Prabodh Govil

Drama


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ज़बाने यार मनतुर्की - 10

ज़बाने यार मनतुर्की - 10

10 mins 144 10 mins 144

सिनेमा हॉल भी थे, कहानियां भी थीं और फ़िल्में देखने वाले भी थे।

पर साधना नहीं दिखाई दे रही थीं। उनकी आवा- जाही अब कैमरे और लाइटों के सामने नहीं, वरन् डॉक्टरों और विदेशी क्लीनिकों में हो गई थी।

उनकी समकालीन अभिनेत्रियों में नूतन " लाट साहब" और "मिलन", आशा पारेख "शिकार" और "आए दिन बहार के", वहीदा रहमान "पालकी" और "पत्थर के सनम", माला सिन्हा "गीत" और "ललकार", सायरा बानो "पड़ोसन" और "शागिर्द" में लगातार दिखाई दे रही थीं लेकिन साधना की कई फिल्में या तो रुक गईं या बदल कर दूसरी हीरोइनों के हाथों में चली गईं।

रणधीर कपूर और बबीता प्रकरण ने इधर साधना और उधर राजकपूर, दोनों को ही जैसे चुप कर दिया। वे दोनों आपस में भी बात नहीं करते थे।

यहां तक कि राजकपूर के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट "अराउंड द वर्ल्ड" के निर्माता पाछी को भी दोनों का ये अबोला और ठंडापन बेचैन कर गया। क्योंकि इस फ़िल्म की कहानी पूरी तरह साधना को दिमाग़ में रख कर ही लिखी गई थी। इसकी शूटिंग दुनिया भर के अनेकों देशों में होनी थी। और राजकपूर व साधना ये सोच भी नहीं पा रहे थे कि उनका इतना लंबा साथ भला कैसे रह सकेगा।

फ़िल्म में राजश्री को ले लिया गया।

उधर राजकपूर ने अपनी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" के एक पार्ट में अपने बेटे ऋषि कपूर की टीचर के रूप में साधना की बुद्धिमत्ता पूर्ण सुंदरता को कैश कराने का जो प्लान बनाया था उस पर भी गाज़ गिरी और इस इंटेलीजेंट शिक्षिका के रूप में दर्शकों ने फ़िर सिमी ग्रेवाल को देखा।

ख़ैर, साधना अमरीका गई थीं इलाज के लिए। और जैसे कभी किसी शहंशाह ने कश्मीर के लिए कहा था कि अगर कहीं धरती पर ज़न्नत है तो यहीं है, वैसे ही अमरीका के लिए कहा जाता है कि अगर किसी रोग का धरती पर कोई इलाज है तो यहीं है। अगले साल के अंत तक साधना लौट आईं। स्वस्थ होकर, बीमारी से निजात पाकर।

उनके लौटते ही उनके पति आर के नय्यर ने उनके लिए एक दमदार कहानी लेकर अपने ही निर्देशन में उन्हें एक ख़ूबसूरत फ़िल्म "इंतकाम" में पर्दे पर उतार दिया।

ये उनके लिए भी और खुद साधना के लिए भी "पैराडाइज री गेंड" जैसी चुनौती थी। एक शानदार मौक़ा था अपने करोड़ों दर्शकों की महफ़िल में फ़िर से लौटने का।

साधना ने इस मौक़े का भरपूर फ़ायदा उठाया और एक जानदार कथानक में जानदार अभिनय के सहारे जान ही डाल दी।

हालांकि अब उनके चेहरे पर बीमारी के इलाज के बाद आई हल्की छाया दर्शकों को नजर आती रही, फ़िर भी फ़िल्म ने बेहतरीन व्यवसाय किया।

कहानी में भी नयापन था। दुख, लांछन और अवहेलना सहती नारी के उस दौर में दर्शकों को बदला लेने वाली आधुनिक औरत पसंद आई।

इस फ़िल्म में साधना के लिए ही नहीं, बल्कि उस पात्र के लिए भी हमदर्दी की पूरी गुंजाइश थी जो साधना अभिनीत कर रही थी।

इसमें एक गरीब परिवार की लड़की जो अपना और अपनी मां का पेट पालने के लिए एक छोटी सी दुकान में नौकरी कर रही है, उसे मालिक जिस्म का सौदा न करने पर झूठे आरोप में फंसा कर जेल करवा देता है।

जेल से लौट कर लड़की उस धन पिशाच से अपने तरीक़े से बदला लेती है। वो उस शख़्स के युवा बेटे से प्रेम करके शादी करती है और शादी के अगले ही दिन रिसेप्शन पार्टी में खुद शराब पीकर उस मालिक को जलील करके उससे बदला लेती है जो अब उसका श्वसुर है।

इस फ़िल्म का गीत संगीत भी बहुत प्रभावशाली था और शराब के नशे में साधना पर फिल्माए गए गीत "कैसे रहूं चुप कि मैंने पी ही क्या है, होश अभी तक है बाक़ी..." ने भी समा बांध दिया। उसे साल का सर्वश्रेष्ठ गीत ठहराया गया।

फ़िल्म की कमाई से साधना के पति नय्यर साहब के कर्ज भी उतर गए, और गाड़ी एक बार फिर से पटरी पर आ गई।

दर्शकों ने जहां साधना के अभिनय और गीत को बेहद पसंद किया वहीं फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने इस बात पर आपत्ति जताई कि फ़िल्म में नायिका को शराब पीते हुए कैसे दिखाया जा सकता है, ये ग़लत होगा।

और तब फ़िल्म के निर्देशक को इस गीत के तुरंत बाद एक छोटा सा दृश्य और जोड़ना पड़ा जिसमें साधना अपनी मित्र से कहती है कि मैंने तो बदला लेने के लिए शराब पीने का नाटक किया, वास्तव में मेरे हाथ में तो ग्लास में कोका कोला थी।

ऐसी आपत्ति उठा कर और छद्म समाधान करवा कर सेंसर बोर्ड ने शायद अपनी हंसी ही उड़वाई।

हमारे फ़िल्म जगत ने अपने चंद चहेतों के ऐसे दृश्य और फ़िल्में भी धड़ल्ले से पास किए हैं जिनमें हीरोइनें फ़िल्म के पर्दे पर भी और वास्तविक जीवन में भी शराब पीते - पीते दिवंगत हो गईं और सेंसर बोर्ड के कानों पर जूं तक न रेंगी।

बहरहाल इंतकाम फ़िल्म से एक तरह से साधना की वापसी ही हुई।

यद्यपि इस दशक के ख़त्म होने तक फ़िल्म जगत में भारी बदलाव दिखाई देने लगा था, फ़िर भी साधना ने एक बार दोबारा ये सिद्ध किया कि वास्तविक कलाकारी देखने वालों की नज़र से इतनी आसानी से ओझल नहीं होती और बेहतरीन काम दर्शकों द्वारा सराहा ही जाता है।

कुछ वरिष्ठ समीक्षक और फ़िल्म वर्ल्ड के सयाने साधना के कभी पुरस्कृत न होने के सवाल पर ये कहते थे कि वस्तुतः पुरस्कार एक प्रोत्साहन है जो उपलब्धि पर बांटने के लिए नहीं, बल्कि उपलब्धि के लिए प्रयास करने को उकसाने के लिए है। कभी - कभी ऐसी बातें सत्य प्रतीत होती थीं।

एक बार एक पत्रकार ने साधना का साक्षात्कार लेते हुए उनसे ये सवाल किया कि ऐसे कौन से नायक हैं जिन्होंने साथ में काम करते हुए आपको सताया या तंग किया हो। साधना ने कहा एक हीरो मुझे याद है कि वो अपने उल्टे- सीधे कॉमेंट्स से मुझे खिजा देता था। मेरा मन नहीं होता था कि इसके साथ काम करूं। निर्देशक उसके साथ दृश्य फिल्माने के लिए बैठा मेरा इंतजार करता रहता था, पर मैं काफ़ी देर तक उठ कर जाती ही नहीं थी। मेरा मन ही नहीं करता था।

उसके कॉमेंट्स इतने बचकाने होते थे कि मुझे उन पर गुस्सा भी आता था और हंसी भी। मैं मन ही मन सोचती, कैसे - कैसे लोग होते हैं।

एक दिन तो हद ही हो गई।

शूटिंग से पहले मैं बैठी हुई कुछ खा रही थी। शूटिंग शुरू होने में कुछ वक़्त था। वो कहीं से टहलता हुआ आया और बोला- इसे जब देखो, कुछ न कुछ खाती ही रहती है।

मुझे एक दम से गुस्सा आ गया। मैं ज़ोर से बोल पड़ी- मेरे खाने का पेमेंट आप तो नहीं कर रहे हैं।

वो एकदम से सकपका गया। यूनिट के सभी लोग हंस पड़े तो उसे और भी इंसल्टिंग लगा। बेचारा खिसिया कर कुछ दूर अलग थलग जा बैठा।

तुरंत ही डायरेक्टर ने शूटिंग शुरू कर दी। और हमें बुलाया। हम दोनों का एक बहुत अंतरंग प्रेम दृश्य था। उधर वो मुरझाया बैठा था इधर मैं तमतमाई बैठी थी।

मैंने सोचा, कैसे होगा ये दृश्य। मुझे उठने में भी ज़ोर आने लगा। पर हम उठे, कैमरे के सामने आए और एक बार में ही शॉट ओके हो गया। मैंने राहत की सांस ली।

संयोग देखिए, इसी हीरो संजय खान ने साधना के साथ दो फ़िल्में की, और दोनों ही सुपरहिट साबित हुईं।

इंतकाम के बाद संजय खान और साधना की फ़िल्म "एक फूल दो माली" आई और ये इंतकाम से भी बड़ी हिट साबित हुई। लोगों ने कहा कि साधना संजय की जोड़ी ज़बरदस्त हिट रही।

साधना का कहना था कि इन दोनों ही फ़िल्मों में एक एक सीनियर सोबर आर्टिस्ट - अशोक कुमार और बलराज साहनी साथ में थे इसलिए शूटिंग का समय अच्छा कट गया।

कहा जाता है कि संजय खान के इस व्यवहार में संजय की ज़्यादा गलती नहीं थी।

क्योंकि एक तो संजय फिरोज़ खान का भाई होने के कारण बहुत पहले से ही छुटपन से फिल्मों में आ रहा था, इसलिए कई कलाकारों के मुंह लगा हुआ था, और वो उसकी बातों का बुरा भी नहीं मानते थे।

दूसरे जब आर के नय्यर ने उसे इंतकाम के लिए साइन किया तो उसे बताया गया था कि वो साधना से उम्र में छोटा है, अतः अगर वो इस ग्रंथि को पालेगा कि हीरोइन उससे सीनियर हैं तो उनके साथ प्रेम दृश्य अच्छी तरह नहीं कर सकेगा, इसलिए उसको साधना से उसे अपने बराबर की दोस्त समझ कर उससे दोस्ताना व्यवहार रखने की कोशिश करनी है। यही कारण था कि संजय कुछ न कुछ ऐसा कह जाता था जो साधना को अटपटा लगता था।

नय्यर को ये भी मालूम था कि संजय खान बबीता के साथ एक हिट नंबर कर चुका है और उसके साथ काफ़ी घुला- मिला है।

शायद साधना को भी ये बात इरिटेट करती हो।

यहां भी वही बात थी कि उसने छोटी बहन के साथ पहले काम कर लिया और बड़ी के साथ बाद में कर रहा था।

इंतकाम में संजय खान के काम की भी काफी तारीफ़ हुई। कुछ समीक्षकों का तो यहां तक कहना था कि इंतकाम की भूमिका संजय खान के कैरियर की सर्वश्रेष्ठ भूमिका थी।

लगातार एक के बाद एक दो हिट फ़िल्में देने से साधना का आत्म विश्वास लौटा ही, संजय खान के लिए भी साधना लकी सिद्ध हुईं।

"एक फूल दो माली" देवेन्द्र गोयल की फ़िल्म थी जो एक बेहद सफल हॉलीवुड फ़िल्म "फैनी" पर आधारित थी।

देवेन्द्र गोयल काफ़ी पहले से साधना के साथ कोई फ़िल्म करना चाहते थे। वैसे बबीता और संजय खान को लेकर बनाई गई फ़िल्म "दस लाख" भी उन्हीं की थी, पर उनका कहना था कि साधना जैसी सफल प्रतिभाशाली अभिनेत्री के साथ फ़िल्म करने का मज़ा और ही था।

देवेन्द्र गोयल जानते थे कि बीमारी के कारण साधना के चेहरे की आभा प्रभावित हो चुकी है, फ़िर भी उनका मानना था कि साधना जैसी शख्सियत का तिलिस्म दर्शकों के दिमाग़ से इतनी जल्दी नहीं उतर सकता और वो उसे देखने अब भी आयेंगे।

फ़िल्म का गीत संगीत भी मार्के का था, और एक फ़िल्म में जहां कैबरे और शराब पीने के बाद के गाने लता मंगेशकर से गवाए गए थे, वहीं दूसरी फ़िल्म में पारिवारिक गीत भी आशा भोंसले ने गाए थे। ये भी एक नए किस्म का चमत्कार था। फ़िल्म हिमाचल के कुलू मनाली में सेब के बगीचों के बीच फिल्माई गई थी जिसमें साधना का ग्लैमर और संजय का युवा लड़कपन एक बेहतरीन काम कर गया था।

दशक के बीतते - बीतते साधना ने फिर ये सिद्ध कर दिया था कि ये पूरा दशक लगभग उसके नाम ही रहा।

एक फूल दो माली ने कई जगह सिल्वर जुबली मनाई और ये वर्ष की एक अन्य ब्लॉकबस्टर "आराधना" को टक्कर देने वाली फ़िल्म साबित हुई।

आराधना शर्मिला टैगोर के डबल रोल वाली फ़िल्म थी, जो साल की सबसे बड़ी फ़िल्म साबित हुई।

फ़िल्म वक़्त में साधना और शर्मिला टैगोर ने एक साथ काम किया था और साधना ने अपनी बेहतरी भी वहां सिद्ध की थी, किन्तु दशक के बीतने के साथ इस मुकाम पर शर्मिला टैगोर का पलड़ा अब उनके मुकाबले भारी था।

ये दशक बीतते- बीतते कई नई तारिकाओं का आगमन फ़िल्म जगत में हुआ और साधना व अन्य समकालीन अभिनेत्रियों की एक पूरी खेप नई पीढ़ी के नए सपनों से लगभग बाहर हो गई।

इस दौर ने हेमा मालिनी, मुमताज़, जया भादुड़ी, बबीता, ज़ीनत अमान,रेखा, रीना रॉय, परवीन बॉबी, शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल के स्वागत में बंदनवार सजा दिए।

फ़िल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट से एक्टिंग सीख कर भी कई कलाकार फ़िल्मों में आए, और उन्होंने कुछ समय के लिए फ़िल्म उद्योग की बुनियादी मान्यताएं बदल डालीं।

अब फ़िल्म निर्माता सौंदर्य, प्यार, जादू, तिलिस्म, प्रकृति, सरलता, निश्छलता जैसे तत्वों को छोड़ कर तर्क, व्यवहार, व्यावसायिकता, हिंसा, क्रूरता,प्रतिशोध,तकनीक जैसे तत्वों की ओर बढ़ने लगे।

देखते - देखते परिदृश्य बदल गया।

अब महत्वपूर्ण ये था कि पुराने कलाकार क्या करें।

उनके सामने तीन रास्ते थे।

एक, वो शांति सद्भाव और संतुष्टि के साथ रजत पट से विदा ले लें।

दो, वो मां,भाभी, आंटी, पिता, अंकल की सहायक, चरित्र भूमिकाएं

स्वीकार करके कैमरे के सामने बने रहें।

तीन, वो निर्देशक, निर्माता, वितरक, फाइनेंसर आदि बन कर पर्दे के पीछे की भूमिकाएं ले लें और अपने मन को समझा लें कि अब वो रंगमंच की पुतलियां नहीं, बल्कि नेपथ्य के नियामक हैं।

पिछले दशक के अधिकांश कलाकार इन तीन क्षेत्रों में बंट गए।

साधना का मन भी अब निर्देशन के क्षेत्र में हाथ आजमाने का था। वे मन ही मन इसके लिए तैयार होने लगीं।

किन्तु यदि आपने बरसों बरस किसी बाग में गाते- बजाते धुआंधार मेले लगाए हों, तो उनकी गमक कोई एक दिन में तो मिट नहीं सकती।

कुछ- कुछ पुराने प्रोजेक्ट्स, अधूरी फ़िल्में, लेट- लतीफी के नतीजे साधना और आर के नय्यर के पास भी थे जो धीरे - धीरे लोगों के सामने आते रहे।


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