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Prashant Subhashchandra Salunke

Drama Tragedy


3  

Prashant Subhashchandra Salunke

Drama Tragedy


चंद घंटे

चंद घंटे

3 mins 154 3 mins 154

हमारी दुकान के करीब रहनेवाली सलोनी को में दिलोजान से चाहने लगा था। उसके बगैर एकपल भी जीना मुझे गवारा न था। आएदिन वह मेरी दुकान में आती रहेती थी लेकिन मैं उसे कभी अपने दिल की बात कह नहीं पाया था। लेकिन आज मैंने सलोनी को मेरे दिल की बात कहने का फैंसला कर लिया था।

मेरे इस फैंसले से मैं बेहद खुश था लेकिन कुदरत को मानो यह मंजूर नहीं था। अचानक उस दोपहर को मेरे सीने में तेज दर्द हुआ। पीड़ा से छटपटाटे हुए मैं वही पर बेहोश हो गया। तकरीबन शाम को पांच बजे मुझे होश आया तब मैंने अपने आप को एक होस्पिटल में पाया! वहाँ मौजूद नर्स ने बताया की मेरी दुकान के अडोस पडोस के कुछ दुकानदार मुझे बेहोशी की हालत में यहाँ लेकर आए थे। जब डोक्टर वहाँ आए तब मैंने उनसे पूछा, “मुझे क्या हुआ है डोक्टर?”डोक्टरने कहा, “सौरवजी, आपके रिपोर्ट देखकर मैं इतना ही कह सकता हूँ कि आप अब चंद घंटो के महेमान हैं । फिर भी हम आपको बचाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं ।“

यह सुनकर मेरा दिमाग सुन्न हो गया। डोक्टरने आगे जो कुछ भी कहा वह मैं समझ ही नहीं पाया। मेरे दिमाग में बस एक ही बात घुमने लगी, “मेरे पास अब सिर्फ चंद घंटे बचे हैं.... चंद घंटे...”

मैं बोला, “डोक्टर, मेरे जीवन के यह आखरी घंटे मैं इस होस्पिटल में बिताना नहीं चाहता। मैं इन अंतिम घड़ियों को जी भरकर जीना चाहता हूँ।“डोक्टरने मुझे रोकने की बहुत कोशिश की मगर मैं माना नहीं।

मैं सलोनी से एकबार मिलकर उसके दिल की बात जानना चाहता था। क्या वह भी मुझे मोहब्बत करती थी या फिर यह मेरा एक तरफा प्यार था? मेरे इन सवालों के जवाब जाने बिना मुझे मौत को गले लगाना कतई मंजूर नहीं था।

मैंने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी में देखा।उसमें वक्त मानो तेजी से दौड़ रहा था।

मेरे लिए अब एक एक मिनट कीमती थी।

“हे इश्वर! मुझे अपनी सलोनी से जल्द मिलने दो... उफ़! अभी गुजर जाएँगे यह अनमोल चंद घंटे।


मैं जैसेतैसे खुद को सँभालते हुए सलोनी के घर पहुँचा तो उसके घर के दरवाजे पर ताला लगा था!

मायूस होकर मैं वहाँ से लौट ही रहा था तभी सलोनी के पडोसीने कहा, “इस परिवार के साथ बहुत बुरा हुआ।“

मैंने हैरत से पूछा, “क्यों क्या हुआ?”

पडोसी बोला, “आपको नहीं पता? तीर्थयात्रा पर गया हुआ सलोनी का पूरा परिवार आज दोपहर को वहाँ आए हुए बाढ़ में बह गया।“मैंने चीखकर पूछा, “और सलोनी???”

पडोसीने कहा, “वह भी नहीं बची...”

मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई।

यकीनन इसलिए आज दोपहर को मेरे सीने में तेज दर्द हुआ था।

मैं सदमे से वहीँ घुटनों के बल बैठ गया।

मैंने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी में देखा।उसमें वक्त मानो थम सा गया था।

मेरे लिए अब एक एक मिनट सदियों जैसा था।

“हे इश्वर! मुझे अपनी सलोनी से जल्द मिला दो... उफ़! कब गुजरेगें यह मनहूस चंद घंटे!“सौरव की आँखों से बहते आँसुओ के साथ बहने लगे उसके जीवन के बचे खुचे वे चंद घंटे।



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