विशाखा शर्मा 'ख़ाक'

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3.9  

विशाखा शर्मा 'ख़ाक'

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चने का नमक

चने का नमक

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दो छोटी बच्चियाँ ( संजना और मोनिका )दूध देने आती हैं।रोज शाम को घर पर ;माँ पापा के पास बैठ जाती है ,कभी कभी फोन में मारवाड़ी सास बहू के झगड़े देख देख कर खुश होती रहती है कभी गाने चला कर नाचने लगती है और बहुत देर तक घर पर ही रहती है कभी माँ अकेली रहे तो उन्हें सुला भी लेती है और कभी भोजन भी करके चली जाती है,मुझे भी अच्छा लगता है कि मेरी और भाई की अनुपस्थिति में ये बच्चियाँ घर मे थोड़ी देर ही सही पर रौनक कर देती हैं।

आज मैं आई तो बहुत खुश हुई क्योंकि मेरा फोन भी चलाने को मिल गया दोनों को अलग अलग..बहुत देर तक रही नो बज गए थे;माँ ने कहा कल भी इनको देर हो गई थी मैंने अकेले भेज दिया आज इनको हम छोड़ आएंगे, हम उन्हें छोड़ने चल दियेl 5 बरस का उनका भाई भी साथ था जिसे हमारे सामने संजना ने शक्कर लेने भेज दिया दुकान पर रास्ते में उनका बड़ा भाई मिला उसने पूछा ये कहाँ जा रही है संजना ने कह दिया अपने घर तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ बोला "साँची!

रास्ते मे चलते चलते मैंने पूछा संजना से कि "मोनिका तुमसे कितनी छोटी है?"संजना अपने कान पर हाथ ले जाते हुए बोली "कान ताई आवे या म्हरे"( कान तक आती है ये मेरे)मैं उसके इस भोले से उत्तर को सुन कर हँसने लगी और अपनी ही मूर्खता पर हँसी कि मैंने प्रश्न ही गलत किया मैंने फिर कहा कि तुम कितने बरस की जो तब बोली मैं 12 बरस की,और बीच में मोनिका बोली मैं 10 बरस की हूँ..तब उन्हें उनके बीच की उम्र का अंतर बताते हुए मैं उनके घर तक आगई उनका घर गाँव के बीहड़ की सीमा पर बना था.उनके घर के बाद घोर जंगल शुरू होता है

 पहुँचे कर देखा तो संजना मोनिका की माँ चूल्हा और चौका लीप रही थी टॉर्च के उजाले में हमे देख कर असहज हो गई अपनी ओढ़नी आदि को संभाल कर एकदम से खड़ी हो गई मिट्टी के हाथों से ही चौंटी से अपनी ओढ़नी को सिर पर डाल लिया उन्हें नहीं फर्क पड़ता लूगड़ी( चुनरी)पर मिट्टी लग जाएगी.

हमने कहा इतनी देर कैसे होगई कहने लगी " दनउङ्ग्या ई लाउणी कू कढ़ जावां दनछपया की आवाँ तो अबार ही लीप री उ काल होड़ी ए, रोटी टूक मोनो संजू ने कर दियो" (दिन उगते ही सरसों काटने चले जाती है दिन छिपने पर आती है इसलिए अब लीप रही हूँ रोटी सब्जी संजू मोनिका ने बना दी थी ) मैं तो आश्चर्य में ही पड़ गई मैंने पूछा मोनिका तुम्हें सब्जी बनाना आता है? तो पता लगा दोनों बहनें चूल्हे पर बहुत रूप की रोटी और स्वादिष्ट सब्जी बना लेती है..मैं उनके जितनी थी तो मुझे कुछ न आता था।

इधर उधर की बातें करते हुए अचानक उनकी माँ भावुक होकर रोने लगी और बोली" थे छोरया न रोटया खुआद्यो हो बामणा रो लूण हम किश्या चुकावँगा पुर्बला तो अब भोग रिया हाँ"( आप लड़कियों को खाना खिला देती हो हम ब्राह्मणों का नमक कैसे अदा करेंगे,पूर्व जन्म के पाप तो अब भोग रहे रहे हैं) माँ ने कहा दिया "ये म्हरी भी छोर्यां हैं।

 "

हमारे आने से उनके बेतरतीब पर शांत से घर मे एकदम हलचल सी हो गई वो सब की सब झेंप ने लगी कि इन्हें कहाँ पर बैठाए हमारे पास खाट है हमने कहा दिया हम बैठ जायेगे कहीं भी ऐसे चिंता मत करो..फिर भी एक कंथा लाकर बिछाई उस पर हम बैठ गए...गैस जलाने के लिए मुझे बहुत शर्माते हुए संजना ने बुलाया क्योकि उनका बड़ा भाई बाहर था!मैंने जला दी उसे सिखाया और ये कहा फोन चलाना जैसे सीखा वैसे ये भी सीख लो बोली "जीजी काइ काम कुन पड़े गेस सू 1 साल होगी गेस बीते ही कोणी"

चाय बना रही थी हमारे लिए ,मैंने बहुत मना किया रहने दे माँ पीती नहीं है मेरे अकेली के लिए मत बनाओ मगर नहीं मानी बहुत स्नेह से एक गिलास जिसका वृत्त त्रिभुज में बदला जा रहा था ,में चाय दी बिना अदरक की बिना लाग लपेट की चाय इतनी स्नेहसिक्त थी मुझे बहुत ही अच्छी लगी,चाय पीते पीते मैंने देखा गुदड़ी में छिपा वो सौंदर्य!दोनों बहनें घाघरे पहने उस पर डाली हुई छोटी छोटी ओढनी जिसमें गिन न सकूँ इतने 'सितारे' छूट गए थे साथ मे अपनी 'जमीन 'लेकर,तो भी इतनी सुंदर थी दोनों! 

 वहाँ चने का झाड़ का भाग पड़ा था उसे देख मैंने पूछ लिया कि तुमने चने बोए हैं?तो मोनिका बोली "नहीं रोनकन के बा मेल्या है"रोनक उसकी कोई सखि होगी..ये सब बातें कर के हम लौट आए संजना मोनिका के पापा हमे आधे रास्ते छोड़ने आये हम आ रहे थे कि पीछे से मोनिका संजना दोनों हाँफते हाँफते आई और बोली ल्यो चणा!

मैं देखती ही रह गई बहुत भाव विभोर हुई मैंने पूछा "कहाँ से लाई तू?" बोली रोनक की माई ने दिए,मुझसे कुछ कहते ही न बना..."चने खाते खाते आ गई, अब जैसे ही चने खाए और अपनी अंगुली को चाट लिया तो कुछ खारा खारा से पर बहुत अच्छा लगा,मैं चने के झाड़ को ही चबाने लगी उसमें उनका नमक जो था!"

 


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