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शालिनी गुप्ता "प्रेमकमल"

Inspirational

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शालिनी गुप्ता "प्रेमकमल"

Inspirational

जीवन डायरी... 2- दो चेहरे

जीवन डायरी... 2- दो चेहरे

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आज मैं बैठे बैठे सोच रही थी, कितनी अजीब जिंदगी है ना हमारी.. कि हम होते तो 'एक' हैं , पर अपने अंदर कितने किरदार जीते हैं और इन किरदारों के साथ उतने ही मुखौटे लगाए हुए...किसी के लिए कुछ....किसी के लिए कुछ l

ऐसा भी नहीं कि किसी एक शख्स की बात हो.. हर शख्स की यही शख्सियत होती है, चंद सेकंडो में बदल जाती हैं l एक चेहरा बिल्कुल सही और दूसरा चेहरा बिल्कुल उसके उलट ...घरवालों के लिए अलग चेहरा, बाहरवालों के लिए अलग l

घर में आपके साथ कितना भी बुरा हो जाए या आप कितने ही दुखी हो, पर घर के बाहर, सबके सामने मुस्कराते हुये ही पेश आना है l और तो और मुझे लगता है, ये "दो चेहरे" की जिंदगी की शिक्षा ना बच्चों को पैदा होते ही सिखाई जाने लगती हैं या वो खुद देख देख कर सीख जाता है l

बॉस आया नहीं.. चट से "जी हुजुर" का मोड ऑन हो गया, जैसे ही गया.. ##¥ कुछ बुरा ही निकलेगा मुहँ से l सबसे ज्यादा हँसी तो इस बात की आती हैं कि जिस परिवार के लिए "कोल्हू के बैल" की तरह मर मर के घिसटते है, कि सभी देखकर कह उठते है.. हाय ! कितनी मेहनत करता है ये अपने परिवार के लिए..लेकिन जैसे ही घर पहुँचे नहीं उसी परिवार की बैन्ड बजा देते हैं.. बताओ भला ..ये कैसी जिंदगी है l 

जिस बीबी के सामने रात में "कुकुर" की तरह थे,सुबह शेर की तरह दहाड़ते दिखेगे, जिन माता पिता के लिए सबके सामने झुके जा रहे थे या जिनके लिए लड़ने के लिए भी तैयार थे या कुछ सुन भी नहीं सकते.. लेकिन रात में अकेले में उनके लिए कुछ और ही गुस्सा निकल रहा है l अब बताओ !! कभी कभी सोचती हूँ कि पहले जो देखा था वो सही था कि अभी जो देख रही हूँ वो सही है l

बड़ी दुविधा होती हैं समझने में.. खासकर के बच्चों को सबसे ज्यादा.. क्योंकि जब मैं बच्ची थी..मुझे भी बहुत हुई l

कभी कभी तो मुझे लगता है कि मुझे ये सब समझने में अभी भी दिक्कत होती हैं या कह सकते हो कि गुस्सा आता है l बच्चे बेचारे तो समझ ही नहीं पाते ..उनकी स्थिति तो और भी बुरी होती है l 

उदाहरण के तौर पर देखें तो जो चाचा उसको अच्छे लगते हैं.. लेकिन मम्मी के अनुसार देखें तो बुरे लगने लगते हैं,.. पापा का तो और कुछ समझ नहीं आता.. जो थोड़ी देर पहले उनके ऊपर गुस्सा कर रहे थे, उनके आते ही बड़े प्यार से पेश आते हैं, और तो और, उनके जाने के बाद उनकी चिन्ता में परेशान हो जाते हैं l फ़िर बच्चों को अपनी बुद्धि के अनुसार जो सबसे ज्यादा समझ आता है उसके अनुसार व्यवहार करने की सोचते हैं तो डाँट पड़ जाती हैं l फ़िर बेचारे आख़िरकार डाँट खा खाकर यही फ़ैसला करते हैं कि जैसे मम्मी पापा करे.. वैसे ही करना है l

ये "दो चेहरे की जिंदगी" को सामाजिक भाषा में लोग.. दुनियादारी निभाना कहते है, जो मुझे आज तक निभाना नहीं आई या कह सकते हो समझ में ही नहीं आई l मेरे लिए.. मुझे जो सामने दिख रहा है वही सच है, इसके आगे मैं ज्यादा दिमाग नहीं लगाती l सहजता और सरलता मेरे लिए बहुत जरूरी है l मेरे लिए चीजे या तो सही है ..या फ़िर गलत.. और उसको कहने से भी नहीं चूकती.. इसलिए बहुत बहुत "लपेटो" में आ जाती हूँ.. फ़िर समझ आता है कि किन परिस्थितियों में फ़ँस गई l फ़िर सोचती हूँ कि सचमुच.. कितनी मूर्ख हूँ मैं.. मेरा कुछ नहीं हो सकता l

चलो डुअल फेस तो समझ आ भी जाए.. लेकिन इसका एक अपग्रेड वर्जन भी आ गया है जिसे कहते हैं "डबल स्टैन्डर्ड"

अपने लिए कुछ, दूसरो के लिए कुछ....चलो इस पर फ़िर कभी बात करेँगे ..........


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