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Nisha Nandini Bhartiya

Drama


5.0  

Nisha Nandini Bhartiya

Drama


एक थी रतना

एक थी रतना

9 mins 436 9 mins 436

आज भी मुझे अच्छी तरह याद है वो समय था दुर्गापूजा की अष्टमी का। जब रतना मेरी जिंदगी में आई थी। यही कोई शाम के छह- सात बजे का समय था, अंधेरा हो गया था। यूँ भी असम में जाड़े के दिनों में अंधेरा शाम के पांच बजे ही हो जाता है। उसी समय लगभग चार फुट की, रंग काफी दबा हुआ, पैरों तक लम्बा कुर्ता पहने, करीब 35-40 किलो वजन की एक स्त्री सीढ़ियां चढ़कर मेरे दरवाजे तक आई और मुझे देखकर हाथ जोड़कर बोली, "दीदी अमा के काम लागे, आमर घोरे किच्छु नाय।"( दीदी मुझे काम चाहिए मेरे घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं है )

उस समय मैं भी एक काम वाली स्त्री की तलाश कर रही थी। कई बार तो देवी मां से प्रार्थना भी कर चुकी थी क्योंकि आज की दुनिया में सब कुछ मिलना आसान है पर अच्छा और सच्चा सेवक या सहायक मिलना बहुत कठिन है। अपनी प्रार्थना में मैं अक्सर देवी माँ से एक सहायक के लिए प्रार्थना करती थी। तो मुझे लगा कि इसको देवी माँ ने ही मेरे लिए भेजा है। इसलिए वेशभूषा से भिखारिन जैसी लगने पर भी मैंने उसका नाम पूछा तो वह बोली - रतना।

रतना रतनों की खान थी या नहीं, यह मैं नहीं कह सकती पर इतना जरूर कह सकती हूँ कि उस साधारण सी स्त्री में कुछ तो असाधारण अवश्य था। जिस कारण मैं उसकी तरफ खिंच रही थी। फिर बातों का सिलसिला शुरु हुआ। तुम्हारा घर कहाँ हैं ? घर में और कौन कौन हैं ? तब उसने बताया तेल डिपो के सामने उसका घर है। हेमंत बरठाकुर के घर में रहती है। उसका एक बेटा भी है।

जो मैट्रिक में पढ़ रहा है। फिर वह फूट फूट कर रोने लगी और हाथ जोड़ कर बोली दीदी आमी सबाय के चिनचि, दीदी अमा के काज लागे ( दीदी मैं सब को जानती हूँ, मुझे काम चाहिए।

उस समय मेरे पति घर पर नहीं थे इसलिए उसे चाय नाश्ता तथा कुछ रुपये देकर,परसों आने का आश्वासन देकर मैं घर के अंदर आ गई। आज मेरा मन निरंतर उसी के बारे सोच रहा था। एक दिन बाद दसवीं अर्थात दशहरे का पर्व था। पश्चिम बंगाल और असम में दुर्गा पूजा व दसवीं का पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। उस समय मैं भी असम के तिनसुकिया नगर में रहती थी और महाविद्यालय में प्रवक्ता के पद आसीन थी।

रतना दसवीं यानी दशहरे के दिन सुबह सुबह आ गई। मैंने उसे अपने पति से मिलवाया, पति महोदय ने और थोड़ा कार्यवाही की- तुम्हारा पति क्या करता है ? क्योंकि वह अच्छी तरह से मांग में सिंदूर भरे हुए थी, बिंदी लगाए थी। उसने बताया कि बी.आर.टी.एफ में नौकरी करता है। पंजाब से दीदी आ गया इसलिए अब वह दीदी के साथ तेजू ( अरूणाचल प्रदेश की एक जगह) में रहता है। असम और अरूणाचल का बहुत अधिक फांसला नहीं है। दो- तीन घंटे की बस या टैक्सी की यात्रा द्वारा हम अरूणाचल प्रदेश में प्रवेश कर सकते हैं। तेजू भी तिनसुकिया से बहुत ज्यादा दूर नहीं था, छह-सात घंटे की यात्रा के बाद हम तेजू पहुंच सकते हैं।

अब रतना जिसको दीदी बोल रही थी उसके बारे में खोजबीन शुरु हुई, तो पता चला कि दीदी से उसका तात्पर्य उसके पति की पहली पत्नी से था। उसका पति एक पंजाबी सरदार पहले से ही शादी-शुदा चार बच्चों का पिता था। धोखे से रतना के साथ भी शादी कर ली थी। बेटे को एक साल का छोड़कर वह अपनी पहली पत्नी के पास चला गया था। गरीबी और दुख के कारण रतना की शारीरिक और मानसिक अवस्था बहुत कमजोर हो गई थी।

रतना सिर्फ एक स्त्री ही नहीं बल्कि पूरी एक किताब थी अगर यह कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।

अब मैंने रतना को एक सेविका के रूप में रख लिया था और मुझे हर दिन रतना के जीवन का एक एक पन्ना पढ़ने को मिलता था। उसका जीवन एक बहुत बड़ा अफसाना था। मैं उस अफसाने को जानना चाहती थी पर समस्या भाषा पर आकर अटक जाती थी। वह सिलचर की बंगाली भाषा बोलती थी। उसकी भाषा समझना बड़ी टेड़ी खीर था। कोई उपाय न होने पर मैंने उम्र के इस पड़ाव पर बंगाली भाषा सीखने का निश्चय किया और शीघ्रता में आधी- अधूरी बंगला भाषा सीख कर उससे बातचीत करने का निर्णय लिया।जब मैं उसकी भाषा बोलती तो वह खिलखिला कर हंस पड़ती थी। अब धीरे-धीरे उससे मेरी समीपता बड़ती गई।रतना दिल की बहुत साफ और ईमानदार थी।

जब मैं विद्यालय जाने के लिए तैयार होती तो वह हर तरह से मेरी सेवा करने के लिए तैयार रहती। मेरी साड़ी ठीक करती तथा मेरी चप्पल तक साफ करके रख देती थी। रतना में कोई अवगुण न था यह कहना कठिन होगा पर वह अपने अवगुणों को भी गुण बनाकर परोसती थी। उसने मुझे अपने अनुकूल बना लिया था पर स्वयं रत्ती भर भी नहीं बदली थी।

बातों ही बातों में एक दिन उसने बताया कि वह सिलचर की रहने वाली है उसके माता-पिता सिलचर में रहते हैं। उसकी तीन बहनें और दो भाई हैं। तेरह साल की उम्र में वह सरदार उसको भगा के तिनसुकिया ले आया था। माता पिता को इस बात की जानकारी नहीं थी। चौदह साल में उसका एक बेटा हुआ था जो कि एक साल का होकर मर गया फिर उसका दूसरा बेटा हुआ जिसका नाम मनजीत है। जो अब चौदह साल का है और एक साइकिल की दुकान में काम करता है।

अब मैं पुन: रतना के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ले चलती हूँ। रतना मन से बहुत पाक थी वह मेरी बहुत परवाह करती थी।न जाने कितने ही काम वह गलत करती थी। मैं उस पर गुस्सा भी करती थी। फिर भी वह काम नहीं छोड़ती थी। उसकी कितनी ही तबीयत खराब क्यों न हो पर वह काम पर जरूर आती थी। अपना काम पूरी लगन से करती थी। फ्रीज का ठंडा पानी वह कभी नहीं पीती थी चाहे कितनी भी गर्मी क्यों न हो। सबसे मजेदार बात तो यह है कि वह रिफाइंड तेल की चीजें कभी नहीं खाती थी। खाने पीने में बहुत परहेज करती थी। उसके पास सभी बीमारियों का घरेलू इलाज भी था। मेरे पेट दर्द होने पर उसने मुझे अमरूद के पत्ते खाली पेट खाने की सलाह दी थी। ऐसी ही न जाने कितनी बीमारियों का इलाज उसके पास था। दिन में तीन बार नहाती थी। सुबह छह बजे नहाकर भगवान के लिए फूल, बेलपत्र तथा दूर्वा लेकर मेरे घर आती थी।

सेवा धर्म में वह हनुमानजी से भी स्पर्धा लेने वाली थी उसके काम में कहीं कोई कमी न रह जाए इसका पूरा ध्यान रखती थी।

मैं उसके जीवन को तीन अध्यायों में बांट सकती हूं। प्रथम अध्याय एक तेरह साल की लड़की का एक चालीस साल के युवक के साथ भाग कर विवाह करना तथा तीन साल उसके साथ सुखमय जीवन बिताना।

दूसरा अध्याय उसके पति का उसको छोड़कर चला जाना, मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ना।एक साल के बेटे की अकेले परवरिश करना, इधर-उधर की ठोकरें खाना।

जब वह एक साल के बेटे मनजीत को लेकर इधर-उधर भटक रही थी तब उसे एक स्त्री का सहारा मिला जिसका पति डी. सी. के कार्यालय में काम करता था। उसके बच्चे नहीं थे। उस स्त्री ने अपने घर के पीछे के भाग में नौकरों के कमरे में उसे सहारा दिया।रतना उनके घर का सारा काम करती थी। उन्होंने उसके बेटे को एक सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए डाल दिया था। कुछ दिन ठीक-ठाक बीत ही रहे थे कि अचानक उस स्त्री के पति की मृत्यु हो गई। अब उस स्त्री को मजबूरन रतना को घर से निकाल कर वह कमरा भाड़े पर देना पड़ा और काम भी वह अपने हाथों से करने लगी।

अब रतना फिर सहारा ढूंढने लगी। अब उसका बेटा मनजीत 12 वर्ष का हो गया था। इस बार उसको सहारा मिला हेमंत बरठाकुर के घर।वहां भी वह उनके घर का सारा काम करती थी। वहां रहते हुए रतना को एक साल ही बीता था कि अचानक बरठाकुर पति-पत्नी दोनों का ही कुछ समय के अंतराल से देहांत हो गया।उनका एक 35 साल का लड़का था। जिसने विवाह नहीं किया था और वह कुछ काम भी नहीं करता था। शराब के नशे में पड़ा रहता था। उसने अपने माता-पिता का सारा धन नशे में दो साल के अंदर ही उड़ा दिया था। उस लड़के की शारीरिक और मानसिक अवस्था भी दिन-दिन खराब हो रही थी। अब रतना रहती तो उसी के घर में थी पर दिन भर घर-घर काम करके उस मानसिक रोगी को पाल रही थी। उसका घर कच्चा था और अब खंडहर बन चुका था।

रतना के जीवन का तीसरा अध्याय तब शुरु हुआ जब उसका बेटा 15 वर्ष का हो गया था। अब उसके जीवन में थोड़ी बहुत सुख की किरणें पड़नी शुरु हुईं। अपना पेट भरने के लिए तथा लड़के को पढ़ाने के लिए उसने घर-घर जाकर झाडू पोंछा, बरतन का काम शुरू किया।काम की तलाश में ही वह एक दिन मेरे घर आकर मुझे मिली थी। रतना के जीवन को पढ़ने में मेरी रूचि दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। अब तक मैं उसे जितना पढ़ सकी थी उससे मैंने जाना की रतना झूठ नहीं बोलती थी। वह हमेशा असमंजस की दुनिया में खोई- खोई सी रहती थी। वह अधिक से अधिक समय मेरे घर पर बिताना चाहती थी। अगर उसे सुबह छह बजे आने को कहा जाए तो वह पांच बजे आ जाती थी और अगर सात बजे कहो तो नौ बजे आती थी। समय का उसे ठीक-ठीक ज्ञान नहीं था। वह घड़ी देखना भी नहीं जानती थी। जब कभी हम लोग तिनसुकिया नगर से बाहर जाते थे तो वह उदास हो जाती थी और बंगाली प्रथा के अनुसार पूरा लेटकर प्रणाम करती थी। वह कहती थी "दीदी आपुनी ताड़ा- ताड़ी चोले आश्बो" यानि आप जल्दी- जल्दी आ जाना। मेरे पैरों में दर्द होने पर गर्म पानी में नमक डालकर रखने की सलाह देती थी, कभी मेरे बालों में तेल लगा देने के लिए कहती थी।

रतना ठोकर खाई हुई प्यार की भूखी स्त्री थी। वह मेरे साथ मित्रवत व्यवहार करती थी। गुरूद्वारे जाने पर मेरे लिए हलुए का प्रसाद तथा लंगर का दाल-रोटी सब्जी लेकर आती थी। मेरे मना करने पर उसे बुरा लगता था इसलिए उसका मान रखने के लिए मैं थोड़ा सा लेकर माथे से लगा लेती थी।

रतना का सबसे बड़ा गुण यह था कि इतनी गरीबी में रहने पर भी उसमें लालच लेशमात्र भी नहीं था। वह सिर्फ अपनी मेहनत के पैसे पर ही विश्वास करती थी। किसी के द्वारा दस-बीस रूपये देने पर भी नहीं लेती थी।

वह पैसे के पीछे भागती आज की दुनिया के लिए बहुत बड़ा उदाहरण थी।

इस दुनिया में ऐसी ही बहुत सी रतना हमारे आसपास रहती हैं पर हम उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। हम चाहे तो ऐसे लोगों से बहुत कुछ सीख सकते हैं और उन्हें बहुत कुछ सिखा सकते हैं। पर इस दौड़ती भागती दुनिया में किसी के पास वक्त ही नहीं है जो कि ऐसी रतनाओं के घाव पर मरहम लगा सकें। घाव देने का वक्त लोगों के पास होता है पर मरहम लगाने का नहीं।

आज लोगों के पास सब कुछ होकर भी कुछ नहीं है क्योंकि मानसिक शांति नहीं है। आदमी कहां दौड़ रहा है, किसके पीछे दौड़ रहा है, कुछ पता नहीं है।

यह कहानी लिखने तक रतना मेरे पास थी। मैंने उसे आत्मनिर्भर बनाया। उसे गाड़ी भी चलाना सिखाया। हर तरह से उसकी सहायता की उसके बेटे को पढ़ाया।अब तक उसका बेटा बड़ा हो गया था तथा उसके जीवन में थोड़ी बहुत स्थिरता आ गई थी। कुछ समय बाद उसके बेटे को दूसरे शहर में नौकरी मिल गई थी। मुझे उसे छोड़ने का बहुत दुख था और उसका दुख तो अवर्णनीय था।

आज भी रतना को याद करके मेरी आंखें नम हो जाती हैं और उस चार बच्चों के पिता सरदार को याद करके मेरी आंखों में घृणा भर जाती है। मेरी आंखें आज भी रतना को ढूंढ़ रही हैं।मुझे याद आता है -उसका दिन में दो बार नमस्ते कहना, उसकी मंद-मंद हंसी याद आती है। उसका अपनत्व याद आता है।

आज इस पुरुष प्रधान समाज में न जाने कितनी रतनाएं दर बदर होकर ठोकरे खा रही हैं। हम सबका कर्तव्य है कि हम उन्हें उनका हक दिलाए। सहानुभूति और अपनत्व देकर उन्हें जीवन जीना सिखाए इसी में मेरी कहानी की सार्थकता होगी।


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