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Vikas Kavi

Romance

3  

Vikas Kavi

Romance

एक छोटी सी मुलाकात

एक छोटी सी मुलाकात

5 mins
202

ये महज़ इत्तेफ़ाक था कि मुझे किसी काम से भोपाल जाना पड़ा ओर में चला गया जब भी इस शहर का नाम ज़हन में आता तो उसी की याद आती है। भोपाल जाने के लिए बस में चढ़ा और बस चलने लगी। मैं शांति मन से बैठा ही था कि फिर से वहीं बीतें हुए वक्त की बातें याद आई और उसी का चेहरा दिल-ओ-दिमाग में छाने लगा। वहा जाते ही मैने पहले तो अपने जरूरी काम खत्म किये। अगले दिन के लिये रूकने का विचार बनाया क्योंकि थक भी गया था तो इसी वजह से एक दिन ओर रूकने का फैसला लिया गया। आंखों में नींद तो थी ही नहीं पूरी रात बस इसी ख्या़ल में जागते हुए गुजर गयी कि मेरा प्यार इसी शहर में हैं तो शायद एक बार ही सही उसे मुलाकात हो जाये। वज़ह जो भी हो जिसके कारण हम एक नहीं हो पाये तो क्या ? आज बाते नहीं होती तो क्या ? लेकिन इस दिल में उसके लिए प्यार आज भी जिंदा है।

बोझल सी ये रात कटी फिर सुबह हुई तो शहर देखने के लिए होटल से बाहर आया ओर टहलते हुए इधर - ऊधर देखते हुए लगभग आधा किलो मीटर दूर चला आया।खाने का शौकीन होने के कारण घूमते हुए एक दुकान पर नज़र गयी ओर मैं उस दुकान पर चला गया। दुकानदार से मैंने 20 रूपये की चैकलेट मांगी और दुकानदार ने चैकलेट दीं मैने जैसे ही रूपये देने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ही था कि पास में एक महिला का आना हुआ ओर उसने कहा - ‘‘आज भी आपकी चैकलेट खाने की आदत नहीं गयी।’’दुकानदार की तरफ रूपये बढ़ाते हुए मैंने गर्दन घुमाकर पास खडी महिला को देखा तो में एक पल के लिए होश-ओ-आवाज खो बैठा और उसे देखता ही रह गया। समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हुआ ओर शायद मैंरे दिल की दुआओं में इतना असर था, कि ऊपर वाले ने सुन ही लिया ओर उसे मुलाकात भी हो गई। अभी भी मैं उसे देख ही रहा था। कि उसने उसका सामान खरीदा और जाने लगी तो मैंने आवाज लगाकर उसे रोका।किशोर - ‘‘रूको आज भी तुम मुझे एक पल मिलकर जा रही हो कुछ देर और रूक जाओ।’’   

"विशाखा -" क्यो किशोर?"

"यह तो मैं भी नहीं जानता। बस दिल ने कहा तो कह दिया।शायद कई सालों से तुमसे मिलने की आस थी, ओर तुम्हें देखा,  तो वह भी इस तरह अचानक मन भर आया। और मैं समझ नहीं पा रहा हूं।"

विशाखा -" क्यों मुझे क्या हुआ?"   

विशाखा फिर से जाने लगी तो उसे रोकते हुए कहा "मेरे साथ चाय पिने चलोगी?" तो वह भी रूक गयी जैसे वह भी मुझसे अपने मन की बातें कहना चाहती हो ओर कुछ व़क्त मेरे साथ बिताना चाहती हो।किशोर - "यहीं पास में एक होटल है। वही चलते है ओर हम दोनों एक साथ अपने चुपचाप चलने लगे। ना ही उसने कुछ कहा और ना ही मैंने कुछ कहा बस यूं ही चलते - चलते कभी वो तो कभी में उसे देखता लेकिन कुछ बातें नहीं हो पाती। ऐसे ही चलते चलते होटल आ गये ओर हम एक दूसरे के सामने कुर्सी पर बैठ गये। अभी भी दोनों के होठो पर खामोंशी का आलम छाया हुआ था। उसी वक्त मेंने अपनी खामोशी तोडते हुए कहा - "तुम क्या पियोगी।"

"विशाखा - "कॉफ़ी (गर्दन झुकाये हुए बोली)"

किशोर ने दो कॉफ़ी का आडर दिया।     

जब तक कॉफ़ी आती तब तक में उस ज़ेब में रखे हुए पेपर का फूल बनाते हुए चुपचाप ही देखता रहा ...

विशाखा - "अब किसके लिए कागज का फूल ल बना रहे हो।"

किशोर - "ओर कौन हो सकता है दूसरा ?" ( विशाखा की और देखते हुए कहा)

विशाखा -" क्यों ?" किशोर चुपचाप नज़र नीचे किए हुए उसी कागज का फूल बना रहा है। कोई जवाब नहीं देता।किशोर ने फूल बनाकर टेबल पर रख दिया और ऊधर से कॉफ़ी भी आ गई।विशाखा ने कॉफ़ी पीना भी षुरू कर दी और मैं उसे खामोशी से देखता ही रहा कि यह वहीं मेरा पहला प्यार है। उसी वक्त विशाखा ने पुछा "क्या सोच रहे हो क्या तुम आज भी लिखते हो."

किशोर - "हां..विशाखा"

" किसके लिए किशोर ? "

"तुम्हारे लिए और किसके लिए लिख सकता हूं।" (नम आंखों को उठाते हुए कहता हैं)

विशाखा - "किशोर तुम्हारी कॉफ़ी ठण्डी हो रही है।"

किशोर मुस्कुराते हुए देखता और कहता है यह तो एक बहाना है। ये खत्म हो जायेगी तो बातें करने का वक्त भी खत्म हो जायेगा। उसने मेरी और देखा तो हम दोनों की आंखें एक-दूजे को देखने लगी शायद पुरानी बातें और पुराने वक्त की चाहत है कि वही फिर लौटकर आये दोनों के दिल बस यहीं दुआ मांग रहे हों।विशाखा ने अपनी आंखें झुकाते हुए कहा "पैगाम आज भी रखा है ?"

किशोर -" हां रखा है।"

विशाखा - "मुझे आज भी याद है। 2014 की वो दिवाली के दूसरे दिन की सुबह जब तुमने पैगाम लिखकर भेजा था।"

किशोर विशाखा की और देखते हुए कहा "तुम्हें आज भी याद है। मैं तो समझा था कि तुम भूल चुकी हो हमें और हमारी बातों को भी।"

विशाखा - "नहीं तुम्हें भूलना मेरे बस में नहीं।"

किशोर - सकी ओर देखने लगा तो उसने आंखें झुका ली। मैं समझ गया कि उसके दिल में वो प्यार आज भी जिंदा हैं। 

विशाखा - ":क्या वह पैगाम सुनाओगे।"

किशोर - "हां मैं आता हूँ तुम चले जाते हो।कुछ तो बात है जो कुछ दूर चल के रुक जाते हो।चांद सूरज की तरह हम दोनों में भी है दूरियां।दिन के उजालें में ढूंढते हैं हम तुम को रात के अंधेरे में मिल जाते हो कुछ तो बात है जो कुछ दूर चल के रुक जाते हो।सूरज भी चांद से कहता हैअकेले न चलो थक जाओगे दो पल तुम भी कहीं रुक जाओगे ,न मंजिल है न कोई रास्ता न साथ है कोई आसरा फिर भी दोनों चलते जाते हैं ।हाथों पे रखे हाथ किन ख्यालों में गुम हो कुछ तो बात है जो कुछ दूर चल के रुक जाते हो।मैं आता हूँ तुम चले जाते हो।कुछ तो बात है जो कुछ दूर चल के रुक जाते हो।" सुनकर विशाखा की आंखों में आंसू आ गये ओर उसने कहा शायद हमारी जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है और वहां से चली गयी। कॉफ़ी के कप वही वैसे ही छोडकर मैं भी उठकर बाहर आ गया ओर वह अपने रास्ते और फिर वहीं अकेला घूमने लगा, सोचते ही सोचते उसकी यादों का एक और लम्हा, यादों के लम्हों की टोकरी में डाल दिया शायद अब और कब मुलाकात हो.


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