Vidhi Mishra

Abstract Classics


4.6  

Vidhi Mishra

Abstract Classics


जज़्बातों की बात

जज़्बातों की बात

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एक छोटी सी कहानी है मेरे पास, पढ़ कर सिर्फ समझने की जगह आप अगर महसूस करें तो मेरे लिखने का उद्देश्य सार्थक होगा।

अल्फ़ाज़ उसके कभी कम न थे, न ही कभी वो चुप रहना चाहते थे,

पर शायद किसी ने उन्हें सुनने का, समझने का कभी वक़्त ही नहीं दिया।

एक दिन कोई आया साथ देने, उसके ख़ामोश लफ़्ज़ों को अपनी मौजूदगी का सहारा देने,

खुश हुआ वो बेचारा, कोई मुझे सुनेगा और समझेगा सोचकर मन ही मन चहक उठा। 

सोचा उसने जो दर्द हुआ है, चोट जो जज़्बातों को लगी है, आज कोई उस पर मरहम लगाएगा, आज मुझे, मेरे जज़्बातों को कोई महसूस करेगा।

दिल ग़मो का दरिया था उसका, मन, जो कभी चंचल हुआ करता था, अब सैकड़ों उलझनों से लिपट चुका था, ख्वाइशें उसकी कभी हज़ारों हुआ करती थीं, अरमां अपने अपनों के पूरे करने का जज़्बा भी था,

पर किसी का साथ चाहता था वो लोग उसे महसूस करें, उसके जज़्बातों की कद्र करें शायद ऐसा सोचता था वो।

उम्र मत पूछना उसकी, वो तो बस एक नए-नए खिलते हुए फूल जितनी थी,

पर बोझ अपने कंधों पर वो अपनी उम्र से कई गुना ज़्यादा ढोता था।

एहसास बहुत कम ही होता है किसी को की उम्र महज़ एक संख्या है, इंसान पर क्या बीतती है, क्या उसके अनुभव हैं, वो कितना समझदार है, वो कितनी बातें समझता है इसका आँकलन करने का पैमाना नहीं।

माना उलझने और कठिनाइयां हर इंसान के जीवन में आती हैं पर हर कोई एक ही तरह से उनसे पार नहीं पा सकता है।

कुछ हंसते-हंसते सह लेते हैं, अडिग बन कर सामना कर लेते हैं,

पर कुछ जिसे हम अंग्रेज़ी में Overthinking कहते हैं, उसके कारण मानसिक रूप से तनाव को झेलते हैं और कभी कभी हालातों से हार भी मान लेते हैं। ग़लत नहीं होते वो जो जज़्बाती होते हैं, माना ये ज़माना Practical लोगों का है,

पर आज भी वो जीते हैं जो जज़्बातों को महत्व देते हैं।

वो बेचारा भी उन मुट्ठीभर जज़्बातियों में से एक था,

दिमाग से ज़्यादा दिल से सोच करता था वो, इसीलिए शायद छोटी-छोटी बातों को महसूस करता था, सबकी भावनाओं का खयाल रखता था पर उसकी भावनाओं को समझने वाला शायद कोई था ही नहीं।

बढ़ना आगे वो बहुत चाहता था, हवाओं के साथ बहना चाहता था, पर दुश्मन भी समाज और उसके हालात थे उसके, हारा कई बार वो, गिरा भी कई बार, पर शायद निराश हुआ वो इस बार।

वो लड़ता रहा, झगड़ता रहा, अपने मन के अंदर की रणभूमि में वो अपने ही ख़यालों और जज़्बातों के युद्ध का साक्षी बनता रहा।

कह किसी से कभी नहीं पाता था वो कुछ, सब खुद ही सहन कर जाता था, लोगों के ताने, परिवार की चिंता, खुद को साबित करने की चाहत शायद छीन ले गए थे उसके खुशियों के तराने।

देख कभी न कोई पाया, समझना तो बहुत दूर था,

क्योंकि उस मीठी सी मुस्कुराहट और खिलखिलाती हुई हंसी नई उस रंगमंच पर पर्दा डाल दिया था जहां रोज़ क़त्ल हुआ करते थे, कभी भावनाओं के, कभी सपनों के।

डूब रहा था, घुल रहा था पर फिर भी वो लड़ रहा था। आस उसे थी कि कोई शायद समझेगा, कोई उसके भिखरते हुए जज़्बातों को प्यार से संजोयेगा, शायद इसी आस में वो उस तिनके की तलाश करता रहा जिसके सहारे वो डूबने से बच सकता था।

धीरे-धीरे दिल के पन्ने खोले उसने, साहस बहुत दिखलाया, जिसको सहारा समझा उसने, वो भी उसे ना समझ पाया, पागल समझा उसने भी, हर किसी की तरह थोड़ा बहुत ज्ञान समझाया, और उस परिंदे के चोटिल पंखों को वो पहले से भी घायल कर गया।

बीच मझदार में छोड़ गया वो उसको, उम्मीद की बैसाखी को भी दिव्यांग बना गया, टूट जो था बिखर गया और बिखरा जो था वो खो गया।

दुनिया की महफ़िल में अकेला हो गया वो, बोझ अब न सह पाया, खुद को ही कोस-कोस कर उसने अपने जज़्बातों को ग़लत ठहराया। 

समझा किसी काबिल नहीं में, न कभी कुछ कर पाऊंगा, हारा था, हारा हूँ, और आगे भी हार जाऊंगा मैं। डर गया, घबरा गया, अब वो सच में हार गया।

उम्मीद छूटी, दिल टूटा, जज़्बात बिखरे, सांसे थमी। छोड़ गया वो दुनियादारी, हो गया विलीन वो, कहीं दूर बह गया हवाओं के संग, बोझ उसे जहां न कर सके और तंग।

ग़लत तो उसे अब दुनिया समझेगी, तरह-तरह की बातें बनाएगी, कमज़ोर दिल था, पागल था, ऐसे ही आरोप लगाएगी, थोड़ी हमदर्दी जताएगी पर समझ उसे अभी भी नहीं पाएगी।

अब आप ये पूछेंगे कि ये कौन है, आप इसे नहीं जानते फिर क्यों मैंने आपको उसकी जीवन-शैली का पाठ पढ़ाया, क्या मतलब था इस कहानी का और शायद सोचेंगे कि ऐसा कैसे किसी के साथ हो सकता है। सच तो बस इतना है कि ये हर उस इंसान की कहानी है जो दिमाग से नहीं दिल से सोचते हैं, जो थोड़े भावुक होते हैं और जिन्हें कभी कोई दिल से समझना नहीं चाहता। उनमें से कुछ जीवन त्याग देते हैं और कुछ जीते हुए भी जीना त्याग देते हैं।

इस कहानी की अपील और निष्कर्ष यही है कि अगर आपका सामना किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो मानसिक तौर पर परेशान है, कृपया उसकी तरफ सहानुभूति से हाथ बढ़ा कर उसको डूबने से बचाएं वरना न जाने हम कितने मासूमों को यूं ही खो देंगे।


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