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Yogeshwar Dayal Mathur

Inspirational


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Yogeshwar Dayal Mathur

Inspirational


हमने आसमान बांट लिया था

हमने आसमान बांट लिया था

7 mins 219 7 mins 219

जमाना था चारपाइयों पर सफेद चादर वाले बिस्तरों पर खुले आसमान के नीचे छत पर सोने का। आसमान के तारे गिनने का । तारों को टूटता हुवा देख कुछ मन्नत मांगने का। सालों बीते हमारे बचपन का । भाई बहनों में गहरे प्यार का। सारे परिवार के साथ का। मां बाप के साये का। उनके प्यार और आशीर्वाद का। उनके संस्कार का।बेवजह आपस में झगड़ने का। फिर मिलकर एक हो जाने का । ये हमारा स्वर्ग था जहां हमारा बचपन बीता था। जो एक बड़े शहर के किनारे पर था। 

कई एकड़ जमीन के एक तरफ बड़ा सा हमारा घर था। कोठी कहलाता था। 

कोठी के चारों तरफ घने पेड़ थे I एक तरफ फलों का बगीचा था ।एक बड़ा गहरा कुआं था । दूसरी तरफ माली , मिश्राइन और दूसरे नौकरों के परिवारों के रहने के घर थे । जमीन के काफी बड़े हिस्से पर सब्जियों के खेत थे I फूलो के बागीचे थे।कोठी के सामने एक सीमेंट का बड़ा सा हौद था। होली उसी हौद में पानी भर कर खेली जाती थी।एक तरफ से नहर का पानी पेड़ों की सिंचाई के लिए बहता था। चारों तरफ हरियाली थी। पेड़ों पर तरह तरह के पक्षियों का बसेरा था I बहुत हरा भरा खुशनुमा माहौल था। हमारे बचपन का संसार था । सारी जमीन पर बिखरी हमारे बचपन की यादें थीं।

आसमान के नीचे लेटे हुवे सोने से पहले हम सब भाई बहन तारों को निहारा करते थे । उन्हें गिनने की कोशिश करते थे ।उनको पहचानते थे I उनकी बातें होती थी। पिताजी को खगोल शास्त्र का काफी ज्ञान था । हमें बहुत कुछ उनके बारे में बताते थे I हमारे लिए कुछ बाते बड़े आश्चर्य की भी होती थी । एक दूरबीन भी थी जिससे हम सब बारी बारी से तारे देखा करते थे। तारे गिनते गिनते एक दूसरे में होड़ भी लग जाती थी। इसी बात पर कभी कभी आपस में अनबन झगड़ा भी हो जाती थी I झगड़ा न हो, इस लिए पिताजी ने एक सलाह दी थी I हम सब मिलकर आसमान को बांट ले और फिर अपने अपने हिस्से में तारे देखा करें और उनकी बातें करें। इससे झगड़े वाली बात ही नहीं होगी। हम सब ने आसमान बांट लिया था l इस के बाद हम लोग में कभी झगड़ा नहीं हुआ।

कई दशक बीत गए हैं इस बात कोI

हम सब अब बड़े हो गए हैं। सबके अपने अपने परिवार हैं । माता पिता का साया हम पर अब नहीं रहा। उन्हें गुज़रे कई साल बीत गए हैं । आसमान में सितारे शायद अब भी उतने ही हैं पर छत पर बिस्तर लगने कम हो गए हैं । बहनों का अपना परिवार है। अब हम आसमान के तारे गिनना भूल गए हैं। पर हम भाई बहनों का प्यार और भी गहरा गया है। दूरियों ने प्यार की की कशिश को और भी बढ़ा दिया हे I आपस का प्यार अब ज्यादा है। सब संतुष्ट हैं अपने अपने परिवार में । कभी कभी सब किसी त्योहार पर मिलते हैं । उसमे रक्षाबंधन एक महत्व पूर्ण पर्व है । कभी किसी ने नहीं पूछा पिता की वसीयत के बारे में। पर जरूरी था उसे सबको पढ़कर उसपर अमल करने का। एक ऐसे ही पर्व पर वसीयत खोली गई और सबने पढ़ी। उसमे लिखा था I

" हमारे न रहने पर हमारी सारी जायदाद को हमारे सब बच्चों में बराबर बांट दिया जाए। बांट न जा सके तो उसे बेचकर सारी आय बराबर हिस्सों में सबको बांट दी जाए। सब का हिस्सा बराबर का हो"

सुना था, खून के रिश्तों की कशिश समय कमजोर कर देता है I बचपन के रिश्ते धुँधले हो जाते हैं I खट्टे भी हो जाते ।पर हमारे रिश्तों की डोर पहले से ज्यादा मजबूत थी । सबकी सहमति थी कि वसीयत को बक्से में ही बंद रहने दिया जाए I ये पिता का आदेश नहीं था, सिर्फ इच्छा थी। ज़मीन का बंटवारा न किया जाए । हम सब का इसपर एक ही मत था । वसीयत को संभाल कर रख दिया गया ।

वसीयत की बात फिर कभी किसी ने नहीं उठाई । दब गई कुछ और वर्षों के बोझ तले। भूल गए सब बंटवारे की बात । पर पैतृक वसीयत का मुँह बंद नहीं किया जा सकता I

कभी न कभी अपना मुंह खोलती है , किसी के चाहे बिना भी। 

इसलिए सबने इसपर फिर से विचार करने का निर्णय लिया I

समा बना की सब भाई बहन अगली दीपावली पर तीन दिन के लिए कोठी में ही साथ रहेंगे और वसीयत पर विचार कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। 

उस रात सब भाई बहन छत पर बचपन की तरह साथ लगी चारपाइयों पर लेटे । दीपावली के एक दिन पहले की रात थी। स्याह आसमान में तारे कुछ ज्यादा ही प्रकाशमान थे। वही बचपन का आकाश था जो कभी हमने बांट लिया था। बातें शुरू हुईं तो सबको अपने अपने हिस्से का आकाश भी याद आया । सोचते रहे, बगैर लकीरे खींचे सबने आकाश को कितनी सरलता से बांट लिया था । ब्रह्मांड का कितना बड़ा हिस्सा सबके हिस्से में आ गया था । अगर हमारी जमीन भी बिना दीवारें बांधे सबको मिल जाती तो कितनी ख़ुशी की बात होती I पर ये तो कोई हल न था और संभव भी नहीं होगा I

दूसरे दिन जब सब फिर से बैठे तो सामने थे ढेर सारे कागज़ पर बने जमीन के कई नक्शे। जो हमारे परिवार के एक मित्र और सलाहकार वकील ने बनवाए थे । उन मित्र को हमारे आपसी संबंधों का अंदाज़ा था। नक्शे में जमीन टुकड़ों में नजर आ रही थी I स्याही का रंग गहरा लग रहा था था। विभाजन की लकीरें तीखी थीं।सबको अपनी खुली जमीन चौकोर बक्से में बंटी खटक रही थी I लकीरें तीर की तरह सबके दिलों को आहत कर रही थीं I सोचा जमीन तो दीवारों से बांट लेंगे, पर सारी जमीन पर बिखरी बचपन की यादें किस तरह बटोर कर बराबर बांट पाएंगे।

कोई भी बंटवारे के लिए सहमत नहीं लगा । बंटवारा किसी को समझ नहीं आ रहा था अक्सर लालच का पलड़ा मन की सदभवनाओं से भारी होता है । पर यहाँ लालसा कमज़ोर पड रही थी I

सारे दिन उन लकीरों को नक़्शे पर काटते छांटते रहे। पर कोई मनपसंद समाधान नहीं निकल रहा था । अपने माता पिता के इस सुन्दर बागीचे को क्यारियों में बांटने को कोई भी तैयार न था। फिर एक ख्याल आया। जमीन का वह हिस्सा जहां नौकरों के रहने के घर थे उसको अलग कर उनको ही दे दिया जाए। वह जैसा चाहें अपने घर बना सकते हैं। इनके बुजुर्गो ने हमारे परिवार की जी जान से सेवा करी थी ।हम भाई बहनों में से किसी को भी जरूरत पड़ने पर जमीन का कुछ और हिस्सा बेचकर उसकी जरूरत पूरी कर दी जाए। पर उसका बाकी जमीन पर बराबर का हिस्सा बना रहेगा। जमीन का एक बाहर का हिस्सा बेचकर वह रकम कोठी की मरम्मत और देखरेख के लिए अलग रख दी जाये I बाकी जमीन बिना तकसीम किये सबकी रहे l ये हल सबको बड़ा पसंद आया Iअचानक सबसे छोटे भाई ने बिना लकीरों वाला एक नक्श अपनी तरफ खींच लिया और शायराना अंदाज़ में कुछ जुमले उस पर लिख डाले ।

 उसने लिखा,

ना कुरेदें दिलों को लकीरें खींच नक़्शे पर

ना बांटे जन्नत को टुकड़ों में 

ना बनाएं समाधि लालसा की दीवारों से  

ना बिगाड़े सूरत, खूबसूरत गुलशन की

खिलते हैं फूल जहां मुंडेरी पर भी

हमारे बचपन की यादों के "

और नक़्शे पर अपने दस्तखत कर दिए I सबने बे झिझक उसपर दस्तखत कर डाले I

सबने एकमत उसे मान भी लिया । वसीयत को सबकी राय के मुताबिक वकील से बदलने का मन बना लिया ।नौकरों को जमीन देने का अपना निर्णय उसी दिन बता दिया गया। उनकी दुआओं का अंबार लग गया । सारी कोठी उनकी खुशी से गूंज उठी ।

दिवाली की रात हम सब ने छत पर ही सोने का मन बनाया था I अमावस की रात थी आसमान गहरा काला था पर सितारों की चमक कुछ ज़्यादा थी । कोठी दीयों से जगमगा रही थी । दिये तो दीपावली के पर्व पर हमने कोठी पर पहले भी जलाए थे I पर आज दीयों का प्रकाश अलौकिक था I पहले दिये प्रतिष्ठान के थे पर आज के दिये श्रद्धा के थे I ये दिये सभी की शुभ इच्छाओं से प्रज्वलित थे , अधिक प्रकाशमान थे I

लेटे लेटे हम सबने आसमान को देखा । सारे सितारे आज भी वैसे ही टिमटिमा रहे थे I आसमान से बंटवारे को हटा कर देखा I कोई बंदिश न थी। सारा ब्रह्मांड एक साथ दिखाई दिया I अनंत था, गहरा था, सबका था । अच्छा लगा इस बार पूरे आसमान को एक साथ देखकर । उधर कोने में नौकरों के परिवार दीवाली मनाने में मग्न थे । उनकी बस्ती आतिशबाज़ी से गूँज रही थी I ये उनकी भी सबसे बड़ी दिवाली थी।

अचानक एक बड़ा सा टूटा हुवा चमकदार सितारा हमारी जमीन की तरफ आता दिखाई दिया I आज हम सबने फिर से कोई मन्नत मांगी थी I

शायद ये हमारे फैसले पर हमारे माता पिता का आशीर्वाद था


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