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Parakh jain

Inspirational

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Parakh jain

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कलाकार की निष्ठा"

कलाकार की निष्ठा"

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एक चित्रकार था, जिसकी चित्रकारी दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। वर्षों की तपस्या और साधना से उसने एक चित्र बनाया — ऐसा चित्र जो प्रकृति की साँसों को भी थाम ले, रंगों से जीवन भर दे।


उसने सोचा, "यदि राजा इस चित्र को देखेंगे, तो निःसंदेह प्रसन्न होंगे और मुझे ईनाम स्वरूप ढेर सारी सोने की अशर्फियाँ देंगे।"

उत्साह से भरा चित्रकार राजमहल पहुँचा और दरबार में वह चित्र राजा के समक्ष प्रस्तुत किया।


राजा ने चित्र देखा — सचमुच अनुपम था! रंगों का संतुलन, भावों की गहराई और रेखाओं की जीवंतता देखकर राजा अभिभूत हो गया।

परंतु, वह चित्रकार की निष्ठा की परीक्षा लेना चाहता था।


राजा ने अपने संग्रह से एक और अत्यंत सुंदर चित्र लाकर चित्रकार के सामने रख दिया और पूछा,

"बताओ, इनमें से कौन-सा चित्र अधिक सुंदर है?"


चित्रकार ने दोनों चित्रों को ध्यानपूर्वक देखा और नतमस्तक होकर उत्तर दिया,

"महाराज, मेरे विचार से मेरा चित्र अधिक सुंदर है।"


राजा थोड़े असंतुष्ट हुए, पर चुप रहे।

इस बार उन्होंने और भी भव्य चित्र सामने रखवाया — वह सचमुच बेजोड़ था।

फिर पूछा,

"अब क्या कहते हो चित्रकार? कौन-सा चित्र अधिक श्रेष्ठ है?"


चित्रकार ने फिर उसी सहजता से उत्तर दिया,

"महाराज, मेरी दृष्टि में मेरा ही चित्र श्रेष्ठ है।"


अब राजा को क्रोध आ गया। उसने ऊँचे स्वर में कहा,

"क्या हठधर्मी हो तुम! जब यह चित्र तुम्हारे चित्र से स्पष्ट रूप से सुंदर है, तो क्यों नहीं स्वीकारते?"


चित्रकार ने विनम्र भाव से उत्तर दिया,

"महाराज, मैं यह नहीं कहता कि मेरी कला सर्वश्रेष्ठ है। परंतु एक कलाकार की निष्ठा उसकी कला में होती है।

जैसे माँ को अपनी संतान सबसे प्यारी लगती है, वैसे ही मुझे भी अपनी रचना सबसे सुंदर प्रतीत होती है।

मैं केवल अपनी कला की जिम्मेदारी ले सकता हूं, किसी और की नहीं।"


राजा स्तब्ध रह गया। उसकी आंखों में संतोष और आदर के भाव उतर आए।

वह चित्रकार की सच्चाई, आत्मसम्मान और कला-निष्ठा से प्रभावित हुआ।


"तुम न केवल एक महान कलाकार हो, बल्कि एक महान आत्मा भी," राजा ने कहा और अपने कोषाध्यक्ष को आदेश दिया —

"इस कलाकार को सोने की सौ अशर्फियाँ इनाम में दी जाएं!"


चित्रकार ने धन्य होकर हाथ जोड़े।

राजा मुस्कराया। और उस दिन दरबार में सिर्फ रंगों की नहीं, आत्मा की भी जीत हुई।


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