"बस थोड़ा सा लगाव था"
"बस थोड़ा सा लगाव था"
Chapter:-01 , प्यार - मोहब्बत
कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे रिश्तों से मिलवाती है जिनका कोई नाम नहीं होता, पर उनका असर पूरी ज़िंदगी रहता है। कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में आते हैं और बिना कुछ कहे सब कुछ बन जाते हैं, लेकिन जब वो जाते हैं तो अपने साथ हमारा एक हिस्सा भी ले जाते हैं, जो फिर कभी वापस नहीं आता।
दक्ष और निशा… ये सिर्फ दो नाम नहीं थे , बल्कि एक ऐसी कहानी थी जिसमें एहसास बहुत थे , लेकिन शब्द बहुत कम। उनकी मुलाकात कॉलेज के पहले दिन हुई थी। भीड़ भरे कैंपस में एक छोटी सी टक्कर ने उन्हें एक-दूसरे से मिलवाया। “Sorry” निशा ने कहा था , और दक्ष बस उसे देखता रह गया। उस दिन से लेकर आखिरी दिन तक , उसे उसकी वो पहली “sorry” याद रही , पर निशा कभी ये समझ नहीं पाई कि उसी पल से उसकी कहानी शुरू हो चुकी थी।
धीरे-धीरे उनकी दोस्ती गहरी होती गई। क्लास साथ , कैंटीन साथ , प्रोजेक्ट्स साथ , और कभी-कभी खामोशियाँ भी साथ। लोग अक्सर उन्हें देखकर मुस्कुरा देते और पूछते “तुम दोनों में कुछ चल रहा है क्या?” हर बार निशा हँसकर टाल देती “हम बस अच्छे दोस्त हैं।” दक्ष भी मुस्कुरा देता , लेकिन हर बार उसके अंदर कुछ टूट जाता था।
दक्ष के लिए निशा सिर्फ एक दोस्त नहीं थी। सुबह उठते ही उसका “Good morning” और रात को सोने से पहले उसका “Good night” वो उसकी आदत थी , उसका सुकून थी , उसकी हर सुबह की पहली सोच और हर रात की आखिरी दुआ। इन दोनों के बीच ही उसकी पूरी दुनिया बसती थी। वो उसकी हर छोटी बात नोटिस करता था , उसका पसंदीदा गाना , उसकी हँसी का तरीका , और वो पल जब वो सच में खुश होती थी।
दक्ष रोज़ भगवान से एक ही दुआ करता था , “बस एक बार उसे मेरा बना दो।” वो मंदिर भी जाने लगा था , जिसे वो पहले सिर्फ त्योहारों में याद करता था। लेकिन उसकी मोहब्बत हमेशा उसकी खामोशी में ही कैद रही।
निशा के लिए दक्ष उसकी ज़िंदगी का सबसे भरोसेमंद दोस्त था। वो उससे हर बात शेयर करती थी। अपनी खुशियाँ , अपने डर , यहाँ तक कि अपने क्रश के बारे में भी। और हर बार दक्ष मुस्कुराकर सब सुन लेता था , जैसे उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता , जबकि अंदर ही अंदर उसका दिल हर बार थोड़ा और टूट जाता था।
एक दिन निशा बहुत खुश थी। उसकी आँखों में चमक थी और आवाज़ में एक अलग ही खुशी। उसने आते ही कहा , “दक्ष, I think I’m in love” ये सुनते ही दक्ष के अंदर सब कुछ जैसे थम गया, लेकिन उसने फिर भी मुस्कुराकर पूछा , “अच्छा? कौन है वो Lucky guy?” उस दिन उसने पहली बार महसूस किया कि दर्द बिना आवाज़ करें भी होता है।
उस दिन के बाद सब कुछ धीरे-धीरे बदलने लगा। निशा अब पहले जितना समय उसे नहीं देती थी। कॉल्स कम हो गए , मैसेज छोटे हो गए , और “busy हूँ” एक नया जवाब बन गया। दक्ष सब समझ रहा था , लेकिन मान नहीं पा रहा था।
एक शाम उसने बहुत हिम्मत जुटाई। उसने सोचा कि आज वो सब कुछ बता देगा। वो निशा के सामने खड़ा था , दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसने कहा “निशा , मुझे तुमसे कुछ कहना है…” लेकिन इससे पहले कि वो अपनी बात पूरी करता , निशा ने उसे रोक दिया “दक्ष, please… मुझे ये सब awkward नहीं करना। तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो , बस वही रहो।” मैं जानती हूं कि तुम मुझे बहुत पसंद करते हों और मैं ये भी जानतीं हूं कि तुम मुझे कभी बताओगे नहीं , तुम्हारे जितना भरोसा मुझे कीसी और पर नहीं है , तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो , बस वही रहो।
उस “बस” शब्द ने उसके सारे हौसले तोड़ दिए। दक्ष ने कुछ नहीं कहा , बस हल्का सा मुस्कुरा दिया , जैसे उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा। लेकिन उस दिन के बाद वो कभी पहले जैसा नहीं रहा। वो अब भी उससे बात करता था , लेकिन पहले जैसी बात नहीं थी। अब वो अपनी feelings छुपाने में और भी माहिर हो गया था। और इसी कारण धीरे-धीरे निशा किसी और की हो गई।
Chapter:-02 , मुलाकात
साल बीत गए। कॉलेज खत्म हो गया , रास्ते अलग हो गए , निशा ने शादी करली और दोनों की जिंदगी अपने-अपने रास्तों पर चल पड़ी। लेकिन कुछ चीज़ें कभी खत्म नहीं होतीं , बस अंदर कहीं रह जाती हैं।
एक दिन किस्मत ने फिर से उन्हें आमने-सामने ला खड़ा किया। एक कैफे में , जहाँ दोनों अचानक टकरा गए। पहले जैसी हँसी नहीं थी , बस एक हल्की सी मुस्कान थी। कुछ देर तक दोनों चुप बैठे रहे।
फिर निशा ने धीरे से पूछा “दक्ष… सच बताओ… क्या था तुम्हें मेरे साथ?”
दक्ष ने कुछ पल तक निशा देखा , जैसे वो फिर से वही कॉलेज वाला लड़का बन गया हो। फिर उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा “कुछ नही निशा , बस थोड़ा सा लगाव था”
लेकिन दक्ष के लिए वो “थोड़ा सा लगाव” उसकी पूरी ज़िंदगी था। वो आज भी लोगों के बीच हँसता है , बातें करता है , लेकिन अंदर से हमेशा खाली रहता है। क्योंकि कुछ कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। वो बस हमारे अंदर जिंदा रह जाती हैं। और कुछ मोहब्बतें ऐसी होती हैं जो कभी मुकम्मल नहीं होतीं ,फिर भी पूरी ज़िंदगी साथ रहती हैं।
निशा मंद सा मुस्कुरा दी। लेकिन इस बार उसकी आँखों में नमी थी। वो कुछ सेकंड तक दक्ष को देखती रही और फिर धीरे से बोली ,
“झूठ बोल रहे हो तुम”
दक्ष चौंक गया।
निशा ने अपनी बैग से एक पुरानी डायरी निकाली , और उसे उसकी तरफ बढ़ा दिया। “ये रखो तुम्हारी डायरी! जो तुमने कॉलेज के आखिरी दिन लाइब्रेरी में भूल दी थी” दक्ष के हाथ काँप गए।
निशा बोली ,
“मैंने इसे पढ़ा था , हर एक पन्ना , हर एक लाइन”
उस डायरी में ,
दक्ष ने अपनी हर वो बात लिखी थीं ,जो वो कभी कह नहीं पाया। उसमें उसकी हर दुआ थी , हर दर्द था और हर वो “I love you”
जो कभी उसके होंठों तक नहीं आ पाया।
निशा की आवाज़ टूट रही थी “मुझे सब पता था दक्ष , सब कुछ पर मैं समझ नहीं पाई , या शायद समझना नहीं चाहती थी” कुछ पल की खामोशी छा गई। फिर निशा ने धीरे से कहा
“काश… तुम एक बार बोल देते…”
दक्ष हल्का सा हँसा…
“और काश… तुम एक बार समझ लेती…”
दोनों की आँखों में आँसू थे , पर अब बहुत देर हो चुकी थी। निशा किसी और की हो चुकी थी , और दक्ष अब भी उसी “थोड़े से लगाव” में जी रहा था।
और उस दिन के बाद दोनों फिर कभी नहीं मिले। पर इस बार कहानी अधूरी नहीं थी , बस बहुत देर से पूरी हुई थी।
कभी-कभी हम किसी को खोने के बाद समझते हैं कि वो हमारे लिए क्या था , और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। दक्ष के जाने के बाद , ज़िंदगी तो चल रही थी , पर वैसी नहीं जैसी पहले थी। सब कुछ था लोग ,रिश्ते ,हँसी। पर अंदर कहीं एक अजीब सा खालीपन रह गया था ,जिसे निशा समझ नहीं पा रही थी , या शायद समझकर भी अनदेखा कर रही थी।
निशा ने हमेशा दक्ष को एक “best friend” की तरह देखा था। वो उसकी आदत था। उसकी comfort zone वो इंसान जिसके सामने वो बिना सोचे कुछ भी कह सकती थी। पर उसने कभी ये जानने की कोशिश ही नहीं की , कि उसके हर शब्द… किसी और के दिल पर क्या असर डालते हैं।
जिस दिन उसे वो डायरी मिली थी , वो दिन उसकी ज़िंदगी का सबसे भारी दिन था। शुरुआत में उसने सोचा ,बस ऐसे ही पढ़ लेती हूँ। पर जैसे-जैसे वो पन्ने पलटती गई उसकी साँसें भारी होती गईं। हर पन्ने पर दक्ष था। उसकी बातें , उसकी दुआएं , और वो मोहब्बत जिसे उसने कभी देखा ही नहीं।
एक जगह लिखा था—
"आज फिर वो किसी और के बारे में बात कर रही थी…
और मैं मुस्कुरा रहा था…
जैसे कुछ महसूस ही नहीं होता…"
ये पढ़कर , निशा के हाथ काँप गए। उसे पहली बार एहसास हुआ , कि वो कितनी बार उसे तोड़ चुकी है।
एक और पन्ने पर लिखा था
"मैं उसे कभी बताऊंगा नहीं ,क्योंकि उसे खोने से अच्छा है ,उसे दूर से खुश देखना"
अब निशा की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। उसे समझ आ रहा था ,कि वो जिस प्यार की तलाश में थी ,वो उसके सामने ही था। पर उसने कभी उसे देखा ही नहीं।
उस दिन के बाद निशा बदल गई। वो उसी कैफे में जाती जहाँ वो दोनों साथ बैठते थे उसी सीट पर जहाँ दक्ष चुपचाप उसे देखा करता था। अब वो वहाँ अकेली बैठती थी और हर बार उसे वही खामोशी महसूस होती जो शायद पहले दक्ष महसूस करता था। उसके रिश्ते में भी अब पहले जैसी बात नहीं रही। वो मुस्कुराती थी पर दिल से नहीं। क्योंकि अब उसे समझ आ चुका था कि कोई भी उसके दिल के इतने करीब था ही नहीं जितना दक्ष था।
सालों बाद जब वो उससे मिली उसने सोचा था , शायद अब भी कुछ बाकी हो ,शायद अब वो कह दे , पर जब दक्ष ने कहा “बस थोड़ा सा लगाव था…” तो उस एक लाइन ने निशा को अंदर से तोड़ दिया। वो समझ गई थी ,कि कुछ लोग अपना सब कुछ देकर भी आखिर में “कुछ नहीं” बन जाते हैं।
अब निशा अक्सर रात को जागती है , और सोचती है ,
"काश उस दिन मैं उसे बोलने देती" , "काश मैंने एक बार उसकी आँखों को पढ़ लिया होता"
पर अब…
ना वो वक्त वापस आएगा ना वो इंसान। और आज निशा भी उसी “थोड़े से लगाव” को अपने अंदर लिए जी रही है।
फर्क बस इतना है—
दक्ष चुपचाप रोता था…
और निशा…
अब हर रोज़ टूटती है।
Chapter:-03 , 10 साल बाद ,
वक्त बीत गया…
दिन महीनों में बदले महीने सालों में ,और देखते ही देखते दस साल गुजर गए। ज़िंदगी ने दोनों को आगे बढ़ा दिया था ,या शायद बस आगे धकेल दिया था। दक्ष अब पहले जैसा नहीं रहा था। वो अब कम बोलता था ,कम हँसता था ,और ज़्यादा समझने लगा था। उसने जीना सीख लिया था ,पर महसूस करना नहीं। उसकी ज़िंदगी में लोग आए भी पर कोई उसके दिल तक नहीं पहुँच पाया। क्योंकि वहाँ आज भी…सिर्फ एक नाम था , निशा।
निशा की ज़िंदगी भी बदल चुकी थी। रिश्ते बने… टूटे…कुछ फैसले सही थे… कुछ गलत…पर हर बार जब वो अकेली होती तो उसे वही एहसास घेर लेता एक अधूरापन ,एक खालीपन ,जो किसी और से कभी भर ही नहीं पाया।
एक दिन ,किस्मत ने फिर एक बार उन्हें आमने-सामने ला खड़ा किया। इस बार एक शादी में। भीड़ थी , शोर था ,पर उन दोनों के बीच फिर वही खामोशी थी।
निशा ने दूर से उसे देखा…
वो बदल चुका था पर उसकी आँखें , आज भी वैसी ही थीं। दक्ष ने भी उसे देखा एक पल के लिए ,वक्त रुक सा गया। जैसे दस साल बस एक पल में सिमट गए हों।
दोनों आमने-सामने आए , कुछ सेकंड तक बस एक-दूसरे को देखते रहे। कहने को बहुत कुछ था ,पर शब्द कहीं खो गए थे। फिर दोनों हल्का सा मुस्कुराए ,वैसी ही मुस्कान जैसी पहले हुआ करती थी।और बिना कुछ कहे दोनों अपनी-अपनी राह पर चल पड़े। क्योंकि कुछ कहानियाँ फिर से शुरू नहीं होतीं चाहे वक्त कितना भी क्यों ना बीत जाए। और कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से कभी जाते नहीं…
बस…
हमारे अंदर ही कहीं रह जाते हैं।

