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श्रेया जोशी 'कल्याणी'

Abstract

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श्रेया जोशी 'कल्याणी'

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कड़वा सच

कड़वा सच

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लोग कहते हैं यह आधुनिक युग है, इसमें वैचारिक उन्नति हुई है। पर मुझे तो अपने आस पास ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया। जिस युग को आज के तथाकथित बुद्धिजीवी पिछड़ा युग कहते हैं उस युग में भौतिक वस्तुओं के मूल्य कम थे और मानवता अधिक मूल्यवान थी। लोगों में अपनापन मुखर रूप से दिखता था। आज के रक्त संबंधों में अपनेपन की वो मधुरता नहीं दिखती जो उस समय के एक मोहल्ले के निवासियों में थी। 

ये तो सामान्य लोगों की बात है, यदि बात एक अक्षम व्यक्ति की करें तो उसकी स्थिति में तो पहले से अधिक दैनीयता देखने को मिलती है। माना कि तब की तुलना में आज की सरकार ने अक्षम व्यक्ति को सामाजिक मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई प्रशंसनीय निर्णय लिए हैं, पर कोई भी मुख्यधारा में तब आ सकता है जब समाज उसे मुख्यधारा में स्वीकार कर सके। 

इस आधुनिक युग के विषय में एक और बहुत बड़ी भ्रांति प्रचारित है, लोगों को कहते पाया जाता है कि इस युग में लिंग भेद नहीं है, हो सकता है सामान्य लोगों के परिपेक्ष में यह बात सही हो पर अक्षम व्यक्ति तो जन्म के साथ ही पग पग पर लिंग भेद का शिकार होते हैं। 

यदि किसी स्त्री का बार बार गर्भपात हो रहा हो या बच्चा जन्म के कुछ समय बाद ही भगवत चरण प्राप्त कर लेता हो तो सांत्वना देने आने वालों के शब्द कुछ ऐसे होते हैं- हे! भगवान् अंधा, लूला, लंगड़ा ही दे दो क्यों तरसा रहे हो बिचारी को? 

उनमें से किसीकी सुन यदि परमपिता ने दया कर एक अक्षम संतान दे दी तो फिर लोग आकर पहले यह जानने का प्रयास करते हैं कि नवजात शिशु लड़का है या लड़की। 

यदि लड़का हुआ तो उसके लिंग के कारण उसकी अक्षमता छिप जाती है, यदि दुर्भाग्य से लड़की हुई तो लोगों को वह मासूम बोझ लगने लगती है। शायद परिवार के सदस्यों को ऐसा न लगता हो पर समाज बार बार अपने व्यवहार से जताने का प्रयास जरूर करता है। जिससेे बच्ची की शिक्षा प्रभावित होती है। 

यदि पिता रसूकदार व्यक्ति हैं तो बच्ची अपने पिता के प्रभाव के कारण यथाशक्ति शिक्षित हो जाती है, वरना उस बेचारी को अक्षर ज्ञान भी नहीं हो पाता क्योंकि कोई विद्यालय उसे अपने यहाँ प्रवेश ही नहीं देना चाहता। 

धीरे धीरे बच्ची उस आयु में आती है जिसमें सामान्यतः माताएँ अपनी बेटियों को घरेलू कामकाज सिखातीं हैं, पर या तो किसी अनहोनी के भय से या किसी पारिवारिक सदस्य के दबाव में आकर माँ अपनी अक्षम बेटी के साथ ऐसा करने में असमर्थ हो जाती है। 

फिर जबतक वह स्वयं करने योग्य होती है मुक रुप से करती रहती है, पर जब उसे परेशानी होने लगती है, जो सामान्य स्त्रियों की तुलना में उसे जल्दी होने लगती है क्योंकि बार बार गर्भपात या कई नवजात संतानों की मृत्यु के कारण शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों का सामान्य से अधिक सामना किया है। 

ऐसे समय में अपनी उस आयु की बेटी का घरेलू दायित्वों से विमुख होना जिस आयु में सामान्यतः बेटियां अपनी माँ को घरेलू कमों से मुक्त कर देतीं हैं उसके लिए अतिशय पीड़ादायक होता है, जिसका सारा क्रोध उस बेटी पर ही निकल जाता है। 

यदि बेटी कम शिक्षित या निरक्षर है तो उसे एक ही कष्ट होता है कि यदि मैं पढ़ पाती तो नौकरी करके घर में पैसे लाती तो घरेलू काम भले नहीं आते पर रोज रोज बातें तो न सुननी पड़तीं। 

यदि बेटी सौभाग्य से इतनी शिक्षित हो कि वह नौकरी कर सके पर उसकी अक्षमता के कारण उसे नौकरी न मिल रही हो तो उसका कष्ट कई गुना बढ़ जाता है। समाज की इस अस्वीकृति के कारण उसे अक्सर ये बात अंदर से खाती रहती है कि न घरेलू काम आते है न नौकरी है आज माँ चार बातें सुनाती है पर खाना तो देती है। आगे का जीवन कैसा होगा?

अंततः यही सारी बातें उसे मानसिक अवसाद का रोगी बनातीं हैं। मैंने बहुत से अक्षम पुरुषों को देखा है पर किसी को ऐसी परेशानियों से संघर्ष करते नहीं पाया हाँ मनसिक अक्षमता से ग्रसित पुरुषों की स्थिति अलग होती है। 

स्त्रियों का जीवन सामान्य रूप में आसान नहीं है, एक अक्षम स्त्री के जीवन की कल्पना एक व्यक्ति तब तक नहीं कर सकता जब तक उसमें ह्रदय रूपी पुस्तक को पढ़ने की क्षमता न हो। 

इसलिए ईश्वर से करबद्ध प्रार्थना है कि यदि किसी के प्रारब्ध के अनुसार एक अक्षम के रूप में जन्म देना ही हो तो स्त्री का जन्म मत ही देना। 


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