Kalyani Das

Tragedy


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Kalyani Das

Tragedy


एक ममतामयी मूरत

एक ममतामयी मूरत

13 mins 24 13 mins 24

शाम का वक्त अधिकांशतः अकेले ही गुजरता है मेरा। वर्षों से ऐसा ही चल रहा है कोई बदलाव नहीं।अब तो आदत हो गई है।इस वक्त मैं भी ढलते सूरज की तरह धीरे धीरे अस्त होती रहती हूं। ऐसा सोचते-सोचते अचानक से प्रिया की आंखों में आंसू आ गए।

मैं भी न थोड़ी पागल हूं बेवजह रोने लग जाती हूं।

हठात पता नहीं क्या हुआ ? आंटी की याद आ गई प्रिया को।

वो सोचने लगी, अरे इतने वर्षों बाद ये आंटी की याद क्यूं आ गई ?

मन बेकल होने लगा।प्रिया सोचने लगी, पता नहीं आंटी, कहां होंगी कैसी होंगीया फिर, होंगी भी या नहीं

सिहर गई एकबारगी प्रिया।

हे भगवान, ये मैं क्या सोचने लगी ? ईश्वर उन्हें लंबी उम्र दें।

सोचते-सोचते प्रिया बचपन के गलियारे में पहुंच गई।

   बचपन की याद आते ही प्रिया का चेहरा खिल गया।

कितना सुंदर सुहाना बचपन था।हर चिंता से मुक्त। पढ़ाई लिखाई के साथ साथ मौज-मस्ती, सहेलियों और भाई-बहनों

का संग साथ।अहा, कितने प्यारे दिन।पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी प्रिया माता पिता की बहुत दुलारी थी।

पापा स्टील प्लांट में कार्यरत थे।प्लांट के तरफ से क्वार्टर भी मिला हुआ था।दो मंजिला बिल्डिंग थी। जिसमें ऊपर चार और नीचे चार क्वार्टर थे। सबसे ऊपर छत थी।

बगल वाले ब्लाॅक में ऊपरी मंजिल पर बांयी तरफ वाले क्वार्टर में एक शर्मा परिवार रहते थे।

सिर्फ दोनों पति-पत्नी।शादी के की साल बीत चुके थे पर

संतान सुख से वंचित।

प्रिया के परिवार से इन लोगों की बहुत अच्छी दोस्ती थी।

प्रिया को याद आ रहा था सब कुछवो सोचने लगी, अंकल आंटी कितने अच्छे थे।

वे लोग प्रिया और उसके सभी भाई-बहनों को बहुत प्यार करते थे। खासकर प्रिया और उससे छोटी बहन श्रुति को।

अंकल आंटी कहीं भी घूमने जाते तो दोनों बहनों को साथ ले जाते थे। खासकर श्रुति तो अधिकतर जगह उनलोगो के साथ ही जाती थी।ज्यादातर लोग श्रुति को उन्हीं की संतान समझते थे।

प्रिया सोचने लगीहम सब के लिए आंटी का प्यार भी

बहुत ही अनोखा था। ईश्वर ने उन्हें मां बनने के सुख से

वंचित रखा था।पर ममत्व उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था।

आंटी मंगलवार को हनुमान जी की पूजा करती थीं और

शाम को हमेशा खिड़की के पास खड़ी होकर हमलोगों का इंतजार करतीं।जब हम सब शाम को बाहर खेलने के लिए निकलते तो हमें बुला कर प्रसाद खिलातीं, फिर वो खुद व्रत

खोलतीं।

उस वक्त ये सब बातें कुछ खास समझ में नहीं आती थीं।बस प्रसाद खाने की खुशी होती थी।अगल बगल इतने सारे बच्चों में से विशेष कर हमलोगों को बुलाकर प्रसाद खिलाना, फिर 

ख़ुद कुछ खानाउस छोटी सी उम्र में ये बातें कहां समझ में आती थी। पर अब सोचती हूं तो लगता है कि इतनी ममतामयी को प्रभु ने संतान सुख से वंचित क्यूं रखा होगा ?

शाम का वक्त अधिकांशतः अकेले ही गुजरता है मेरा। वर्षों से ऐसा ही चल रहा है कोई बदलाव नहीं।अब तो आदत हो गई है।इस वक्त मैं भी ढलते सूरज की तरह धीरे धीरे अस्त होती रहती हूं। ऐसा सोचते-सोचते अचानक से प्रिया की आंखों में आंसू आ गए।

मैं भी न थोड़ी पागल हूं बेवजह रोने लग जाती हूं।

हठात पता नहीं क्या हुआ ? आंटी की याद आ गई प्रिया को।

वो सोचने लगी, अरे इतने वर्षों बाद ये आंटी की याद क्यूं आ गई ?

मन बेकल होने लगा।प्रिया सोचने लगी, पता नहीं आंटी, कहां होंगी कैसी होंगीया फिर, होंगी भी या नहीं

सिहर गई एकबारगीप्रिया।

हे भगवान, ये मैं क्या सोचने लगी ? ईश्वर उन्हें लंबी उम्र दें।

सोचते-सोचते प्रिया बचपन के गलियारे में पहुंच गई।

बचपन की याद आते ही प्रिया का चेहरा खिल गया।

कितना सुंदर सुहाना बचपन था।हर चिंता से मुक्त। पढ़ाई लिखाई के साथ साथ मौज-मस्ती, सहेलियों और भाई-बहनों

का संग साथ।अहा, कितने प्यारे दिन।पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी प्रिया माता पिता की बहुत दुलारी थी।

पापा स्टील प्लांट में कार्यरत थे।प्लांट के तरफ से क्वार्टर भी मिला हुआ था।दो मंजिला बिल्डिंग थी। जिसमें ऊपर चार और नीचे चार क्वार्टर थे। सबसे ऊपर छत थी।

बगल वाले ब्लाॅक में ऊपरी मंजिल पर बांयी तरफ वाले क्वार्टर में एक शर्मा परिवार रहते थे।

सिर्फ दोनों पति-पत्नी।शादी के की साल बीत चुके थे पर

संतान सुख से वंचित।

प्रिया के परिवार से इन लोगों की बहुत अच्छी दोस्ती थी।

प्रिया को याद आ रहा था सब कुछवो सोचने लगी, अंकल आंटी कितने अच्छे थे।

वे लोग प्रिया और उसके सभी भाई-बहनों को बहुत प्यार करते थे। खासकर प्रिया और उससे छोटी बहन श्रुति को।

अंकल आंटी कहीं भी घूमने जाते तो दोनों बहनों को साथ ले जाते थे। खासकर श्रुति तो अधिकतर जगह उनलोगो के साथ ही जाती थी।ज्यादातर लोग श्रुति को उन्हीं की संतान समझते थे।

प्रिया सोचने लगीहम सब के लिए आंटी का प्यार भी

बहुत ही अनोखा था। ईश्वर ने उन्हें मां बनने के सुख से

वंचित रखा था।पर ममत्व उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था।

आंटी मंगलवार को हनुमान जी की पूजा करती थीं और

शाम को हमेशा खिड़की के पास खड़ी होकर हमलोगों का इंतजार करतीं।जब हम सब शाम को बाहर खेलने के लिए निकलते तो हमें बुला कर प्रसाद खिलातीं, फिर वो खुद व्रत

खोलतीं।

उस वक्त ये सब बातें कुछ खास समझ में नहीं आती थीं।बस प्रसाद खाने की खुशी होती थी।अगल बगल इतने सारे बच्चों में से विशेष कर हमलोगों को बुलाकर प्रसाद खिलाना, फिर

ख़ुद कुछ खानाउस छोटी सी उम्र में ये बातें कहां समझ में आती थी। पर अब सोचती हूं तो लगता है कि इतनी ममतामयी को प्रभु ने संतान सुख से वंचित क्यूं रखा होगा ?

आंटीजिनका नाम सुधा था, सचमुच सुधा ही थीं। लंबी, गोरी,गदबदा शरीर, और सबसे आकर्षक उनकी लंबी काली

सी चोटी।चेहरा बहुत ही आकर्षक।एकदम सौम्य,हर समय 

मुस्कुराती हुई।

बहुत ही नेक,ममतामयी और दयालु महिला। अपने घर परिवार और पति के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित।

फिर ईश्वर ने उनको संतान सुख कर्मों नहीं दियाये भी कम अजीब नहीं था।

प्रिया आज पूरी तरह से आंटी की याद में ही कोई हुई थी।

तभी चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान उभर आई।

रहना ठंडी-ठंडी रहनाजो आंटी हम सब को पिलाया करती थीं,गर्मी के दिनों में।उन दिनों सबके घरों में फ्रिज कहां हुआ करते थे।

प्रिया सोचने लगी शायद १९८७-८८की बात है। अंकल फ्रिज खरीद लाए थे। टीवी तो और भी पहले ही खरीद चुके थे।

हम सब जब भी शाम में उनके यहां जाते तो आंटी बहुत ही खुशी से हम सबको ठंडी-ठंडी रसना पिलाया करती थीं।

मन तृप्त हो जाता था।वो खुशी शायद शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। दोनों ही परिवारों में बहुत ही गहरी दोस्ती हो गई थी।

हर आए दिन एक-दूसरे के यहां खाना पीना चलता रहता था।

प्रिया को याद आ रहा था कि अंकल ने पापा को टीवी खरीदने के लिए साफ-साफ शब्दों में मना कर दिया था।

वे कहते कि टीवी देखने के लिए जब बच्चे आते हैं तो 

घर कितना अच्छा लगता है।

उस समय जिनके घर में टीवी होता,पूरा आस-पड़ोस

उनके यहां जमा हो जाता और लोग खुशी-खुशी सबकी

खातिरदारी करते थे।

हालांकि रामायण शुरू होने के कुछ महीनों बाद पापा

टीवी खरीद लिए थे।पर अंकल आंटी के यहां जाना

बदस्तूर जारी था।

उसे याद आया एक बार दुर्गा पूजा में श्रुति और प्रिया 

अंकल आंटी के साथ मेला घूमने गए थे। कितना मज़ा आया था।

एक फोटो भी खिंचवाई थी।बीच में आंटी और एक तरफ श्रुति और दूसरी तरफ खुद प्रिया।उसे फ्रेम करवा कर

प्रिया ने शोकेस पर सजा दी थी।

अपने बच्चों से तो सभी प्यार करते हैं पर किसी दूसरे के

बच्चों पर अपने बच्चों जैसा प्यार और ममता लुटाना,

सबके लिए आसान नहीं। हमेशा एक मां की तरह ही हम 

सब पर ममता बरसाया।पर

ये पर याद आते ही प्रिया उदास हो गई। तभी छोटी बहन

श्रुति का फोन आ गया। उसने उससे भी आंटी की चर्चा की।

श्रुति ने कहा, जानती हो, दीदी, अभी दो-तीन दिन पहले हीष

शर्मा अंकल का फोन आया था। बहुत देर तक बात हुई उनसे। सभी के बारे में पूछ रहे थे। उन्होंने कहा कि तुम्हारे

पापा से भी बात होती रहती है। बात करने के लिए तो

मैं उनसे बात कर लेती हूं। कभी कभी फोन करते रहते हैं।

पर अब पहले जैसा आदर नहीं रह गया मन में, उनके लिए।

आंटी के साथ उनलोगों ने जो किया, उसके बाद अंकल के

तरफ से मन उदासीन हो गया है।

प्रिया ने कहा"सही कह रही हो तुम।पर हमारे संस्कार ऐसे नहीं कि हम उनसे घृणावश बात न करें।

मुझे भी बहुत साल पहले एक बार फोन किया था उन्होंने।

पर अब उनके लिए समयमान की कमी पाती हूं मन में।

             जानती हो, आंटी की बहुत याद आती है।

पता नहीं कहां होंगी। वैसे तो उनका मायका मुंगेर में था,पर अब पता नहीं कहां होंगी ? ?

श्रुति ने कहा बिल्कुल, मुझे भी बहुत याद आती है उनकी। मुझे तो वे लोग अपनी संतान ही समझते थे।

आंटी हर जगह मुझे अपने साथ लैकर जाती थीं।

बहुत ममता और प्यार दिया है उन्होंने।"

प्रिया ठीक है,चलो फिर बाद में बात करते हैं।कहकर 

प्रिया ने फोन रख दिया।

और घर के कामों में व्यस्त हो गई । पर आज किसी काम में मन नहीं लग रहा था। आज मन बहुत उदास था उसका।

आंटी के साथ जो भी हुआ, उसे याद करके मन विचलित और व्यथित होने लगा।

सभी सो गए पर प्रिया की आंखों से नींद कोसों दूर थी। उसने देखा पति गहरी निद्रा में थे।वो थोड़ी निश्चिंत हुई। वर्ना पति उसे रोता देखते तो फिर उन्हें सारी बातें बतानी पड़ती और

अभी वो कुछ भी बोलने के मूड में नहीं थीं।     

मन फिर से अतीत के पन्ने पलटने लगा।बचपन में घटित कुछ घटनाएं दिलो-दिमाग पर ऐसे अंकित हो जाती हैं जिन्हें

ताउम्र भूलाया नहीं जा सकता है। गाहे-बगाहे उनकी टीस दर्द

देती रहती है।

काश आज अगर आंटी कहीं मिल जाएं तो बेटी होने के

सारे फर्ज अदा कर दूं। श्रुति भी तो ऐसा ही बोल रही थीप्रिया सोचने लगी। पर कुछ काश,जीवन भर काश ही रह जाते हैं।

हे भगवान, कभी-कभी आप इतने निष्ठुर क्यूं हो जाते हो ?                 

प्रिया फिर से सोच में डूबा जाती है

आंटी बहुत ही पढ़े-लिखे परिवार से थीं। उनकी ससुराल भागलपुर में थी। बीच-बीच में उनकी सासू मां भी आया करती थीं। अंकल की एक बहन कलकत्ता में रहती थीं। अंकल और उनकी छोटी बहन एक ही शहर में रहते थे।

उनके बहनोई भी स्टील प्लांट में कार्यरत थे। अंकल के क्वार्टर से कुछ दूर मगर पास ही दूसरे सेक्टर में उनका

क्वार्टर था।उनका भी अपने भाई-भाभी के यहां आना-जाना लगा रहता था।

कलकत्ता वाली बहन भी बीच-बीच में आती रहती थीं अपने परिवार के साथ।उनकी बड़ी बेटी चंदा और मैं (प्रिया)एक ही उम्र के थे।हम सभी बच्चे साथ में खूब खेला करते थे। खूब मस्ती करते।प्रिया को याद आ रहा था कि एक बार ने साल के अवसर पर जब चंदा अपने परिवार के साथ अंकल यानि अपने मामा जी के यहां आई थी तो हमलोग सभी बच्चे(जिनमें अगल-बगल के और भी बच्चे शामिल थे)अंकल के घर के छत पर सब मिलकर पिकनिक मनाए थे। सभी अपने-अपने घर से थोड़ी-थोड़ी सामग्री लेकर आए थे और सबने मिलकर कच्चा-पक्का जैसा भी बन पड़ा, हमने खाना बनाया और खाया था।(खाना बनाने में थोड़ी बहुत हमारी मदद आंटी ने भी की थी) खूब मज़ा आया था। सबसे ज्यादा खुशी सबके साथ मिलकर खाना बनाने की थी।

"अरे, मैं ये कैसे भूल गई"प्रिया ने खुद से ही कहा।अंकल कवि भी थे। हमेशा कवि सम्मेलन में भाग लिया करते थे। उन्होंने एकि छोटी सी फिल्म भी बनाई थी जो कि उनकी ही एक लघुकथा पर आधारित थी। उनकी कविताओं की कुछ पुस्तकें भी छपी थीं। जिन्हें वे हमलोगों को सुनाया करते थे। उन्होंने पापा को अपनी कुछ किताबें भी दी थीं।

पर आज सोचती हूं कि क्या कवि इतने निष्ठुर और निर्दयी हो सकते हैं ?

अंकल आप ऐसे कैसे हो गए थे ? आंटी के साथ दुर्व्यवहार के अलावा और कोई भी बुराई आप में थी,ऐसा तो याद नहीं।

पर ये एक ऐसा काला धब्बा है आपके व्यक्तित्व पर जिसे दुनिया या आप स्वंय भले ही भूल गए हों, पर हम दोनों बहनें 

कभी नहीं भूला पाएंगी।

आप हमारे लिए माता-पिता समान थे। कोई भी बच्चा अपनी मां के साथ हुए गलत व्यवहार को कभी नहीं भूल सकता।

फिर चाहे वो ग़लत व्यवहार करने वाला व्यक्ति उसका पिता

ही क्यूं न हो।

कभी कभी मन करता है कि पूछूं आपसे क्या कभी भी आंटी की याद नहीं आई होगी आपको ?

आज न जाने क्यूं नींद ही नहीं आ रही।जितनी कोशिश कर

रही हूं नींद उतना ही दूर भाग रही है।

आखिरकार झल्ला कर प्रिया उठ कर आंगन में आ गई।

वहीं टहलने लगी। फिर एक गिलास पानी पीया और वहीं एक कुर्सी लेकर बैठ गई।

आसमां को निहारने लगी।जब भी वो बहुत परेशान होती है

आंगन में टहलते हुए या फिर एक जगह बैठ कर एकटक आसमां की तरफ देखती रहती है। जैसे कि उसकी समस्याओं का हल वहीं कहीं छुपा हो।

अजीब सी आदत है मेरी भीये बुदबुदाते हुए मुस्कान की एक हल्की सी लकीर चेहरे पर आ गई।

प्रिया सोचने लगी कि औरतों की जिंदगी भी बड़ी ही अजीब होती है।इतने अच्छे पढ़े-लिखे परिवार से होने और खुद इतनी अच्छी होने के बावजूद, सिर्फ एक बच्चे नहीं होने के कारण

आंटी को कितना कुछ सहना पड़ा था,अपनी जिंदगी में।

जैसे कि औरतों का अपना व्यक्तित्व कोई मायने ही नहीं

रखता हो।

थोड़ा-थोड़ा याद आ रहा था किजब भी आंटी की सास या कलकत्ता वाली ननद आती थीं तो उनके यहां बच्चे को लेकर अधिकतर लड़ाई झगड़ा होता रहता था।

उम्र कम जरूर थी हम बच्चों की पर थोड़ा-बहुत तो समझ में आ ही जाता था।

प्यार और नफ़रत को समझने के लिए उम्र कोई मायने नहीं

रखता है।

साथ में अंकल भी गुस्सा करते थे। पापा हमेशा समझाते थे कि ऐसा करना गलत है।पर इसका कोई असर होता तो नहीं दिखता था।उस दिन जो घटित हुआ वो उसी का परिणाम था।

उस समय भी उनकी सास और कलकत्ता वाली ननद आई हुई थीं।इतना स्पष्ट रूप से तो याद नहीं आ रहा था कि क्या हुआ था।

पर कुछ तो हुआ था उनके परिवार में।शायद बहुत ज्यादा 

लड़ाई झगड़ा।

शायद पहले से ही कुछ खिचड़ी पक रही थी। आंटी के परिवार वालों को भी शायद पहले से ही खबर कर दी गई थी

कि आकर उनको ले जाएं।

रात में शायद बहुत ही लड़ाई झगड़ा या शायद उनके साथ मार-पीट भी हुई थी। दूसरे दिन भी झगड़ा होता रहा। शाम के वक्त उनको मारते हुए घर से निकाल दिया गया।सास या ननद में से किसी ने धकेल भी दिया था जाते समय।

उनके घर के बाहर बहुत भीड़ जमा हो गई थी। सभी आस- पड़ोस के लोग जमा हो गए।

पापा एक बार फिर से समझाने की कोशिश किए थे पर कोई फायदा नहीं हुआ।

हम सब वहीं बुत बने खड़े थे। उनके परिवार वाले सभी आंटी को कोस रहे थे। आंटी का रो-रोकर बुरा हाल था। गुस्सा तो मुझे बहुत आ रहा था।पर छोटी होने की वजह से बोलने का

साहस नहीं जुटा पा रही थी।


आंटी के जीजाजी और भैया उनको लेने के लिए आए थे।

जब आंटी अपना बक्सा लेकर रिक्शे में बैठने लगी तो

उनकी ननद ने कहा कि बक्सा खोलकर दिखाइए।

पता नहीं,क्या-क्या लेकर जा रही हैं ?

ये शब्द आज तक मेरे कानों में गूंज रहे हैं। मुझे काटो तो खून नहीं।लगा कि मैं कहीं शून्य में खोती जा रही हूं। वहां जो भी कुछ हो रहा था। मैं सोचने समझने के हालत में नहीं थीं।एकबारगी लगा कि उनकी ननद का मुंह नोच लूं।

इतनी निर्दयता

वो भी एक औरत होकर,एक औरत के लिए।

इतनी वैमनस्यता उस औरत के लिए जो उनकी खुद की भाभी थीं।वो भी सिर्फ इसलिए कि उनके बच्चे नहीं हो 

रहे थे।

पर आंटी इतनी सरल स्वभाव की थीं कि बीच सड़क पर

इतने लोगों के सामने अपना बक्सा खोलकर दिखा दिया।

फिर वे लोग वहां से चले गए।

अपने किसी परिचित के यहां रुके थे उस दिन। दूसरे दिन उनके भैया हमारे यहां 

मिलने के लिएआए थे।

बाद में एक बार फिर आंटी आई थीं तलाक के सिलसिले में।

हमारे यहां भी आई थीं,हमलोगों से मिलने के लिए।

इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी उनके मन में अंकल के लिए कोई दुर्भाव नहीं था।

बाद में उनका तलाक भी हो गया था।

उस घटना के बाद से ही हमलोगों का अंकल के यहां जाना बंद हो गया।

उनकी जो बहन वहीं रहती थी,वो हमारे घर के सामने से

गुजरती,हमलोगों को बहुत ही बुरा भला बोलती थीं।

क्योंकि पापा ने अंकल को समझाने की कोशिश की थी।

फिर दो-तीन साल बाद पापा को दूसरे सेक्टर में बड़ा क्वार्टर मिल गया। हमलोग वहां शिफ्ट हो गए।बाद में पता चला कि अंकल ने किसी गरीब परिवार की लड़की से शादी कर ली।

बाद में उनके तीन बच्चे भी हुए।आज वे तीनों बच्चे पढ़ लिखकर इंजीनियर बन गए हैं। इस बात की खुशी है।

पर आंटी के साथ उन्होंने जो किया,वो हमें उनके लिए खुश

 नहीं होने देता।

उस घटना के बाद से हमलोगों के साथ उनके संबंध खराब हो गए थे।आस पड़ोस में लोग अब उनसे दूर भागने लगे थे।

बहुत सालों बाद उन्होंने फिर से पापा के बातचीत

शुरू कर दी थी।

पापा को फोन करते रहते हैं । श्रुति के साथ भी हमेशा फोन पर बात करते रहते हैं।

पर मेरा और श्रुति का मन तो आज भी आंटी में ही अटका हुआ है।न जाने वो कहां होंगी ?

हे ईश्वर,एक बार तो उनसे मिला दे। क्या मालूम, हमारी तरह

शायद वो भी हमें याद करतीं हों।

ऐसा सोचते ही प्रिया की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे।

वो बहुत देर तक यूं ही आंगन में बैठी आसमां को निहारती रही।


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