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विशाखा शर्मा 'ख़ाक'

Drama Inspirational


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विशाखा शर्मा 'ख़ाक'

Drama Inspirational


कर्मन की गति न्यारी

कर्मन की गति न्यारी

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विषादमय मुख से सर्वसुख चतुर्वेदी जीर्ण से द्वार की गली हुई अर्गला को हटा घर के भीतर प्रविष्ट हुआ l सुदेवी और सब बाल गोपाल भाग कर उसके पास आये l सर्वसुख के पास कुछ नहीं था आज पहली बार ही तो भिक्षा मांगने गया था दो मुट्ठी आटे को छोड़ कुछ न मिला l निहालसिंह ने तो झिड़क कर भगा दिया था l


सर्वसुख स्वयं को सुदामा समझ रहा था लेकिन सुदेवी तो और भी दुखी थी" द्वारिका जाहु जु द्वारिका जाहू की जक वो कैसे लगाती, उसने तो हृदय को पाषाण बना कर अपने पति के द्वारा कही 'सुदेवी हम ब्राह्मण है भिक्षा माँगना कोई दोष ही नहीं है' यह बात मानी थी l

अपने आँसू छुपा कर बच्चों को सुदेवी ने भीतर भेज दिया पति को सांत्वना देने को हुई ही थी कि भीतर से माई ने आवाज़ लगाई कोई पानी ही पिला जाओ और घर की अमूल्य और मात्र एक संपत्ति पानी को लेकर संकोच से अपनी सास के पास गई l

सब पानी ही पीकर रहे


 रात हुई, सब बच्चे भूखे थे बीच बीच में कुनमुना उठते सुदेवी उन्हें थपकी दे दे सुला देती पर सोते भी कैसे आखिर 

"आगि बड़वागि से बड़ी है आगि पेट की "

सुदेवी और सर्वसुख की आँखों से नींद कोसों दूर थी l

सर्वसुख अगर थोड़ा सन्तुष्ट था तो इसलिए कि पिता नहीं है उन्होंने आज उसे भिक्षा माँगते न देखा..

तारों से मूक संवाद करते हुए सर्वसुख अतीत में खो गया...

पिता अपने भाइयों से व सर्वसुख की दादी से कह रहे हैं "नहीं चाहिए मुझे किसी हत्या पर मिली जमीन! मैं भीख माँग खाऊंगा ब्राह्मणों को तो कटोरा दे भेजा है विधाता ने मैं बेईमानी के पैसे पर जीवित रहने के बजाय भूख से मरजाने में ज्यादा गौरव अनुभव करूंगा" !

सर्वसुख को याद आया कि गाँव का एक भांजा सोमदेव जिसके हिस्से में सर्वसुख के गाँव की आधी से ज्यादा जमीन थी उसके नाना जो कभी सर्वसुख के गाँव के स्वामी हुआ करते थे ,ने अपनी इकलौती पुत्री की इकलौती संतान(सोमदेव) के नाम वो जमीन कर दी थी पर दुर्भाग्य से हैजे की बीमारी सब को लील गई बचा तो केवल सोमदेव l 

वो यदा कदा अपनी जमीन देखने आया करता था, गाँव के ब्राह्मण उसका बहुत लाड करते थे पर केवल दिखावे के लिए.... 

एक बार किसी ने सोमदेव के लिए एक रिश्ता बताया तो अपने विवाह के बारे में सोच कर वो पहले अपने ननिहाल(सर्वसुख के गाँव) आया जमीन को देखने व वहाँ के पटवारी से पुख़्ता कागज़ात लेजाने आया था l

गाँव में उसका बड़ा स्वागत किया, गाँव के लोग उसके साथ अच्छा व्यवहार करते थे उसे नदी पर घुमाने ले जाते थे l

सब जानते थे कि सोमदेव तैरना नहीं जानता जब वह सिखाने को कहता तो सब कह देते सीख जाना समय आने पर और वह मान जाता l

सोमदेव वापस जाने को था पटवारी ने भी सब कागजात दे दिए जब वह जाने लगा तो गाँव के कुछ लोगों ने तय किया कि इसे आधे रास्ते तक छोड़ कर आते हैं l

वे सब साथ गए रास्ते में एक जगह वो भोजन करने के लिए कुए के पास रुके सोमदेव ने अपने थैले से अपना लोटा निकाला और कुए की जगत पर सदा पड़ी रहने वाली रस्सी को लोटे में फँसाया और पानी निकालने के लिए कुएँ में डाला कि एक जोड़ दार धक्के ने लोटे के साथ सोमदेव को भी कुएँ में फेंक दिया l

सोमदेव मर गया..और गाँव के उन बेईमान लोगों के संगठन में पटवारी का भी बराबर हाथ था l

सोमदेव के आगे पीछे कोई न था जो उसकी सुध लेता और जिस किसी ने सुध लेने की कोशिश की भी वो भी जमीन के लोभ में सब भूल गया l

एकड़ों जमीन को बाकी लोगों ने आपस में बाँट लिया और जब सर्वसुख के पिता ने ये जाना तो उनकी आँखें अंगारे उगलने लगी थी l 


एक भैंस जिसका दूध बेच कर मुश्किल से अपना जीवन यापन करने वाले सर्वसुख के पिता इस प्रलोभन में न आये l हत्या की जमीन पर अन्न पैदा कर के खाना उनके लिए जहर खाने से ज्यादा कठिन था l अतः उन्होंने नहीं ली और सारे गाँव में लोगों को यह खला और किसी ने उनकी भैंस को माहुर दे दिया भैंस के मरते थी अगले दिन ही पिता भी सर्वसुख को छोड़ गए l


मन्दिर की झालर की आवाज ने सर्वसुख की तन्द्रा तोड़ी !ओह चार बजे गए ! रात भर ही जगा रहा, सुबह सुदेवी से उसकी सास ने सर्वसुख को बुला भेजा l

सर्वसुख आया तो बोली, सरसुख्या ! हाँ माई, ये संदूक उतार, उसने उतारा, उसे खोला उसमें चाँदी के दो आँवले (पैरों में पहने जाने वाला आभूषण) निकले l

सर्वसुख को याद आया कि जब वो बच्चा था तो माँ के पैरों में इन्हें देखता था l

माई बोली ये ले और एक भैंस खरीद ला मेरे बाप ने दिए थे कल का का दिन न देखना पड़े इस लिए जीव से ज्यादा रखे थे l

तेरे बाबूजी ने पहनने को कहा था बोले खाली पाँव अच्छी न लगती है पर मैं ने नहीं माना यूँ तो घिस कर कम हो गये लेकिन पुरानी चाँदी है तुझे सही दाम मिल जाएंगे l

सर्वसुख चौंक पड़ा! कल का दिन माई? कल क्या हुआ, बूढ़ी होगई तो क्या तेरी माँ न हूँ तू न बताएगा तो क्या न जानूँगी?

तेरे जाने से पहले भी दे सकती थी लेकिन तुझे तैयार करना था मेरा जना हुआ 'खक्कल'( एक दह) में न डूब मरे l

आज भरोसा हो गया है तू भीख माँग कर भी खा सकेगा पर जीवन से न हारेगा l


माई.... सर्वसुख की आवाज़ कांप गई l हाँ सरसुख्या ! दोनों पति पत्नी माई के चरणों मे गिर गए l


सर्वसुख आंवले लेकर भैंस लेने चल दिया, एक लाठी उठा कर गमछा कंधे पर डाल कर जूते पहनने को हुआ तो पैर का अँगूठे और एक अंगुली ने जूते के अग्र भाग से अपना मुँह निकाल कर सर्वसुख को चिढ़ाया कि तुम्हारा ही नाम 'सर्वसुख' है??


उसने जूतों की उपेक्षा की और बिना जूते के चलने लगा उसके कानों में गूँजने लगा 'पाय उपानह की नहीं सामा' l

 लाठी और अपने पाँवों से संयुक्त रूप से मार्ग के कंटको को रौंदता हुआ पहले वो सुनार के पास गया जिसे देख सुनार ने साश्चर्य भृकुटि बंक की मगर आंवलों को देख सहज हो गया l उसे बेच कर मिले हुए पैसे लेकर वो पशु हाट में गया तो उसकी आँखें फटी रह गई ऐसी सुंदर सुंदर सवत्सा गायें और भैंसें थी l


उसने एक गाय का मोल करवाया तो वो महंगी रही उसके पास उतने पैसे न थे पर भैंस आसकती थी और माई ने भैंस का कहा ही इसलिए होगा कि गाय से कम मूल्य में आजाएगी पर सर्वसुख के मन में गाय खरीदने की इच्छा हो आई l

गाय का भाव लगाते ही उसकी हालत प्रेमचंद की कहानी के पात्र 'हामिद' की सी हो गई जिसे चिमटा भी चाहिए था और पैसे कम थे l

और यहाँ भी विक्रेता को दया आगई और उसने गाय दे दी मानो सर्वसुख ने 'चार पदारथ' पा लिए हों,

 सर्वसुख हुमकता हुआ गाय को गाँव ला रहा था l गाय के साथ सुंदर बछिया थी गाय के चलने में ही एक उत्सव सा था चलते समय गाय की पूँछ की फटकार गाय के पीछे चल रहे सर्वसुख को ऐसा अनुभव करवाती जैसे उसी पर चँवर ढ़राई जा रही है l

गाँव भर में हल्ला हो गया नई औरतें आश्चर्य कर रही थी और पुरानी में से कुछ जिनका माई के पास उठना बैठना था वे जानती थी निरला के पास आंवले थे l

 घर पहुँचते ही माई और सुदेवी ने गाय का स्वागत किया माई तो आँखों मे आँसू भर कर बोली सरसुख्या ! 'म्हारे पूत गाय ई ल्यावै या ही म्हारी साध ही रे ! पण रपया साउटा कोन छा,न्यो भैंस की कही'( मेरे पुत्र तू गाय लाये यही मेरी साध थी पर इतने पैसे नहीं थे इसलिए भैंस का कहा) 

सर्वसुख की आँखें चमक गई l


अब गाय सर्वसुख के यहाँ 'सर्वसुख' करने ही आई थी l लक्ष्मी ही थी, दूध बहुत देती थी जिसे बेचकर उनका खर्च चलने लगा वो सदा सोचता कि पिता होते तो गाय देख कर फूले न समाते पर क्या करे जिसके भाग्य में जितने सुख दुख होते हैं वो वही देखता है

'मनचीती ना होत है हर चीती तत्काल'


दोनों वक़्त दाल रोटी चलते देख माई भी स्वर्ग में अपने साथ कोई दुख न लेकर गई l सर्वसुख ने अपने पुत्र को पढ़ाया अपनी बेटियाँ ब्याह दी l

एक दिन सर्वसुख बैठा हुआ छैनी घिस रहा था कि अखबार लेकर नवल आया और बोला "छैनी ही घिसता रहेगा दुनिया में क्या हो रहा है पता है क्या "?

 "क्या होगा नवल वही हमले वही सैनिकों का मरना चाहे वो किसी भी देश के हों" नजर उठाये बिना छैनी को घिसने में तल्लीन रहते हुए ही सर्वसुख ने उत्तर दिया l

देख सरजू की फोटू अखबार में ! अखबार खोलते हुए उत्साह में नवल ने सर्वसुख को फ़ोटो दिखाई और बताया तेरा बेटा अधिकारी हो गया है गाँव का हमारे पूरे जिले का अधिकारी ! कलक्टर रे!! 

सर्वसुख अब कंगाली जाती रही मेरे यार! देख उसने लिखा है वो सबसे पहले गाँव के लिए कुछ करेगा!

और घर में उत्सव हुआ..


इधर सोमदेव को धक्का देकर पटवारी और अन्य गाँव के लोग जिन्हें सर्वसुख का यह सुख खला नहीं वे खुनसाते रहते थे, जमीन होते हुए भी जाने क्यों सुख से न खा पाते थे, पटवारी को कोढ़ हो गया वह गाँव छोड़ गया, जमीन का हिस्सा लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति जमीन से कुछ खास नहीं पाता था खाने लायक अन्न होता कभी वह भी न होताl और वो व्यक्ति जिसने सोमदेव को धक्का दिया था वो तो सोचता था कि सोमदेव के साथ वह अपने चैन को भी धक्का दे आया है लेकिन फिर भी उस पर पर्दा डाल उसने जमीन को काम में लिया ! जमीन अपने आप बंजर हो गई

ईश्वर की कृपा कौन जान सकता है जितनी जमीन सोमदेव की थी उतनी उतनी बंजर हो गई, हर कोई आश्चर्य करता लेकिन मन में सब समझ भी जाता!

 सर्वसुख अब धनाढ्य हो गया था पर एक चीज उसने अभी भी न छोड़ी थी वह थी विनम्रता,  सरजू ने कुर्सी संभालते ही सारा पिछला रिकॉर्ड खंगाला उसने कितना भ्रष्ट मिला l जो जमीन बंजर हो चुकी थी उसे सरकारी जमीन करार दे दिया गया l और जिस जिस ने जमीन का अन्न खाया उस उस की पीढ़ियां अब भी गरीबी झेल रही थी!


 एक दिन सर्वसुख बरामदे में बैठा था बहुत वृद्ध हो गया था ऐनक के बिना दिखता न था उसे कल ऐनक टूट गई थी तो सरजू ने नई बनवा दी थी 

बैठे बैठे गाने लगा" अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल"

'भवति भिक्षाम देहि' की आवाज़ की दस्तक ने सर्वसुख के गान में विघ्न डाला

सर्वसुख ने देखा यह तो सोमदेव के हत्यारे निहालसिंह का पोता था उसके द्वार पर भिक्षा.....

सरजू की पत्नी भीतर से आटा लाई

शायद दो मुट्ठी होगा.....

       



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