जोरू का गुलाम !
जोरू का गुलाम !
क्या हुआ तबीयत ठीक नहीं क्या?"
"नहीं विनोद जाने क्यों बहुत चक्कर आ रहे है बिलकुल उठा नहीं जा रहा।"
"कोई बात नहीं कमजोरी है बस तुम आराम करो मैं चाय बनाता हूँ।"
"लेकिन विनोद मम्मीजी नाराज़ हो जायेंगी।"
"रोज़ तो सब तुम्ही करती हूँ एक दिन क्या मैं नहीं कर सकता? तुम आराम करो।" विनोद ने सौम्या के बालों को सहला कर मुस्कुराते हुए कहा तो सौम्या भी मुस्कुरा उठी और निश्चिंत मन से आँखें बंद कर करवट बदल लिया।
सौम्या और विनोद की शादी को अभी कुछ ही महीने बीते थे। विनोद के घर में सिर्फ उसकी माँ रमा जी थी विनोद के पिता जी कुछ सालों पहले गुजर चुके थे। विनोद की माता जी पुराने ख्यालों की महिला थी उन्हें यूं विनोद का सौम्या का हाथ बांटना बिलकुल पसंद नहीं आता था।
विनोद एक बहुत ही नेकदिल इंसान था आम मर्दों से अलग सोच रखता था जहाँ तक होता सौम्या की घर के कामों में भी मदद कर देता था। रमा जी जब भी विनोद को सौम्या की मदद करते देखती मन ही मन में चिढ़ जाती थी। सौम्या जानती थी उसकी सासू माँ को ये पसंद नहीं आता था तो वो हमेशा विनोद को मना करती लेकिन विनोद नहीं मानता था कभी गीले कपड़े छत पे सूखने डाल देता तो कभी रसोई में मदद करने चला आता था।
"विनोद आप रहने दीजिये मैं कर लुंगी।"
"क्यों कर लोगी अकेले मैं भी मदद कर देता हूँ जल्दी काम होगा तब तो कुछ समय हम दोनों को भी मिलेगा।"
"लेकिन माँजी "?
"क्या माँजी? शादी के पहले मैं उनकी भी तो मदद करता था सो अब तुम्हारी कर रहा हूँ।"
हँसते हुए विनोद कहता तो सौम्या चुप लगा जाती लेकिन सासू माँ के चेहरे पे आते जाते भाव उसे सब बता जाते की बेटे का यूं रसोई में बहु का हाथ बटाना उन्हें रास नहीं आता था।
इधर कुछ दिनों से सौम्या की तबीयत कुछ ठीक नहीं रह रही थी। कमजोरी के कारण अकसर चक्कर आ जाते थे। सब कुछ जान सुन के भी रमा जी निर्विकार भाव से चुप्पी लगाये रखती जैसे कुछ मालूम ही ना हो। सौम्या को अपनी सासू माँ का व्यवहार से बहुत दुःख होता लेकिन सीधी सरल सौम्या मौन रख उनका मान रख लेती थी।
आज भी सौम्या को आराम करता छोड़ विनोद ने चाय बना खुद भी पीया और अपनी माँ को भी दे दिया।
"तूने क्यों चाय बनाई विनोद, बहु कहाँ है"?
"माँ सौम्या की तबीयत ठीक नहीं तो वो सो रही है ।"
"डॉक्टर की दिखा दिया, दवा करवा दिया अब ये कैसी कमजोरी है जो जा ही नहीं रही है? कैसी बीमार बहु घर आ गई।"
"माँ ऐसा क्यों बोल रही हो? बीमारी घर और इंसान देख थोड़े ही आती है और फिर सौम्या को टाइफाइड हो गया था उसके बाद तो कमजोरी आती ही है।"
"वो तो ठीक है लेकिन नाश्ते का क्या होगा? मेरी भी उम्र हो चली है मुझसे इतना काम नहीं होता।" बेटे के बात पे मुँह बनाती रमा जी ने कहा।
माँ की बात पे विनोद आश्चर्य में पड़ गया, " अभी छः महीने ही हुए थे सौम्या को बहु बन आये हुए उसके पहले तो सारा काम माँ अकेली ही करती थी एक कामवाली आती थी सफाई करने उसके साथ भी माँ लगी रहती थी और अचानक छः महीनों में माँ इतनी बूढ़ी हो गई की एक कप चाय भी नहीं बना सकती थी।
माँ के साथ बहस में करना विनोद को किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं लगता था इसलिए उसने बिना कोई ज़वाब दिये नाश्ते की तैयारी की और ऑफिस निकल पड़ा।
थोड़ा सो कर सौम्या उठी तो तबीयत संभली लग रही थी नहा धो कर दोपहर का खाना बनाया।
"माँजी खाना खा लीजिये।"
"बहुत जल्दी बना दिया खाना बहु अब सीधा रात को ही खाऊँगी। मेरा मन तो मेरे बेटे की हालत देख कर ही भर गया। अच्छा खासा मेरा श्रवण कुमार जैसा बेटा जोरू का गुलाम बन कर रह गया है ।"
सासू माँ की रूखी बातें सुन सौम्या की रुलाई फुट पड़ी चुपचाप सास को खाना दे कमरे में आ गई।
पिछले छः महीनों की बीती बातें आँखों के आगे चलचित्र सी घूम रही थी। कितनी ख़ुश थी सौम्या विनोद को अपने हमसफर के रूप में पा कर उसका सौम्य स्वाभाव और सुलझा व्यक्तित्व सौम्या को बहुत पसंद आया था। छोटा सा परिवार था विनोद का। कहाँ तो सौम्या ने सोचा था को अपनी सासू माँ की सेवा कर उनका दिल जीत लेगी लेकिन यहाँ तो सासू माँ हमेशा उखड़ी उखड़ी रहती सौम्या से।
शाम को विनोद ऑफिस से आया तो सौम्या की सूजी ऑंखें और माँ का सुजा मुंह जैसे सब बता दिया उसे। समझ तो विनोद भी रहा था की उसकी माँ व्यवहार सौम्या के प्रति अच्छा नहीं लेकिन माँ को दुःख ना हो तो चुप लगाये हुए था।
"क्या हुआ माँ सब ठीक है ना?"
"मुझे क्या होना है? तुनक के माँ ने ज़वाब दिया।"
"फिर नाराज़ क्यों हो? सौम्या का चेहरा भी उतरा हुआ है।"
"वाह बेटा वाह ! बड़ी जल्दी बीवी का चेहरा पढ़ना सीख गया। जा अब जा कर मना उसे, खाना बना खिला, रसोई में रखे बर्तन धो... पक्का जोरू का गुलाम बन गया है तू तो। ऐसी उम्मीद ना थी तुझसे कभी देखा है अपने चाचा ताऊ के बेटों को अपनी पत्नियों की मदद करते? वो तो अच्छा है हम अलग रहते है वर्ना सब के बीच मज़ाक बन कर रह जाते हम माँ बेटे।"
माँ की बातें सुन विनोद सन्न रह गया..।
"ये कैसी बातें कर रही हो माँ? अगर पत्नी बीमार है और पति उसकी मदद कर दे तो वो जोरू का गुलाम बन जाता है। मदद तो मैं आपकी भी करता था तब तो चाचा, ताऊ सब मुझे श्रवण कुमार जैसा बेटा कहते थे। अब अगर मैं सौम्या की मदद कर रहा हूँ वो भी तब जब उसकी तबीयत ठीक नहीं है तो मैं गुलाम बन गया ।"
" माँ, जब सौम्या हम दोनों का ध्यान रख सकती है तो क्या मेरा और आपका फ़र्ज नहीं की हम उसका ध्यान रखे। मेरे हर जरूरत में वो मेरे साथ खड़ी रहती है तो मैं क्यों ना खड़ा रहूँ उसके साथ " ?
"पति पत्नी के रिश्ता बराबरी का होता है ये कहाँ लिखा है की सारे काम पत्नी के और आराम पति के होते है? घर के कामों में अपनी पत्नी की मदद करने से ना तो मैं जोरू का गुलाम बनता हूँ और ना ही मेरी मर्दानगी कम होती है। मर्दानगी तो औरत को सम्मान देने में है उसे बराबरी का अधिकार देने में है। बल्कि मैं तो फ़क्र से कहता हूँ की मैं जोरू का गुलाम नहीं एक जिम्मेदार पति बनने की कोशिश कर रहा हूँ ।"
"माँ बहुत छोटा परिवार है हमारा बस हम तीन ही तो है आप बड़ी है हमारी माँ है ऐसे में अगर आप हम दोनों को प्यार और आशीर्वाद नहीं देंगी तो कौन देगा? माँ सौम्या बहुत अच्छी लड़की है उसको प्यार देंगी तो बदले में आप भी मान सम्मान पायेंगी।"
विनोद की बातें सुन रमा जी भी दंग रह गई। कटु लेकिन कितनी सच्ची बात कह गया था उनका बेटा। जब बेटा सेवा करें तो श्रवण कुमार और जब वही बेटा जब अपनी पत्नी की मदद कर दे तो जोरू का गुलाम बन जाता है। अपनी छोटी सोच पे आज खुद ही शर्मिंदा हो गई थी रमा जी। माँ के चेहरे पे आये भाव पढ़ मन ही मन विनोद भी समझ गया की आज उसकी माँ को रिश्तों की सही परिभाषा समझ आ गई थी। विनोद का मन निश्चिंत हो उठा था क्यूंकि अब उसका परिवार एक सुखी परिवार बनने की रह पे चल पड़ा था।
प्रिय पाठकगण, जब भी कोई बेटा अपने माता पिता भाई बहन की सहायता या सेवा करता है तो श्रवण कुमार बन जाता है लेकिन जब वो अपनी पत्नी की मदद कर दे तो जोरू का गुलाम बन जाता है। ये कहाँ तक उचित है? पति पत्नी तो बराबर के रिश्ते में होते है फिर प्यार और देखभाल दोनों को एक दूसरे की बराबर ही करनी चाहिये। आशा है कहानी पसंद आयी होगी
