल तक आवारागर्दी करने वाला , किताबों की तरफ ना देखने वाला लड़का, किताबों का दोस्त बन चुका था। मोहल्ले के लोग जब मुझे मिलते तो पूछते ...और भाई कहां हो ???...मैं बस मुस्कुरा कर रह जाता ।साल भर बाद कड़ी मेहनत के उपरांत मैंने दसवीं की परीक्षा 94% के साथ पास की ।रिजल्ट वाले दिन मुझे लगा अविका के पास जाऊं और कहूं ..!!!!देखो यह हूं मैं ....पर लगा नहीं यह तो शुरुआत है ,मुझे तो अभी कुछ और करके दिखाना है ।बस फिर मैं अपने 12वीं के रिजल्ट के लिए मेहनत करने लगा, पहले मैं हर वक्त घूम फिर कर टाइम पास किया करता था। पर आज मूड फ्रेश करने के लिए भी मैं मोहल्ले के दो बच्चे पढ़ाने लगा। मेरा 12वीं का रिजल्ट 92% था ।उस दिन फिर मुझे लगा अविका के पास जाऊं और कहूं... देखो यह हूं मैं!!!... फिर लगा नहीं अभी नहीं.....मैंने ग्रेजुएशन शुरू किया। जीवन का उद्देश्य अभी भी वही था कि अविका को मुंह तोड़ जवाब देना है ,उसे कुछ करके दिखाना है । ग्रेजुएशन के साथ-साथ मैंने बैंकिंग की तैयारी भी शुरू कर दी थी ।मैं अब पढ़ाई में पूरी तरह डूब चुका था। इधर मेरा ग्रेजुएशन हुआ ,उधर मेरा बैंक क्लेरिकल में सिलेक्शन हो गया। मैंने सोचा आज अविका को कहूंगा ...देखो यह हूं मैं ....पर रुक गया ।यह तो क्लर्क का पोस्ट है ,कम से कम पी ओ क्लियर करके बताऊंगा ।

मेरी पहली पोस्टिंग जयपुर आई थी, मेरे घर से बहुत दूर, दूसरे प्रदेश में ।मैं वहां बहुत मेहनत से काम करता था।सारे बैंक कर्मी मुझसे बहुत लगाव रखते थे ,एक तो मैं सबसे छोटा था, दूसरे मेहनती भी था। शाम को अपने कमरे में पहुंचकर मैं पी ओ एग्जाम के लिए पढ़ता था। कभी-कभी छुट्टियों में घर जाता और अविका दिखती तो सोचता... अभी कुछ दिन और रुको ...मैं अधिकारी बनकर दिखाऊंगा ।साल भर की कड़ी मेहनत से मैंने पी ओ की परीक्षा दी और परिणाम का इंतजार करने लगा। 4 महीने बाद रिजल्ट आया तो मैं अति प्रसन्न था ,ऐसा लग रहा था की हवा के घोड़े पर सवार हूं। मैं सेलेक्ट था। मैं जल्दी-जल्दी अपने घर जाना चाहता था ,मुझे अब अविका से मिलना था और उसे बताना था ....यह हूं मैं ....।मैंने अपनी हफ्ते भर की छुट्टियां पास करवा ली थी और ट्रेन में भी सीट बुक कर दी थी।मैं अपनी बर्थ पर लेट गया, पर नींद थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी। मैं अविका के बारे में सोचने लगा।

....वह कितनी सुंदर है और स्ट्रॉन्ग भी,मै कितने सालो से उससे बात करना चाहता था।तभी मुझे लगा जैसे वह मेरे सामने वाली बर्थ पर आकर लेटी है,अब मैं बात करने का मौका नहीं गवांना चाहता था..." क्या आज मैं तुमसे बात कर सकता हूं."...."क्यों नहीं".... "तुम्हें नीचा दिखाने की ललक ने मुझे आज अधिकारी बना दिया"...."क्या??"वह चौंक पड़ी...... "मैं पहले ऐसा ही सोचता था .....और अब...... मैं कितना गलत था ,असल में तुमसे बात करने की चाह मुझे यहां तक लाई है,तुम मेरी प्रेरणा हो, तुमने मेरे जीवन में रोशनी भरी, एक नई दिशा दी...... अच्छाs..s.......आज मैं कह सकता हूं मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं, इसीलिए एक पल के लिए भी मैं तुम्हें अपने दिलो दिमाग से दूर नहीं कर पाया,आज अपने पूरे समर्पण के साथ तुमसे तुम्हारा प्रेम मांगना चाहता हूं।"........ तभी ट्रेन की सीटी की आवाज़ से मेरी आंख खुली,ट्रेन धीरे धीरे रुक रही थी।मेरा स्टेशन आ गया था मैं लपक कर उतरा और बाहर आकर अपने घर के लिए ऑटो रिक्शा किया। घर पहुंचकर मैं जल्दी जल्दी नहा धोकर तैयार होने लगा,...अम्मा बोली , "कहां की जल्दी है,नाश्ता तो कर"....."नहीं नहीं अम्मा पहले मैं अविका के घर जाऊंगा"....."लेकिन वहां कोई नहीं हैं"....."क्यों" ,मैं चौंका।...अरे अविका की शादी के लिए सब कानपुर गए है,उसकी शादी वहीं से कर रहें हैं.....अम्मा नाश्ते की प्लेट टेबल पर रखकर जाते जाते बोली।


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