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RockShayar Irfan

Inspirational

3.2  

RockShayar Irfan

Inspirational

एक पार्क मेरा दोस्त बन गया

एक पार्क मेरा दोस्त बन गया

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एक पार्क है काॅलोनी के उस छोर पर
जहाँ अक्सर शाम को जाया करता हूँ 

पता नहीं क्यों जाता हूँ ?
ना मुझे टहलना होता है 
ना कोई खेल खेलना होता हैं 
मैं फिर भी उस पार्क में जाता हूँ
जहाँ बच्चों के लिए झूले
और बुजुर्गों के लिए बेंच लगी हुई हैं ।

पता नहीं मैं कौन हूँ ? बच्चा या बुजुर्ग !

कभी झूले से बेंच को तकता रहता हूँ
तो कभी बेंच पर बैठे हुए
उन झूलों के दरमियान
खुद को झूलता हुआ पाता हूँ ।

वैसे तो बहुत सी बेंच लगी हैं वहां पर
मगर मुझे वो लकड़ी वाली बेंच
सबसे अच्छी लगती है
जहाँ से ठीक सामने
बच्चे झूले झूलते हुए दिखाई देते हैं ।

तन्हाई में अक्सर इसी बेंच पर बैठकर
अपनी कई पुरानी नज़्मों को
ताज़ा करता रहता हूँ ।
ऊँची ऊँची आवाज़ में बोलकर उन्हें
मोबाइल में रिकॉर्ड करता रहता हूँ ।

सुना है !
आवाज़ अल्फ़ाज़ में जान डाल देती है ।

रिकार्डिंग के वक्त
आस पास की कई आवाज़ें भी
बिन बुलाए मेहमान की तरह
बैकग्राउंड में शामिल हो जाती हैं...
"जैसे गिलहरी की आवाज़
बहती हवा का शोर
और खेलते कूदते बच्चों की
गूँजती हुई किलकारियाँ"

इस वहम के चलते शायद
मैं उन्हें हटाता नहीं हूँ
कि यह गूँजती हुई "अनवांटेड आवाज़ें"
उस दर्द को छुपा सके
जो नज़्म के भीतर क़ैद है कहीं"

हालांकि ऑडियो सॉफ्टवेयर से
एक्स्ट्रा नॉइज़ भी रिमूव करता हूँ ।
मगर वो जो ख़ामोशियों का नॉइज़
अहसास के सुलगते हुए पन्नों पर
वक्त की अमिट स्याही से उतरा हुआ हैं,
कोई सॉफ्टवेयर
भला उसे कैसे रिमूव कर सकता है !

उसी पार्क के कोने में एक पेड़ है ।
बिल्कुल सूखा
ना कोई पत्ता है जिस्म पर
ना किसी शाख़ का साया ।
पता नहीं ज़िंदा भी है या मर गया !
टहलने वाले लोग उसे ठूंठ कहते हैं ।

उसी के नीचे बैठकर मैंने
कई तन्हा शामें गुज़ारी हैं
ताकि उसे भी अच्छा लगे ।
अकेलापन कितना डरावना होता है !
अच्छी तरह मालूम है मुझे ।

इसी बगीचे में एक बुजुर्ग
रोज अपने पोते के साथ टहलने आते है ।
वो मासूम बच्चा अपनी तोतली ज़बान में
कई बड़े बड़े सवाल पूछता रहता है
अपने दादा जी से ।
उन दोनों को देखकर
मुझे अपने दादा जी याद आ जाते है
जिनकी गोद में ना खेल पाया कभी मैं
मेरी पैदाइश से पहले ही वो चल बसे थे ।

पार्क के ही एक कोने में
माली ने अपना घर बना रखा है ।
कहने को घर है बस
घास फूस और बेलों से लदी हुई एक झोपङी ।
माली और पार्क यक़ीनन
घंटों तक बातचीत करते होंगे रोजाना ।
दोनों एक दूसरे के परिवार का
ख़्याल जो रखते हैं ।

पता नहीं इस पार्क में ऐसा क्या है ?
दिन भर की थकन से चूर होकर
जब भी इसके आगोश में समाता हूँ
ये बङे प्यार से आराम देता है मुझे ।

हम दोनों एक दूसरे को
बखूबी समझते हैं !

शायद इसीलिए आज
एक पार्क मेरा दोस्त बन गया ।।


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