होनहार बिरवान के होत चीकने पात-५
होनहार बिरवान के होत चीकने पात-५
अनीशा तब बहुत छोटी थी , बात उस समय की है। जब वह चार- पॉंच वर्ष की रही होगी। उसकी मम्मी को विदेश जाना पड़ गया काम के सिलसिले में। अनीशा को उसकी मम्मी नानी के पास छोड़कर गई थी। वहॉं उसकी मौसी आयीं तो उसे अपने पास कुछ दिनों के लिये ले गईं, यह सोचकर कि बच्चों के साथ उसका मन भी लग जायेगा और घूम फिर भी लेगी।
एक दिन मौसी अपने दो बच्चों के साथ अनीशा को दिल्ली में अप्पूघर दिखाने ले गईं। तब अप्पू घर खुला हुआ था और बच्चों के आकर्षण का केन्द्र था। जहॉं खेल हो रहा था ,वहॉं अप्पू घर में बहुत भीड़ थी। भीड़ के कारण उसके मौसा अनीशा के साथ अपनी एक बेटी का हाथ पकड़े हुए थे और मौसी अपनी छोटी बेटी का हाथ पकड़े हुए थीं। थोड़ी देर तो वहॉं रुककर सब खेल देखते रहे ।
जब वहॉं से आगे बढ़े और थोड़ी दूर गये होंगे तो मौसी ने देखा कि अनीशा नहीं है। उन्होंने मौसा से पूछा-“ अनीशा कहॉं है ? उसे कहॉं छोड़ दिया ?”
मौसा कुछ जवाब नहीं दे पाए। अनीशा तो उन्हीं के साथ थी, उनका हाथ पकड़े हुई थी तो कहॉं छोड़ दिया ? मौसा कुछ बता नहीं पाये ,कब अनीशा छूट गई ? मौसी चिन्तित हुई। बच्चे की ज़िम्मेदारी बड़ी थी। वह कहॉं छूट गई। इतने बड़े अप्पू घर में और इतनी भीड़ में उसे कहॉं ढूँढें ? व्याकुलता बढ़ रही थी।
कैसे अनीशा का हाथ छूट गया ? कैसे कहॉं रह गई ? कहॉं होगी इतनी भीड़ में अप्पूघर में ? तभी मौसी को ध्यान आया कि वहॉं एक खेल हो रहा था, तब तो ईशा साथ थी। सभी वहां खड़े होकर खेल देख रहे थे।
मौसी जल्दी जल्दी भगवान का नाम लेती पीछे लौटी जहॉं खेल चल रहा था , और वे लोग खड़े होकर देख रहे थे। जब वहॉं जाकर देखा तो अनीशा वहीं खड़ी थी। मौसी की जान में जान आई ,अनीशा मिल गई। कसकर अनीशा का हाथ पकड़ा और उससे पूछा-“ तुम कैसे छूट गईं ?”
अनीशा बोली-“ मैं खेल देख रही थी, थोड़ी देर में देखा कि कोई नहीं है। तो मैं चुपचाप वहीं खड़ी रही कि आप यहीं आकर देखेंगी और मुझे ले जायेंगी। “
अनीशा का धैर्य था। वह न रोई, न घबराई। यदि वह घबरा कर रोने लगती या किसी के साथ चली जाती तो मिलना मुश्किल था। वहां खड़े एक दम्पती ने बताया कि उस बच्ची को अकेले खड़े देखकर उन्होंने पूछा था कि तुम अकेले कैसे हो , साथ के लोग कहॉं हैं । तो बच्ची ने बताया कि वह साथ में आई थी, वे लोग आगे चले गये पर आकर ले जायेंगे।
अनीशा वहीं खड़ी प्रतीक्षा करती रही। उसका अविचल धैर्य और स्थिरता प्रशंसनीय थी। बचपन से ही उसमें एकाग्रता बुद्धिमत्ता थी। बड़े होने पर अपने इन्हीं गुणों का कारण वह पढ़ाई में अव्वल रही। यदि वह घबराकर कहीं आगे बढ़ जाती , या रोने लगती या किसी के साथ चली जाती तो उसका मिलना मुश्किल था। घोषणा करानी पड़ती और तब भी मिलती या न मिलती , कुछ पता नहीं। कुछ नहीं कहा जा सकता था। अनीशा की समझदारी से एक अप्रिय घटना होने से बच गई। छोटे बच्चों की संभाल का बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है।
