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Prashant Wankhade

Horror

4  

Prashant Wankhade

Horror

डरावना मंजर

डरावना मंजर

10 mins
22

रात के ठीक 2:13 बजे।


पूरा शहर सो चुका था।


लेकिन शहर के बाहरी हिस्से में खड़ी वह तेरह मंज़िला इमारत अब भी जाग रही थी।



बारिश लगातार काँच की दीवारों पर थपेड़े मार रही थी। आसमान में बिजली चमकती, और हर चमक के साथ इमारत का ऊपरी हिस्सा कुछ सेकंड के लिए दिखाई देता… फिर वापस अंधेरे में डूब जाता।


इमारत का नाम था — “सुर्या हाइट्स।”


तीन साल से बंद।


तीन साल से वीरान।


और तीन साल से… उसके 13वें फ्लोर पर जाने की मनाही थी।


लोग कहते थे, वहाँ रात में किसी औरत के रोने की आवाज़ आती है।


कुछ लोग कहते थे — किसी बच्चे की हँसी।


लेकिन जो बात सबसे ज़्यादा डरावनी थी…


वो ये कि जो भी उस फ्लोर पर गया… वापस आने के बाद अजीब बन‌ जाता ।




उस रात, पाँच लोग उस बिल्डिंग के अंदर घुसे।


चार लड़के।


एक लड़की।


सबके हाथों में कैमरे और टॉर्च थीं।


वे यूट्यूब के लिए “रियल हॉरर एक्सप्लोर” शूट करने आए थे।


“भाई, अगर आज कुछ मिल गया ना… वीडियो फाड़ देगा!”


रोहन ने कैमरा ऑन करते हुए कहा।


उसकी आवाज़ पूरे खाली लॉबी में गूंज गई।


लॉबी में धूल जमी थी। रिसेप्शन डेस्क पर पुरानी फाइलें बिखरी थीं। हवा में सीलन और सड़े पानी की गंध थी।


रिया ने धीरे से पूछा—


“तुम लोगों को सच में लग रहा है ये अच्छा आइडिया है?”


“डर लग रहा है क्या?”


अमन हँस पड़ा।


रिया ने जवाब नहीं दिया।


क्योंकि उसी पल…


उसे ऊपर कहीं से धप्प… धप्प… धप्प… की आवाज़ सुनाई दी।


जैसे कोई भारी चीज़ धीरे-धीरे घसीट रहा हो।


सब चुप हो गए।


रोहन ने कैमरा ऊपर किया।


अंधेरी सीढ़ियाँ।


कुछ नहीं।


“शायद पाइपलाइन होगी…”


विवेक बोला।


लेकिन उसकी आवाज़ में भी भरोसा नहीं था।


लिफ्ट बंद थी।


उन्हें सीढ़ियों से ऊपर जाना पड़ा।


हर फ्लोर पर अजीब सन्नाटा था।


7वें फ्लोर पर पहुँचते ही रिया अचानक रुक गई।


“तुम लोगों ने सुना?”


सब रुक गए।


दूर कहीं…


आख़री ट्रेन

कोई बहुत धीरे-धीरे गाना गा रहा था।


एक औरत की आवाज़।


बहुत मीठी…


लेकिन अजीब तरह से टूटी हुई।


“ये prank है क्या?” अमन फुसफुसाया।


कोई जवाब नहीं आया।


गाना अचानक बंद हो गया।


और अगले ही सेकंड—


ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।


तेज़।


बहुत तेज़।


जैसे कोई नंगे पैर सीढ़ियों पर भाग रहा हो।


ठक-ठक-ठक-ठक-ठक!


“कौन है वहाँ?!”


रोहन चिल्लाया।


आवाज़ रुक गई।


पूरा सन्नाटा।


फिर…


एक बच्ची की हँसी सुनाई दी।


बहुत पास से।


रिया का चेहरा सफेद पड़ गया।


“मैं नीचे जा रही हूँ…”


लेकिन तभी सीढ़ियों का दरवाज़ा अपने आप धड़ाम! से बंद हो गया।


सब उछल पड़े।


अमन भागकर दरवाज़े तक गया।


दरवाज़ा नहीं खुला।


“ये लॉक कैसे हो गया?!”


उसकी आवाज़ काँप रही थी।


और तभी—


ऊपर 13वें फ्लोर की तरफ जाने वाली सीढ़ियों में अंधेरे के बीच कोई खड़ा दिखाई दिया।


बहुत लंबा।


बहुत पतला।


उसका सिर अस्वाभाविक रूप से टेढ़ा था।


और उसकी आँखें…


पूरी सफेद।


रिया के हाथ से टॉर्च गिर गई।


रोहन ने कैमरा ज़ूम किया।


स्क्रीन पर वह आकृति साफ दिख रही थी।


लेकिन असली सीढ़ियों में…


वहाँ कुछ नहीं था।


“भाई… कैमरे में… कैमरे में दिख रहा है…”


विवेक की सांस अटक गई।


रोहन ने धीरे-धीरे कैमरे से नज़र हटाकर ऊपर देखा।


खाली सीढ़ियाँ।


फिर वापस कैमरे की स्क्रीन देखी—


अब वो आकृति पहले से ज़्यादा करीब थी।


एकदम कैमरे के सामने।


उसका चेहरा पूरी स्क्रीन भर चुका था।


सड़ी हुई चमड़ी।


फटा हुआ मुँह।


और होंठों के बीच सैकड़ों छोटे-छोटे दाँत।


अचानक कैमरा बंद हो गया।


पूरी सीढ़ियों में अंधेरा छा गया।


फिर…


रिया चीखी।


“पीछे!!”


सबने पलटकर देखा।


वो चीज़ अब उनके पीछे खड़ी थी।


इतनी पास… कि उसकी ठंडी साँसें महसूस हो रही थीं।


उसका शरीर इंसान जैसा था… लेकिन हाथ जमीन तक लटक रहे थे।


और उसकी गर्दन…


धीरे-धीरे 180 डिग्री घूम रही थी।


कड़क…


कड़क…


कड़क…


उसकी आँखें सीधे रोहन पर टिक गईं।


फिर उसने मुस्कुराया।


एक लंबी, असंभव मुस्कान।


और अचानक—


पूरी बिल्डिंग की सारी लाइट्स जल उठीं।


सिर्फ दो सेकंड के लिए।


उन दो सेकंड में…


उन्होंने देखा—


सीढ़ियों की दीवारों पर हर तरफ खून से हाथों के निशान थे।


और उन निशानों के बीच…


सैकड़ों लोग खड़े थे।


चुपचाप।


सबके चेहरे नीचे झुके हुए।


जैसे वे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे हों।


फिर सब अंधेरा।


और पूरी बिल्डिंग में एक साथ चीखें गूंज उठीं।


ऐसी चीखें…


जो इंसानों की नहीं लग रही थीं।




उन चीखों के बाद…


पूरा माहौल एकदम शांत हो गया।


इतना शांत… कि सबको अपनी धड़कनें सुनाई देने लगीं।


रिया काँपते हुए पीछे हट रही थी। उसकी आँखें अंधेरे में कुछ खोज रही थीं।


“व… वो कहाँ गया…?”


किसी ने जवाब नहीं दिया।


क्योंकि उसी पल—


ऊपर 13वें फ्लोर से धीरे-धीरे घिसटने की आवाज़ आने लगी।


जैसे कोई भारी चीज़ फर्श पर रेंग रही हो।


खर्रररर…


खर्रररर…


हर आवाज़ सीढ़ियों में गूंज रही थी।


अमन ने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।


उसकी रोशनी कांप रही थी।


“हमें नीचे जाना चाहिए…” उसने फुसफुसाकर कहा।


लेकिन तभी…


सीढ़ियों के ऊपर लगे पुराने स्पीकर में अचानक खरखराहट हुई।


क्र्र्र्र…


फिर एक लड़की की आवाज़ आई—


“13वें फ्लोर पर आपका स्वागत है…”


रोहन का चेहरा उतर गया।


“ये… ये किसी ने सेटअप किया है…”


वो खुद को समझाने की कोशिश कर रहा था।


लेकिन उसकी आवाज़ बता रही थी कि अब उसे भी डर लगने लगा था।


फिर स्पीकर से दोबारा आवाज़ आई—


“कृपया… पीछे मुड़कर मत देखिए…”


सब जम गए।


रिया की सांसें तेज़ हो गईं।


विवेक धीरे-धीरे बोला—


“अगर ये prank है… तो बहुत घटिया है…”


अचानक पीछे से किसी के नाखून घसीटने की आवाज़ आई।


खर्रररर…


बहुत पास से।


रिया खुद को रोक नहीं पाई।


उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।


और उसकी चीख निकल गई।


सीढ़ियों की दीवार पर…


पुराना रेल्वे ब्रिज

एक औरत उल्टी चिपकी हुई थी।


हाँ… उल्टी।


जैसे मकड़ी।


उसके लंबे बाल नीचे लटक रहे थे।


हाथ-पैर अस्वाभाविक तरीके से मुड़े हुए।


और उसकी आँखें…


पूरी काली।


वो धीरे-धीरे दीवार पर रेंग रही थी।


टप…


टप…


उसके मुँह से काला पानी टपक रहा था।


“भागो!!”


रोहन चिल्लाया।


सब ऊपर की तरफ भागने लगे क्योंकि नीचे जाने वाला दरवाज़ा बंद था।


सीढ़ियाँ खत्म हुईं।


सामने जंग लगा दरवाज़ा था।


उस पर लिखा था—


13


दरवाज़े के नीचे से हल्की पीली रोशनी बाहर आ रही थी।


और अंदर से…


बहुत सारे लोगों के धीरे-धीरे फुसफुसाने की आवाज़।


जैसे सौ लोग एक साथ कुछ पढ़ रहे हों।


अमन ने काँपते हाथों से दरवाज़ा धक्का दिया।


चूंऊऊ…


दरवाज़ा खुल गया।


अंदर पूरा फ्लोर वैसा नहीं था जैसा होना चाहिए था।


वो किसी बिल्डिंग का फ्लोर नहीं लग रहा था।


बल्कि…


पुराना अस्पताल।


दीवारों पर जंग।


फर्श पर सूखा खून।


टूटे हुए स्ट्रेचर।


छत से लटकती ट्यूब लाइट जो हर दो सेकंड में झपक रही थी।


और सबसे डरावनी बात—


पूरा फ्लोर खाली नहीं था।


सैकड़ों लोग वहाँ खड़े थे।


बिल्कुल स्थिर।


सबने सफेद मरीजों वाले कपड़े पहने थे।


उनके चेहरे नीचे झुके हुए थे।


रोहन ने धीरे से कहा—


“ये… इंसान हैं क्या…?”


अचानक उन सभी लोगों ने एक साथ सिर उठाया।


उनके चेहरे देखकर सबकी रूह कांप गई।


किसी की आँखें नहीं थीं।


किसी का जबड़ा फटा हुआ था।


किसी का पूरा चेहरा जला हुआ।


और सबकी आँखें सीधे इन्हीं पाँचों पर थीं।


फिर…


सभी ने एक साथ मुस्कुराना शुरू किया।


धीरे-धीरे।


अस्वाभाविक तरीके से।


ट्यूब लाइट जोर से झपकी।


एक सेकंड अंधेरा।


जब रोशनी वापस आई—


वे सारे लोग थोड़ा और करीब आ चुके थे।


रिया रोने लगी।


“हमें यहाँ से निकलना है…”


तभी फ्लोर के आखिरी कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुला।


अंदर से पीली रोशनी बाहर आई।


और एक छोटी बच्ची बाहर निकली।


लगभग आठ साल की।


सफेद फ्रॉक।


हाथ में पुरानी गुड़िया।


उसका चेहरा सामान्य था।


लेकिन उसकी आँखों में अजीब खालीपन था।


वो धीरे-धीरे रिया के पास आई।


फिर बहुत मासूम आवाज़ में बोली—


“क्या आप मेरी मम्मी को देखना चाहोगे…?”


रिया कुछ बोल नहीं पाई।


बच्ची ने उंगली से पीछे कमरे की तरफ इशारा किया।


रोहन ने हिम्मत करके अंदर झाँका।


और उसी पल…


उसका पूरा शरीर जम गया।


कमरे की छत से…


दर्जनों लाशें उल्टी लटक रही थीं।


सबकी आँखें खुली हुई।


और बीच में…


एक औरत कुर्सी पर बैठी थी।


उसका चेहरा पट्टियों से ढका हुआ था।


लेकिन सबसे भयानक चीज़ थी—


उसके पेट के अंदर हलचल हो रही थी।


जैसे उसके भीतर कुछ जिंदा हो।


धीरे-धीरे उसका पेट फटने लगा।


चिर्ररर…


खून फर्श पर गिरने लगा।


और उसके पेट के अंदर से…


एक लंबा, काला हाथ बाहर निकला।


फिर दूसरा।


फिर…


कुछ बाहर आने लगा।


कुछ ऐसा…


जो इंसान नहीं था।


ट्यूब लाइट्स पागलों की तरह झपकने लगीं।


पूरे फ्लोर में एक साथ लोगों की हँसी गूंज उठी।


और उस बच्ची ने मुस्कुराकर कहा—


“मम्मी जाग गई…”




उस बच्ची के इतना कहते ही…


पूरा 13वाँ फ्लोर हिलने लगा।


दीवारों से काला पानी बहने लगा।


ट्यूब लाइट्स एक-एक करके फटने लगीं।


धड़ाम!


धड़ाम!


धड़ाम!


अब वहाँ सिर्फ लाल इमरजेंसी लाइट जल रही थी।


उस लाल रोशनी में वो चीज़… जो उस औरत के पेट से बाहर आ रही थी… धीरे-धीरे साफ दिखाई देने लगी।


उसका शरीर इंसान जैसा था…


लेकिन बहुत लंबा।


हड्डियाँ चमड़ी को भीतर से फाड़ती हुई दिख रही थीं।


चेहरा पूरी तरह चिकना।


ना आँखें।


ना नाक।


सिर्फ एक लंबी कटी हुई मुस्कान।


रिया डर के मारे जमीन पर गिर गई।


अमन पीछे हटते हुए चिल्लाया—


“भागो यहाँ से!!”


लेकिन पीछे खड़े सारे मरीज अब धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगे।


उनके पैर जमीन पर नहीं चल रहे थे…


वे घिसट रहे थे।


जैसे लाशों को कोई अदृश्य चीज़ खींच रही हो।


रोहन ने रिया का हाथ पकड़ा और सब भागने लगे।


पूरा फ्लोर अब बदल रहा था।


दीवारों पर पुराने ऑपरेशन के निशान उभरने लगे।


हर कमरे से चीखें आ रही थीं।


कहीं कोई दरवाज़ा पीट रहा था।


कहीं कोई रो रहा था।


और हर आवाज़ के बीच…


एक ही शब्द बार-बार सुनाई दे रहा था—


“माँ…”


“माँ…”


“माँ…”


विवेक अचानक रुक गया।


उसने सामने दीवार पर लगी एक पुरानी फोटो देखी।


उस फोटो में यही बिल्डिंग थी।


लेकिन नीचे लिखा था—


“सूर्या मानसिक चिकित्सालय — 1998”


रिया हाँफते हुए बोली—


“ये… हॉस्पिटल था…?”


तभी पीछे से बच्ची की आवाज़ आई—


“यहाँ लोगों को ठीक नहीं किया जाता था…”


सबने पलटकर देखा।


वो बच्ची अब उनके पीछे खड़ी थी।


लेकिन अब उसका चेहरा बदल चुका था।


उसकी आँखें पूरी काली हो गई थीं।


और उसकी मुस्कान कानों तक फटी हुई थी।


“यहाँ उन्हें… बंद किया जाता था…”


अचानक पूरा फ्लोर जोर से कांपा।


और सबके सामने एक भयानक दृश्य चमका—


डॉक्टर मरीजों को जंजीरों से बाँध रहे थे।


लोग चीख रहे थे।


बच्चों पर प्रयोग हो रहे थे।


एक औरत अपने बच्चे को बचाने की कोशिश कर रही थी…


लेकिन लोगों ने उसे पकड़ रखा था।


फिर—


उसी औरत के पेट में कुछ इंजेक्ट किया गया।


उसकी चीख पूरे फ्लोर में गूँज उठी।


रिया कांपते हुए समझ गई।


“वो… वही औरत है…”


बच्ची मुस्कुराई।


“उन्होंने मम्मी के अंदर उसे पैदा किया…”


अचानक पीछे से धप्प… धप्प… धप्प… की आवाज़ आई।


वो लंबा काला जीव अब उनकी तरफ आ रहा था।


हर कदम पर फर्श टूट रहा था।


उसका मुँह धीरे-धीरे खुला…


और उसके अंदर…


सैकड़ों इंसानी दाँत थे।


अमन पागलों की तरह सीढ़ियों की तरफ भागा।


लेकिन जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला—


उसकी चीख निकल गई।


सीढ़ियों में अब कुछ नहीं था।


सिर्फ अंतहीन अंधेरा।


जैसे पूरी बिल्डिंग गायब हो चुकी हो।


और तभी—


बंद पड़ी फैक्ट्री

उस अंधेरे से दर्जनों हाथ निकले…


और अमन को भीतर खींच लिया।


उसकी चीख अचानक बंद हो गई।


बाकी सब जड़ हो गए।


रिया रोते हुए बोली—


“हमें क्या चाहिए तुम लोगों को?!”


बच्ची धीरे-धीरे उसके पास आई।


फिर मासूम आवाज़ में बोली—


“बस… कोई हमारे साथ रहे…”


अचानक पूरे फ्लोर की सारी लाइट्स बुझ गईं।


पूर्ण अंधेरा।


फिर…


धीरे-धीरे एक पुराना लाउडस्पीकर चालू हुआ।


क्र्र्र्र…


“सभी मरीज कृपया अपने कमरों में लौट जाएँ…”


उसके बाद…


चीखें।


दौड़ने की आवाज़ें।


हड्डियाँ टूटने की आवाज़।


और फिर…


एकदम सन्नाटा।


तीन दिन बाद।


पुलिस को “सूर्या हाइट्स” के बाहर रोहन का कैमरा मिला।


बाकी चार लोग कभी नहीं मिले।


कैमरे की आखिरी रिकॉर्डिंग में सिर्फ अंधेरा दिखाई देता था।


लेकिन आखिरी पाँच सेकंड में…


एक छोटी बच्ची कैमरे के बिल्कुल सामने आई।


उसने मुस्कुराकर कहा—


“क्या आप मेरी मम्मी को देखना चाहोगे…?”


और वीडियो अचानक बंद हो गया।


उसके बाद से…


जो भी उस वीडियो को पूरी रात अकेले देखता है…


उसे रात 2:13 बजे अपने घर में…


ऊपर से किसी के घिसटने की आवाज़ सुनाई देती है।


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