खबर सच्ची है
खबर सच्ची है
बाबू जी ऑफिस से घर पहुंचे तो हमेशा के जैसे छोटी बहू नीरू उनके लिए पानी का गिलास लेकर आई। बाबू जी ने अपनी गाड़ी में से कुछ फल मिठाई, चीनी के करवे एक छोटी सी सोने की चेन और बहुत सारे कपड़े निकाल कर मालती जी को पकड़ाए और फिर नीरू की ओर मुखातिब होकर बोले बेटा तुम्हारे घर से यह सब सामान तुम्हारी मां ने तुम्हारे लिए मेरे दफ्तर में किसी के हाथ भिजवाया था। मालती जी और नीरू दोनों हैरान थे लेकिन -----।
आपकी जानकारी के लिए बता दें बाबूजी के इस परिवार में मालती जी बाबूजी के दो बेटे और एक विवाहित बेटी भी। घर में बड़ी बहु रीना उनके बड़े बेटे सुनील की पत्नी थी और नीरू छोटे बेटे अनिल की पत्नी थी। बाबूजी एक सरकारी दफ्तर में अकाउंट्स ऑफीसर थे और उनके दोनों पुत्र प्राइवेट कंपनियों में थे। उनकी बड़ी बहू रीना के पापा का अपना व्यवसाय था और उसका एक भाई विदेश में भी रहता था। हर त्यौहार में, और त्योहारों में ही क्यों बिना वजह भी उसके घर से उपहारों की भरमार लगी रहती थी। उसके घर से मालती जी के लिए भी हर त्योहार पर जरूर कुछ ना कुछ सामान आता था। अनिल ने बीकॉम जयपुर के किसी कॉलेज से करी थी इसलिए वह वहां ही एक हॉस्टल में रहता था और वहां ही उसकी मुलाकात नीरू से हुई थी और उन दोनों ने शादी के बंधन में बंधने की अपनी इच्छा जब अपने माता पिता को बताई तो बाबूजी को तो कोई एतराज नहीं था लेकिन मालती जी अपने घर में एक ऐसी बहू की इच्छा रखती थी जिसका परिवार रीना के परिवार से भी ज्यादा संपन्न हो , आखिर उन्होंने अपनी बेटी को भी तो दहेज में बहुत कुछ दिया था बस इसी कारण मालती जी को नीरू के साथ अनिल का विवाह करना पसंद नहीं था । लेकिन बाबूजी के सामने किसी की भी नहीं चली और नीलू विवाह होकर घर में आ गई। नीरू के घर में उसके पिता की मृत्यु हो चुकी थी, भाइयों ने अपनी बहन को पढ़ा दिया इतने में ही उनके कर्तव्यों की इतिश्री हो गई थी। नीरू की मां भी उसके पिताजी की मृत्यु के पश्चात बहुत सी बीमारियों से ग्रस्त थी इसलिए उसकी शादी पर भी कोई विशेष सामान ना दे सकी।
अब क्योंकि 3 दिन बाद करवा चौथ था और रीना के घर से करवा चौथ के उपलक्ष्य में बहुत सा सामान आया था तो मालती जी यूं ही बड़बड़ा रही थी कि छोटी बहू के घर से अगर शगुन का सामान भी नहीं आया तो घर में यह कोई अच्छा लक्षण तो नहीं होगा। बाबूजी देख रहे थे कि रीना के घर से सामान आने के बाद से ही नीरू बेहद चुप और सहमी सी ही थी।
आज जब बाबू जी ने करवा चौथ का सारा सामान मालती जी को दिया तो नीरू बाबूजी की और प्रश्नवाचक दृष्टि से देख रही थी। वैसे ऐसा पहली बार नहीं हुआ था क्योंकि जयपुर से नीरू के भाई वगैरह तो नहीं आते थे लेकिन ऐसा कई बार हुआ है कि उसकी मम्मी जयपुर से दिल्ली आने वाले किसी भी रिश्तेदार या जान पहचान वाले के हाथ कभी मिठाई या फल नीरू के लिए भिजवा दिया करती थी । घर में मालती जी और रीना नीरू के घर से आई हुई साड़ी और कपड़े देखने में ही व्यस्त थी। बाबूजी भी सामान रखवा कर, पानी पीकर कपड़े वगैरह बदलने के लिए दूसरे कमरे में चले गए। नीरू ने वहां जब उन्हें अकेले खड़े हुए देखा तो उसने बाबू जी से कहा, मेरी आज ही मां से बात हुई थी वह भी बेहद दुखी थी और कह रही थी कि मैं तुझे कुछ भी भेजने में असमर्थ हूं। कोई भी भाई आना ही नहीं चाहता। आप सच बताओ क्या यह खबर सच्ची है कि यह सामान मेरी मां ने भिजवाया है? हमेशा आप खुद ही सामान लेकर आते हो ना?
बाबूजी ने मुस्कुराते हुए उसके सर पर हाथ रखा और कहा "तुम अब हमारी बेटी हो, बेशक यह तुम्हारी मम्मी ने नहीं भिजवाया लेकिन इतना तो निश्चित है कि तुम्हारी मम्मी तुम्हारे लिए यही सामान भिजवाने की इच्छा जरूर कर रही होंगी। तो पिता होने के नाते यह सब तो बनता ही है ना? जाओ वहां जाकर अपना सामान संभलवाओ, और खबरों का तो नहीं पता लेकिन यह खबर बिल्कुल सच्ची है कि तू मेरी सबसे प्यारी बेटी है।" आंखों में आंसू लिए रीना खुद ही अपने मायके से आया हुआ सारा सामान देख रही थी।
