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Mani Pritam

Thriller


4.6  

Mani Pritam

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"गुलाब का एक बेरंग फूल" भाग-3

"गुलाब का एक बेरंग फूल" भाग-3

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मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह मेरी बेरुखी भाप गया हो।

" वह चुप रहा "उसे यूँ चुप देख मुझे अच्छा नहीं लगा था ।

इसलिए लगभग उसकी ओर मुड़ते हुए मैंने पूछा" अच्छा बता भी दो गुलाब का" लाल फूल" क्यों अच्छा नहीं लगता तुम्हें "

 मैंने लाल फूल पर जोर डालते हुए कहा था । कुछ देर बाद उसने मेरी आंखों में घुरते हुए कहा "बस मुझे प्यार का यह लाल रंग अच्छा नहीं लगता "उसके चेहरे पर एक मायूसी सी थी ।

"तो सफेद भी है" उसे ही अपने प्रेम का रंग मान लो! इतना सुनते ही वो मुस्कुराया, वह मुझे नहीं जानता था ! इसलिए वह मेरा नाम न ले सका,

 लेकिन उसने कहा "एक बात कहूं मिससच तो यह है कि प्रेम का कोई रंग नहीं होता" क्या लाल, क्या सफेद,क्या नीला' गौर से देखो तो सब बेरंग है  

 " बेरंग "सच ही तो कहा था उसने!

 बेरंग ही तो हैं !इन हवाओं का रंग, इन आसमानों का रंग, दूर-दूर तक फैले इन सफेद हिमखंडो का रंग, चिनारो और देवदारो का रंग,

इन वादियों का रंग, इनमें घुले प्रेम का रंग, इकरार और इजहार का रंग, "डर का रंग"  " डर और खामोशी का रंग "

,,सब बेरंग ही तो है,अगर बेरंग ना होते! तो उस दिन कैसे सबकी आंखों में डर होता और सबकी जुबान पर एक खामोशी होती

, जिस दिन भरे बाजार, कुछ लोगों ने एक प्रेमी जोड़े को इसलिये सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया था क्योंकि वे एक-दूसरे से प्रेम करते थे। जिसका इज़हार उन्होंने एक-दूसरे को सरे बाजार फूल देखकर किया था।

,' यह वही दिन था जिस दिन मुझे डॉक्टरेट की उपाधि मिली थी ।

'यह वही दिन था जिस दिन मिर्जा मुझे अपने घर वालों से मिलाने वाले थे '

लेकिन उससे पहले मैं और मिर्जा एक साथ उस खास लम्हे को जीना चाहते थे, जिसके लिए हम दोनों ने एक बार फिर डल झील के किनारे गुलाब के रंग बिरंगे फूलों से सजे इस बाग को चुना था । जहां हम पहले भी आया करते थे । उन पलों को जीने जो मेरी यादों में आज भी जस की तस है ।

,"मुझे आज भी याद है, उस दिन मैं और मिर्जा कॉलेज से साथ साथ ही चले थे। लेकिन जाने, मिर्जा कहां रह गए थे? और मैं यहां आ पहुंची थी उसी बाग में, उसी बेंच पर, उसी जगह, जहां मैं अक्सर उनका इंतजार करती थी ।   मैं अब भी उनके ख्यालों में खोई हुई उनका इंतजार कर ही रही थी। की उसकी आवाज मेरे कानों से टकराई"

 'मेरा नाम आनंद है 'आनंद पंडित! और आपका ? उसकी आवाज के साथ ही मैं अपने आप को एक बार फिर मजबूती के साथ अपने अंदर खींच लाई थी। लेकिन अब सब कुछ वैसा नहीं रह गया था जैसा पहले था।, मैंने चौकते पर हुए उससे पूछा" क्या कहा तुमने ?क्या नाम है तुम्हारा?,

"आनंद पण्डित उसने लगभग डरते हुए कहा था ।

"हिन्दू हो?,जाने मै उससे किस जुबान में पुछ बैठी थी। शायद ये उस वक़्त घाटी में बदल रहे माहौल का असर था।

"नहीं कश्मीरी हूँउसने झेपते हुए हुए बहुत धीरे से कहा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कुराहट थी। जो आज तक मेरी आँखो में घुली हुई है।

  मैंने उससे आगे पुछा था

  " जारी है"


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