विशाखा शर्मा

Drama


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विशाखा शर्मा

Drama


प्रेम-अप्रेम

प्रेम-अप्रेम

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वाह कविराज ! तुम तो बहुत अच्छा लिखने लगे हो सारा बनारस आपकी प्रशंसा कर रहा है ! 

 नहीं...अभी तो मेरी कविता की आत्मा उसमें नही हैं

मतलब? तुम भी जाने क्या क्या बोलने लगते हो प्रत्यक्ष ! 

मतलब ये निहारिका कि मेरी कविताओं की साम्राज्ञी अभी मेरी तो न हुई

कौन है तुम्हारी कविताओं की साम्राज्ञी ?

क्या यह भी बताना पड़ेगा ?

हाँ बताओ न !

छोड़ो..अच्छा तुम कह रही थी कि आजकल तुम भी लिखती हो!

न न!ये सब मेरे बस का नहीं है कविवर ये तुम्हारे ही काम हैं मुझसे न होता...मैं तो तुम्हें पढती हूँ न !

लाओ दिखाओ तो और प्रत्यक्ष के हाथ से उसने पन्ना छीन लिया और पढ़ने लगी l

" नत नयनों से झड़ते लज्जा कुसम..."

"अभी वो आधी है" ..कह कर प्रत्यक्ष ने उस से वो पन्ना वापस ले लिया l

अच्छा जब पूरी हो जाएगी तो मुझे सुनाओगे न !

तुम्हें भी सुनानी पड़ेगी ?

क्यों भला ?

कुछ नहीं...

 बहुत पहेलियाँ बुझाते हो !

रात एक बजा रही थी प्रत्यक्ष कविता लिख रहा था उसकी आँखों के सामने निहारिका का चेहरा ही था..

प्रत्यक्ष को कविताओं से प्रेम था और निहारिका से भी जो उसकी हर शृङ्गार रस की कविताओं का शृङ्गार थी l

 आठ दिन बीत गए निहारिका प्रत्यक्ष से मिलने नहीं आई..

प्रत्यक्ष सोचने लगा पहले तो कभी ऐसा न हुआ वो कविता ही पढ़ने या सुनने ही सही पर आती थी l

 प्रत्यक्ष ही निहारिका से मिलने चला गया l

शाम का समय था मंद अनिल बह रहा था घर के सामने लॉन में निहारिका गुलाबी रंग के कपड़ों में हरी दूब पर बैठी हुई थी पास ही में छोटे छोटे गुलबांस से फूल खिल रहे थे  और उनमें निहारिका भी किसी फूल से कम नहीं लग रही थी l

निहारिका के वेणीबन्ध से निकल आई अलकें मंद बयार की धुन पर नाच रही थी बिल्कुल ऐसे ही जैसे गुलबांस के सुमनों के वृन्तों भी होले होले हिल रहे थे l

प्रत्यक्ष ने देखा कि निहारिका पन्नों पर झुकी हुई कुछ लिख रही है उसकी भँवें तनी हुई है और उसके आस पास फाड़कर मुट्ठी से मोड़ कर फेंके हुए कागज पड़े हैं

यह देख प्रत्यक्ष दबे पाँव लेकिन फुर्ती से उसके पास पहुँच गया और निहारिका इतनी एकाग्र थी कि उसे पता ही न चला l

तब प्रत्यक्ष ने पुकारा नेहा!!! क्या करने में लगी हो तो निहारिका का ध्यान भंग हुआ उसने प्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष देख कर अपने लिखे हो हथेली से ढक दिया और शरमा गई

प्रत्यक्ष ने उसकी मृदु हथेली को उस पन्ने पर से हटाया और पढा 

नत नयनों से झड़ रहे लज्जा कुसुम....

कविता पूरी लिख दी थी निहारिका ने l

प्रत्यक्ष ने पढ़ा फिर पढ़ा और फिर पढ़ा

वो तो देखता ही रह गया निहारिका ने जैसा लिखा था उसके सामने तो उसकी लिखी हुई यही कविता कुछ न थी l

प्रत्यक्ष झूम उठा उसने निहारिका की बहुत तारीफ की निहारिका भी खुशी और शर्म से लाल होगई l

प्रत्यक्ष घर आगया उसने अपनी कविता को वापस पढ़ा वो जरा भी संतुष्ट न था और सोचने लगा ये उपमान और निहारिका जैसी कल्पनाएँ उस से कैसे छूट गई l

उस दिन की तारीफ से निहारिका बहुत उत्साहित हुई और उसने भी लिखना शुरू कर दिया l

अब वो जब तब प्रत्यक्ष के पास आती और छन्द लय सम्बंधित बातें उस से पूछती अपनी लिखे को बैठे बैठे सुधारती रहती l

और आजकल प्रत्यक्ष से जैसे कुछ लिखा ही न जाता था कलम उठाता तो भी कुछ खास नहीं उकेर पाता और खीझ में अपनी डायरी उठा लेता उसमें ही अपनी मनोदशा को लिख कर बन्द कर के सो जाता l

प्रत्यक्ष निहारिका का इंतजार करता था और निहारिका उसके पास दिन में दो दो बार भी आती तो वो उस से कोई बात नहीं करती बस अपना लिखा दिखाती उसे सुधरवाती या अपने सुधारों को दिखाती रहती l

इधर

निहारिका लिखने लगी...

2 महीने में निहारिका साहित्यिक रुचि और मेधा के बल पर खूब अच्छा लिखने लगी

और प्रत्यक्ष ने अनुभव किया की वो जहाँ था वहाँ से भी नीचे आगया है l

सुबह उठा और अपने अधूरे पड़े खण्ड काव्य को लिखना शुरू किया..

लिखता रहा,

जैसे तैसे उदासी में उसने आफत की तरह उसे खत्म तो कर दिया l

आजकल निहारिका कम आती थी क्योंकि उसे अब प्रत्यक्ष की जरूरत न पड़ती थी,

इधर तीस दिन बीत गए निहारिका मिली ही नहीं प्रत्यक्ष से.. 

 पर आज वो उसके पास जाने को लेकर अधिक उत्साहित थी ,

इतने में द्वार पर दस्तक हुई उसे लगा ये प्रत्यक्ष तो नहीं कहीं ! उसने डरते डरते द्वार खोल तो विदिशा थी l

ओह्ह! तू है क्या! निहारिका ने एकदम से सहज होते हुए कहा

क्यों तुझे किसी और कि प्रतीक्षा थी ? विदिशा ने चुटकी लेते हुए कहा l

नहीं नहीं!" ये देख एक उपन्यास" निहारिका ने विदिशा के हाथ मे रख दिया

 "प्रेम-अप्रेम" वाह री!!ये तूने लिखा? और कब लिख लिया! छुपी रुस्तम !

अच्छा ला मैं पढ़ लूँ सब बातें विदिशा ने उत्साह में कह दी l

 देख,प्रत्यक्ष से ही मैंने लिखना सीखा है; मैं पहले उस ये दिखाउंगी तीस दिन से मैंने उसे दर्शन न दिया इसलिए कि उपन्यास लिखूँगी और उसे दिखाऊंगी, विदिशा! वो कितना खुश होगा न, वैसे तो पता नहीं अभी तो वही इसे संसोधित करेगा देखेगा कैसा है मेरी तारीफ करेगा ,उसे बहुत प्रसन्नता होगी ना!

तू इसे ये छप जाए न तब पढ़ना इसकी एक प्रति तुझे मुफ्त में दे दूँगी और निहारिका हँस पड़ी वो बहुत खुश रही भीतर की खुशी उसकी आँखों में चमक चमक आती थी l

अच्छा ये तो बता दे सुखांत है या दुखांत? विदिशा ने पूछा

पता नही....किसी के लिए सुखांत किसी के लिए दुखांत! निहारिका ने कंधे उचकाते हुए कहा

अच्छा इसकी नायिका नायक से मिलती है? फिर विदिशा ने प्रश्न किया

नहीं..वो चली जाती है कहीं!निहारिका ने उत्तर दिया

'क्या तू भी इसे सुखांत ही कर देती ' विदिशा ने मुँह बनाते हुए कहा

चल अब मैं प्रत्यक्ष के यहाँ जा रही हूँ मुझे देर हो रही है 'निहारिका ने कहा

और निहारिका निकल गई l

 निहारिका ने प्रत्यक्ष के द्वार खटखटाया तो कोई उत्तर न आया दरवाजे को हल्का सा धक्का दिया तो वो खुल गया l

अंदर देखा तो सारा सामान अस्तव्यस्त है l पानी का गिलास गिरा पड़ा है, जगह जगह कागज के कूड़े पड़े हैं सिगरेट का धुँआ आधी बुझी हुई कई सिगरेट पड़ी है,

 लगता था पूरा कमरा ही एश ट्रे है कुछ किताबें नीचे पड़ी थी आधा चद्दर जमीन पर टिक रहा था और आधे में प्रत्यक्ष लिपटा हुआ बेसुध पड़ा था या तो नींद में था या नशे में,

उसके तकिए के पास एक डायरी खुली पड़ी थी और कलम उसके हाथ मे थी रह गई थी उसका बड़ा सा चश्मा उसकी आँखों पर ही चढ़ा हुआ था अपने हाथ का तकिया लगाने से वो जरा सा टेढ़ा हो गया था l

यहाँ वहाँ पड़े कागजों को उठाते हुए निहारिका उस कमरे में अपने चलने का रास्ता बनाती हुई उसके पास पहुँची और उसे हाथ से हिलाकर उठाने के लिए हाथ बढ़ाया कि उसकी नजर उसकी खुली डायरी में लिखे अपने नाम निहारिका पर गई तो निहारिका ने उसे उठाने के बजाय वो डायरी उठा ली l

और उसे पढ़ने लगी

उसमे लिखा था

"मैं हतमनोबल हो गया हूँ जिसे मैं ही लिखना सिखा रहा हूँ वो मुझे कहीं का नहीं छोड़ रही,और मेरे पास जो निहारिका थी जिसे मैं प्रेम करता था वो कहाँ चली गई इसे तो कविता के सिवा कुछ नहीं सूझता है l

अब निहारिका आती है तब न उसके आने पर खुशी नहीं होती है और न ही रुचि से उसे कविताओं के बारे में समझा पाता हूँ l क्या इस सब का कारण था कि को लोग मुझे चाहते हैं मेरी कविता पढ़ते हैं एक दो बार मैं मंच पर भी गया हूँ उसके बाद भी नामचीन नहीं हो सका हूँ जिला स्तर और राज्य स्तर से बड़े स्तर तक जाने के लिए खुद भी संघर्षरत हूँ,ऐसे में निहारिका ही जिसे मैं पत्नी बनाने के स्वप्न देखा करता हूँ,  उसमें बहुत बड़ा कवि नजर आने लगा है l

 मुझे यह सब क्यों नहीं भा रहा है!उस दिन निहारिका ने मात्राओं की गणना के बारे में पूछा था तो मैंने उसे 'छत्रच्छाया' की मात्राएँ गलत सिखा दी और उसके सुंदर उपमानों को बदलवा कर सामान्य कर दिया था! और फिर जब से निहारिका गई थी मेरा का चित्त ही न लगता था कमरे में इधर उधर चक्कर काट रहा था न लिखते बन रहा था और सामने लगी सरस्वती की मूर्ति से तो वो नजर ही न मिला पा रहा था l

ये सब क्यों हो रहा है, मैंने तो प्रार्थना भी की कि निहारिका शाम को न आये और निहारिका नहीं आई मुझे अपनी यह स्वीकारी प्रार्थना भी अच्छी नहीं लगी,

 मैं उसकी प्रतीक्षा में था भी और नहीं भी था...

रात को कुछ खाया न खाया और बिस्तर पर आकर पड़ रहा..

नींद तो सम्भव ही न थी l 

मैंने उसे जानबूझ कर उसे गलत बताया ! 

 क्या मुझे निहारिका से डाह हुआ है! 

नहीं !नहीं! ऐसा नहीं हो सकता!मैंने अपराध किया है!मैंने क्या सोच कर उसे सब गलत बता दिया वो तो कितनी भोली है मान भी गई कल कह रही थी 'पर लगने लगे है मुझे परवाज लेना तुमसे सीख रही हूँ मुझे बहुत उड़ना है' तुम सिखाओगे न प्रत्यक्ष! उसकी यह बात कितनी बुरी लगी थी मुझे..मगर क्यों!!मैं इतना नीचे गिर गया हूँ!! "मैं तो अच्छा कवि छोड़ अच्छा इंसान तक न हुआ" मुझे इतना पसीना क्यों आ रहा है ....

 कल के सूरज के साथ मैं ये इर्ष्यादि कुवृत्ति को समाप्त कर निहारिका को अच्छे से सिखाऊंगा...

क्या मैं सिखा पाऊंगा ?नहीं शायद नहीं मैं तो तबाह हो चुका हूँ !पिछले तीन महीने से मैं कुछ नहीं कर पा रहा और ये खण्डकाव्य! मैंने शुरू क्यों..."

निहारिका सब एक साँस में पढ़ गई और थर थर काँपने लगी और वहाँ से चली आई

 दो तीन घण्टे बाद प्रत्यक्ष की आँख खुली

उसने देखा उसके हाथ में एक तह किया हुआ कागज था पहले वो उसे फेंकने को हुआ पर उसने उसे खोल लिया ,उसमें लिखा था

'माँ की तबियत खराब होने के कारण मैं अपने गाँव जा रही हूँ' तुम गहरी नींद में थे इसलिए उठाया नहीं" 

निहारिका

प्रत्यक्ष पत्र पढ़ते ही निहारिका के निवास स्थान की ओर भागा ! 

उसने देखा उसके कमरे पर ताला लटका हुआ था

गुलबांस के फूल मुरझाए हुए थे लॉन सांय सांय कर रहा था दूब अपना रंग छोड़ चुकी थी और पास में राख का एक ढेर पड़ा था जो शायद कागजों के जलने के था, हल्का सा धुँआ उठ रहा था और जाकर निहारिका के कमरे के ताले में मिल रहा था उसने एक नीम की पतली लकड़ी से राख इधर उधर की तो एक सख्त से कागज पर "प्रेम-अप्रेम"शब्द 'जल' गए थे।


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