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Prabodh Govil

Drama


4  

Prabodh Govil

Drama


ज़बाने यार मनतुर्की - 9

ज़बाने यार मनतुर्की - 9

10 mins 244 10 mins 244

आम तौर पर फिल्मस्टारों को अपनी तरफ से कुछ बोलने का अभ्यास नहीं होता, क्योंकि उन्हें संवाद लेखक के लिखे संवाद बोलने के लिए दिए जाते हैं।

लेकिन उस दिन पार्टी के बाद चढ़ती रात के आलम में हिंदुस्तान के फ़िल्म वर्ल्ड की दो हीरोइनें एक दूसरी से ऐसी उलझीं कि उनके दिल के तरकश से एक से एक पैने संवाद अपने आप निकलते चले गए।

बबीता के भाई का जन्मदिन था। इसी उपलक्ष्य में थी पार्टी। केवल घर के लोग और चंद करीबी लोगों का जमावड़ा था।

हमेशा अपने काम से काम रखने वाली बड़ी बहन साधना को न जाने क्या सूझा उस दिन, कि बबीता को नसीहत दे बैठी। दोनों आपस में कुछ बात कर पाने की गरज़ से यहां एकांत में इसीलिए चली आई थीं।

असल में साधना को घरवालों की बातों से कुछ उड़ती- उड़ती भनक सी मिली थी कि राजकपूर और साधना के बीच दो- तीन बार बबीता को लेकर जो बातें हुई हैं, वो किसी तीसरे के माध्यम से बबीता के कानों तक भी पहुंच गई हैं और बबीता इस बात से खिन्न है। उसे ये अच्छा नहीं लगा है कि साधना ने कभी बबीता से इस बात को लेकर कोई ज़िक्र नहीं किया और न ही बबीता को विश्वास में लेकर उससे कुछ पूछने की कोशिश की। उसे लगता था कि साधना ने न जाने ऐसा क्या कहा है कि राजकपूर बबीता से बात भी करने से बचते हैं।

ये उन राजकपूर के घर की बात है जिनके दोनों छोटे भाई शम्मी कपूर और शशि कपूर ही नहीं, बल्कि बेटा रणधीर कपूर भी बबीता के साथ दोस्ताना ताल्लुक़ रखते हैं।

बबीता की उलझन ये थी कि राजकपूर के मन की थाह इनमें से कोई नहीं जानता था और इस बारे में राज जी ने केवल और केवल साधना से ही बात की थी।

शायद वे साधना को ही मानसिक रूप से अपने समकक्ष व अपनी मानसिकता के स्तर का समझते थे।

और लोग तो इन बातों के बारे में कोई बात करना भी पसंद नहीं करते थे, और इन्हें बच्चों की आपसी नोंक- झोंक समझ कर किसी भी तरह गंभीरता से ही नहीं लेते थे।

और शायद इसी कारण बबीता को ऐसा लग रहा था कि इस मामले में साधना बबीता की गार्जियन की तरह बात कर रही हैं।

अगर ऐसा था भी, तो इसमें ग़लत क्या था? साधना बबीता से पूरे सात साल बड़ी थीं। दूसरे, साधना ने अपने जीवन के पहले आठ सालों में ही जो कुछ देख लिया था, वो बबीता सोच भी नहीं सकती थी। बबीता का जन्म तो मुंबई में ही देश को आज़ादी मिलने के बाद आज़ाद भारत में एक ऐसे परिवार में हुआ था जिसमें पिता फ़िल्म कलाकार थे तो माता एक विदेशी महिला।

जबकि साधना ने अपने परिवार को बचपन में ही दर- बदर होते हुए देखा था, अपने संपन्न परिवार के सपनों को विभाजन की आंच में सुलगते और छिन्न- भिन्न होते देखा था, एक मुल्क से दूसरे में पलायन के दर्द को देखा था और फ़िर जो मुकाम पाया वो अपनी सलाहियत,अपनी जिजीविषा के बल पर पाया था। ऐसे में परिपक्वता के मामले में उनके और बबीता के बीच का मानसिक अंतर सात साल से कहीं ज्यादा बड़ा था।

फ़िर एक बात और थी।

किसी- किसी का स्वभाव ऐसा निर्मल, आत्मीय और सहयोगी होता है कि वो सबसे अपनापन मानते हुए वही करते हैं जो सबके लिए उचित हो, लेकिन कुछ लोग इतने आत्मकेंद्रित व कैलकुलेटिव होते हैं कि उन्हें कुछ भी कहने या करने में केवल अपना हित नज़र आता है। ऐसे में वो किसी और के लिए अपनी तरफ़ से कुछ करने या कहने का जोखिम भी नहीं उठाते। वो ज़िन्दगी को तौल - मोल के जीने में ही यकीन रखते हैं।

- मैं तुमसे बड़ी हूं, तुम्हारा भला- बुरा सोच सकती हूं।

- हां हां, तुम बड़ी हो, इतनी बड़ी कि हम सब तो तुम्हारी ऊंचाई को छूने की सोच भी नहीं सकते! है न? तुम लाखों रुपए कमा रही हो...

- चुप कर! ये रुपए की बात बीच में कहां से आ गई? साधना लगभग चीख पड़ीं।

- आज तुम्हारी बात का सब यक़ीन करते हैं, तुम जो फ़ैसला करोगी वही माना जाएगा न, हम सब की वैल्यू क्या है, हमारी औकात क्या है! बबीता ने व्यंग्य किया।

- तू नहीं जानती, छोटी बहन तो अपनी औलाद की तरह होती है!

- वाह! औलाद की तरह? औलाद का कभी ऐसा भला मत सोचना कि ज़िन्दगी में औलाद के लिए तरस ही जाओ! कहते हुए बबीता रो ही पड़ी।

कोई और होता तो शायद उसका हाथ ही उठ जाता।

ऐसा श्राप मिलने पर शायद दुनिया की कोई भी औरत अपने होशो हवास में खड़ी नहीं रह सकेगी, पर वो साधना थीं। जिनके बोले एक एक संवाद ने हिंदुस्तान के घर घर में असर छोड़ा था, जिनकी शख्सियत को लोग जेब से पैसा देकर सिनेमा हॉल में देखने आते थे।

वो "मिस्ट्री गर्ल" अपने जेहन की पथरीली दीवार पर ज़हरीले तरकश से निकले तीर का ये वार चुपचाप सह गई, और दोनों बहनें छत से उतर कर नीचे के कोलाहल में आकर इस तरह घुल- मिल गईं जैसे कुछ हुआ ही न हो।

उन्नीस सौ छियासठ में साधना की शादी के बाद कई दिशाओं से उलझनों का उनकी ओर बढ़ते हुए आना हैरान करने वाला था। जिस तरह कभी ऐसा समय आता है कि मिट्टी को हाथ लगाने पर वो सोना बन जाए, उसी तरह कभी ऐसी ग्रहचाल से इंसान का सामना होता है कि वो सब कुछ अच्छा करे,फ़िर भी नतीजे निराशा जनक आएं। जाता हुआ ये साल शायद साधना के लिए ऐसा ही समय लाया था।

शम्मी कपूर के साथ इस साल रिलीज़ हुई फ़िल्म "बदतमीज" ने भी अजीबो- गरीब दास्तां रची। अच्छे गीत - संगीत, अच्छी कहानी, और बहुत अच्छी स्टार कास्ट के बावजूद फ़िल्म ने साधारण बिज़नेस ही किया।

शम्मी कपूर और साधना के चाहने वालों को सबसे ज़्यादा निराशा तो इस बात से हुई थी कि दोनों पहले "राजकुमार" जैसी शानदार रंगीन फ़िल्म दे चुकने के बाद अब इस ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म में क्यों आए हैं।

दरअसल ये भी गबन की तरह ही बहुत पहले शुरू की गई फ़िल्म थी। ये कुछ शूटिंग के बाद रुक गई थी। और अब मन मोहन देसाई ने इसे दोबारा से शूट करके रिलीज़ किया था।

इस सामान्य व्यावसायिक फ़िल्म ने भी एक और रिकॉर्ड साधना के नाम लिखा। इसमें पहली बार किसी नायिका पर पूरा गीत स्विमिंग सूट में फिल्माया गया। यूं नरगिस नूतन जैसी हीरोइनों ने भी ऐसे दृश्य किए थे किन्तु वो केवल कुछ समय के लिए झलकियों के रूप में ही थे। पूरा गीत किसी नायिका पर इस परिधान में फिल्माने का ये पहला ही अवसर था, और इसका श्रेय भी नायिका के शरीर की संतुलित सुंदरता को दिया गया।

फ़िल्मों की रिकॉर्ड बुक ऐसे कई प्रतिमानों से भरी पड़ी है। किसी फिल्म के नाम का किसी शहर के नाम पर होना भी लव इन शिमला से ही आरंभ हुआ था, जो साधना की पहली हिंदी फ़िल्म थी। इस के बाद तो टोक्यो,पेरिस, दिल्ली,मुंबई नामों में आते ही रहे।

फ़िल्म में शंकर जयकिशन का सुन्दर संगीत था और गाने भी अधिकांश अच्छे थे। एक गीत ने तो शायद अनजाने ही आने वाले दिनों का संकेत भी दे डाला था साधना को...

बुलंदियों से गिरोगे तुम भी, अगर निगाहों से हम गिरेंगे !

शोख़ चटख बुलंदियों के शोहरत - सिंहासन से उतर कर ही तो थायराइड के इलाज के लिए साधना को जाना पड़ा था।

कहते हैं थायराइड ग्रंथि गर्दन में नीचे की ओर तितली के आकार में होती है जो श्वास नली को घेरे रहती है।

इस ग्रंथि में आए विकार का असर वैसे तो पूरे शरीर के स्वास्थ्य पर ही पड़ता है, पर ये आंखों पर भी खास असर डालता है।

साधना के परी चेहरे पर ये विकार दिखाई देना शुरू होते ही आर के नय्यर की नाव तो डगमगाने लगी ही, साधना के शुभचिंतकों को भी गहरी निराशा हुई।

"अनीता" के बाद पूरे साल साधना की कोई और फ़िल्म नहीं आई। अगले साल भी साधना रजतपट से अनुपस्थित ही रहीं।

ऐसा लगने लगा था कि ख़ूबसूरती, जादू और फैशन की रौनकों का एक पूरा दौर मानो अपना जलवा समेट कर ले गया।

इसी समय लोगों का ध्यान इस बात पर भी गया कि लगातार नौ साल की धुआंधार सफ़लता के बाद भी साधना को कोई फिल्मी पुरस्कार नहीं मिला है, और ग्यारह सुपरहिट फिल्में एक के बाद एक देकर उनकी फ़िल्मों से विदाई भी हो गई।

और तभी मीडिया, बुद्धिजीवियों, दर्शकों और फिल्मकारों की नज़र इस बात पर भी गई कि आख़िर फ़िल्म पुरस्कारों का गणित क्या है?

क्या ये अवॉर्ड्स भी जटिल राजनीति के शिकार हैं?

क्या ये पुरस्कार पाना भी कोई प्रायोजित पराक्रम है?

क्या कला और परिश्रम की इस विरासत पर भी चंद घराने राज करते हैं?

क्या लाखों दर्शकों की भावनाओं और पसंद का कोई मोल नहीं है?

क्या "गॉड फादरों" के बिना यहां भी सफ़लता प्रमाण पत्रों पर दस्तखत नहीं होते?

क्या अपनी शर्तों पर जीने वालों के लिए इस सम्मान- महल में कोई कौना ख़ाली नहीं रहता?

और तब फ़िल्म जगत में हलचल के साथ ही एक बड़ी घटना घटी।

उन दिनों "फिल्मफेयर" फ़िल्म जगत की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित फ़िल्म पत्रिका मानी जाती थी। ये बाद में हिंदी में भी निकलने लगी थी किन्तु उन दिनों अंग्रेज़ी में ही निकला करती थी। इस पत्रिका की प्रकाशक कंपनी बैनेट एंड कोलमैन की ओर से ही फ़िल्मों के इस सबसे बड़े और प्रतिष्ठित फ़िल्म अवॉर्ड्स का आयोजन किया जाता था। इसमें साल की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ डायरेक्टर, अभिनेता, अभिनेत्रियों के साथ- साथ गीत संगीत, फोटोग्राफी, कोरियोग्राफी तथा फ़िल्म निर्माण के अन्य तकनीकी क्षेत्रों की हस्तियों को पुरस्कृत करने के लिए चुना जाता था।

इसी समूह की हिंदी पत्रिका "माधुरी" भी उस समय की सबसे बड़ी और प्रामाणिक फ़िल्म पत्रिका मानी जाती थी। इतना ही नहीं, बल्कि इसी समूह की अंग्रेज़ी पत्रिका "इलस्ट्रेटेड वीकली" और हिंदी पत्रिका "धर्मयुग" भी देशभर में सर्वाधिक ख्यात पत्रिकाएं थीं।

एक तरह से कहा जा सकता था कि देश की तात्कालिक बौद्धिकता को आंकने- नापने का बैरोमीटर मुंबई के इसी संस्थान के पास था।

जिस प्रकार पिछले कई वर्षों से फिल्मफेयर अवार्ड्स दिए जा रहे थे, उनका स्वरूप एक सांस्थानिक स्वरूप ले चुका था।

इसी माधुरी पत्रिका से जोड़ कर संस्थान ने ये घोषणा की कि देशभर के पाठकों- दर्शकों की राय के आधार पर प्रतिवर्ष फ़िल्म जगत के "नव रत्नों" को चुना जाएगा, जिन्हें "माधुरी नवरत्न" का खिताब प्रदान किया जाएगा।

इसमें सबसे बड़ी बात ये थी कि इनके चुनाव में किन्हीं आयोजकों, निर्णायकों या समीक्षकों का कोई दखल नहीं होगा और ये पूरा चयन पारदर्शी तरीक़े से पाठकों- दर्शकों की राय के खुले सर्वेक्षण के आधार पर होगा।

ये कहा गया कि इस तरह के चयन में कोई नामांकन, क्रिटिक्स की राय आदि नहीं होगी, और फ़िल्म की आय, खर्च, सफ़लता - असफलता से परे केवल दर्शक अपने आकलन में ये बताएंगे कि पूरे फ़िल्म- जगत के कौन से वो "नौ" प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं जिन्होंने इस वर्ष में फ़िल्म - उद्योग को सर्वाधिक प्रभावित किया है।

इस घोषणा से पाठक समुदाय काफ़ी खुश हुआ और लोगों ने निर्धारित समय में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बढ़ चढ़ कर भाग लिया। इस लोकतांत्रिक पद्धति में किसी पूर्वाग्रह या मैनिपुलेशन आदि की कोई आशंका नहीं थी, और वही सामने आना था जो सर्वाधिक लोग चाहते हों।

इस विराट सर्वेक्षण का परिणाम आया और इसमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में राजेश खन्ना और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में साधना का नाम आया।

माधुरी ने पूरे पृष्ठ के रंगीन फोटो इन सभी कलाकारों के छापे।

फ़िल्म फेयर अवॉर्ड्स की श्रृंखला में साधना को दो बार बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया गया था, लेकिन दोनों ही बार ये पुरस्कार अंतिम रूप से किसी अन्य अभिनेत्री को दे दिया गया।

अब सीधे जनता द्वारा इन नवरत्नों को चुना जाना स्पष्ट रूप से बताता था कि पुरस्कारों में गुटबाज़ी में लिप्त समीक्षकों, प्रायोजकों, आयोजकों का दखल इन प्रतिभा पुरस्कारों को किस तरह से प्रभावित करता है। ढेर सारे दर्शकों ने इस तथ्य को उजागर करने वाले मंतव्य प्रकट भी किए।

लेकिन इस उपक्रम की यही भव्य निष्पक्षता फ़िल्म जगत की नैया अपनी मनचाही दिशा में खेने वालों की आंख की किरकिरी बन गई।

उन्होंने पहले तो चयन प्रक्रिया में तोड़ - मरोड़ प्रस्तावित करके इसके प्रभाव को कुंद करने की कोशिश की ओर फ़िर एक वर्ष बाद ही इसे बंद करवा छोड़ा। एक स्वस्थ परंपरा इस तरह ठंडे बस्ते में चली गई।

फ़िल्मों के इसी दौर में एक नई प्रवृत्ति भी फिल्मी दुनिया में दिखाई दी।

पहले जहां फ़िल्म में किसी कलाकार को अभिनय का अवसर देने के लिए कई तरह की कड़ी जांच, परख, परीक्षा होती थी, अब ये चलन होने लगा कि जो जमे हुए स्थापित कलाकार हैं वही अपने बच्चों या अन्य परिजनों को मौक़ा देने या दिलवाने लगे।

ये एक गहरी चर्चा का विषय बन गया कि एक्टिंग नैसर्गिक प्रतिभा होती है, या फ़िर ये प्रशिक्षण के द्वारा सीखी जा सकने वाली कला है।

कुछ ऐसे संस्थान भी खुल गए जो बाकायदा एक्टिंग का पूरा कोर्स करवा कर अभिनय का प्रशिक्षण देने लगे। एक्टिंग सीख कर आने वालों की एक पूरी खेप फ़िल्मों में सक्रिय हो गई। जिस तरह पहले डायरेक्टर, एडिटर, सिनेमेटोग्राफर आदि काम सीखते थे, वैसे ही एक्टिंग भी देश - विदेश में सीखी जाने लगी।

बदलाव का ये दौर एक ताज़गी भरे झौंके की तरह फ़िल्म जगत में भी दिखाई देने लगा।


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