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Afzal Hussain

Tragedy


5.0  

Afzal Hussain

Tragedy


कहानी

कहानी

14 mins 665 14 mins 665

अजीब मुर्दों का शहर है। ना कोई सुनता है ना बोलता है। सब ज़िंदा लाशों की तरह चले जा रहे हैं। अरे सुनो भैया। ले ये भी बिना देखे निकल गया। ” मैं बस स्टैंड पर खड़ा बेचैन हुए जा रहा था के अचानक कान में पहली आवाज़ पड़ी।

“एक्सक्यूज मी। ” आवाज़ की तरफ पलटा तो कुछ देर पलटा ही रह गया। कहां तो परिंदा भी नहीं दिख रहा था और एकाएक दिखी भी तो सीधी परी। सफेद सूट पर नीला दुपट्टा पहने मेरे सामने वो खड़ी थी। हालांकि सौंदर्य प्रसाधन के एड में दिखने वाली कन्याओं जैसी तो नहीं थी मगर सांवले रंग के बावजूद तीखे नयन नक्श उसके चेहरे को इस काबिल ज़रूर बना रहे थे के थकी हुई निगाहें कुछ देर वहां विश्रम कर सकें।

“आप भी वज़ीर गंज जाएंगे क्या। ?” 

“जी जी जी। वहीं वहीं जाना है…और आप। ”

“जी मेरा तो घर ही वहीं है। ” बोलकर वो हल्के से मुस्कुराई।

“। देखिए ना। एक घंटा तो मुझे ही हो गया ट्रेन से उतरे। कोई सवारी ही नहीं मिल रही…और किसी से पूछो तो कोई कुछ बताता ही नहीं”

“कोई कुछ बताएगा भी नहीं। ये छोटा सा शहर है। दस बजे के बाद यहां आवाज़ें क्या कोई किसी की चीख भी नहीं सुनता। ”

“फिर आप । कैसे । इतनी रात। ”

“ एक्चुअली मेरा यहीं ऑफिस है । अकाउंटेंट हूं। आज रिटर्न फाइल करने की आखिरी तारीख थी तो लेट हो गई। स्कूटी स्टार्ट नहीं हो रही तो सोचा बस स्टॉप की तरफ चलूं शायद कोई हेल्प मिल जाए। और देखिए ना आप मिल गए। ” उसका इतना कहना था के मैंने आसमान की तरफ सर उठाया और एक आंख मारते हुए इस खुशनुमा इत्तेफ़ाक़ के लिए भगवान जी को बिग थैंक यू बोला।

थोड़ी देर उचक ऊचक कर दोनों सवारी की संभावनाएं तलाशते रहे जब कोई सम्भावना नहीं दिखी तो उसने कहा। “ दो ही तो किलोमीटर है। पैदल चलें क्या। ”

एक तो भूखा ऊपर से बिरयानी का ऑफर। ठुकराता कैसे। इसी बहाने इस परी के साथ थोड़ा और वक़्त मिलेगा। ”अरे चलिए ना। नेकी और पूछ पूछ”

चांदनी रात। सुनसान सड़क और साथ में अजनबी हसीना। ये सफर तो किसी ख्वाब जैसा लग रहा था मुझे। लगा जैसे ज़िन्दगी अब एक नया अध्याय लिखने जा रही है।

मैं चुप चले जा रहा था। कभी दिमाग में एक अजनबी हसीना से यूं मुलाक़ात गीत गूंजता तो कभी फ्रैंक सिनात्रा का अंग्रेजी क्लासिकल strangers in the night two lonely people were wandering in the night गूंजता। मुझे समझ नहीं आ रहा था के बात कहां से शुरू करूं। उसी ने सन्नाटे को तोड़ते हुए पूछा।

“आपको अकेले में डर नहीं लगता। ”

“डर मतलब। किस तरह का। भूत प्रेत पर तो मैं विश्वास नहीं करता। और कोई लूटेगा तो उसे बटुए में पांच छेह सौ रुपए और इस सात हज़ार के पुराने मोबाइल के आलावा बाबा जी का ठुल्लू भी नहीं मिलेगा। ” बोलकर मैंने अपने बत्तीसी की झांकी प्रस्तुत की।

“ मेरा मतलब है जैसे आधी रात में अकेले खड़े हो। कोई छेड़ने लगे। या रेप कर दे। ”

“ आहाहा। रेप। अरे मर्दों का कहीं रेप हुआ है क्या। कोई करे तो सही। ये तो बस फैंटेसी ही बनके रह गई हमारे लिए। ” मेरे गंदे दिमाग ने संदेश दिया के शायद ये रात यादगार बनने वाली है वरना ऐसे सवाल क्यूं पूछती ये। वो भी अजनबी से। इसलिए मैं ज्यादा बेबाक हो चला था।

“हंसी क्यूं आयी तुमको…मैं तो दुआ करती हूं दो चार मर्दों का भी रेप होना चाहिए। फिर देखती हूं उनकी ये फैंटेसी कैसे डरावना सपना बनती है” वो अचानक गुस्से से बिलबिलाने लगी।

“सॉरी सॉरी। मेरा वो मतलब नहीं था। ”

“खूब समझ रही हूं आपका मतलब । कहां से आए हो आप?”

“दिल्ली से। ”

“ओह रेप कैपिटल से हैं जनाब। फिर तो मुझे आपकी बात पर कोई हैरत नहीं” कुंठा भरी हंसी के साथ उसने अपनी बात खतम की।

“आप भी क्या मज़े ले रही हैं। दो चार केस हुए हैं। मोटा मोटी तो निर्भया वाले केस के बाद ऐसा कुछ हुआ भी नहीं । इससे रेप कैपिटल कैसे हो गया। ”

“ओ हेल्लो। दो। चार। ? । किस दुनिया में जीते हो तुम। अपने दिल्ली पुलिस का डाटा देख लेना। हर दिन पांच रेप होते हैं आपकी दिल्ली में। पिछले साल दो हज़ार तेंतालिस रेप हुए। ये वो संख्या है जिसके एफ आई आर दर्ज हैं। उनमें से भी साठ प्रतिशत क्राइम दोस्त रिश्तेदार और पड़ोसी के नाम हैं। हर रिश्ते का चीर हरण किया है तुमने। लड़की छोड़ो बच्ची और बूढ़ी तक भी तुम्हारी हैवानियत से सुरक्षित नहीं हैं। मर्द बने फिरते हो” मुंह ऐंठते हुए मेरी तरफ देखा उसने।

“ऐसा नहीं है। सब एक जैसे नहीं होते। हम रेप को क्राइम मानते हैं। ”

 “अच्छा बताओ क्या करते हो जब पता लगता है किसी का रेप हुआ है। ”

“हम । हम अपना गुस्सा दिखाते हैं। ”

“कैसे। ”

“कैंडल मार्च निकालकर। ट्वीट करके। फेसबुक पर पोस्ट करके। जस्टिस की मांग करके। ”

“कितनी बार किया ऐसा अब तक”

“वो। एक तो निर्भया वाले टाइम में किया था। फिर आसिफा। फिर एक दो बार और किया शायद। ”

 “बस। ज़िम्मेदारी ख़तम आपकी। दो दिन ग्ला फाड़के चिल्लाए। डीपी लगाया । पोस्ट डाली और ज़िम्मेदारी ख़तम। फिर इंतज़ार करो नए हादसे का…ताकि फिर चिल्ला सको। कभी पूछा है अपनी सरकार से अपने न्यायधीशों से। पिछली बार चिल्लाए थे उसके बाद कितने बलात्कारियों को सज़ा हुई। नहीं पूछोगे क्यूंकि तुमने ढोंग किए तुम्हारी ज़िम्मेदारी ख़तम। रोज़ तुम्हारा हैशटैग बदलता है…भागते दौड़ते कुछ नहीं बदलता सुधार लाने के लिए ठहरना पड़ता है। तुम कभी बदलाव नहीं ला सकते। लिख लो । जब तक बलात्कारियों की वकालत करने वाले रहेंगे बलात्कार होता रहेगा। जानते भी हो कैसा लगता है जब कोई तुम्हारी इच्छा के बिना तुम्हें छूता है। चूमता है। काटता है। निर्वस्त्र करता है। और फिर अपनी मर्दानगी का पीठ थपथपाता है। मौत से बदतर होता है वो अनुभव। ” बोलते बोलते उसका चेहरा एकदम लाल सुर्ख हो गया गुस्से से। ”

“आप तो एकदम जज्बाती हो गई। सॉरी बोला ना मैंने। इतनी देर से साथ चल रहे हैं। बात कर रहे हैं। मुझे ये भी नहीं पता आपका नाम क्या है। ”

“जैसमीन। ” उसने दो टूक जवाब दिया

“बड़ा भूतिया सा नाम है जी। उठो जैसमीन वीराना तुम्हें बुला रहा है। वीराना फिल्म देखी है आपने। उसमें भी जैसमीन नाम की खूबसूरत भूतनी होती है। ” खिख्यते हुए मैंने फर्जी सा टॉपिक छेड़कर बात बदलने की कोशिश की। मगर उसने मेरी बात को भाव ही नहीं दिया।

“आपको मालूम है जिस सड़क पर आप चल रहे हो। छह महीने पहले इसी सड़क पर एक हादसा हुआ था। ” मेरी तरफ अपनी बड़ी बड़ी आंखों को और बड़ा करके देखते हुए उसने कहा।

“कैसा हादसा” मुझे जानने की जिज्ञासा हुई।

“मेरी एक दोस्त थी वो भी स्कूटी से आना जाना करती थी। एक दिन यहीं पर उसकी स्कूटी बंद हो गई। इत्तेफाक था के उसका फोन उस दिन घर पर ही छूट गया था जैसे आज मेरा छूट गया…घर पर फोन कर नहीं सकती थी तो यहीं मदद के इंतज़ार में खड़ी हो गई…। ठीक इसी जगह जहां पर अभी आप खड़े हो…तभी उसे सामने से एक गाड़ी आती दिखी” मैं सकपका कर रुक गया। और पूछा।

“फिर”

छोड़ो मेरा घर आ गया गया। आगे की कहानी फिर कभी।

“घर आ गया मतलब। यहां पर तो कोई घर नहीं”

“अपने दाईं तरफ देखो। ” मैंने देखा तो सामने एक नीला बोर्ड लगा था जिस पर सफेद अक्षरों में लिखा था। आखिरी मंजिल।

“आखिरी मंजिल। ओह तेरी। ये तो शमशान है। तुम यहां। मेरा मतलब आप यहां रहते हो। ”

“हां। यहीं है मेरा घर। मेरी कई सहेलियां रहती हैं यहां” एकदम गंभीरता से बड़े रहस्यमई अंदाज़ में मेरी तरफ देखते हुए उसने जवाब दिया।

“यार मज़ाक मत करो। मेरी सच में फट रही है। ”

“मैं मज़ाक नहीं कर रही। बस यहीं तक था अपना साथ। अब तुम बताओ। कोई अंतिम इच्छा। ”

“भूत। कहां फंस गया यार। जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। या अल्लाह या ओम नमः शिवाय। जेसस मैरी वाहेगुरु दा खालसा। मम्मी। मुझे जाने दो प्लीज़” मैं हांथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा और मेरी हालत देख वो हंसने लगी। हंसते हुए बोली।

“अरे शांत शांत। कोई भूत वूत नहीं हूं मैं। ” बोलकर वो फिर ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी।

“यार पहले तो हंसना बंद करो। इस वक़्त तुम्हारी हंसी उतनी ही डरावनी लग रही है जितनी अंधेरे में झड़ने की आवाज़ डरावनी लगती है। पैर दिखाओ यार उल्टे तो नहीं है। ”

“लो देख लो। और ये तो बताओ। तुम भागे क्यों नहीं। ”

“अरे जितना भी तेज़ भागूंगा भूतनी से तेज़ थोड़ी ना भाग पाऊंगा। ऐसे टाइम के लिए ही मम्मी बोलती थी हनुमान चालीसा रट ले। तुम एकदम विचित्र हो। बताओ इतनी सीरीयस बात करते करते ऐसा मज़ाक। तुम समझ से बाहर हो”

“पुरुष कभी समझ ही कहां पाया है नारी को। उसका नारी से संबंध छाती से शुरू होता है और जांघों पर ख़तम हो जाता है। ” वो फिर गंभीर हो गई।

“अरे यार ये छोड़ो । वो बताओ फिर आगे क्या हुआ। उस लड़की के साथ। ”

“उसे लगा के फरिश्ते आ गए मदद के लिए। बड़ी उम्मीद से उसने हांथ दिया। गाड़ी रुकी। अंदर से दो लड़के उतरे। ”

“अच्छा। फिर। ”

“उन्होंने उतरते ही पूछा। कितना लेगी। हम पांच लोग हैं। वो लड़की तो सकपका गई। बोली। भैया आप गलत समझ रहे हो। मेरी स्कूटी खराब हो गई है। इसलिए वेट कर रही कोई हेल्प मिल जाए। तभी अंदर से एक और लड़का उतरा बोला। तुम हमारा मूड ठीक कर दो हम तुम्हारी स्कूटी भी ठीक कर देंगे और तुम्हे भी घर तक छोड़ देंगे। ”

“ तमाचा जड़ना चाहिए था क्मीने के गाल पे। ”

“ बी प्रैक्टिकल यार। वो पांच थे और लड़की अकेली। उसने कहा भैया प्लीज़ आप जाइए मैं मैनेज कर लूंगी। तभी अंदर से चौथा लड़का उतरा उसने आव देखा ना ताव उस लड़की को कमर से पकड़ा और चिल्लाया क्यों टाइम खराब कर रहे हो ले के चलो इसे अंदर। पांचों ने हांथ पांव पकड़े और सड़क के किनारे। देखो उन्हीं झाड़ियों में ले गए। चलो दिखा के लाती हूं। ”

“अरे पागल हो क्या। मेरे को नहीं देखना। ”

“सोचो आप देखने में इतना डर रहे हो। जिसको लेकर गए होंगे वो कितना डरी होगी। ”

“तो यार उसे चिल्लाना चाहिए था। भागने की कोशिश करनी चाहिए थी। प्रतिरोध करना चाहिए था। ”

“आधुनिकता के शोर ने शहर को बहरा कर दिया है। यहां अपनी चीख खुद को नहीं सुनाई देती कोई और क्या सुनेगा। और विरोध करने की ऊर्जा ही कितनी होती है शरीर में। थोड़ी देर उसने विरोध किया फिर निढाल हो गई। गिद्धों को बदन मिल गया था वो तब तक नोचते रहे जब तक थके नहीं। ”

“मेरे तो रोएं खड़े हो गए सोचकर। जिस पर बीतती होगी वो किस दर्द से गुजरता होगा। ”

“दर्द तो थोड़ी देर में महसूस होना ही बंद हो जाता है। बदन सुन्न पड़ जाता है। मन मस्तिष्क पर बस खौफ हावी रहता है। लगता है कैसे छूटकर भाग जाऊं। कभी कसाई के हांथ में मुर्गी देखी है तुमने। बस वही छटपटाहट होती है। ” बोलते बोलते वो रुक गई।

“क्या हुआ रुक क्यूं गई। ”

“ये पेड़ देख रहे हो। ”

“हां। ”

“इसके चारों तरफ वो अक्सर घूमती नजर आती है। सब बोलते है ये पेड़ समाज और अदालत की तरह है एकदम मौन जिससे वो रात भर गुहार लगाती है और ये स्थिल निष्क्रिय सा खड़ा रहता है”

“घूमती है मतलब। उन दरिंदों ने मार दिया क्या उस बेचारी को…भूत बन गई वो”

“नहीं रे । जब दरिंदगी कर कर के थक गए तो वो जाने लगे। तभी उनमें से एक बोला इसे ज़िंदा मत छोड़ो। वरना हम फंसेंगे। इसे मार दो। उसके बाद उनमें से एक आया और तब तक गर्दन पर खड़ा रहा जब तक उसे उस लड़की के मरने का यकीन नहीं हुआ। ”

“ओह। हे भगवान। हरामजादे कहीं के। ”

“लेकिन पता है वो मरी नहीं। उसने जीने की उम्मीद नहीं छोड़ी। वो यमराज से लड़ती रही। जब वो उसे मुर्दा समझ कर चले गए। तो उसी हालत में रेंगती हुई वो वापस सड़क तक आई। और बेहोश हो गई। सुबह आंख खुली तो हॉस्पिटल में थी। और उसकी बेहोशी वाली तस्वीरें सबके मोबाइल पर”

यार क्या दोष दूं किसी को मैं खुद ऐसा हूं। लड़कियों की लीक हुई निजी तस्वीरें और संबंधों की वीडियो मैं खुद बड़े चाव से देखता और आगे फॉरवार्ड करता हूं। कभी सोचता ही नहीं इससे किसी के इज्जत और आबरू का क्या होगा।

“फिर बची क्या वो। ” मैंने आगे जानने की इच्छा ज़ाहिर की।

“आगे की कहानी तुम्हें सुबह बताऊंगी। मेरा घर आ गया है। वो रहा। लेफ्ट में सेकंड वाला। मेरा नंबर ले लो सुबह फोन करना। आपको भी उधर ही जाना है मुझे भी । तो साथ चल लेंगे। और हां टाइम से आना लेट मत होना। ”

“हां पक्का पक्का लेट नहीं होऊंगा। पर ये तो बताओ इतना कुछ कैसे जानती हो उस लड़की के बारे में। ”

“अरे बुद्धू। बाकी सारी बातें कल। ”इतना बोलते हुए अपने घर की तरफ वो हांथ हिलाकर चल पड़ी।

मैंने भी अलविदा कहा और अपने ठिकाने पहुंचा । जैसे तैसे रात काटी। एक अजीब सी बेताबी थी जैस्मीन से मिलने की। घड़ी देखते देखते रात गुजर गई। सुबह उठा। तैयार हुआऔर जैस्मीन के घर के बाहर पहुंच कर फोन किया।

“हेल्लो कौन। ”

“हेल्लो सर। जैसमीन से बात हो जाएगी। ”

“जैस्मीन से। बेटा आप कौन। ”

“अंकल फ्रेंड हूं उसका। घर के बाहर उसका वेट कर रहा हूं। ”

“ओके । बेटे वो नहा रही है। घर आ जाओ। बाहर कब तक खड़े रहोगे। ”

“ठीक है अंकल जी। ” मैं सरपट घर पहुंचा। घंटी बजाई। एक तकरीबन पचपन साठ साल के व्यक्ति ने दरवाजा खोला। उम्र की लकीरों चेहरे पर डेरा जमाए हुए थीं। आंख पर उनके मोटा चस्मा लगा था। सफेद कुर्ता पायजामा पहने मेरे सामने खड़े थे।

“नमस्ते सर। वो जैसमीन। ”

“हां हां। वो नहा रही है। आओ बैठो। । ”

“और बताओ कबसे जानते हो जैसमीन को। कहां मिले पहली बार। ”

“अंकल वो दिल्ली में रहता हूं मैं। कल रात बस स्टैंड पर सवारी धुंध रहा था तो वहीं मुलाक़ात हुई। उसकी स्कूटी खराब हो गई थी। तो पैदल आए दोनों। वही रास्ते में जान पहचान हुई”

“एक रात की जान पहचान में घर तक चले आए। ”

“अरे नहीं अंकल वो रास्ते भर अपने किसी फ्रेंड की कहानी सुनाती हुई आई थी। कहानी पूरी होती इससे पहले घर आ गया। बोली बाकी कल बताऊंगी। अभी मुझे भी उधर ही जाना है तो सोचा साथ चले जाएंगे और कहानी भी पूरी हो जाएगी। ”

“कहां तक सुनाया उसने। ”

“अंकल वो हॉस्पिटल तक। आप भी जानते हैं क्या उस कहानी के बारे में। ”

“। कौन नहीं जानता। तुमने शायद कभी जानने की ही कोशिश नहीं की। आगे मैं सुनाता हूं।

“लड़कर बाज के झुण्डों से जब घायल चिड़िया पहुंची घर। होश में आयी तो आभास हुआ उसके पर हैं गए कुतर। बैठ के कोने में रात दिन देर तलक बस रोती थी। चीखती उठती पापा पापा दो घड़ी भी गर सोती थी। दिन में कई कई बार चेहरा धोती दसियों बार नहाती थी। सीसे में देखकर अपना चेहरा ज़ोर से चिल्लाती थी। सजा मिली किस जुर्म की मुझको मन नहीं रहा साध मेरा। वक्ष और योनि की स्वामिनी हूं क्या है यही अपराध मेरा। ” किसी वीर रस के कवि की तरह लयबद्ध कहानी बताकर वो थोड़े चुप हुए।

“हे भगवान। वो तो डिप्रेशन में चली गई। फिर अंकल जी। उसकी काउंसलिंग नहीं कराई उसके पैरेंट्स ने। ”

“बाप ने समझाया बिटिया । हादसे हैं जीवन के हिस्से इससे होता कुछ भी भंग नहीं। भूल जाओ समझकर दुस्वप्न ,रखो ये विस्मिर्ती संग नहीं। नई ऊर्जा से नए जीवन का फिर आगाज़ करो। जैसे पहले करती थी फिर सारे वो काज करो। ”

“ टचवुड। उनके पापा की सराहना करनी बनती है। मतलब सब ठीक हो गया फिर। ” मेरी बात सुनकर अंकल जी मुस्कुराए और आगे बताना शुरू किया।

“कोई फिर से जीना चाहे तो ये लोग कहां सह पाते हैं। कुरेद कुरेद कर बीती बातें हर दिन याद दिलाते हैं। क्या हुआ कैसे हुआ तेरी भी कुछ गलती होगी। कपड़ा तंग पहना होगा या रात में बाहर टहलती होगी। या पीकर बाहर निकली होगी यार के संग। गिर पड़ी होगी सड़क पे होकर मलंग। आधी रात में सुनसान सड़क पर किसका था इसको इंतज़ार । हमको तो लगता है ये करती है देह व्यापार। सूझा ना कुछ रास्ता जब अपना अपराध झुपाने का। इल्जाम लगा दिया इसने जिस्म के लुट जाने का। ” फिर चुप होकर अंकल जी हांफने लगे क्योंकि इस बार बड़े ऊंचे स्वर में कविता पाठ करके समाज का दर्पण सामने रखा उन्होंने।

समाज का दर्पण जब सामने रखा गया तो उसमें मुझे अपना घिनौना चेहरा दिखने लगा। मैं भी तो उनमें से ही हूं। मुझे खुद पर अपनी सोच पर घिन्न आने लगी। कैसे हम मर्डर से भी व्यावह इस अपराध पर दो दिन झूट मूठ चिल्लाकर चुप्पी साध लेते हैं। हम दिखाते हैं के हमें फिक्र है लेकिन अपने रोटी पानी में इतने मशगूल रहते हैं के चार शब्दों के अलावा हमारा कोई योगदान नहीं होता।

“फिर क्या हुआ अंकल जी। ”

“गैरों से लड़कर आई लक्ष्मी अपनों से हार गई। एक रात कमरे से निकलकर टहलने के बहाने बाहर गई। पीछे एक बाप भी है वो पापा की गुड़िया भूल गई। डाला गले में नीला दुपट्टा और उस पेड़ पर झूल गई। ”

“वही पेड़ जो जैस्मीन ने दिखाया था। जिसके चारों तरफ वो घूमती रहती है। और वो अपराधी लड़के। ”

“शास्त्र कहते हैं दो मृत्युदंड व्यभिचारी को। फिर चाहे रावण हो या दुर्योधन। लेकिन नियति देखो उसके हत्यारे आज़ाद घूम रहे मगन। जितने दोषी वो पांचों थे उतना ही है हर इंसान क्यूंकि आज भी मासूम चिड़िया उन गिद्धों से है परेशान । ” अंकल जी का चेहरा निराशा से लटक गया। मैंने घड़ी देखी और बात वापस मुद्दे लाया।

“ओह…बहुत दर्दनाक हादसा है और अफसोस ये हादसा रोज़ होता है। मेरी संवेदनाएं उस लड़की के साथ हैं। अंकल देखो ना जैस्मीन नहा ली क्या। लेट हो रहे हैं। ” उन्होंने सर उठाकर मेरी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

“बेटा वो तो तब तक नहाती रहेगी जब तक जिस्म से दरिंदगी के निशान ना मिट जाएं। तुम जाओ नहीं तो लेट हो जाओगे और कोशिश करना जिस समाज में तुम रहते हो वो लेट ना हो। मेरी जैस्मीन तो पहले से ही लेट है। ” इतना बोलकर उन्होंने मुझे एक दीवार की तरफ देखने का इशारा किया। मैं पलटा तो देखता हूं जैस्मीन की फूल चढ़ी तस्वीर लगी है। मैं स्तब्ध वो तस्वीर देखता रह गया…उसने वही सफेद सूट और नीला दुपट्टा पहना था। ये देखकर जिस्म निष्प्राण हुए जा रहा था। कोशिश कर रहा था उठने की लेकिन लगता था सोफे पर चिपक गया हूं।


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