Rishi Dev Tiwari Tiwari

Inspirational


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Rishi Dev Tiwari Tiwari

Inspirational


चाय

चाय

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परिचय...!!!

चाय...! प्रथम दृष्टया ये शब्द सुनते ही किसी देश भक्त को तो यही लगता होगा... कि अंग्रेजियत का ये फॉर्मूला आज हम भारतीय अपने मत्थे लिए ढो रहे हैं। लेकिन चाय का जो भारतीय स्वरूप मेरे मानस पटल पर उत्पन्न होता है.... वह थोड़ा भिन्न है। चाय एक ऐसा साधन है...जिसके माध्यम से लोग विचारों व स्वप्नों के सागर में गोते लगाते हैं। चाय एक ऐसा साथी है...जिसके साथ लोग मन ही मन अनगिनत यादों का सफर तय कर लेते हैं।

मानसी, सुबह सुबह करीब ६ बजे... चाय की प्याली लिए अपने बरामदे में बैठी किसी दिवा स्वप्न में खोई हुई थी। ये आज कोई पहली बार नहीं था। रोज़ तड़के उठ जाना...नित्य क्रियाओं के बाद यूं चाय ले कर स्वप्नों में कहीं खो जाना....उसकी दिनचर्या में शामिल था। लेकिन आज के चाय की चर्चा इसलिए की गई है यहां...क्यूं कि आज किसी ने इस बात को संज्ञान में लिया है...नोटिस किया है।

प्रीती, अभी अभी मानसी के पड़ोस में रहने आयी है। पच्चीस वर्ष की प्रीती, नगर निगम ऑफिस में एक सहायक के पद पर कार्यरत है। वैसे तो उसका रूप अत्यंत मोहक और आकर्षक है, किन्तु अनापेक्षित दुर्घटनाओं ने उसके चेहरे के तेज को मानो छीन सा लिया है। मानसी, देश पर शहीद हो चुके एक वीर की नवविवाहित विधवा है।

"विधवा"...कैसा शब्द है ये??? अजीब...बहुत अजीब...! किसी स्त्री को शाब्दिक रूप से कमजोर प्रदर्शित करने के लिए शायद इससे बड़ा कोई शब्द नहीं हो सकता। स्त्री कितनी भी सबल क्यूं ना हो...कितनी भी मानसिक शक्ति से मजबूत क्यूं ना हो...ये शब्द समाज की निगाहों में उसे दया का पात्र बना ही देता है।

खैर, प्रीती तो एक वीरांगना है...जिसने कभी भी अपनी सुन्दरता और यौवन का सहारा लेकर अपने पति को देश सेवा की राह से विचलित नहीं किया। उसे याद है...जब वो नई नई शादी कर के आयी थी...पूरे गांव में सिर्फ उसकी सुंदरता के ही चर्चे थे। सशक्त इतनी कि...कभी भी पति के शहीद हो जाने का भय नहीं रहा उसको।

आज प्रीती ने जब मानसी को इस तरह चाय की प्याली लिए किसी स्वप्न में बिल्कुल उदास सा देखा तो....उसने खुद को मानसी की जगह पाया। कैसे वो खो जाया करती थी। कुछ तो समानता थी...उसमे और मानसी में। रोज़ वो दोनो चाय की प्याली लिए कुर्सी पर बैठती तो थी...चाय पीने...लेकिन दो चुस्कियों के बाद वो चाय कभी खत्म नहीं हो पाती थी...दोनों अपने अपने स्वप्नों में कहीं खो जाया करती थीं।

करीब एक महीने हो चुके थे... प्रीती रोज़ मानसी को भरी निगाहों से देखती रहती...लेकिन कोई प्रतिक्रिया ना मिल पाने के कारण कुछ बोल नहीं पाती। लेकिन आज प्रीती ने ठान ही लिया था कि बात तो हो के रहेगी। उसकी उत्सुकता के तूफ़ान रोज़ विशाल हिलोरों के साथ मानसी के बिल्कुल करीब जा कर लौट आते थे।

लेकिन आज प्रीती ने बोल ही दिया,

"दीदी...नमस्ते...! मेरा नाम प्रीती है। मैं यही नौकरी करती हूं...!"

"नमस्ते...!!!" मानसी से इतने अल्प प्रतियुत्त्तर की आशा नहीं थी प्रीति को।

"दीदी...आइए ना चाय पीते हैं...रोज़ रोज़ यूं ही अकेले अकेले चाय पीना भी कोई चाय पीना हुआ ???" प्रीती ने बात को थोड़ा आगे बढ़ाया।

चाय के आशिक़ कभी चाय को इनकार नहीं करते। बस लग गई दो कुर्सियां आज प्रीती के बरामदे में। और बन गई दो प्याली चाय। अब मानसी और प्रीती दोनों के बरामदे में...दो दो कुर्सियां थी। दोस्ती हो गई थी दोनों की। चाय की दोस्ती थी ये...भावनाओं की नहीं।

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दो चम्मच शक्कर...!!!

"प्रीती....चाय बन गई है...आ जाओ जल्दी से।" मानसी ने शाम होते ही आवाज़ लगा दी। मानसी और प्रीती को मानों रोज़ ऐसी ही आवाज़ सुनने की आदत सी हो गई थी।

मानसी जैसे ही बरामदे में चाय की ट्रे लेकर पहुंची... प्रीती पहले से वहां बैठी हुई थी। अब इसे चाय के प्रति सम्मान की भावना कहें या दोनों के मध्य उत्पन्न हो चुके आत्मीय प्रेम में समर्पण का भाव...चाय की पुकार पर कभी भी मानसी या प्रीती की ओर से कोई भी देरी या कोई भी इंतजार संभव ही नहीं था।

अभी पहली ही चुस्की ली थी दोनों ने.... कि मानसी उठ खड़ी हुई और प्रीती के हांथों से कप ले लिया।

"अरे क्या हुआ दीदी....???" प्रीती समझ ही नहीं पाई।

"सॉरी यार...बहुत मीठी हो गई है चाय। भूल से एक की जगह दो चम्मच शक्कर डल गई। क्या हो गया है मुझको...?? रुको...मैं दूसरी बना के ले आती हूं।" मानसी के चेहरे पर एक सशंकित भय के बादल व्याप्त थे...मानो कोई अपराध हो गया हो उससे।

"अरे दीदी...बहुत अच्छी चाय है। बस थोड़ी मीठी ज्यादा है आज। वैसे दीदी...एक बात कहूं...शक्कर चाय को कभी मीठी कर ही नहीं सकती। ये तो आपका प्यार है मेरे लिए...जो ये चाय इतनी मीठी लग रही है।" असीम प्रेम के भाव थे...प्रीती के इस कथन में।

वैसे तो प्रेम भाव से उत्पन्न हुए प्रीती के इस बात पर, मानसी क्षण भर के लिए मुस्कुराई जरूर थी...लेकिन अचानक वो बिल्कुल उदास हो गई और बैठे बैठे एक स्वप्न में खो गई............!!!!

"मानसी...एक कप चाय मिल सकती है क्या...??" अमित अभी अभी ऑफ़िस से घर पहुंचा था।

अमित...मानसी का पति...एक कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट है। वैसे तो उच्च शिक्षित और एक संभ्रांत परिवार से संबंध रखता है अमित...लेकिन बात बात में क्रोध के वशीभूत हो जाना...अपशब्दों की बौछार कर देना...आपा खो बैठना...अमित के स्वभाव में है।

"हां...बस अभी ले आयी...! तुम फ्रेश हो लो।" मानसी की चाय करीब करीब तैयार ही थी।

"कैसा रहा दिन...??" मानसी ने अमित को चाय देते हुए पूछा।

अमित ने कोई जवाब ना देते हुए पहली ही चुस्की ली थी कि,

"अरे यार...तुम्हें इस जन्म में चाय बनाने नहीं आयेगी। महीने भर का शक्कर इसी एक कप में डाल दिया है क्या तुमने।" अमित गुस्से से मानो लाल हो चुका था।

"अमित...ये तो मेरा प्रेम है इस कप में...जो ये इतनी मीठी लग रही है...शक्कर तो बस दो चम्मच ही डाली है मैंने।" मानसी ने अमित के गुस्से पर अपने प्रेम की चादर बिछा देने की कोशिश की।

गरम चाय मानसी के हाथों पर जा गिरी...और चाय की प्याली कई टुकड़ों में जमीन पर बिखर गई।

"असल में गलती तुम्हारी नहीं है...तुम्हारे मां बाप की है। जाहिल बना कर बांध दिया मेरे मत्थे। चाय बनाना तक नहीं सिखाया। पूरे दिन ऑफिस में माथा खराब कर के घर आओ...और फिर तुम को झेलो। किस मनहूस घड़ी में तुमसे मेरा विवाह हुआ... हे भगवान...!!!" अमित का गुस्सा सातवें आसमान पर था।

मानसी स्तब्ध और भयाक्रांत चुपचाप खड़ी रही। अपने हाथों में पड़े छालों पर तो उसकी नज़र ही नहीं गई। अश्रुपूरित आंखों और जले हुए हाथों से कप के टुकड़ों को उठाती मानसी अपनी मां की यादों में खो गई.......

"बेटा...घर का काम मत सीख...!! जब शादी के बाद पति खाना मांगेगा तो बस यही गाना बजाना परोस देना...। एक कप चाय तो बनाना सीख लो...मेरी नाक तो कटवा के ही रहोगी तुम ससुराल में...!" मां के ऐसे ताने सुनना अब मानसी की आदत सी हो गई थी। गाने का बहुत शौक था उसको।

"हां...हां...परोस दूंगी गाना ही। अब खुश....! वैसे भी मेरी शादी जहां होगी...वहां नौकरों की फौज़ होगी...माताश्री...! रानी बन के रहूंगी मैं...रानी...।" मानसी और उसकी मां के बीच ऐसे वाद विवाद होना एक आम बात थी।

"अरे फिर सुबह सुबह शुरू हो गई...मेरी प्यारी बिटिया को कोसने का कोई भी मौका मत छोड़ो।" मां बेटी के इस विवाद में मानसी के पापा बिना बुलाए ही कूद पड़े थे।

"मेरी बेटी नहीं...मेरा बेटा है ये...क्यूं बनाएगी ये खाना...इसका पति बनाएगा...और अपने प्यार भरे हाथों से खिलाएगा भी। काशी नरेश के खानदान में करूंगा अपने बेटी की शादी...मैं। मानसी की मम्मी...शास्त्रीय संगीत की संध्या में जब मेरी बेटी अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही होगी ना...तुम्हारे जैसे चाय बनाने वाले तब इससे मिलने को तरसेंगे...!!!" मानसी का भरपूर पक्ष ले लिया था उसके पापा ने।

"बिगाड़ लो...बेटी को...मेरा क्या है..!! तुम भी चले जाना ससुराल साथ निभाने...! जिसका घर चूता है ना...उसी को छवाना पड़ता हूं....।" मानसी की मां ने हथियार डाल दिए थे।

हमारे समाज की भी एक अलग ही परिपाटी है...एक अलग ही विडंबना है। यहां स्त्री को पूज्य माना जाता है...लेकिन तब जब वो सर्व गुण संपन्न हो। उसे खाना बनाना आता हो...वो भी अच्छा खाना। उसे घर के सारे काम हंसते हुए करने होते हैं। मां सबसे पहले अपनी बेटी को ही रसोई में आने को प्रेरित करती है। मां के हाथ से छूटा बेलन सबसे पहले बेटी के हाथ में ही आता है।

लेकिन बेटे के हाथों में क्यूं नहीं???

इस सवाल का जवाब व्यक्तिगत तौर पर शायद नहीं दे सकता मैं। मेरा अहंकारपूर्ण पुरुषत्व मुझे इसकी आज्ञा नहीं देता। हां...लेकिन एक लेखक के तौर पर...अवश्य कुछ कह सकता हूं।

शायद, ये व्यवस्था किसी पुरुष ने ही लिखी होगी। शायद फिर बलात अपनी इस व्यवस्था का पालन भी सुनिश्चित करवाया होगा। शायद, हर मां को मजबूर किया होगा...इस पुरुष प्रधान समाज को स्वीकार करने के लिए। शायद, यह भी कहा हो... हे मां...तेरा कर्तव्य सिर्फ पुरुष को जन्म देने के साथ ही पूर्ण हुआ...अब तुझे उसी पुरुष के बनाए नियमों पर चलना होगा। शायद, दमन कर दिया होगा...एक स्त्री के सभी उन्मुक्त विचारों को...जो उसके अंतर्मन में उत्पन्न हुए होंगे।

फिर किसी मां ने इसका विरोध क्यूं नहीं किया...?? क्यूं नहीं कहा... कि खाना बनाना एक कार्य नहीं...एक कला है... जो समान रूप से बेटे और बेटी दोनों को सीखना होगा। क्यूं नहीं कहा कि पुरुष और स्त्री, एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं...दोनों एक दूसरे के बिना पूर्ण नहीं। क्यूं नहीं बताया कि...चाय की मिठास शक्कर से नहीं...दो लोगों के आत्मीय प्रेम से होती है।

अपने ही स्वप्नों में खोई मानसी को अमित ने बांह पकड़ के ऐसे जोर से झकझोर दिया...मानो आज अमित के उपर तो जैसे कोई शैतान ही सवार हो गया हो।

मानसी चौक गई। स्वप्न लोक से बाहर आ गई थी वो।

"अरे दीदी...क्या हुआ??? कहां खो गई आप??" प्रीती, मानसी की बांह पकड़े उसे स्वप्न से जागते हुए बोली....

"ऐसा क्या सोचने लगी दीदी...दो चम्मच शक्कर ही तो है....कौन सी बड़ी बात हो गई...?? अच्छा मैं चलती हूं...कल की चाय मैं बनाऊंगी...! और बिना शक्कर की फीकी चाय पिलाऊंगी आपको....!!!" प्रीती मुस्कुराती हुई अपने घर की ओर चल दी।

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चाय की तासीर...!!!

चाय के दीवानों का भी क्या कहना है। गर्म से गर्म चाय की तासीर को भी वे ठंडी ही बताते हैं। ठंडी हो चुकी चाय में कोई रस नहीं होता यहां। पांच रुपए भी कोई खर्च नहीं करता...ठंडी चाय पर। हमारे समाज में प्रायः एक व्यक्ति और एक चाय में एक विरोधाभास पाया जाता है। चाय गर्म पसंद होती है सबको...लेकिन तासीर उसकी ठंडी है। व्यक्ति ठंडे स्वभाव के अच्छे माने जाते हैं...तो देखो...तासीर सबकी गर्म ही होती जा रही है आजकल।

खैर, आज प्रीती की बारी थी चाय बनाने की। सो, 

समय का बिल्कुल पाबंद विद्यार्थी, जैसे अपने गुरुजी के आने से पांच मिनट पूर्व ही अपनी जरूरी किताबों को लेकर यथा स्थान उनके इंतजार में बार बार दरवाज़े पर झांकता रहता है...ठीक उसी तरह प्रीती भी बार बार मानसी के दरवाजे की ओर झांक रही थी। 

"दीदी....अरे ओ दीदी...कहां हो...आ जाओ..!! बन गई चाय..." प्रीती ने आवाज़ लगाई।

उदास सी बैठी मानसी, प्रीती की आवाज़ सुनते ही जैसे एक ऊर्जा से पूर्ण हो गई। बैठ गए दोनों...चाय की प्याली लिए हुए।

"प्रीती...तुमने दोबारा शादी क्यूं नहीं की...?" मानसी ने एक मुक्त प्रश्न छेड़ दिया था। "इतनी सुंदर हो तुम...फिर नौकरी भी करती हो...बहुत सी शादियाँ मिल जाती तुम्हें...दुवाह...!!"

"दुवाह....ये दुवाह क्या होता है दीदी....???" प्रीती ने बड़ी उत्सुकता से पूछा।

"अरे...मतलब ऐसे आदमी जिनकी पत्नियां नहीं होती या ऐसी औरतें जिनके पति नहीं होते...सेकंड मैरिज वाले लोग यार....!!!" मानसी ने जवाब दिया।

प्रीती का चेहरा जैसे एक उदासी से भर गया।

"क्यूं दीदी... मैं इतनी बुरी हूं क्या?? सिर्फ सेकंड मैरिज वाले ही मुझसे शादी कर सकते हैं...नॉर्मल लड़के नहीं...???" प्रीती ने मजाक भरे लहजे में बोला।

"बात तो सही है...! एक विधवा के लिए एक विधुर ही क्यूं...?? या फिर एक विधुर के लिए एक विधवा ही क्यूं??? ऐसे सामाजिक विभाजन का क्या अभिप्राय हो सकता है...?? ऐसे वैवाहिक विधानों की स्थापना क्यूं हुई??? क्यूं लोग आगे आ कर, पूर्ण सामाजिक सम्मान के साथ ऐसी वीर वधुओं का वरण नहीं करते...?? अभी उम्र ही क्या है बेचारी की...?? पच्चीस वर्ष...!! आजकल यही तो एक सामान्य उम्र है शादी की। फिर ऐसी सोच...क्यूं है समाज की....???" मानसी अंतर्युद्ध से घिरी हुई थी।

"अरे दीदी...कहां खो गई...?? इतना ना सोचो आप...!!" प्रीती ने विषय को बदलने की कोशिश की।

"लेकिन दीदी...ये बताओ...ये पुनर्विवाह जरूरी है क्या...?? एक स्त्री का अस्तित्व क्या एक पुरुष के साथ ही सार्थक हो सकता है..?? विवाह एक संस्कार है...मेरा इससे तनिक भी विरोध नहीं...और उस संस्कार का मैंने वरण भी कर लिया। अब दोबारा उसी संस्कार को निभाना क्यूं जरूरी है...??भगवान की इच्छा होती तो...आज मेरे पति मेरे साथ होते। विवाह के तीन माह बाद ही...मुझे यूं अकेला छोड़ क्यूं चले जाते।" प्रीती ने अपने मन के भावों को मानसी के हवाले कर दिया था।

"ऐसा नहीं है बहन...विवाह सिर्फ सामाजिक रीतियों की बात नहीं है। वंश वृद्धि की एक राह है...ये विवाह। मातृ, पितृ, भाई, बहन, सास, ससुर जैसे अनगिनत रिश्तों का आधार है...ये विवाह। जीवन के इक पड़ाव पर जब कोई तुम्हारे साथ नहीं होता...जीवनसाथी ही तो होता है...जो तुमसे बात करता है...तुम्हे ढांढस देता है...तुम्हारे सुख दुख में साझीदार बनता है...!" मानसी कह तो रही थी ये बातें...लेकिन एक हद तक वो खुद पूर्णतया सहमत नहीं थी उन बातों से...।

"उम्र के इस पड़ाव पर कहां है...मेरा जीवनसाथी?? धन की लोलुपता...!!! हां...इसी धनलोलुपता ने ही दूर कर रखा है अमित को...मुझसे...!! कहां है मेरे सुख दुख का साझीदार...?? मैं भी तो प्रीती की ही तरह हूं। बस मेरी मांग में सिंदूर है...और उसके नहीं..!! जीवनसाथी का अभाव तो दोनों को ही है। ऐसे विवाह से तो अविवाहित होना ही ठीक है।" मानसी अपने किए हुए सवालों में ही घिरती जा रही थी।

"लेकिन इसका मतलब क्या...पुनर्विवाह बुरी चीज है...??? बड़े बड़े महापुरुष हुए हैं...जिन्होंने इसी के लिए लड़ाइयां लड़ी...समाज का विरोध झेला...निरुद्देश्य तो नहीं रहा होगा ये सब। सिर्फ संतानोत्पत्ति या वंश वृद्धि ही इतने बड़े जन आंदोलनों का आधार तो नहीं रही होगी।" मानसी को अपने ही विचारों से विरोधाभास हो रहा था।

विचारों के इसी विरोधाभास में, आज फिर मानसी की चाय ठंडी हो गई थी...!!! आज फिर वो चाय अपना सम्मान खो बैठी थी...!!! क्यूं??? क्यूं कि अब वो ठंडी हो चुकी थी। लेकिन आज उस ठंडी चाय ने मानसी को एक संकल्प लेने पर मजबूर कर दिया था।

"मैं अपने बेटे का विवाह... प्रीती से ही करूंगी। भले ही मुझे भगवान का विरोध भी क्यूं ना झेलना पड़े। विवेक, मेरा बेटा है...मेरा अंश है...। मेरी भावनाओं से उसका विरोध हो ही नहीं सकता। एक साल ही तो छोटा है वो प्रीती से। ऐसा कोई लिखित विधान है क्या...की लड़की छोटी ही होनी चाहिए।" 

मानसी बहुत दिनों बाद आज हृदय से प्रसन्न हुई थी। चलते चलते उसने प्रीती को गले से लगा लिया था। भावुक सी हो गई थी वो।

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प्रणय निवेदन वाली चाय...!!!

सुबह से ही आज घने बादल थे। बस बारिश नहीं हो रही थी। मानसी अकेले ही घर में पड़ी पड़ी बार बार खिड़की से बादलों की ओर निहार रही थी। तभी घर की डोर बेल बजी। डोर बेल लगातार ही बजती जा रही थी।

"अरे...आती हूं भाई...कौन है...??? दरवाज़ा ही तोड़ दो...इससे अच्छा तो...!!" खुद से ही बात करते मानसी ने दरवाजा खोला।

"दीदी... मैं आ गई...!!" प्रीती ने मानसी को गले से लगाते हुए बोला।

" अच्छा तो तुम हो ये...घंटी पे घंटी बजाए जा रही... मैं सोच रही कौन है ये पागल...!!" मानसी हँसते हुए बोली।

"हां... मैं ही हूं वो पागल....दीदी। चलो आप बैठो...आज मैं बनाती हूं...चाय आपके लिए....चार चम्मच शक्कर वाली...!!!" प्रीती ने बड़े ही चुलबुले अंदाज़ में बोला।

"ठीक है बाबा...तुम्हीं बनाओ...लेकिन मैं एक बात बोलूं...मुझे तुम दीदी ना बुलाया करो...आंटी बोला करो।" मानसी ने प्रीती से कहा।

"अरे...क्यूं...आप आंटी लगती ही नहीं..!!! मुझसे चार पांच साल ही तो बड़ी होगी आप...??" प्रीती ने मानसी से अपने बात की सहमति मांगी।

"तुम्हारे जितना बड़ा तो मेरा बेटा है....!" मानसी , प्रीती के गालों पर स्नेह भरे हाथ फेरती हुई बोली।

" ओहो...ये तो मैं पूछना ही भूल गई... कौन कौन है आपकी फैमिली में..??" प्रीती ने रसोई से ही पूछना शुरू किया।

"फिल हाल तो मैं...यहां अकेली ही हूं। बैंगलोर में मेरे पति हैं...दिल्ली में मेरा एक बेटा है...और बेटी भी वही है। बेटी की शादी हो गई। बेटा वहां जॉब करता है...विवेक नाम है उसका।" 

"अच्छा...! तभी कोई दिखाई नहीं देता यहां।" प्रीती ने हामी भरी।

"हां...लेकिन विवेक से आज मिल लोगी तुम...रास्ते में है वो...आ ही रहा होगा...मैंने बुलाया है उसे...!!!" मानसी बोली।

"अच्छा...तो तीन कप चाय बना दूँ क्या...??" आज प्रीती काफी प्रसन्नचित थी।

विवेक...एक सौम्य हृदय, आज्ञाकारी व सामान्य सा लड़का था। बचपन से मानसी ने ही उसे मां और बाप दोनों का प्यार दिया। आज मानसी ने उसे प्रीती से मिलवाने के लिए ही बुलाया था।

"कैसे कहूंगी विवेक से??? कैसे प्रस्ताव रखूंगी उसके सम्मुख... प्रीती का..??? क्या विवेक मेरी बात मानेगा...??? फिर उसके पापा को कौन समझाएगा...?? सबको समझा लो...फिर प्रीती को भी तो राज़ी करना पड़ेगा।" अनगिनत सवाल थे मानसी के मन में।

दोनों चाय पी ही रहे थे कि...विवेक आ गया।

" मां...कैसी हो..??" पैर छूते हुए विवेक ने पूछा।

"मस्त...तुम कहो..?? इतनी देर कहां कर दी आने में...??" इससे मिलो....ये प्रीती है...मेरी टी पार्टनर...!!" मानसी ने प्रीती की ओर इशारा करते हुए कहा।

दोनों ने हाथ उठा कर एक दूसरे का अभिवादन किया..."हाई....!!"

"अच्छा तो मैं चलती हूं दीदी.....आ...आ.... सॉरी...आंटी.." प्रीती मुस्कुराती हुई चल दी।

रात के नौ बज रहे थे। बारिश के बादल छंट गए थे। चांदनी रात थी। विवेक और मानसी छत पर बैठे लूडो खेल रहे थे। 

"विवेक...अगर मैं कहूं कि मैंने तुम्हारी शादी के लिए एक लड़की पसंद कर ली है...??" मानसी ने विवेक की ओर देख कर बोला।

"कौन...?? वो प्रीती से...??" विवेक ने मानो मानसी के मन की बात पढ़ ली थी।

"तुझे अच्छी लगी वो...???" मानसी उत्साहित हो कर विवेक की ओर उन्मुख हो गई।

" हां...लड़की जैसी है...उसमे अच्छा और बुरा क्या लगना...??" विवेक चुप हो गया। काफी देर तक दोनों चुप ही बैठे रहे।

"हां...तो शादी पक्की समझूं मैं...??" विवेक ने हंसते हुए कहा।

"विवेक... प्रीती एक विधवा है...!" मानसी की आंखे बिल्कुल विवेक के चेहरे पर ठहरी हुई थी।

"क्या...??? ये क्या कह रही हो मां...?? और तुम मेरी शादी उससे कराना चाहती हो?? पूरी दुनिया में अब लड़कियाँ ही नहीं बची...?? मजाक कर रही हो ना...??" विवेक का नाराज़ होना शायद स्वाभाविक भी था।

"अच्छा...तो क्या कमी है उसमें...??? विधवा होना तुम्हारी नज़र में कमी है क्या??? यही कारण है कि उससे तुम्हारा विवाह नहीं हो सकता??? फिर तो तुम्हें मुझे भी अस्वीकार कर देना चाहिए??"

"मां...!!! अब तुम्हारी और प्रीती की क्या तुलना है...??" विवेक कटाक्ष करता है।

"क्यूं...अगर... प्रीती एक विधवा है...फिर तो मैं भी एक विधवा ही हुई ना...उसके भी पति नहीं हैं??? मेरे भी नहीं हैं??? क्या अंतर है...मुझ में और उसमे...अगर सिर्फ पति का होना ना होना ही एक स्त्री को विधवा का दर्ज़ा दे सकता है तो... पिछले चार सालों से तुम्हारे पापा ने कभी मेरी खबर नहीं ली...कभी मुझसे मिलने नहीं आए...!" मानसी की आंखे भर आयी थी।

"मां...ये कैसी बात कर रही तुम...??" विवेक ने अपने हाथ मानसी के मुख पर रख दिए।

" बात तो सही है...कैसा घिनौना शब्द है ये...विधवा...!!! जब मैं अपनी मां के लिए ऐसे शब्द नहीं सुन सकता...तो उस दुखियारी प्रीती के लिए...!! उसमे उसका क्या दोष। कैसा अज्ञानी हूं मैं?? बल्कि सामान्य लड़कियों की अपेक्षा तो प्रीती को और अधिक संबल की आवश्यकता है। उसे एक ऐसे साथी कि जरूरत है...जो उसे यह विश्वास दिला सके... कि वो उम्र भर उसका साथ देगा। उसके हर दुख सुख में साथ रहेगा। फिर मां ने कहीं ना कहीं प्रीती में अपनी ही कोई ना कोई प्रतिमूर्ति देखी होगी...तभी तो मेरे लिए चुना उसको। कोई भी मां अपने बेटे के लिए बुरा क्यूँ चाहेगी।" विवेक अपराधबोध में धंसा जा रहा था।

"मां...मुझे माफ़ कर दो...!!! मैं स्वार्थी हो गया था। समाज के दिखावे में खुद को भुला बैठा था। सोचा...लोग क्या कहेंगे?? मैं क्या जवाब दूँगा खुद को...ये सोच ही नहीं पाया। तुम्हारे विचारों से मेरा जरा भी विरोध नहीं। माफ़ कर दो...!" विवेक ने मानसी को गले से लगा लिया था।

हमारा समाज अपनी सुविधानुसार नियमों और सिद्धांतों को अपनाता है। उन नियमों की व्याख्या करता है। लेकिन समाज के बने बनाए दकियानूस नियमों के विरुद्ध जाकर आज सोचने की आवश्यकता है। जन मानस की भावनाओं को महसूस करने की आवश्यकता है।

शाम की चाय का वक़्त था। आज प्रीती के घर पर मानसी के साथ विवेक भी गया हुआ था।

"प्रीती...अगर तुम्हें कोई ऐतराज़ ना हो...तो मेरी ये दिली ख़्वाहिश है कि तुम्हारी चाय मुझे इस जन्म में यूं ही रोज़ मिलती रहे। तुम मुझे अगर अपने योग्य समझो तो...मुझे स्वीकार करो।" विवेक ने अपना प्रणय निवेदन प्रीती के सम्मुख रख दिया था।

प्रीती की आंखों के आंसूओं ने विवेक का प्रणय निवेदन स्वीकार कर लिया था। मानसी ने उसे गले से लगा लिया। 

"बैठो तुम दोनों...बातें करो... मैं सबके लिए लाती हूं...चाय बना कर...चार चम्मच शक्कर वाली खूब मीठी चाय....!!" मानसी ये कहते हुए रसोई की ओर चल दी।



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