Manoj Charan 'Kumar'

Drama Action Inspirational


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Manoj Charan 'Kumar'

Drama Action Inspirational


हठी बारठ

हठी बारठ

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सांय-सांय करती उत्तर दिशा से बहती हवा ने ठंड कुछ ज्यादा ही बढ़ा रखी थी लेकिन फिर भी पूरे नगर में भाग-दौड़ मची हुई थी। लोग ऊँटों पर सामान लादे हुए थे, जिनके पास घोड़े थे वो घोड़ों पर चढ़े हुए तीव्रता से जा रहे थे। बैलगाड़ियों की कतारें लगी हुई थी सामान से लदपद हुई और सभी के चेहरों पर अपने घरों से बिछड़ने अपने नगर से बाहर जाने का दुख भी गहरे तक चिपका हुआ दिख रहा था। खामोशी के साथ लोग अपने घरों से निकल रहे थे, कुछ की आँखों में आँसू थे तो कुछ के चेहरों पर मजबूरी और लाचारी के भाव भी साफ नजर आ रहे थे। जब से महाराणा ने उदयपुर खाली करने का आदेश दिया तब से लगातार पांचवा दिन था नगर के लोगों की भीड़ की भीड़ अपने महाराणा के आदेश का पालन करती हुई लगातार नगर को खाली कर रही थी। पिछले पांच दिनों में पूरा उदयपुर नगर लगभग खाली हो चुका था।

जब से बादशाह ने हिन्दुओं पर दोबारा से जजिया लगाया है तब से महाराणा राजसिंह ने बादशाह की खिलाफत शुरू कर दी थी। महाराणा ने एक कठोर पत्र बादशाह को लिखा जिसमें मेवाड़ द्वारा जजिया नहीं चुकाने की चेतावनी देकर महाराणा ने अपने हिन्दु हृदय सम्राट होने के विरूद को कायम रखा था। इस गर्मागर्मी के बीच ही महाराणा ने बादशाह के विरूद्ध किशनगढ़ की राजकुमारी चारूमति से विवाह कर उसका उपकार भी किया था। इस कारण बादशाह जो राजसिंह से इस विवाह के कारण द्वेष रखता था उसने इक्का ताजखाँ और रूहेलाखाँ के नेतृत्व में एक बड़ी फौज को उदयपुर पर आक्रमण करने के लिये रवाना कर दिया था। महाराणा को जब पता चला कि, मुगल फौज उदयपुर पर आक्रमण करने वाली है और मेवाड़ के पास इतनी ताकत नहीं है कि, मुगलों का सीधा सामना कर सके तो दूरदर्शी महाराणा ने अपने नगर को खाली कर अरावली की पहाड़ियों में शरण लेने के लिये अपने दरबारियों को आदेश दिया था। इसी आदेश की पालना करते हुए संपूर्ण नगरवासी अपने महाराणा के साथ चल दिये थे।

महाराणा के शाही जनानखाने के साथ महलों की सारी महिलाएं पहले ही जा चुकी थी, महाराणा भी नगर से प्रस्थान कर ही चुके थे और उनके साथ उनके भरोसेमंद सेनापति, दरबारी भी प्रस्थान कर चुके थे। राजकवि और उदयपुर के पोलपात नरूजी बारठ भी अपने सेवादारों के साथ उदयपुर से प्रस्थान करने के लिये घोड़े पर सवार हो चुके थे। बारठजी ने अपने परिवार की महिलाओं को तो महाराणा के जनानखाने के साथ पहले ही भिजवा दिया था। अपने घोड़े पर सवार नरूजी उदयपुर के मुख्य मार्ग से होते हुए जब तोरणपोल (तोरण दरवाजा) से निकल ही रहे थे कि, दूर खड़े किसी ने ताना मार दिया


 बारठजी जिण पोल आडा फिर-फिर नेग लेवता आज बिना हील-हुज्जत कींकर छोड़ चाल्या।   बारठजी का इतना सुनना हुआ कि, उनके मन ने उनको धिक्कार दिया और वो घोड़े से उतर गए] अपने सेवादारों से उदयपुर छोड़ने के लिए कहने लगे -

- जिण पोल माथै इत्ता नेग लिया आज उण पोल नै सूनी छोड़ मैं नहीं जाऊँला, थे लोग पधारो अर महाराणाजी री सेवा करता रैया।

- नहीं बाबोसा हुकुम आप बिन्यां म्हे लोग भी नीं जावां। एक सेवादार बारठजी से कहते हुए अपने घोड़े से उतर गया

   देखते ही देखते बारठजी के साथ उनके सेवादारों ने भी घोड़े त्याग दिये और तोरण-पोल पर ही अपना डेरा जमा दिया। इसी वक्त लाछूड़ा ठाकुर राठौड़ वहाँ पहुँचे और बारठजी की बात सुनी तो उनको कहने लगे -

- बारठजी बाबोसा आप भी किण नाजोगै री बात पर ध्यान दियो, आप रो चालणों भोत जरूरी है, आप जिद छोड़ न म्हारै साथै पधारो।

- नहीं राठौड़ां आ बात अबै नेम-धरम री है, जिण भोम सूं इत्ता नेग लिया आज उण भोम नै सूनी छोड़ता धर्म लाजा मरै। बारठजी ने अपने कुलधर्म को याद करते हुए कहा

   इसी वक्त जनानी ड्योडी के पोलपात डोडीया राजपूत खानदान के शिव सिंह वहाँ आते हैं और राठौड़ के साथ बारठजी के वार्तालाप को सुनते हुए कहते हैं -

- बारठजी बाजी आप रो सामधर्म आपरी जागां है पण इंया सामी मौत ठहरणों कोई समझदारी री बात नहीं है, आप म्हारै साथ हालो।

- समझणहार सुजाण नर मोसर चुकै नहीं। बारठजी ने एक पुरानी कहावत कहते हुए डोडीया ठाकुर को जबाब दिया।

- पण बाजी हुकुम आप महाराणासा रा खास मर्जीदान हो। डोडीया ठाकुर ने बारठजी को बाजी कहते हुए एक बार फिर प्रयास किया।

   परन्तु नरूजी तो एक बार अपनी बात कह चुके थे। इस प्रकार नरूजी अपने हठ पर अड़े रहे और अपना बारहठ नाम सिद्ध करने के कुलधर्म की पालना करने को वहीं तोरणपोल पर अपने डेरे जमा चुके थे मुगलों से लोहा लेने के लिए।

   इधर बारठजी ने अपनी मंशा बता दी तो राठौड़ और डोडीया ठाकुर भी आपस में बातचीत करने लगे।

- इण बिध बारठजी एकला खेत रैय जावैला तो रजपूती मांय धूल पड़ ज्यावैली राठौड़ां। डोडीया ठाकुर ने राठौड़ से कहा

-आप सही फरमावो हुकुम, बारठजी नै इण टेम एकला छोड़ दिया तो आपां महाराणा नै कांई मुंह दिखावांला। राठौड़ सिरदार ने डोडीया ठाकुर की बात की तस्दीक करते हुए कहा

- तो पछै आ बात तय रही आपां भी अबै बारठजी रै साथै ही जीवांला अर उणा रै साथै ई मरांला। डोडीया ठाकुर अपनी तरफ से पक्का इरादा करते हुए कहने लगे और राठौड़ ने उनकी हाँ में हाँ मिलाई

   दोनों राजपूत ठाकुर नरूजी के पास जाते हैं और अपना मंतव्य बतलाते हुए वहीं तोरणपोल पर रूकने को तैयार हो जाते हैं। बाकी सब को वहां से रवाना करवाते हुए बारठ नरूजी सौदा, राठौड़ सिरदार और डोडीया ठाकुर अपने चुने हुए बीस सैनिकों के साथ तोरणपोल पर डट गए मुगल सेना का सामना करने के लिए।

   उधर ताजखाँ और रूहेलाखाँ मुगल सेना को लेकर बड़ी तेजी से उदयपुर को तहस-नहस करने को बढ़ रहे थे। बादशाह ने दोनों सेनापतियों को इक्का की उपाधी दी हुई थी जो तलवारबाजी के सिद्धहस्त यौद्धा को ही मिलती थी। दोनों युद्ध के मद में चूर थे और हिन्दूओं के मंदिरों को तोड़ने और मूर्तियों को खंडित करने के लिये कुख्यात थे। उदयपुर में प्रवेश करते हुए दोनों को पता चल गया कि, पूरा नगर खाली है और अब युद्ध जैसी कोई बात नहीं है तो सिर्फ मंदिरों को लूटने और ध्वंस करने का काम ही बाकी बचा हुआ है। दोनों यौद्धा इसी फिराक में आगे बढ़ ही रहे थे कि, सामने से दो अदम्य साहसी वीर हाथों में नंगी तलवार लिये रास्ता रोके खड़े थे।

   नरूजी बारठ ने अपने साथ रूके डोडीया ठाकुर से कहा था कि, जब मरना तय है तो मुगलों को मार कर ही मरना है और इस पोल पर मरने की बजाय हमें जगदीश मंदिर के पास रूककर भगवान जगदीश्वर की रक्षा करनी चाहिए वहाँ मुगलों के पाँव नहीं पड़ने चाहिए वो मंदिर हमारे लिए तीर्थ समान है। ठाकुर भी बारठजी की बात से सहमत था और इसी कारण मोर्चा बांधा गया जगदीश मंदिर पर। दोनों वीर अपनी नंगी तलवारों से मुगलों को गाजर-मूली की तरह काटने लगे थे। मेवाड़ी खून रगों में उबाल मार रहा था और सामने मुगल सेना लहर-लहर कर आती दीख रही थी लेकिन एकलिंगनाथ की जय बोलते हुए दोनों की सूरमा एक पग भी पीछे नहीं रख रहे थे कि, अचानक से एक धमाका हुआ और दोनों ही वीरों के चीथड़े उड़ गए। मुगलों ने एक छोटी तोप से गोला चलाया था। उन दोनों के गिरते ही रूहेलाखाँ ने जोरदार नारा लगाया

- अल्लाह हो अकबर।

   रूहेलाखाँ का नारा पूरा भी नहीं हुआ था कि, सामने से केसरिया पाग बांधे दो जूझारू वीर एकलिंगनाथ की जय के साथ उसी स्थान पर आ डटे जहाँ अभी-अभी दो वीरों ने अपना बलिदान दिया था। दोनों ने मार-काट मचानी शुरू कर दी थी। मुगल सेना की गिनती ही नहीं हो पा रही थी लेकिन दोनों ही वीर सामने आने वाले हर एक मुगल सैनिक को यूं गिरा रहे थे मानो वो गीली मिट्टी की कच्ची दीवार हो। लेकिन जैसे कहा जाता है ठीक वैसे ही वीरता पर भीड़ भारी पड़ी और दोनों वीर मुगलों को काटते-काटते इतने घायल हो गए कि, अब खड़े रह पाना मुश्किल हो गया, एकलिंगनाथ की जय बोलकर दोनों ही वीर धरती पर गिर पड़े। उनके गिरते ही एक बार फिर अल्लाह हू अकबर का नारा जोर से आसमान में गूंज उठा था। कुछ कदम ही आगे बढ़े थे कि, केसरिया बाना पहने दो नये सैनिक उस मुगल दल के सामने काल के समान नाचने लगे थे। पचास-साठ मुगल सैनिकों को मारने के बाद जब वो सैनिक गिरे और उनके स्थान पर फिर जब नए दो सैनिक आए तो रूहेलाखाँ ने अपना सर पकड़ लिया और चिल्लाया -

- या अल्लाह ये काफिर जाने कहाँ छुप कर बैठे हैं] खत्म ही नहीं हो रहे जबकि पूरा शहर खाली दिख रहा है।

- जनाब ये इनके जंग करने का कौनसा तरीका है जो दो-दो के जोड़े में ये काफिर आ रहे हैं। ताजखाँ ने रूहेलाखां से कहा

- कितने ही क्यों न हो इक्का साहेब मुगलिया फौज के सामने कब तक टिकेंगे। रूहेलाखाँ ने उन दोनों पर आक्रमण करने का आदेश देते हुए कहा

   सुबह शुरू हुई लड़ाई अब दोपहर तक आ गयी थी, अब तक नरूजी बारठ, राठौड़ और डोडीया ठाकुर डटे हुए थे और लगभग पांच सौ मुगल सैनिकों को जन्नत की सैर करा चुके थे। डोडिया ठाकुर ने नरूजी से कहा -

- बाजी, मरने से पैली आपरै मुख से कोई कविता सुण लेता तो सीधो मोक्ष मिल जांवतो।

- रणभोम मांय कविता रो रसपान करण री आपरी हूंस मैं पूरी करूंला ठाकरां। कहते हुए नरूजी बारठ ने एक पुराना छंद सुनाया कि राजपूत सरदार वाह-वाह कर उठे

नरूजी अपनी घन-गंभीर वाणी में जोर-जोर से उच्चारण कर रहे थे -

एकलिंगनाथ सहाय करै, रणखेतां मांय जाय मरै।

मातभोम मेवाड़ धरा, धड़ शीश कटा आजाद मरां।

खग्ग रहै हाथ जबै, मल्लेछ किणा बिध आय तबै।।

   एक के बाद एक छंद नरूजी की वाणी से निकल रहे थे और उधर राजपूत सिरदार मुगलों से लोहा ले रहे थे। सामने हजारों की मुगलिया फौज जिससे टकरा रहे थे बस केवल बीस मेवाड़ी रणबंके। सांझ ढ़लते-ढ़लते सभी वीर काम आये बच गये थे बस नरूजी सौदा, डोडीया ठाकुर और राठौड़। तीनों ने जगदीश मंदिर में भगवान को नमन किया और मेवाड़ धरा को अंतिम प्रणाम किया। तीनों ने एक दूसरे से अमल की मनवार की और जम कर अमल खाया। एकलिंगनाथ की जय बोलकर तीनों एक साथ रण आंगन में कूद पड़े। नरूजी जगदीश मंदिर की सीढ़ीयों पर थे और दोनों राजपूत सिरदार उनसे कुछ आगे बढ़ कर लड़ने लगे थे। दोनों ने नरूजी को इस बात के लिये मना लिया था कि, पहली वीरगति राजपूत की होनी चाहिए। राजपूत के जीते जी चारण रणभूमि में प्राणोत्सर्ग करे यह रजपूती नहीं। तीनों इस बात पर सहमत हो कर ज्यों ही रण में कूदे मानो प्रलय का ज्वार आ गया था। मुगलों के पांव उखड़ने लगे थे, तीनों कालभैरव के समान मार-काट मचा रहे थे। मुगल सैनिक अब आगे बढ़ते हुए डरने लगे थे इसलिये खुद ताजखाँ आगे बढ़ा और नरूजी पर वार करने की कोशिश में उनसे गहरा घाव खा बैठा था। अपने सेनापति का घायल देख चार-पांच मुगल सैनिकों ने प्राण हथेली पर रख उसे वहां से निकाला और सेना के पिछले भाग में लेकर चले गए। इस प्रकार एक सेनापति को रणभूमि से लौटता देख मुगल सेना के मनोबल पर बहुत गहरा असर हुआ लेकिन घण जीतै अर बल हारै।

   पचास-साठ सैनिकों को मारने के बाद डोडीया ठाकुर धरा पर गिर चुके थे। राठौड़ भी काफी घायल हो चुका था और दोनों राजपूतों ने अपने वचन और रजपूती धर्म का पालन करते हुए नरूजी से पहले अपनी शहादत दी, लेकिन नरूजी अभी तक जगदीश मंदिर की पहली सीढ़ी पर खड़े मुगलों का काल बने हुए थे।

सांयकाल की आरती का समय हो चुका था। नरूजी बारठ ने जोर से भगवान जगदीश्वर और एकलिंगनाथ का जयकारा लगाया, अपनी कुलदेवी को याद किया और मेवाड़ धरा को अपना अंतिम प्रणाम किया। एक पाँव कट चुका था, एक हाथ कट कर लटक चुका था लेकिन राणा सांगा जैसे वीरों को पैदा करने वाली माटी के जाये नरूजी अभी तक मैदान में डटे हुए थे। मुगलों के लगभग एक हजार सैनिकों को उन बीस वीरों ने काट डाला था। खून इतना बह चुका था कि, अब नरूजी का शरीर लड़खड़ाने लगा था, उस वीर ने अपने अंतिम सांस से पहले जोरदार हाक लगायी

- एकलिंगनाथ की जय।


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