एकता में शक्ति है
एकता में शक्ति है
"गुनगुनी ठंडक सर्दी की शुरुआत चाय का प्याला हाथ में"सुरेंद्र भाई चिन्ता मग्न थे।
"यही तो दिन थे वे जब राजू यह घर छोड़ कर"वे मन ही मन में बुदबुदा रहे थे।
"किस ध्यान में हैं?? "
"चाय ठंडी कीजिएगा क्या"
नयना ने पति को टोका।
सुरेन्द्र भाई ने पिताजी के स्वर्गवास के उपरांत छोटे भाई राजू को कलेजे से लगाकर पाला-पोसा। बहुत प्यारा था उन्हें राजू यानि राजेंद्र।
जब बापू ने लम्बी बीमारी से जूझते हुए आखिरी सांस ली तो सुरेंद्र भाई बुरी तरह टूट गये। जहाँ एक ओर बापू के जाने का असहनीय दुख वहीं दूसरी ओर क़र्ज़ की मार जो कि पिता को गंभीर बीमारी से राहत दिलाने के लिए सुरेंद्र भाई ने बैंक, जी पी एफ व प्राइवेट संस्थाओं से लिए थे। अपने पिता की ज़िन्दगी बचाने के जतन में सुरेंद्र भाई ने अपने आप को होम कर दिया लेकिन विधि का विधान। ईश्वर पर कोई ज़ोर न चला और वो चल बसीं।
नियति मान सुरेंद्र भाई शनैः-शनैः दुख को भूलने का प्रयत्न करते रहे। धन का अभाव तो वे बाल्यावस्था से ही महसूस करते चले आ रहे थे। सरकारी विभाग में एल डी सी की साधारण-सी नौकरी से ही संतुष्ट शांत मिजाज़ सुरेंद्र भाई संतोष से अपनी जीवन नैया खे रहे थे परन्तु छोटे भाई राजू ने उनके शांति पूर्ण स्वभाव व जीवन को जैसे चुनौती देने की ठान रखी थी।
पहले कुंवारा था तब आये दिन कोई न कोई फर्माइश ले कर रूठता और घर से निकल जाता। माँ और पत्नी के अनुरोध पर सुरेंद्र भाई उसे ढूंढ कर मना कर लाते।
फिर राजू कुछ छोटी - मोटी नौकरी करने लगा क्योंकि पढ़ा-लिखा नहीं था और उसकी शादी हुई। लड़की भी उसकी न्यून योग्यता के अनुसार कम शिक्षित थी।
राजू को सट्टा लगाने व उधार लेने की लत थी और उसकी पत्नी को झूठी शान दिखाने की।
एक दिन एक सट्टा व्यापारी राजू से अपनी उधारी लेने आया और लगा अपशब्द बोलने। सुरेंद्र जी से न रहा गया। उन्होंने उसे फटकार लगाई व बाकी राशि दे कर झंझट मिटाया।
वह दिन भी याद आता है जब
सेठ रत्तीमल का आदमी उधारी का ब्याज उगाहने आया और राजू ठन- ठन गोपाल बन कर यहां - वहां मुंह छिपाने लगा। उस वक्त भी सुरेंद्र भाई ने पैसा चुकाया और बात खत्म की।
खैर बड़े भैया सुरेंद्र भाई बड़े सुचारू रूप से अपनी कमाई से खुद का परिवार राजू का परिवार व माँ का भरण-पोषण खुशी-खुशी कर रहे थे। उन्हें कभ भी ईश्वर से कोई शिकायत न थी।
इधर कुछ समय से तुच्छ सोच वाले राजू व उसकी पत्नी सरिता बड़े भाई के विरुध्द विष उगल कर बड़े भाई से अलग होने के बहाने ढूंढने लगे। गाहे-बगाहे वे दोनों भाभी जी पर रौब चलाने, परेशान करने के और भैया पर पैसे की अकड़ दिखाने के आरोप लगाने लगे। माँ ने भी छोटे बेटे-बहू को बड़े भाई - भाभी के प्यार व त्याग की मिसालें दे कर साथ प्रेम से मिल-जुल कर रहने की समझाइश दी किन्तु कोई फायदा न हुआ।
अन्ततः रोज़-रोज़ की किल्लत से परेशान हो कर सुरेंद्र भाई ने दोनों को अलग कर मनचाही जगह जाने की छूट दी लेकिन जाते-जाते यह भी कहा कि साथ जैसा सुख कहाँ। साथ में जो शक्ति है वह अकेले में नहीं। वहाँ तू एक अकेला यहाँ मैं एक अकेला। दोनों साथ हों तो एक और एक ग्यारह किन्तु उन अक्ल के अंधों को यह बात रास न आई।
माँ ने बड़े बेटे सुरेंद्र के साथ रहना पसंद किया जिस पर छोटे बहू-बेटे सहर्ष तैयार हो गए क्योंकि उन दोनों को माँ भी एक बोझ नज़र आती थीं । राजू व सरिता तो बहुत खुश कि चलो बड़ों की कैद से आज़ादी मिली। माँ इसी ग़म में बीमार हो गयी जिसका परिणाम एक लंबी बीमारी और उनकी जीवन लीला की समाप्ति।
अब सुरेंद्र भाई अपनी पत्नी नयना व दो बेटों के साथ थे। छोटे बहुत याद आते थे किन्तु उन लोगों ने मिलना तो दूर कभी सामने हों तो पहचानना, नमस्ते करना भी बंद कर दिया था।
अभी सुबह की चाय के कप ही समेटे थे नयना कि एक आॅटो घर के सामने रुका।
नयना पति से बोली - "देखिए जी। कोई अपने घर आया है क्या ?"
"अरे नहीं। इतनी सुबह कौन आएगा ? "सुरेंद्र भाई अखबार में नज़रें गड़ाए हुए बोले।
"अजी है कोई। मैं देखती हूँ "कहती हुई नयना बाहर निकली। सामने देखती क्या है कि राजू व सरिता बच्चों सहित सामान ले कर ऑटो से उतरे। हालत यह कि ऑटो वाले को चुकाने के लिए भी जेब में कौड़ी नहीं। नयना ने पैसे चुकाए और सबको खुशी-खुशी अंदर ले आई।
"देखिए कौन आया है" नयना ने पति से कहा।
सुरेंद्र भाई तो सबको सम्मुख पाकर जैसे खुशी से पागल हो उठे। दौड़ कर सबको गले लगा लिया। नयना भी अपने आंसुओं पर काबू न कर सकी। राजू व सरिता उन दोनों के पैरों में गिर कर अपने किए की माफी मांग रहे थे। अकेले रह कर वे दुनिया के थपेड़े सहन कर पाए और बुरी तरह टूट चुके थे। राजू बड़े भाई के गले लग कर बोल उठा-"भैया सच कहा था आपने एकता में शक्ति है। अब हम एक और एक ग्यारह हैं भैया। हमें कोई तोड़ नहीं सकता।"
