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ପ୍ରଶାନ୍ତ କୁମାର ବିଦ୍ୟାଧର

Abstract Fantasy

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ପ୍ରଶାନ୍ତ କୁମାର ବିଦ୍ୟାଧର

Abstract Fantasy

घड़ी

घड़ी

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-संजना मेरी चस्मा ?

-टेबल के ऊपर।

-मेरी पर्श ?

- टेबल के ड्रायर पे।

-मेरी बेल्ट ?

- गोदरेज में।

- मेरे मोबाईल ?

चार्जिंग में , बैठा है, ड्रॉइंग रूम पे।

- मेरे घड़ी ?

जंहा रखेथे , वंही है, मेरी मतलब वोंही होगी। 

मतलब ?

घुस्से में .......मतलब, मैने आपका घड़ी कल से , देखाही नहीं। आपका हरेक समान ,का हिसाब किताब ,करते हुए में पागल हो जाऊंगी। जांह से आप , उठाते वहीं रखोगे तो , धुंडने पर मिलेगा ना।सारे घर के काम करो। वचों से लेकर बूढ़ों तक सबका , खाना,पीना, कपड़े , सव करते करते, में मर क्यों ना जाऊं किसको क्या पड़ीहे। नौकरानी तो फ्री में मिला है ना। आफिस का काम काज करू, ममी,पापा की देखभाल, इतने सारे घर का काम,या फिर आपकी सारे सामान की , सज्जबट करूं, क्या क्या करूं। अगर आप अपने चीज़ों कों ठीक से रखेंगे तो इतना , ढूंदना नहीं पड़ता। बोलती हूं तो , मुझे ताना मारते, अफिस छोड़ क्यूं नहीं देते।अभी स्वयं और सुहानी भी (बच्चे) अपने काम ठीक करलेटे, ममी,पापा भी मुझे हेल्प करते , सेवाएं आपकी।

पापा (सुहानी) आपकी ,घड़ी खराब हो गई है। बन्द हुई घड़ी को घरमे रखना नहीं चाहिए। तो स्वयं ने उसे फेंक दिया।और टम्मी उसे अपनी दांत से काट रहा है।प्यारी बिटिया की वात सुनते हुए सुब्रत बाबू , अपने घड़ी को कुतो की कब्जे से ,छीन लिए और टिफिन लेते हुए तेजिसे अफ़िस की ओर चलपडे।

एही तो है, जिंन्देगी , विंस सताब्दी,एक की नौकरी से, केसे करें गुज़ारा। सादी की सालगिरह पर, पापा ने ,इस अमूल्य तोफा दिएथे। केसे करे अनादार,मेरे जिंदेगि की  ओ परछाई है।मेरे सपनो का हिस्सेदार। छाई से परछाई कभी ना अलग हुए ना होगा। ओ मेरी प्यारी...

घड़ी

यह तो है जींदेगि,जीना तो इसिका नाम है। यह सोच , सोच कर , घुसे वाला सुब्रत बाबू घर से एक कदम घरके अंदर और दूसरी चौखट के बाहर रखे ....

वाउ इंटरस्टिंग, क्या नज़ारा था वो। पड़ोसी घर के राई साहेब के धर्मपत्नी ,अपने पीहर को ऑफिस जाने के समय , विदाई समारोह शुरू करते हुए फ्लियिंग किस। सच में बहुत सुंदर अनुभव था वो। 

अपने आपको कोषते हुए , सुब्रत बाबू मनही मन में दुखी हो गए। नाजाने बारह वर्षों के पहीले का वो वादा,वो कस्मे, वो रस्मे रिवाजों के साथ लिया हुआ वो सात फेरों की बंधन को , कोई केसे भूल सकता है। यह तो संभव नहीं हो सकता है ना। और सुभ विवाह की पावन अवसर पर पत्नी को दिया गया वो वादा,वो वचन ,वो सपथ।

पर क्या करे ,अब वो सब याद आया , इस दो लव बर्ड को देख कर। अपने अंतरात्मा कोसते हुए.....

धिक्कार है तेरे मर्दांगी पर ....

धिक्कार है , जो किया हुआ वादे पे कायम ना ,रहा पाए। नजाने , ऐसे कितने , छोटी,मोटी गलती किए ,है अपनी जिंदगी में ,और कभी भी माफी मांगी नहीं , संजना से। आखिरकार , इंसान हैं, गलती तो होगी। प्रायस्चिती अंदर ही अंदर से किए परन्तु कभी भी सॉरी बोला नहीं।

इंसान की सारे उम्र गुज्जर जाता है, सपने को साकार रूप, रंग देने केलिए ,और पता भी नहीं होती कब बूढ़ा हो गया , फ़िर वही बातें ,वोही वचपना और मृत्यु सुंदरी को सादर अभिवादन करते हुए इंसान प्राण पख्येरू कव उड़ जाता है।

साढ़े नौ से छह बजे तक रहेंगे, ऑफिस में, दुनिया भर की काम, समय का पता ही नहीं होती। ऐसे सोचते सोचते , बाइक पर सवार होकर , बाज़ार से गुजरते हुए सुब्रत बाबू जी ने कुछ नए तमाशा देख कर वो , थोड़ी देर तक रुक गए। फुटपाथ पर एक , कूड़ा उठाने वाले बच्चा अपने हाथ में एक रसी लेते हुए कलाई पर बड़े प्यार से बांध लिया और वार वार , सुर्यनारायण के तरफ़, तो कभी कलाई पर अपने नजर डालने लगा।

क्या ढूंढ रहा है वो ?

अपने होठं से , निकलती हुई वो खिल खिलाते हुए मनोहर हसी। क्या वो रशी , एक कलाई घड़ी ! ???

मन में आशा, अंसुमारी, खियाली मन में , आंदोलित हो उठा ढेर सारे जुआर, भट्टा, तरंगित, पुलकित हो गया आत्मा। क्या बोलूं सच में मेरे मन में तो नाचने लगा था मेरे वो फेवराइट गाना ......

पंछियों के सोर से 

जाना की भोर हो गई

पुलकित हो गए प्राण

पुलकित हो गए प्राण

आत्मा आनंद विभोर हो गई

पंछियों की सोर से , जाना की भोर हो गई।।

बेखयाली मन, चला गया बचपन की और। भाई साहेब की पुरानी पेंट, सर्ट, किताबें , सच में बहुत सुंदर अनुभव था वो दिन। छोड़ो वो बातें , सादी का सालगिरह पर केसे भी एक घड़ी खरीद करना है,और प्यारी पत्नी संजना केलिए , उसकी पसंद की बनारसी जर्जत्ती साड़ी साड़ी लेनी है।

मन में ढेर सारे प्रश्नवाची के साथ सुब्रत बाबू ऑफिस में पहुंच गए।और अपने बस बबलू जी को सुबह की प्रणाम करते हुए।

गुड मॉर्निंग सर।

गुड मॉर्निंग मी. सुब्रत बाबू , अरे वाउ ,आज तो बड़े हैंडसम लग रहे हो। वो भी फॉर्मल में , रिस्ट वॉच नहीं...

अरे ना सर , क्यूं मजाक करते हैं।

मेरे पास भी एक घड़ी है,जो मेरे बीबी ने मुझे गिफ्ट किया था। पर मेरे एंजियो कॉपी ,और सुगर कि वजह से मैने , पेहेनना छोड़ दिया। बट यू आर सो लुकिंग हैंडसम ...वो भी बिना घडी के।

और एक वात , में भी सोच लिया की घड़ी कभी यूज नहीं करूंगा। रियाली आई आम नट जोकिंग !

वास बबलू सर जी के, बर्तलाप में आश्चर्य , चकित हो गए सुब्रत बाबू।

थैंक यू सर,पर यह थैंक यू तो दिखावा है।सही में .... थैंक यू माई डियर स्वीट हार्ट संजना .....

समय अपराह्न् एक बज गया कव, पता चला नहीं, रोज़ के तरह कल आया संजना की ....

एक बजगया , खाना खा लो, नहीं तो, पता चला है कि बाबूजी भुखें है और बाबूजी के घुसा मेरे तरफ।

प्रेयसी के हाथ के, बनाया हुआ खाना, चावल, डाल फ्राई, चना मसाला , आलू के भरते और साथ पापड़। वाउ मेज्ज है।रोज के तरह चार दोस्त के साथ खाने के पर्व का समापन हुआ। परन्तु सुबह की वो बातें अभी भी कान में गूंज उठी है।

ना, कभी और मैने कुछ भी नहीं भूलूंगा। ना कभी संजना को परेशान करूंगा। आज म मेने जरूर , सॉरी बोलंगा , माफ़ी मांगने से क्या मेने छोटे थोड़ी ना बन जाऊंगा। ऑफिस के काम काज के साथ घर के काम में भी मुझे हेल्प करनी होगी संजना की, इतने में गुप्ता जी के फोन आया कि भाई, सैलरी के साथ वोनोस भी आगया , चैक करलो।

थैंक यू डियर, बाय......

रोज़ के तरह ,बेटा स्वयं और बेटी सुहानी केलिए किंदर्ज्वाय चोकोलेट और पत्नी संजना केलिए वनारसी साड़ी ले कर , सरप्राइज़ केलिए उसे बेड की नीचे रख दिया। मा और पापा केलिए चपल, साल।

एक पुरुष के जिंदेगी ,कौन जाने उसकी वो दर्द, सवकी फरमाइश पूरा करते करते उमर ढल जाती है। परिवार को खुश रखने में ,और प्य्यार देते हुए कव खुद बेसहारा हो जाता है , उसकी भनक तक नहीं होती।

स्त्री तो , कस्त्सहिस्नू नारायणी , ममता मयी, परिवार की खुशियां बटोरते बटोरते ,अपनी पति को खुशी केलिए पूरी जिंदगी निछावर कर देती है।फिर भी संजना तो पत्नी है ,केसे वो भूल जाएं अपनी पति की खुशी किस्में है। 

पतिको बेहद पसंद हैं घड़ी, छाई की परछाई होते हुए केसे, नज़र अंदाज़ करे। फिर भी घर के खर्च तथा अपने पास की पैसे से संजना सुब्रत बाबू जी केलिए एक टाइटन रेगलिया घड़ी खरीद करके ड्रायर के भीतर रख दिए। शाम हो गई है। सुबह की वतों का इतना प्रभाव। अरे वाउ इंटरस्टिंग , आज सब सामान अपने जगहों पर।ना तो संजना,संजना,... संजना की आवाज़। क्या हुआ है आज। 

कहीं में सपना तो देख नहीं रही हूं ???

रसोई में पतिदेव हेल्प भी किए, व्हाट हैपन ????

चलों बच्चों ,दादा और दादी जी को बुलाओ डिनर रेडी है।

रोज़ के तरह ,डिनर पार्टी खत्म। बच्चों अपने स्टडी रूम में चले गए , मामा और पापा को गुड नाईट के साथ स्वीट किस देकर।

बारह वर्षों पहले की वो बेड रूम , आज भी उतनी ताजा लग रहा था। समय बदल गया जररू था पर , इतने दिनों बाद में संजना की प्यार कम नहीं हुई है।

सुब्रत बाबू सरप्राइज़ देने से पहले ,संजना वो 

घड़ी,

प्रेजेंट गिफ्ट के तौर पे , दे चुके थे। हाथ में बनारसी साड़ी लेते हुए , आंख से छलका आशु को अपने हाथों से समेट ते हुए संजना अपनी मांग भरली।

अरे वास करों , यह क्या , मेने तो आपकी परछाई हूं,आप मेरे छाई भल्ला केसे में आपसे नाराज़ होंगी। 

I LOVE YOU SWEETHEART।

सॉरी संजना ,लव यू टू।


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