देना सीखा
देना सीखा
मेरे दादा जी एक बहुत ही सज्जन, ईमानदार और नेक इंसान थे समाज में उनकी अपनी साख थी, शहर में उनका एक शो रूम था
दादा जी ने कभी भी अपने शो रूम में रखे सामान से समझौता नहीं किया हमेशा उत्तम गुणवत्ता वाला सामान ही लोगो को देते थे, जिससे शहर में उनका नाम और इज़्ज़त भी थी।
दादा जी अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान -पुण्य में लगाते थे।
मेरा जन्म दिन आने वाला था, मेरी इच्छा थी दादा जी एक बड़ी पार्टी दें, परंतु मेरे दादा जी ने एक नियम बनाया था घर में किसी का भी जन्म दिन हो दादा जी खाना बनवाकर अनाथाश्रमों और गरीबों में बंटवाते थे, उनका कहना था दुआएँ कमाओ दुआएँ मुश्किल समय में बहुत काम आती हैं। बाकी सब तो ठीक था दादा जी जो भी करें मुझे कोई आपत्ती नहीं थी परन्तु अपने कुछ दोस्तों कों पार्टी देने की मेरी इच्छा थी।
आखिर मेरा जन्म दिन आया ,सुबह बहा धोकर हम मंदिर गए फिर प्रसाद चढ़ाया ,उसके बाद अनाथ आश्रम में खाना बांटा उन्हें खिलाया और कोई जरूरत का सामान दिया, बहुत अच्छा लग रहा था उनके चेहरों पर हंसी देखकर थोड़ी सी चीज भी उनके चेहरों पर हंसी ला रही थी ।
उसके बाद हम जुग्गी झोपड़ियों में गए वहां के बच्चे हमे देख उत्सुकता वश भागे दौड़े आ रहे थे ऐसा लग रहा था मानो उनके लिए कोई खुशी का खजाना खिल गया हो .....
बहुत कुछ बांटा भर पेट खाना खिलाया ,सब ने हमारे पैर छुए मानों हमने उन्हें नियामत दे दी हो।
अब मन संतुष्ट था अब किसी पार्टी की आवश्यकता नहीं लग रही थी। मन में एक गरूर था की हमने कुछ किया हम बड़े लोग हैं। रास्ते में घर जाते हुए कुछ देर के लिए हम एक पार्क में रुक गए, ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी,आम के पेड़ों से लदे वृक्ष झूल रहे थे, वहीं पास में सब के पेड़ भी थे ,फलों से लदे पड़े थे पेड़, मैं पेड़ों को निहार रही थी, तभी एक आम टूट कर नीचे गिरा मैंने आम उठाया ,वृक्ष को गौर से देखा .... मेरा गुरूर चकनाचूर हो गया इन वृक्षों को देखा तो लगा प्रकृति तो निस्वार्थ भाव से बस दे रही है यकीनन ये परमात्मा की अद्भुत रचना है प्रकृति ,वृक्ष, नदिया ,पर्वत ,सूर्य,पवन,आदि ,आदि ...
प्रकृति से बड़ा कोई दानी नहीं हो सकता, मेरा अहंकार टूटा।
प्रकृति को संजोना ,उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है तभी मनुष्य समाज सुरक्षित रहेगा ।
अब मुझे मेरी प्रकृति गुरूर और गर्व महसूस हुआ उसका संरक्षण मेरा परम कर्तव्य है यह मैंने मन ही मन प्रण लिया।
