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Patel Shubh

Horror

4  

Patel Shubh

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"कालिदारा"

"कालिदारा"

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रात थी… पर सिर्फ अंधेरा नहीं था। वो अंधेरा था जो रूह के भीतर उतरकर दिल की धड़कनों को जकड़ ले। ये कहानी है एक गांव की—कालिदारा। न कोई नक्शे में, न किसी प्रशासन में दर्ज। कहा जाता है कि जो इस गांव का नाम भी ज़ुबान से ले, उसकी रातों का चैन छिन जाता है।

शुरुआत: आवाज़ जो आई नहीं, सुनाई दी

रुद्र नाम का एक नौजवान पत्रकार था। साहसी, जिज्ञासु, और सच्चाई को उजागर करने की ज़िद लिए घूमता रहता था। एक दिन एक बूढ़े फ़कीर से उसने एक अजीब बात सुनी—
“अगर तू सच्चाई का दीवाना है, तो कालिदारा जा… वहाँ तुझे सच्चाई नहीं, मौत की आँखें दिखेंगी।”

रुद्र ने इसे एक और अफ़वाह समझा, पर रात होते ही अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं। बिस्तर के नीचे से कोई गीली साँसें लेता, दरवाजे के पीछे से कोई कंधे पर हाथ रख देता। आंख खुलती तो कोई न होता। एक दिन दीवार पर खून से लिखा मिला—
“अब आ ही जा, तुझे बुला लिया गया है।”

कालिदारा की दहलीज़ पर

रुद्र कैमरा और रिकॉर्डर लेकर अकेला ही निकल पड़ा। लोगों ने उसे रोका, पर उसने कहा—
“झूठ से डरकर कोई सच्चाई तक नहीं पहुंचता।”

GPS ने उसकी मदद नहीं की, पर पेड़ों पर खुद-ब-खुद उभरे काले निशान उसे रास्ता दिखाते रहे। जैसे-जैसे वो गांव के पास पहुंचा, हवा बंद हो गई। घड़ी रुक गई। मोबाइल डिसचार्ज हो गया—बिना उपयोग के।

गांव की सीमा पर लिखा था:
"जो आया, वो दोबारा गया नहीं। जो गया, वो बोल नहीं सका।"

गांव जो सोता नहीं

कालिदारा में घुसते ही उसने देखा—एक भी आदमी नहीं, पर दरवाजे खुले थे। दीये जल रहे थे, पर तेल नहीं था। बर्तन हिल रहे थे, पर हवा नहीं थी। और फिर उसे दिखा एक बच्चा… बिना पलक झपकाए, ज़मीन पर उल्टा चलते हुए, मुस्कुराता हुआ… और फिर ग़ायब।

पहला दरवाज़ा

एक कच्चा मकान था, दरवाज़ा ख़ुद-ब-ख़ुद खुल गया। अंदर एक औरत बैठी थी—मुँह पर काला घूँघट, पर पैर उल्टे। वो बिना देखे बोली—
"तेरी माँ को तुझे लेकर नहीं जाना चाहिए था सात दिन बाद उसके पेट में फिर तू ही आया था…"

रुद्र डर के मारे भागा, पर जितना भागता, वापस उसी घर के बाहर आ जाता। जब वह थककर गिरा, तो औरत ने धीरे-धीरे उसका घूँघट उठाया—चेहरा नहीं, सिर्फ़ दो काले गड्ढे… और उनमें सांप रेंग रहे थे।

दूसरा पड़ाव: मंदिर जो बंद नहीं होता

गांव के बीचोंबीच एक टूटा मंदिर था, जिसमें कोई मूर्ति नहीं थी—सिर्फ़ एक खोपड़ी, और उस पर ताज।
उसके नीचे लिखा था—
"जिसने इसका नाम लिया, उसकी आत्मा यहीं रह गई।"

रुद्र ने फ़ोटो खींचने के लिए कैमरा उठाया, लेकिन कैमरे में सिर्फ़ उसका ही शव दिखा—गला कटा, आँखें बाहर। वो डर से गिरा, तब एक पुजारी जैसा आकृति आई, जिसकी आंखें नहीं थीं, बस काले धुएँ थे।

वो बोला—
“अब लिख मत, सुन। तेरे हाथ अब सिर्फ़ खून लिखेंगे, शब्द नहीं।”

रात का तीसरा पहर: आवाज़ें जो पीछा करती हैं

रुद्र अब वापस लौटना चाहता था, लेकिन बाहर अजीब सन्नाटा था। पेड़ अपनी जगह से हिल रहे थे, मानो आगे जाने को मजबूर कर रहे हों।

हर मोड़ पर कोई फुसफुसाता था:
"तू वो है जो बिना बुलाए आया है, अब तेरे बिना कुछ अधूरा है…"

उसने पेड़ के तने पर खुदा नाम देखा—रुद्र
नीचे लिखा था—"मरा 3 दिन बाद, पर आत्मा यहीं रही।

घर जो उसका नहीं था

एक पक्के घर में जाते ही उसे अपनी बचपन की चीज़ें दिखीं—वही लाल साइकिल, वही फटी हुई नोटबुक, वही स्टील की थाली। लेकिन बचपन में तो वह कभी कालिदारा नहीं आया था!

फिर एक बूढ़ी आवाज़ आई—
"तेरी माँ तुझे बचा ले गई थी, पर अब वक़्त पूरा हुआ। हर जन्म का हिसाब देना पड़ता है बेटा।"

रुद्र अब रोने लगा, समझ नहीं पा रहा था कि वह कौन है, क्यों है, और कब तक है।

भोर की किरण नहीं आती यहाँ

उसने देखा, रात लंबी होती जा रही थी। घड़ी की सूइयाँ उल्टी चलने लगीं। अब सब कुछ ठंडा नहीं, जलता हुआ लग रहा था। पेड़ से आग की लपटें निकलती, पर जलती नहीं थीं। रास्ता खून की धार बन गया।

और फिर वही बच्चा वापस आया—इस बार उसकी पीठ से दो हाथ निकले, जिनमें छुरियाँ थीं।

"अब खेल खत्म, तेरा नाम हम रखेंगे।"

रुद्र ने आंखें बंद की, तो चारों ओर सिर्फ़ चीत्कार था। इंसानों की नहीं… आत्माओं की।

अंत नहीं, एक शुरुआत

तीन दिन बाद रुद्र की डायरी उसके कमरे में मिली—गीली, खून से सनी। आखिरी पन्ने पर लिखा था:

“मैं रुद्र नहीं रहा… मैं अब कालिदारा हूँ।”

उसके बाद जिसने भी उस डायरी को पढ़ा, उसने खुद को खिड़की से फेंक दिया, या खुद को जला लिया। अब वो डायरी एक सरकारी तिज़ोरी में बंद है, लेकिन हर पूर्णिमा को उसमें एक पन्ना और जुड़ जाता है—खून से लिखा हुआ।


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