कला का पारखी
कला का पारखी
राजीव परमार बचपन से ही जिज्ञासु और रचनात्मक स्वभाव का था। उसे नई चीज़ें सीखने का गजब का उत्साह रहता। किसी भी काम में वह पूरी तन्मयता से डूब जाता और उसे पूरा करना उसकी आदत बन गई थी। यही लगन और एकाग्रता उसे अपने साथियों से अलग करती थी।
पाँचवीं-छठी कक्षा तक आते-आते उसकी चित्रकला और स्केचिंग में गहरी रुचि हो गई। घंटों बैठकर वह स्केच बनाता, हर बारीकी पर ध्यान देता और रंगों की शेडिंग में नए-नए प्रयोग करता। सातवीं तक पहुँचते-पहुँचते उसने अंग्रेज़ी के अल्फ़ाबेट्स को खूबसूरती से लिखना सीख लिया था। अब उसकी इच्छा हिंदी अक्षरों को भी कलात्मक ढंग से लिखने की थी।
राजीव का सौभाग्य था कि उसके मामा जी चित्रकला में निपुण थे। एक दिन उसने उनसे निवेदन किया,“मामा जी, मुझे कलर शेडिंग और हिंदी अक्षर बनाना सिखा दीजिए।”
मामा जी उस समय व्यस्त थे, उन्होंने कहा,“अभी समय नहीं है, छुट्टियों में आ जाना।”
लेकिन राजीव का उत्साह कम नहीं हुआ। आठवीं की छुट्टियाँ शुरू होते ही वह लगभग 10 किलोमीटर पैदल चलकर मामा जी के घर पहुँचा। वहाँ उसने धैर्य और लगन के साथ रंगों की शेडिंग और अक्षरों की सजावट सीखना शुरू किया।
उसकी मेहनत रंग लाई। धीरे-धीरे उसने कलर शेडिंग में महारत हासिल कर ली, एक ऐसा कौशल जो चित्रकला में उच्च स्तर का माना जाता है।
दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में ड्राइंग का पेपर आया। राजीव ने आत्मविश्वास के साथ अपनी सीखी हुई कलाकारी का प्रयोग किया। उसने पूरा चित्र कलर शेडिंग से सजाया।
पास खड़ा एक लड़का , रघुनाथ हैरान टीचर से बोला ,“सर ये तो गड़बड़ हो गया! कहीं रंग ज्यादा, कहीं कम।”
टीचर ने कहा ये चुपके उसकी सहायता कर दो।
रघुनाथ ने ब्रश उठाया और एक कोने में यूनिफार्म रंग क्र दिया जैसे पेंटर सड़कों पर करते हैं। राजीव को अपनी मेहनत पर पानी फिरता दिखा।
उसने झपट कर रघुनाथ से ब्रश छीना ," यार तुम मेरी सहायता रहने दो। अपने काम पर ध्यान दो। "
लेकिन जो काम राजीव ने किया था, वह एकदम सटीक और कलात्मक था – जिसमें रंगों का संतुलन और शेडिंग का बारीक कौशल छिपा था।
राजीव ने धैर्य और आत्मविश्वास से चित्र पूरा किया। उस दिन उसने यह सीखा कि सच्ची कला की कद्र वही कर सकता है जो समझ रखता हो।
कला के पारखी बिरले ही होते हैं। नादान आदमी का साथ आपकी बरसों की मेहनत पर पानी फेर सकता है।
