STORYMIRROR

Sudhir Srivastava

Abstract Tragedy

4  

Sudhir Srivastava

Abstract Tragedy

खामोशी

खामोशी

2 mins
196

आज आप सुबह से बहुत चुपचाप हैं।क्या बात है ?तबियत तो ठीक है न।रमा ने अपने पति राज से पूछा।

राज बोले-नहीं लखन की माँ। बस किसी निर्णय पर पहुंचने की कोशिश कर रहा.हूँ।

रमा -कैसा निर्णय ?

राज-लखन की माँ !अब इस उमर में हमसे तो कुछ होने वाला नहीं है।क्यों न हम वृद्धा आश्रम में ही चलें।

रमा-लखन के बापू बात तो ठीक है।मगर अपना घर छोड़कर क्या अच्छा लगेगा ?

राज-अब अच्छा खराब देखोगी या सूकून से मरना चाहोगी ?

रमा-आखिर बेटा क्या सोचेगा ?

राज-जो भी सोचना है सोचे,मगर अब इस तरह रह पाना मुश्किल है।अभी ज्यादा समय भी कहाँ बीता ?जब तुम मरते मरते बच गई।वो तो भला हो पड़ोसियों का।जिन्होंने इतना ध्यान रखा और एक बेटा है हमारा, जिसे फुरसत नहीं है।

रमा -बात तो सही है।तो क्यों न अब हम कल ही वृद्धाश्रम चलकर अपनी जो भी सम्पत्ति है,उसे भी उसी वृद्धाश्रम को दान कर दें।

राज-मैं भी यही सोच रहा था।आखिर जब बेटा ही किसी काम का नहीं हैं,तो कैसी सम्पत्ति ?समझ में नहीं आ रहा आजकल का फैशन समाज को कहाँ ले जायेगा ?

छोटे छोटे बच्चे भी बड़ो की इज्ज़त नहीं करते।वो हमारा छोटू है,वो भी बाबा दादी के पाँव तक नहीं छूना चाहता।पास नहीं आता।मन में कसक सी होती है।

रमा-अब दुखड़ा न गाओ,हमारे सास ससुर ने हमें कितना सहारा दिया।मैं तो अपने माँ बाप को ही भूल गई।हमारा बेटा भूख लगने पर ही माँ को याद करता था।दादी बाबा का दुलारा जो था।

राज-अब रहने भी दो।दर्द न बढ़ाओ।उस जमाने की बात और थी।नया जमाना तो माँ बाप को लावारिस की ही मौत देगा।इसी एकल परिवार के कारण अब सगे संबंधी भी बिखर रहे हैं।बेटे को ससुराल और बहू को मायके के अलावा किसी की फिक्र नहीं रही।

रमा-आप भी बेकार की बात लेकर बैठ गये।जब हमारी फिक्र नहीं,तो फिर कौन रिश्तेदार, संबंधी।सब खत्म।बस बिना कुछ सोच विचार के कल की तैयारी आज ही शुरु कर दें।

राज-हाँ लखन की माँ।अब यही ठीक है।

पति पत्नी नये विश्वास के साथ उठे और अपनी तैयारियों में लग गये।

 आज उनकी खामोशी टूट चुकी थी।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Abstract