Mrinal Ashutosh

Drama


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Mrinal Ashutosh

Drama


दानव

दानव

11 mins 140 11 mins 140

बसन्त का आगमन हो चुका था। तड़के थोड़ी बारिश भी हुई थी तो मौसम और भी सुहावना हो गया था। पक्षियों का कलरव वातावरण को संगीतमय बना रहा था। आँखें पूरब दिशा में सूर्य को ढूंढ रही थीं जो अभी भी तरसा रहा था। बालकनी में बैठी कविता जी ने चाय की पहली चुस्की ली ही थी कि डोरबेल की आवाज़ ने उठने पर मजबूर कर दिया। कप टेबल पर रख दरवाजे की ओर बढ़ी। खोला तो सामने मेड शीला के साथ उसकी छोटी बेटी रूबी भी खड़ी थी।

"अरे शीला, क्या हुआ ? रूबी को वापस क्यों बुला लिया ?"

"बीबीजी! वो! इसका वहाँ मन नहीं लगता था तो वापस आ गयी !"

"क्या बात करती है ? तुम्हारी बड़ी बेटी अभी दस दिन पहले ही न माँ बनी है। ऑपरेशन से बच्चा हुआ है न। ऐसे समय में उसको जरूरत तो होगी ही ! रूबी को अभी वहाँ रहना चाहिए था। कैसे संभालेगी वह अकेले खुद को और नन्हीं सी जान को ?"

"रूबी ! क्या हुआ ? मन क्यों नहीं लग रहा था वहाँ ?"

"कुछ नहीं मैडम जी ! बस ! मन नहीं लगा तो वापस आ गए।" रूबी की आवाज़ में कुछ हकलाहट थी जो कविता जी से छुप न सकी। आखिर कॉलेज में साइकोलॉजी की प्रोफेसर थीं कविता मेहरा !

वापस बालकनी आकर कुर्सी पर बैठ गयीं।

चाय ठंडी होने लगी थी पर, प्रोफेसर का मन अब शान्त न था। अखबार उठाया और पन्ने पलटने लगी पर मन बार-बार वापस रूबी पर आकर टिक जाता। अखबार टेबल पर रखते हुए आवाज़ लगायी ,"शीला! इधर बालकनी में आना तो!"

"किचेन में झाड़ू लगा कर आई बीबीजी!"

"नहीं! पहले इधर आ जा !" आवाज़ में तेज़ी कुछ ज्यादा थी।

"जी!" सामने आकर खड़ी हो गयी शीला।

"शीला, सच बता। क्या हुआ! रूबी को वापस क्यों बुला लिया?मुझे उसकी आवाज़ में कुछ..."

"क्या बताऊँ बीबीजी?" शीला फफक पड़ी।

"बोल न क्या हुआ?"

"नहीं बता सकती आपको। आपको क्या किसी को भी नहीं बता सकती।"

"ऐसा क्या हुआ जो किसी को नहीं बता सकती?"

"मेरे दामाद ने ही रूबी के साथ...." कहते हुए

शीला की रुलाई फूट पड़ी और वह किचन की ओर भागी। और इधर कविता जी के हाथ से कप छूट कर फर्श पर गिरा..ढप्प...

आगे कुछ पूछने की हिम्मत न हुई और खुद चली गयी उस जहाँ में, जहाँ आज से बीस साल पहले उसके साथ भी ऐसा ही कुछ घटित हुआ था। ऐसा लग रहा था कि मानों एक फिर वही नीच काम वही दानव उसके साथ दोहरा रहा हो!

वह जोर से चीख पड़ी... नहीं....!

"क्या हुआ बीबीजी ?" शीला दौड़ी आयी।

"कुछ नहीं!कुछ नहीं। एक ग्लास पानी दे!"

शीला ने पानी का ग्लास थमाया। जल्दी से एक घूँट लगाते हुए कविता जी ने इशारे से शीला को काम में लग जाने को कह आँखें बंद कर लीं।

बन्द आंखों का दायरा बहुत विस्तृत होता है। वे पीछे, बहुत पीछे और उससे पीछे भी देख लेती हैं।

ऐसा लग रहा था कि मानो ठहरे हुए तालाब में किसी ने एक बड़ा सा पत्थर फेंक दिया हो! और पानी में हलचल एक बार फिर शुरू हो गयी हो। आखिर कोई भूल भी कैसे सकता है! कभी नहीं भूलने वाली रात थी वह!

तीन बहन और एक भाई में सबसे छोटी थी वह! सबसे सुंदर और सबसे काजुल! मुँह से कोई काम कहता , उससे पहले कर देने वाली कविता। साथ ही पढ़ने में सबसे तेज़। अपने वर्ग में हमेशा अव्वल आती। पापा सरकारी स्कूल में चपरासी थे पर बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। नवमीं पास कर वह दसवीं में गयी ही थी। बड़ी दीदी को बाबू होने वाला है! साल भर पहले ही उसकी शादी हुई थी। इस खुशखबरी ने घर को और खुशहाल बना दिया था। यह सोच-सोच कर तीनों भाई-बहन खूब खुश रहते और झगड़ते भी। भाई कहता कि मैं मामा बनने वाला हूँ तो दोनों बहनें कहतीं कि नहीं, मैं मौसी बनने वाली हूँ। कभी कभार तो माँ को आकर झगड़े सुलझाने पड़ते। अधिक दिनों तक प्रतीक्षा नहीं करना पड़ी। जैसे ही समाचार मिला कि दीदी को बाबू हुआ है, पापा ने तुरन्त एक गाड़ी रिजर्व की औऱ सब लोग निकल पड़े। घर से करीब सौ किलोमीटर दूर बड़े शहर जीजाजी का ऑफिस था। ऑफिस के करीब ही किराये का मकान मिल गया था।

रास्ते भर तीनों भाई-बहन बच्चे के लिये नाम चुनते रहे। कोई कहता सोनू तो कोई बिट्टू। कोई सनी तो कोई राहुल। कब पहुंच गए दीदी के पास हॉस्पिटल, रास्ते का पता ही नहीं चला। जीजाजी के घर से उनकी माँ के अलावा कोई और नहीं आया था। हॉस्पिटल से घर और घर से हॉस्पिटल में छह दिन कैसे बीत गये, पता ही न चला। तीनों भाई-बहन बच्चे को गोद लेने को बेचैन रहते पर माँ किसी को हाथ लगाने नहीं देती। कहती कम से कम पन्द्रह-बीस दिन रूक जाओ। देखते नहीं कि बच्चा कितना कमजोर है। आज दीदी हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर घर आ रही थी और आज ही रात में बच्चे का प्रथम संस्कार छठी भी था। इस उपलक्ष्य में जीजाजी ने एक छोटी-सी पार्टी दी थी। अधिक तो नहीं पर बीस-बाईस लोग जरूर आये थे। छठी के अगले दिन जब सब लोग जाने की तैयारी करने लगे तो दीदी की सास ने माँ का हाथ पकड़ लिया,"बहू को ऑपरेशन से बच्चा हुआ है और डॉक्टर ने कम से कम तीन महीने रेस्ट करने को कहा है! मेरी तबियत भी ठीक नहीं रहती। आजकल बाई तो मिल जाती है पर सही से काम कहाँ करती है! आप हम पर एक उपकार कीजिए। कृपया कविता को यहीं छोड़ दीजिए!"

माँ ने मेरी ओर देखा। मन तो मेरा रूकने का नहीं था पर बाबू का प्यारा चेहरा देख मैं तैयार हो गयी।

मुझे छोड़ सब वापस घर को लौट गए।

घर में अधिक काम न था। सब काम फटाफट निबटा कर मैं बाबू के साथ खेलती रहती। सोते समय उसकी मुस्कान देखने का आनंद कुछ अलग ही था। उसकी कोमल अंगुलियों को छूने से भी शुरू में डर लगता था! पर छूने की कोशिश जरूर करती। उसके रोने की आवाज़ से मैं घबरा जाती तो दीदी की सास प्यार से मुझे समझाती। दो कमरे का फ्लैट था। एक कमरे में दीदी, जीजाजी और बाबू तो दूसरे कमरे में मैं और दीदी की सास! हफ्ता कैसे बीत गया, पता ही न चला। फिर आयी वह काली रात....। 

एक बार फिर से रोआँ सिहर उठा। उस रात पड़ोस में शादी थी। दीदी की सास उसी में गयी हुई थी। रात के बारह-एक बज रहे होंगे। नींद मेरे बुलाने पर आने से मना कर रही थी। मैं करवटें बदलते हुए नींद की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी मेरे शरीर पर सरसराहट सी महसूस हुई। मैं मुझे लगा कि शायद मैं कोई बुरा सपना देख रही हूं पर यह सपना नहीं था। सरसराहट अब गिरफ्त में बदलने लगी थी। मैं डर के मारे पसीने से नहा उठी और चीखी,"कौन! कौन है?"

"मैं! मैं हूँ कविता!" जीजाजी के फुसफुसाहट की आवाज़ के साथ मेरे मुँह पर उनका हाथ था।

"नहीं। नहीं। छोड़िये मुझे!" पर मेरी चीखें डीजे और लाउडस्पीकर की आवाज़ में दब गईं। लाख कोशिश के बाद भी उसके जकड़न से मैं अपने आपको आज़ाद न कर पाई। हाथ-पैर पटकती रही पर वही हुआ जो कोई लड़की सपने में भी अपने साथ नहीं होने देना चाहती है। और...और आधे घण्टे वह मुझे रौंदता रहा। मैं खून के आँसू रोती रही। वह जब उठ कर गया। तब मैं पस्त हो चुकी थी। साली तो छोटी बहन के समान होती है न! मज़ाक में उसे आधी घरवाली भी कह देते हैं। पर यहाँ तो पूरी घरवाली बना दिया। एक नाजुक कली को मसल दिया और वह भी ज़बरदस्ती! मेरे आँसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। जब रक्षक ही भक्षक बन जाये तो...तो क्या किया जा सकता है! भगवान को कोसती रही कि हे भगवान! तुमने मेरी दीदी को कैसा पति दे दिया! पहले तो वह ऐसे न थे जब हमारे घर आते थे। या होंगे, मैं बच्ची समझ न पायी होऊँगी। या मौके की तलाश में होंगे। उस पल के लिये अपने आपको को कोस रही थी जब दीदी के सास ने मुझे रूकने को कहा और मैंने हामी भर दी थी। शरीर बुरी तरह टूट रहा था। मैं उठने कोशिश करती पर उठ नहीं पा रही थी। बड़ी मुश्किल से उठी। एक ग्लास पानी पीया और धीरे से दीदी के कमरे में गयी। दीदी निढाल सो रही थी और वह दानव भी दीदी के बगल में खर्राटे ले रहा था।

करीब एक घण्टे के बाद दरवाजे की घण्टी बजी। उठने का मन नहीं कर रहा था। मैं क्या किसी का भी मन नहीं करता। फिर दीदी की सास की आवाज़ आयी। दरवाजा खोलते ही लिपट गयी उनसे। उन्होंने सर पर हाथ फेरा,"क्या हुआ?"

"जीजाजी...जीजाजी ने मेरे साथ गलत..."

"ओह्ह! ऐसा कैसे कर सकता है वह तुम्हारे साथ? कल बात करते हैं। बेटा, रात बहुत हो चुकी है।"

बिस्तर पर आते ही दीदी की सास खर्राटे भरने लगी पर मेरी आँखों से नींद कोसों दूर थी। मुझे अपने आप से घिन्न आने लगी थी। मन कर रहा था कि कुछ कर लूँ! क्या करुंगी अब जी कर ! यह सोचते-सोचते कब आँख लग गई पता न चला। 

सवेरे नींद काफी देर से खुली। तब तक वह दानव अपने ऑफिस जा चुका था। उठते ही बिस्तर से भागने वाली लड़की को आज बिस्तर छोड़ने का मन नहीं कर रहा था। तभी दीदी की सास नज़दीक आयी और धीरे से बोली,"बेटी, तेरे हाथ जोड़ती हूँ। यह बात किसी को न कहना। तुम्हारी दीदी तो मर जाएगी। फिर उस नन्हीं सी जान का क्या होगा ?"

मैं चुप रही। पर उनका बोलना जारी रहा।

 "सोच उसके बारे में! तू अपने दीदी और बच्चे से कितना प्यार करती है। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि आज के बाद यह कभी न होगा।"

रख लिया मैंने कलेजे पर पत्थर! और दीदी और बाबू के कारण बन गयी मैं बुत! दीदी जागती कम और सोती ज्यादा थी। जगी भी रहती तो बेहोश सी रहती। मैं सबसे कटने लगी। हमेशा एकांत ढूंढती। दीदी ने एक बार मुझसे पूछा भी कि क्या हुआ तुझे? आजकल मेरे पास क्यों नहीं बैठती।

मैंने गर्दन हिलाया, कुछ नहीं।

क्या कहती मैं दीदी को कि जिस पति को तुम भगवान मानती हो, वह राम नहीं बल्कि रावण है।उसने तुम्हारी फूल जैसी बहन को ज़बरन तुम्हारी सौतन बना दिया। इधर दानव मुझसे आंखें चुराता। खूब सवेरे निकल जाता और ऑफिस से आता भी देर से।

इस घटना के बाद दीदी की सास मुझसे कुछ ज्यादा ही प्यार जताने लगी। बहुत मना करने के बाद भी एक दिन ज़बरदस्ती बाजार ले गयी। कुछ कपड़े और गहने खरीद दिए। मैं मना करती रही पर एक न सुनी।

बोली,"तू तो मेरी बेटी है!"

तुरन्त मन हुआ कि पूछ लूँ! क्या आपकी बेटी के साथ भी आपके बेटे ने यह काम किया था क्या ?

पर चुप रह गयी।

कहते हैं ना कि जब बाघ के मुँह में मानव का खून लग जाता है तो वह नरभक्षी हो जाता है। वह बस मौके की तलाश में रहता है। दिन पहाड़ की तरह लगता था और रात में नींद कोसों दूर रहती। भूल नहीं पा रही थी उस दिन को...। कोई भला भूल भी कैसे सकता है!

एक दिन काफी देर से उठी। उठते ही फिर शरीर बुरी तरह टूट रहा था? बुखार तो नहीं था फिर शरीर क्यों टूट रहा था। सोचा बाथरूम जाकर सबसे पहले नहा लेती हूं। बाथरूम में जैसे ही कपड़े उतारे तो मेरे होश उड़ गए। अंडरगारमेंट्स उल्टा पहना हुआ था मैंने। मैं धम्म से वहीं बैठ गयी। समझने में पल भर न लगा कि दानव ने अब मायावी रूप धारण कर मुझे छला। फिर याद आया कि रात में सोते समय दूध का गिलास...कहीं उसमें तो कुछ मिला... नहीं.. नहीं दीदी की सास ऐसी नहीं हो सकती... दूसरे मन ने कहा कि क्यों नहीं कर सकती ऐसा...उसने नहीं तो उसके शैतान बेटे ने मिलाया होगा... बाथरूम में झरने के पानी से अधिक मेरे आँसू बह रहे थे! मेरे साथ ही ऐसा क्यों...क्यों ?

पूरे शरीर को रगड़-रगड़ कर उस दानव की गंदगी धोना चाह रही थी पर उसने तो मानों मेरी आत्मा को ही मैला कर दिया था...

नहाकर कपड़े पहनते ही मैंने कुछ निश्चय कर लिया। अब नहीं और अब बिल्कुल नहीं। अपनी आत्मा को मारकर मैं जिंदा नहीं रह सकती।

कमरे में पहुँची तो दीदी की सास कोई भजन गुनगुना रही थी।

"आज रात फिर आपके बेटे ने मेरे साथ वही गंदा काम..." चीखना चाह रही थी पर दीदी न सुने, यह सोच कर आवाज़ पर बड़ी मुश्किल से नियंत्रण रखा।

"चुप क्यों हैं ? जवाब दीजिये !"

"बेटी। अब तुम भी जवान हो। तुम्हें भी मन करता होगा किसी मर्द के...."

"थू...छि...इतनी घटिया सोच... उस दिन आपने मुझे बेटी कहा था। आप अपनी बेटी के बारे में भी ऐसा ही सोचती होंगी न! आप औरत नहीं औरत के नाम पर कलंक हैं। थू..."

आवाज़ पर नियंत्रण न रहा। शायद दीदी ने कुछ सुन लिया हो। उसकी आवाज़ आयी,"क्या हुआ छुटकी?"

"कुछ नहीं दीदी। बहुत दिन हो गया अब। घर जा रही हूँ।" दीदी के गले मे लिपटते हुए मैंने कहा।

"अरे दो दिन और रूक जा। रविवार को वह घर छोड़ देंगे तुझे! अकेली कैसे जायेगी?"

"मैं अकेले चली जाऊँगी दीदी। अब तुम्हारी छुटकी बच्ची नहीं रही, जवान हो गयी है।" बड़ी मुश्किल से मैंने अपने आँसू रोके। कपड़े बैग में डालते हुए मैं निकल पड़ी स्टेशन की ओर...। दीदी के सास ने रोका भी नहीं। और उसके रूकने से मैं रुकने वाली थी भी नहीं!

पर चिंतन के साथ रूदन भी जारी था। कदम के साथ गंगा-जमुना की धार भी चल रही थी।

क्या किसी पुरुष के बलात्कारी बनने में माँ का भी रोल होता है?

क्या कोई औरत इस हद तक भी गिर सकती है कि अपनी बेटी समान...न...न...न

दीदी की सास अपवाद ही होंगी। भगवान करे वह, अपनी तरह की दुनिया मे अकेली औरत हो!

"बीबीजी, आज खाने में क्या पकाऊं?" शीला की आवाज़ से कविता जी हड़बड़ा गयीं और वापस वर्तमान में लौटीं।

"जो मन हो बना लो। मेरा तो खाने का मन भी नहीं कर रहा।" शीला को जबाब दे वह तेज़ी से रूबी के पास गई और उसे बाँहों में भींच लिया। अब रूबी से रहा नहीं गया और वह फुट पड़ी।

"शीला! चल थाने।" रूबी का हाथ पकड़ते हुए कविता जी ने कहा।

"बीबीजी, भगवान के लिये ऐसा मत करो। हम बर्बाद हो जायेंगे। सोचो मेरी बड़ी बेटी का क्या होगा ?"

"छोटी बेटी के साथ क्या हुआ? वह भूल गयी क्या? एक चुप्पी दस अपराध को जन्म देती है। आज तेरी बेटी के साथ किया। कल किसी और के साथ। परसों किसी और के साथ! मैं हूँ न। सब संभाल लूंगी।"

अभी भी शीला के पैर उठ नहीं रहे थे।

"तू नहीं चलेगी थाने तो मैं रूबी को लेकर अकेले चली जाऊँगी। आज से वह मेरी बेटी है। जब तक उस दानव को सज़ा नहीं दिला देती तब तक मैं चैन से नहीं बैठूँगी।" कहते-कहते कविता जी के कदम दरवाजे की ओर बढ़ चले।


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